‘प्रताप’ की धरोहर को राष्ट्रीय स्मारक करार दे सरकार

कानपुर। राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर कानपुर प्रेस क्लब में राष्ट्रीय पत्रकारिता पर एक कार्यशाला आयोजित की गयी। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अधिवक्ता और वरिष्ठ पत्रकार कैलाशनाथ त्रिपाठी ने कहा कि आज पत्रकारिता में असहमति की हत्या हो रही है। ये केरल में दक्षिणपंथी पत्रकार और कर्णाटक में वामपंथी पत्रकार की हत्याओं से साफ़ जाहिर है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज की पत्रकारिता में असहमति के लिए जगह कम पड़ रही है, यह विचारणीय पक्ष है जहाँ पर हम में से हर एक पत्रकार को गौर करने की जरुरत है। गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप की पत्रकारिता असहमति की पत्रकारिता है।

प्रताप शताब्दी समारोह के समन्वयक सुधांशु त्रिपाठी ने आयोजन श्रंखला में अब तक किये गए कार्यों का संक्षिप्त प्रगति का ब्यौरा प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि प्रताप शताब्दी समारोह की श्रंखला हमने 9 नवम्बर 2012 को शुरू की गई। इस परंपरा के तहत हमने गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप अख़बार के माध्यम से पत्रकारिता मूल्यों पर गहन चिंतन मनन शुरू किया। इसी श्रंखला में प्रताप अख़बार की जन्म शताब्दी के दिन शुरू हुई यह परंपरा के पांचवे वर्ष तक पहुंची है, इसी कड़ी में हमने विद्यालयों के छात्रों के बीच जाकर संवाद के लिए विद्यालयों में कार्यशालाएं आयोजित की गयीं। इसी श्रंखला में प्रेस क्लब में आयोजित एक कार्यक्रम में शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की तस्वीर भी स्थापित की गई। इस आयोजन का पूरा श्रेय कानपुर प्रेस क्लब, शहर के युवा पत्रकारों और कार्यकारिणी को जाता है।  इसी के अंतर्गत गणेश शंकर विद्यार्थी पर एक शोध ग्रन्थ प्रस्तुत किया गया जिसमे गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप के माध्यम से आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाली पत्रकारिता का अनुपम चित्र प्रस्तुत है। कार्यक्रम में अतहर नईम ने पत्रकारों की हत्या पर निराशा व्यक्त की। वरिष्ठ समाजसेवी ने पत्रकारों से इन विषम परिस्थितियों में अवाम की दशा और दिशा देने का आह्वान किया। 

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पूर्व अध्यापक और गाँधीवादी जगदम्बा भाई ने भारतीय पत्रकारिता के वर्तमान सन्दर्भों में निर्भयता और निष्पक्षता को प्रमुखता से जरुरी बताया। निर्भयता और निष्पक्षता वह सामाजिक सम्पदा है जिससे पत्रकारिता मुखर होती है, सार्वजानिक होती है। आज की व्यावहारिक पत्रकारिता में हमारे पत्रकारों को साहसिक और गंभीर होकर मनन करने की जरुरत है। जब गाँधी ने चंपारण सत्याग्रह किया तो कोई पत्रकार उनको छापने को तैयार न था, लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी ने वह साहस दिखाया। सरकार के खिलाफ गाँधी के सत्याग्रह को छापने का काम बड़े साहस का काम था। गिरफ़्तारी हुई, जेल गए, जब्ती हुई। लेकिन उन्होंने सत्य और साहस का साथ न छोड़ा।उन्होंने बताया कि देश की आज़ादी के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र के ब्राह्मण और हजारी प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती पत्रिका और गणेश शंकर विद्यार्थी के अख़बार प्रताप ने समाज में निर्भयता और निष्पक्षता पैदा की। लेकिन आज पत्रकारों के बीच उस भावना का आभाव बढ़ रहा है। पत्रकारों में आध्यात्मिकता का अभाव है, जिसके चलते पत्रकरिता भ्रामक और खतरनाक हालत बना रही है। उन्होंने प्रलोभन से बच कर निर्भय निर्भय निष्पक्षता का उद्घोष करके करके पत्रकारों को देश के लिए आगे बढ़ने का आह्वान किया।  कार्यक्रम के अध्यक्षता पद्म श्री गिरिराज किशोर ने मुखर पत्रकार चंचल कुमार की गिरफ़्तारी का जिक्र करते हुए अपनी निराशा व्यक्त की। उन्होंने बताया कि आज कई सन्दर्भों में पत्रकारों के सामने चुनौतियाँ हैं, हमारे अख़बारों में कॉर्पोरेट की दखल बढ़ रही है। इसलिए अपने लिखे का रिकॉर्ड रखने की जरुरत है, ताकि आने वाले समय में कानून से दमन शोषण न हो सके। आज अख़बार कहते हैं कि हमे राजनीतिक लेख नहीं चाहिए। अपने बारे में लिखिए। साहित्यकारों की समालोचना का भी ख़त्म हो रही है। उन्होंने बताया कि सरकार पत्रकारिता पर बेहिसाब खर्च भी कर रही है। सरकार ने ग्यारह लाख करोड़ मीडिया को दिया है। इन्ही प्रलोभनों में देश की पत्रकारिता का चरित्र डगमगा रहा है, पत्रकारों और पत्रकारिता की दुर्गति सामने है। हिंदुस्तान अख़बार बिक गया क्योंकि उसमे पत्रकारिता धराशायी हो गई। ओम थानवी के समय तक जनसत्ता सरकारी समालोचना में मुखर रहा लेकिन उसके बाद उसके भी तेवर बदले हैं। आज़ादी की लड़ाई का समय पत्रकारों के इसी संघर्ष का गवाह रहा। उस दौर की पत्रकारिता ने पत्रकारों के लिए और अख़बारों के लिए सम्मान अर्जित किया। तब अंग्रेज अधिकारीयों और ब्रिटिश सांसदों तक को इन्तेजार रहता था कि कानपुर के अख़बारों में आज क्या लिखा गया। लेकिन जब आज कोई विदेशी कभी पूछता है कि उनकी प्रेस कहाँ गयी तो समझ नहीं आता कि क्या जवाब दिया जाए।

