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फिल्मों ने किया देश को एकजुट : लेख टंडन

मुम्बई। भारतीय सिनेमा ने देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पहले फ़िल्मों में एक बड़ा उद्देश्य होता था, लेकिन अब उददेश्य को लेकर नहीं, व्यावसायिक दृष्टि से फिल्में बनाई जा रही हैं, इससे आम आदमी सिनेमा से दूर होता जा रहा है। यह बात प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखक श्री लेख टंडन ने “भारतीय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन अपने संबोधन में कहीं। मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 5-6 जनवरी को महाविद्यालय के सभागार में किया गया। अपने संबोधन में निर्देशक लेख टंडन ने कहा कि फिल्में समाज पर अपना गहरा प्रभाव छोडती हैं। भारत एक महान देश है जहां व्यक्ति को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है। अब यह तो फिल्मकार या साहित्यकार पर निर्भर है कि वह इस स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे करता है।

मुम्बई। भारतीय सिनेमा ने देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पहले फ़िल्मों में एक बड़ा उद्देश्य होता था, लेकिन अब उददेश्य को लेकर नहीं, व्यावसायिक दृष्टि से फिल्में बनाई जा रही हैं, इससे आम आदमी सिनेमा से दूर होता जा रहा है। यह बात प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखक श्री लेख टंडन ने “भारतीय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन अपने संबोधन में कहीं। मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 5-6 जनवरी को महाविद्यालय के सभागार में किया गया। अपने संबोधन में निर्देशक लेख टंडन ने कहा कि फिल्में समाज पर अपना गहरा प्रभाव छोडती हैं। भारत एक महान देश है जहां व्यक्ति को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है। अब यह तो फिल्मकार या साहित्यकार पर निर्भर है कि वह इस स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे करता है।

सम्मेलन के पहले दिन उद्घाटन वक्तव्य देते हुए सुप्रसिद्ध पटकथा लेख श्री अतुल तिवारी ने कहा कि सामाजिक यथार्थ और फ़िल्मी यथार्थ में बहुत अंतर होता है। साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है लेकिन दर्पण कभी सच नहीं बोलता। दर्पण हमारे अक्स को उलटा दिखाता है। फ़िल्म की स्थिति भी कुछ इसी तरह की है। कहना मुश्किल है कि फ़िल्म समाज के यथार्थ को कितना सच और कितना झूठ दिखाती हैं?

सतना से आए फिल्म विशेषज्ञ श्री प्रहृलाद अग्रवाल ने दर्शकों की सिनेमाघरों में घट रही संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि सिनेमा कॉमन मैन का मीडिया है। कॉमन मैन को सिनेमा हाल से बाहर करने की साजिश रची जा रही है। समाज के कॉमन मैन को देख कर फिल्मों का निर्माण नहीं किया जा रहा है। वर्तमान में मल्टीपलेक्स सिनेमा की संस्कृति बढ गई है और उसी के अनुसार फिल्में बनाई जा रही हैं। इस महाबाजार ने सिनेमा हाल को समाप्त कर दिया है और आम आदमी को उससे बाहर।

इस कार्यक्रम में कथाकर एवं पटकथा लेखक सुधा अरोड़ा ने एक सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि सिनेमा समाज का पूरा यथार्थ प्रस्तुत नहीं करता है। सिनेमा चीज़ों को भटका देता है और उनके सही संदर्भ भी नहीं बताता है। कुछ फ़िल्में बहुत गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। भारतीय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ विषय पर आयोजित इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश से आए लगभग 200 प्रतिनिधियों, प्रोफेसरों और शोधार्थियों ने हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी और गुजराती भाषाओं में अलग-अलग समानांतर सत्रों में प्रतिभागिता की एवं अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रो. रतन कुमार पाण्डेय, मुम्बई की फिल्म विशेषज्ञ डॉ. वंदना शर्मा, डॉ. हूबनाथ, फिल्मिस्तान फ़िल्म के क्रिएटिव निर्देशक अशोक पुरंग सहित कई शिक्षाविदों, फिल्मों से जुडे लोगों ने भी सिनेमा के सामाजिक परिदृश्य पर प्रकाश डाला।
 
मॉंट्रियल विश्वविद्यालय, कनाडा से आए प्रो. मैथ्यू बॉज़वर्ट ने तीसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन बहुत आवश्यक हैं क्योंकि चर्चा और विमर्श से ही समाज और सिनेमा के बदलते परिदृश्य को समझा सकता है। नेपाल से आए फिल्म निर्देशक आलोक लमसाल ने गिटार के साथ नेपाली गीत प्रस्तुत किए। इसके साथ ही नेपाल के संगम पंत ने सारंगी बजाकर दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। आलोक लमसाल और संगम पंत ने नेपाली सिनेमा पर भारतीय सिनेमा के प्रभाव पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
हरियाणा के अखिल भारतीय जाट सूरमा स्मारक महाविद्यालय, रोहतक से आए वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. रामिन्द्र हुडडा, सहायक प्रोफेसर डॉ. जसमेर सिंह हुडडा, डॉ. समशेर सिंह धनखड, डॉ. राजेश्वर लाठर ने सिनेमा के सामाजिक संदर्भों और खाप-पंचायतों को लेकर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

राजस्थान से आए डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्देशक डॉ. सुधीर सोनी ने पहले सत्र में बोलते हुए सिनेमा के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डाला। वहीं उच्च शिक्षा विभाग राजस्थान की अध्यापिका डॉ. अनिता नायर ने सिनेमा में नारी की स्थिति पर अपनी प्रस्तुति दी। सिम्पली जयपुर पत्रिका के प्रबंध संपादक व राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल के प्रबंधक श्री सोमेन्द्र हर्ष ने कहा कि आज फ़िल्में व्यापार के लिए बन रही हैं न कि आम आदमी के लिए। जयपुर से आई राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल, जयपुर की प्रबंधक श्रीमती अंशु हर्ष ने फ़िल्मों में आई स्वतंत्रता का स्वागत करते हुए कहा कि समाज में आए परिवर्तन से फ़िल्मों में भी परिवर्तन का दौर आया है।

समापन समारोह में कथाकार सूर्यबाला ने कहा कि फ़िल्मों ने समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह पूरी तरह से नहीं किया है। फ़िल्मों में बहुत शक्ति है लेकिन इसे सही दिशा में होना चाहिए। एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय की पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. माधुरी छेड़ा ने कहा कि भारतीय सिनेमा ने सौ साल की अपनी यात्रा में बहुत बड़े कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसमें सिनेमा ने अन्य सभी माध्यमों को पीछे छोड़ दिया है। 

कॉलेज की प्राचार्या प्रो. हर्षदा राठोड़ ने सभी अतिथियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उनके आने से कॉलेज का सम्मान हुआ है। देश भर के विभिन्न भागों से आए हुए प्रतिभागियों ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. रवीन्द्र कात्यायन ने सभी अतिथियों व प्रतिभागियों का धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके आने से ही कार्यक्रम सफल हुआ है।  

इस मौके पर सेंट जेवियर्स कॉलेज की उप-प्राचार्य डॉ. आशा नैथानी दायमा, बनारस के कलाकार आशुतोष पाठक, एलजेएनजे महिला महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. स्मृति भोसले, शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर के प्रोफ़ेसर अर्जुन चव्हाण, उच्च शिक्षा विभाग अजमेर के डॉ. संदीप अवस्थी, युवा संगीत इतिहासकार एवं गायक हार्दिक भटट, अभिनेत्री असीमा भटट ने भी अपने संबोधन में सिनेमा के सामाजिक यथार्थ और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

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