आज की पत्रकारिता अपनी बदहाली से कैसे उबरे इस विषयक टिपण्णी करते हुए वयोवृद्ध विष्णु चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त किया। आकाशवाणी के वरिष्ठ पत्रकार रहे श्री चतुर्वेदी ने बताया कि प्रताप आखबार के मकसद से सबक लेना होगा। इसलिए जरुरी है कि पत्रकारिता को किसी दल के साथ टैग न किया जाए। जे.पी और लोहिया के समय सरकार असहमतियों को लेकर उदार थी, लेकिन हमें इमरजेंसी भी देखने को मिली। यही वजह है कि पत्रकारिता को विरोधी होकर निष्पक्ष रहने की जरुरत है। वयोवृद्ध पत्रकार ने चेताया कि मूल्यों के लिए पत्रकारों को प्रलोभन से मुक्त रहना होगा। उन्हें खुद से सीखना होगा और दुनिया के साथ कदमताल करना होगा।

कार्यक्रम में प्रताप शताब्दी समारोह समिति के सचिव भारतेंदु पुरी ने सरकार के सामने पिछली मांगे दोहराया कि सरकार प्रताप और शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी की पत्रकारिता को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करे। ताकि देश की पत्रकारिता में कानपुर का योगदान सुनिश्चित हो सके। कार्यक्रम का संचालन रामकिशोर बाजपेई ने किया, जिन्हें वरिष्ठ पत्रकार विष्णु चतुर्वेदी ने आचार्य की उपाधि दी। अन्य वक्ताओं में राकेश मिश्र, कुलदीप सक्सेना, सत्य प्रकाश त्रिपाठी समेत तमाम लोग मौजूद रहे जिन्होंने कार्यशाला को संबोधित किया और नवोदित पत्रकारों के विचारों को भी सराहा।

Rakesh Mishra
8896485949
सत्यमेव जयते
http://ganga-alliance.blogspot.in

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दो दिनी अलीगढ़ यात्रा : जिया, मनोज, प्रतीक जैसे दोस्तों से मुलाकात और विनय ओसवाल के घर हर्ष देव जी का साक्षात्कार

पिछले दिनों अलीगढ़ जाना हुआ. वहां के छात्रनेता और पत्रकार ज़ियाउर्रहमान ने अपनी पत्रिका ‘व्यवस्था दर्पण’ के एक साल पूरे होने पर आईटीएम कालेज में मीडिया की दशा दिशा पर एक सेमिनार रखा था. सेमिनार में सैकड़ों इंजीनियरिंग और एमबीए छात्रों समेत शहर के विशिष्ट जन मौजूद थे. आयोजन में शिरकत कर और युवाओं से बातचीत कर समझ में आया कि आज का युवा देश और मीडिया की वर्तमान हालत से खुश नहीं है. हर तरफ जो स्वार्थ और पैसे का खेल चल रहा है, वह सबके लिए दुखदायी है. इससे आम जन की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं. सेमिनार में मैंने खासतौर पर मीडिया में आए भयंकर पतन और न्यू मीडिया के चलते आ रहे सकारात्मक बदलावों पर चर्चा की. बड़े मीडिया घरानों के कारपोरेटीकरण, मीडिया में काले धन, मीडिया में करप्शन जैसे कई मामलों का जिक्र उदाहरण सहित किया. 

अलीगढ़ शहर में पहली बार गया था. वहां शहर में सेंट्रल प्वाइंट स्थित मीनार होटल में मुझे ठहराया गया था. प्रोग्राम के बाद अलीगढ़ के जाने माने फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) देखने के लिए निकला. मनोज ने एक बेहतरीन गाइड की तरह अपनी कार में बिठाकर न सिर्फ एएमयू घुमाया बल्कि शहर के चर्चित स्थलों, इमारतों, सड़कों आदि से भी परिचय कराया. मनोज अलीगढ़ी इन दिनों आगरा के ऐतिहासिक स्थलों पर काम कर रहे हैं और उनकी फोटो स्टोरी अमर उजाला में प्रकाशित हो रही है. साथ ही उनके चर्चित फोटो अन्य दूसरे बड़े स्थानीय और राष्ट्रीय अखबारों में छपते रहते हैं. मनोज अलीगढी का फोटोग्राफी के प्रति जुनून देखने लायक था. वे हर पल कुछ नया करने, कुछ नया क्लिक करने, कुछ नया रचने के बारे में सोचते रहते हैं.

जिस युवा और उत्साही पत्रकार ज़ियाउर्रहमान उर्फ ज़िया ने मीडिया पर केंद्रित सेमिनार का आयोजन किया था, वे खुद अपने आप में एक संस्थान की तरह दिखे. छोटी उम्र में उन्होंने छात्र राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र में जिस सक्रिय नेतृत्वकारी भूमिका में काम किया, वह सराहनीय है. बेहद कम उम्र से ही वह अपने आसपास के अंतरविरोधों और उलटबांसियों से दो-दो हाथ करते हुए आज अनुभवों का पिटारा अपने पास रखे हैं. इस आयोजन में उन्होंने बहुत सारे बड़े लोगों, नेताओं, मंत्रियों, अफसरों आदि को बुलाया था लेकिन उनमें से कोई नहीं आया. ज़ियाउर्रहमान ने मंच से कहा कि इस आयोजन ने उनको बहुत सारे सबक दिए हैं. जिया की सक्रियता के कारण उनके ढेर सारे विरोधी भी अलीगढ़ में पैदा हो गए हैं जिनने कार्यक्रम असफल करने की पूरी कोशिश की लेकिन हुआ उल्टा. प्रोग्राम जबरदस्त रूप से सफल रहा. हां, जिन जिन ने आने का वादा किया था और उनके नाम होर्डिंग्स बैनर पर छापे गए थे, उनके न आने से जिया को थोड़ा झटका तो जरूर लगा दिख रहा था. पर वह इस अनुभव का इस्तेमाल आगे के जीवन, आयोजन में करने को तत्पर दिख रहे थे. वो कहते हैं न कि कोई भी युवा अपने जोश जज्बे के कारण समय के साथ व्यावहारिक पहलुओं-अनुभवों से वाकिफ होता जाता है और इस प्रकार पहले से ज्यादा मेच्योर होता जाता है.

बुके देकर सम्मानित करते सीनियर फोटो जर्नलिस्ट मनोज अलीगढ़ी

तस्वीर में सबसे बाएं सोशल मीडिया के चर्चित चेहरे वसीम अकरम त्यागी दिख रहे हैं और कार्यक्रम के आयोजक जियाउर्रहमान खड़े होकर श्रोताओं की तरफ जाने को उन्मुख दिख रहे हैं.

तस्वीर में खचाखच भरा हाल दिख रहा है और कार्यक्रम आयोजक जियाउर्रहमान खड़े कुछ चिंतन मनन करते दिख रहे हैं. 

सबसे दाएं गोरखपुर से आए पत्रकार साथी राशिद और बाएं से दूसरे एडवोकेट प्रतीक चौधरी संग कार्यक्रम की याद सहेजने के वास्ते फोटोग्राफी. 

जिया के एक साथी हैं एडवोकेट प्रतीक चौधरी. वकालत के क्षेत्र में प्रतीक ने अपने जन सरोकारी रवैये के कारण कम समय में अच्छा खासा नाम कमाया है. उन्होंने गरीबों को न्याय दिलाने के वास्ते तरह तरह से लड़ाई छेड़ रखी है और उनके साथ बहुत सारे लोग कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं. प्रतीक ने अलीगढ़ शहर में प्रदूषण से लेकर पुलिस उत्पीड़न तक के मामलों में लंबी लड़ाई लड़ी और उद्यमियों, अफसरों, नेताओं को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया.

कार्यक्रम के अगले दिन अलीगढ़ निवासी वरिष्ठ पत्रकार विनय ओसवाल जी के घर दोपहर के खाने पर जाने का कार्यक्रम बना. मैं, जिया और प्रतीक एक एक कर विनय ओसवाल जी के घर पहुंचने लगे. विनय ओसवाल जी नवभारत टाइम्स में लंबे समय तक हाथरस के संवाददाता रहे. उन्होंने पत्रकारिता को कभी कमाई का जरिया नहीं बनाया. पैसे कमाने के लिए उन्होंने बतौर उद्यमी कई काम शुरू किए और आज वह अपनी फैक्ट्रीज का संचालन करके पूरे परिवार को सम्मानजनक जीवन दे सके हैं. वे अब फिर पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय हो गए हैं. ब्लाग, वेब, सोशल मीडिया के माध्यम से वह खरी खरी बात कहने लिखने लगे हैं.

विनय ओसवाल जी ने बताया कि उनके घर पर थोड़ी ही देर में नवभारत टाइम्स दिल्ली में कई दशक तक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत रहे हर्षदेव जी आने वाले हैं. हर्षदेव जी का नाम तो मैंने सुन रखा था लेकिन उनसे मुलाकात नहीं हुई थी. जब वो आए तो तुरंत उनका एक वीडियो इंटरव्यू किया, जिसे आप इस लिंक https://www.youtube.com/watch?v=LGArckWHAIU पर क्लिक करके देख सुन सकते हैं.

विनय ओसवाल जी (दाएं) के अलीगढ़ स्थित आवास पर वरिष्ठ पत्रकार हर्ष देव (बीच में) के साथ दोपहर का भोजन.

विनय ओसवाल ने सभी लोगों को दोपहर के भोजन में उत्तर और दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसकर दिल जीत लिया. सबने तबीयत से खाया और विनय ओसवाल जी की सेवा भावना और आतिथ्य की सराहना की. मेरे लिए अलीगढ़ की दो दिन की यात्रा यादगार रही. कई नए साथी मिले. कई नए किस्म के अनुभव हुए. लगा कि दुनिया में अच्छे लोग हैं, बस वे बिखरे हैं, उनकी अखिल भारतीय या प्रादेशिक स्तर पर कोई यूनिटी नहीं है. यह भी समझ आया कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अगले पांच दस सालों में बड़े बदलाव से गुजरेगी क्योंकि युवाओं के बीच से ऐसे ऐसे लोग सामने आ रहे हैं जो बिना भय खौफ सच कहने और सच को जीने का साहस रखते हैं. थैंक्यू दोस्तों, दो दिन की अलीगढ़ यात्रा के दौरान आप सबने मेरा दिल जीत लिया.

एएमयू के मुख्य द्वार पर यशवंत. तस्वीर : मनोज अलीगढ़ी

लेखक यशवंत भड़ास4मीडिया के एडिटर हैं. उनसे संपर्क yashwant@bhadas4media.com के जरिए किया जा सकता है.


आयोजन में किन किन का हुआ सम्मान, किसने क्या कहा, संबंधित अन्य तस्वीरें देखने पढ़ने के लिए नीचे क्लिक कर अगले पेज पर जाएं…

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मीडिया का फोकस बदल गया है, सामाजिक दायित्व से ज्यादा उसके लिए आर्थिक लाभ जरूरी हो चला है

ईटीवी, लखनऊ के पत्रकार मनीष सिंह का फ्रीडम आफ स्पीच पर दिया गया पूरा भाषण पढ़ें… बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (केन्द्रीय विवि), लखनऊ में “FREEDOM OF SPEECH AND EXPRESSION – CONTEMPORARY ISSUES AND CHALLENGES” पर आयोजित नेशनल सेमिनार में ईटीवी, लखनऊ के पत्रकार मनीष सिंह ने जो भाषण दिया, वह अविकल नीचे प्रस्तुत है.. सेमिनार में हिन्दुस्तान टाइम्स की सम्पादक सुनीता ऐरन, वरिष्ठ पत्रकार रामेश्वर पाण्डेय के साथ लखनऊ विवि के विधि विभाग के विभागाध्यक्ष रहे अवस्थी जी आदि मौजूद थे…

मंच पर उपस्थित सभी मेरे श्रेष्ठ…

अवस्थी जी…सुनीता जी…पाण्डेय जी….

और, हॉल में मौजूद सभी श्रेष्ठ गुरुजन, छात्र-छात्राओं, मित्रों…..

जब मुझे अम्बेडकर विश्वविद्यालय प्रशासन से इस सेमिनार में मौजूद रहने का आमंत्रण मिला और मुझे पता चला कि अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता पर बोलना है तो मुझे बहुत संतोष हुआ. पिछले कुछ समय से इसपर और इससे मिलते जुलते तमाम मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस चल रही है. ये अच्छा है क्योंकि अब तक सिर्फ गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक उठापटक और उसके अपराधीकरण पर ज्यादा बात होती थी लेकिन, मुझे लगता है कि पहली बार बोलने की आजादी पर इतनी बहस हो रही है. खास बात तो ये है कि इसपर बहस कुछ ही दिनों में थम नहीं गयीं बल्कि लगातार जारी है. अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. जाहिर है कि कुछ न कुछ तो बदलाव आया है कि जिसकी वजह से पूरे देश में इसपर मुद्दे पर चर्चा चल रही है. यहां तक की पूरी दुनियां भी इसपर नजर रखे हुए है कि भारत में इन दिनों क्या हो रहा है…हमें उस बदलाव को महसूस करना होगा जो पिछले समय में आया है.

साहित्याकारों द्वारा अपने पुरस्कार लौटाने के दौर से लेकर जेएनयू के छात्रों की गिरफ्तारी तक इस मुद्दे पर रोज नये अध्याय जुड़ रहे हैं….मैं व्यक्तिगत तौर पर मानता हूं कि जब भी कोई बात हमें नागवार गुजरती है या फिर हम जिसे पसंद नहीं करते तो उसके खिलाफ हमारा जो विरोध शुरु होता है उसके तरीके में बदलाव आया है. नापसंदगी के प्रति जिम्मेदार लोगों का विरोध बेहद तीखा और पहले से कहीं ज्यादा तीव्रता का हो गया है. आमिर खान का ताजा उदाहरण हमारे सामने है. आमिर खान ने देश के सामने एक ऐसी बात रखी जिसे उनकी पत्नी ने उनके सामने रखी थीं. आमिर ने अपने निजी अनुभवों को समाज के सामने रखा था लेकिन, आमिर का विरोध किस रूप में हमारे सामने आया. पहले तो आमिर के बयान के बारे में ज्यादातर लोगों तक गलत ,सूचना पहुंचायी गयी. जैसे आमिर ने ये कहा हो कि उसे भारत से ज्यादा प्यार किसी दूसरे मुल्क से हो. आमिर का प्रकरण सामने आते ही देश के अलग अलग हिस्सों से इस बात की प्रतिक्रिया आने लगी कि ऐसे लोगों को तो पार्टिशन के वक्त ही पाकिस्तान चले जाना चाहिए था. ऐसे लोगों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है…वगैरह…वगैरह….साथ ही आमिर के पुतले फूंकने से लेकर उनकी फिल्मों को दिखाने वाले सिनेमाघरों में तोड़फोड़ तक शुरु हो गयी.

हैरान करने वाली बात तो ये है कि ऐसा आमिर के साथ ही नहीं हुआ बल्कि कई और लोगों के लिए ऐसी ही घटनायें दोहरायी गयीं. अब ये कहां तक उचित है कि जो हमारी पसंद की बात न बोले उसके खिलाफ हिंसक आन्दोलन छेड़ दें. भारत माता की जय बोलने और ना बोलने को लेकर भी ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है. मैं तो ये देखकर हैरान रह गया कि दिल्ली में वकीलों के एक दल ने एबीपी न्यूज की पत्रकार श्रेया बहुगुणा को इन्टरव्यू के दौरान ये कहने के लिए मजबूर करते रहे कि तुम भारत माता की जय बोलो. हालांकि श्रेया ने इस प्रवृत्ति का पुरजोर विरोध किया. तो क्या श्रेया बहुगुणा देशद्रोही हो गयीं. असल में इस बात का प्रयास तेजी से किया जा रहा है कि देश का माहौल और राजनीति यहां तक की लोगों की सोच भी नारों के इर्द गिर्द सिमटकर रह जाये. अब सवाल ये उठता है कि क्या नारों से ही नागिरकों का चरित्र तय किया जायेगा. राजनैतिक दलों को ज्यादातर नारों की ही जरूरत महसूस हो रही है. बेहतर नारे गढ़ने के लिए मैनेजर रखे जा रहे हैं. लेकिन, ये हमें नहीं भूलना चाहिए कि मैनेजरों के सहारे चुनाव जीतना लोगों को भ्रमित करके चुनाव जीतने के बराबर है. क्योंकि जब आपकी असलियत उजागर हो जाती है तभी आप मैनमेजर का मुखौटा लगाते हैं. तो क्या राजनीतिक दल समर्थन और विरोध में दिये जाने वाले नारों के बीच ही लोगों को ऱखना चाहते हैं. क्या इस बात की कोशिश नहीं की जा रही है यदि आप भारत माता की जय नहीं बोलतके हैं तो आप देशद्रोही करार दिये जायेंगे. लेकिन, इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए.

और, इसीलिए मैंने कहा कि अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी जैसे मुद्दों पर चर्चा की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस हो रही है. इस देश में एक बहुत बड़ा वर्ग है को मसर्थन और विरोध से अलग एक अपने दायरे में रहता है जिसकी प्राथमिकतायें नारा लगाना से ज्यादा किसी और मुद्दे के लिए है. आखिर हम उसे कहां जगह देंगे. वैसे लोगों को वो जगह लेनी होगी. ऐसे समय में मीडिया की भूमिका बेहद अहम हो जाती है लेकिन उसकी भूमिका भी इस मामले में कुछ कम विवादास्पद नहीं रही है. अखबार हो या टेलीविजन दोनों ने ही जमकर मनमानी की है. जेएनयू के मामले में तो हद ही हो गयी. नेशनल चैनलों ने जिस तरह से इस पूरे प्रकरण को प्रस्तुत किया वो वाकयी खतरनाक है. चैनलों ने अपनी स्क्रीन पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा कि क्या जेएनयू देशद्रोहियों का अड्डा है. इतना ही नही, कुछ चैनलों ने कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान की फोटो एक साथ लगाकर लिखा कि देशद्रोही कौन…. देशद्रोही शब्द रोटी कपड़ा की तरह लोगों की जुबान पर चढ़ गया. अब बात ये पूछी जानी चाहिए कि इण्डियन पीनल कोड में देशद्रोही शब्द कहा हैं और उसकी क्या व्यख्या है. जिन आरोपों की बात टीवी वाले कर रहे थे वो राजद्रोह था ना कि देशद्रोह. फिर दोनों में अंतर क्यों नहीं किया गया. जब हम कानून की बात कर रहे होते हैं तो हमें कानूनी शब्दों से परहेज क्यों. आखिर मीडिया ने मनमाने तरीके से ऐसा क्यों किया.

असल में मीडिया का फोकस बदल गया है. सामाजिक दायित्वों से ज्यादा उसके लिए आर्थिक लाभ जरूरी हो चला है और ऐसा इसलिए भी क्योंकि ज्यादातर मीडिया घराने एक एक करके कार्पोरेट के हाथों में चले गये हैं या जा रहे हैं. मीडिया की जो भूमिका पिछले दिनों में सामने आयी है उससे ये आशंका बढ़ती जा रही है कि कहीं मीडिया लोकतंत्र के चौथा स्तम्भ होने के अपने वजूद को खो ना दे और सिर्फ एक व्यावसायिक घराने के रूप में ही देखा जाने लगे. अपनी हर गलती या अपराध पर मीडिया ये कहकर निकल जाता है कि टेलीविजन का इतिहास अभी नया है लेकिन, सवाल ये है कि इस बात के भरोसे कब तक टीवी को अपराध की छूट मिलती रहेगी. मैं टेलीविजन पर ज्यादा फोकस इसलिए कर रहा हूं क्योंकि टेलीविजन का प्रभाव अखबारों से कहीं ज्यादा व्यापक और तीव्र होता है. टीवी की न सिर्फ पहुंच अखबारों से ज्यादा है बल्कि उसे समझने के लिए आपका पढ़ा लिखा या बौद्धिक होने की भी जरूरत नहीं. यदि आप भाषा भी नहीं समझती तब भी वीडियो फुटेज ही अपना काम कर देता है.

लेकिन, इस मामले में अखबारों ने भी कुछ कम नहीं गंवाया है. जब भी पुलिस आतंकवाद के आरोपों में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है तो अखबारों में इसे इस तरह क्यों छापा जाता है कि…. आईएसआईएस के चार आतंकी गिरफ्तार… तीन आईएसआई एजेण्ट गिरफ्तार…. आखिर संदिग्ध शब्द को क्यों त्याग दिया गया है. इसी लखनऊ में आठ साल पहले आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार चार लड़कों को कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया है. जबकि उन लड़कों का 2008 में केस लड़ने वाले वकील को कोर्ट परिसर में जमकर मारा पीटा गया और उनका हाथ तोड़ दिया गया. लेकिन, किसी ने ये सवाल नहीं पूछा कि जब “आतंकी” बरी हो गये तो फिर पुलिस ने जो हथियार उनसे बरामद दिखाया था वो कहां से आये थे. जाहिर है मीडिया को ये देखना होगा कि उसकी मनमानी कब रूकेगी. हालांकि न्यूज ब्रॉडकास्ट स्टैण्डर्ड अथॉरिटी ने टाइम्स नाऊ पर जुर्माना लगाया है लेकिन, उसकी सफलता तो तब मानी जायेगी जब एनबीएसए की चलेगी.

आपको एक उदाहरण पाकिस्तान का देता हूं. ये हाल ही में चर्चा में आया है क्योंकि न्यूयार्क टाइम्स में एक लेख 19 मार्च को छापा गया था. पाकिस्तान में कुरान या फिर पैगम्बर के खिलाफ बोलने वालों को सजा ए मौत दी जाती है. पाकिस्तान का ब्लासफेमी कानून बहुत पुराना है लेकिन, इसे बेहद सख्त किया जनरल जियाउल हक ने अपने दौर में. पाकिस्तान की महज तीन फीसदी आबादी गैर मुस्लिम है. जिसमें ज्यादातर हिन्दू और ईसाई हैं. अब इस कानून के तहत जिन लोगों को सजा दी गयी है उनमें से आधे से अधिक इन्हीं दोनों समुदायों के लोग रहे हैं. 2008 में एक ईसाई महिला ने पैगम्बर के खिलाफ कुछ बयान दिया तो उसे फांसी की सजा दी गयी. इस बीच पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलीम तासीर ने इसका विरोध किया और ब्लासफेमी कानून खत्म करने की मांग की. उनके इतना कहने भर से ही पूरे पाकिस्तान में उनका जबरदस्त विरोध शुरु हो गया. अंततः 2011 में उनके अपने ही बॉडीगार्ड काद्री ने उनकी हत्या कर दी.

काद्री को इस हत्याकांड के लिए फांसी की सजा हुई जो इसी साल फरवरी में दी गयी. काद्री का जब जनाजा निकाला गया जो पूरी दुनियां दंग रह गयी. काद्री के जनाजे में रावलपिंडी में एक लाख लोग जमा हुए. इतनी बड़ी संख्या पाकिस्तान में सिर्फ दो ही लोगों के जनाजे में जमा हुई थी. पहली बार मुहम्मद अली जिन्ना और दूसरी बार बेनजीर भुट्टो के जनाजे में. असल में काद्री के जनाजे में शामिल होने आये लोगों को काद्री में दिलचस्पी नहीं थी बल्कि उनकी रूचि उस ख्श को देखने में थी जिसने सलमान तासीर की हत्या की. वह सलमान तासीर जिसने एक ऐसी महिला का समर्थन किया जिसने इस्लाम के खिलाफ कुछ कहा था.. आपको येजानकर हैरानी होगी कि 1980 से अब तक लगभग 1500 लोगों पर ब्लासफेमी कानून के तहत कार्रवाई की गयी है. यहां तक की 60 से ज्यादा लोगों की तो हत्या की जा चुकी है. कुछ तो ऐसे लोगों की हत्या की गयी है जिन्हें कोर्ट ने बरी कर दिया था.

मैंने पाकिस्तान के इस प्रकरण का हवाला इसलिए दिया क्योंकि हमारे अंदर भी ऐसी प्रवृत्ति पनपने लगी है. अब सवाल उठता है कि क्या हमारा समाज भी कहीं धीरे धीरे उसी मानसिकता की ओर तो नहीं बढ़ रहा है. हमारी नापसंदगी की बात करने वालों को मिटा देने की प्रवृति ठिक नहीं कही जा सकती. कन्हैया कुमार पर हमला हो या फिर आतंकियों का मुकदमा लड़ने वाले वकील पर हमलाकर हाथ तोड़ने का मामला हो…. ऐसी प्रवृति को हर हाल में खत्म करना होगा. विरोधियों को नष्ट करने की भावना खतरनाक है क्योंकि ये हमारे सामाजिक ताने बाने के उलट है. हमारे पुरखों ने हमें सिखाया है निन्दक नियरे राखिये….. जवाहर लाल नेहरू ने भी श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बाबा साहब, जिनका आप जन्मदिवस मनाने जा रहे हैं, को अपने तमाम विरोधों के बावजूद मंत्रिमण्डल में रखा था. तो आखिर फिर वो प्रवृत्ति क्यों कमजोर हो रही है. हमें इसे ताकत देनी होगी तभी कुछ बुरा नहीं होगा…..

धन्यवाद…

मनीष सिंह
चीफ रिपोर्टर
ईटीवी, लखनऊ

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लक्ष्य से भटकाव मीडिया को हितसाधन का औजार बना देता है

: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में आयोजित सेमिनार में मीडिया और आध्यात्मिकता के बिंदुओं पर हुई विस्तार से बात : देश भर के चर्चित विद्वानों व वक्ताओं ने लिया भाग, कई पुस्तकों का हुआ लोकार्पण : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में पिछले दिनों आध्यात्मिकता जैसे गंभीर, जरूरी व व्यापक फलक तथा सरोकार वाले विषय को केंद्र में रखकर एक विशिष्ट सेमिनार का आयेाजन हुआ. ‘आध्यात्मिकता, मीडिया और सामाजिक बदलाव’ विषय पर आयोजित इस सेमिनार में देश भर से कई चर्चित विद्वतजनों, विशेषज्ञों व मीडिया विश्लेषकों ने भाग लिया. विषय के अनुसार वक्ताओं ने अपने विचारों को साझा किया और सबने अपने-अपने वक्तव्यों के जरिये इस विषय के दायरे का विस्तार करते हुए बहस के नये आयाम खोले. आध्यात्मिकता जैसे विषय पर चर्चा के साथ ही मीडिया के दायित्वों व उसके बदलते स्वरूप पर भी गहराई से बात हुई.

सभी बातों का मूल सार यह रहा कि आध्यात्मिका का गहरा सरोकार जीवन मूल्यों से है और मीडिया का दायित्व जीवन मूल्यों को बेहतर बनाकर समाज को सुंदर बनाना है. लेकिन यह दोनो तब संभव है, जब समाज सजग हो, जिम्मेवार हो और अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए तैयार रहे. आध्यात्मिकता जैसे अहम व व्यापक फलक वाले विषय पर आयोजित इस सेमिनार में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधियों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने उपस्थिति दर्ज करायी. इस सेमिनार में मीडिया के विविध पक्षों पर प्रतिभागियों व अतिथि विद्वानों ने विस्तार से अपनी बातें रखीं. एक प्रमुख चिंतन का विषय यह भी रहा कि मीडिया अपने वास्तव लक्ष्य से भटक गया है. इस कारण वह कुछ लोगों के हित का साधन बन गया है. जब वह कुछ लोगों तक सिमट कर रह जाता है तो वह जनसंचार का साधन नहीं रह जाता. मीडिया से आम जनता के मुद्दे गायब होते जा रहे हैं.

इस सेमिनार में मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे चर्चित विद्वान व माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत गंभीर बातें कही. उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता का संबंध किसी धर्म या विचारधारा से नहीं बल्कि यह नैतिक आदर्श है. इसका संबंध व्यक्ति के मन और ज्ञान की परंपरा से है और यह उपदेश मूलक भी नहीं है, अपितु आचरण मूलक है. मीडिया के साथ सामंजस्य बिठाते हुए आध्यात्मिकता के जरिये सामाजिक बदलाव को अगर एक ही जगह देखना हो तो यह महात्मा गांधी के जीवन में देखे जा सकते है. मीडिया के माध्यम से अगर हम सामाजिक बदलाव की उम्मीद करते हैं तो इसके लिए हमें सकारात्मक पत्रकारीय भाव को भी रखना होगा. उदघाटन सत्र में ही अध्यक्षता करते हुये विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो गिरीश्वर मिश्र ने डॉ. मिश्र की बातों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मीडिया प्रक्रिया, उपकरण और परिणाम भी है और कहना अतिश्योक्ति नहीं कि मीडिया ने जीवन का व्याकरण ही बदल दिया है और भारी शक्ति के तौर पर इसके उभार की प्रक्रिया जारी है. इसी बात को कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो मानसिंह परमार ने गीता के श्लोक को उद्धृत करते हुए कहा कि सकारात्मक सोच के साथ मीडिया में आध्यात्मिकता का भावबोध पैदा किया जा सकता है. प्रो परमार ने मीडिया काउंसिल बनाने कि दिशा में प्रयास करने का सुझाव दिया.

इस तरह कई बातें सामने आयी और सभी विद्वानों ने सेमिनार के केंद्रीय विषय पर एक दूसरे की बातों से सहमति का विवेक दिखाते हुए और असहमति का साहस दिखाते हुए भी बहस को सार्थक दिशा में बढ़ाया, जिससे सेमिनार के निर्धारित विषय से संबंधित कई नये तथ्यों का उभार हुआ. आरंभ के सत्र में ही बीज व्यक्तव्य देते हुए प्रो राम मोहन पाठक ने कहा कि मीडिया में सकारात्मकता ही उसकी आध्यात्मिकता है जो वैयक्तिक संचार से भी पहचानी जा सकती है. सार वक्ता के रूप में प्रति कुलपति डॉ चित्तरंजन रंजन मिश्र ने गिरते पत्रकारीय मूल्यों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि आज मीडिया द्वारा अपसंस्कृति भी फैलाई जा रही है। इससे निपटने की दिशा में भी हमे सोचना चाहिए. इसी क्रम में दूरदर्शन दिल्ली के सलाहकार संपादक केजी सुरेश ने वर्तमान पत्रकारिता की बात करते हुए कहा कि आज पत्रकारिता में नैतिकता का संकट पैदा हो गया है. आज की पत्रकारिता में पत्र कम और कार ज्यादा है.

इस तीन दिवसीय सेमिनार में वक्ताओं के वक्तव्य के साथ ही कई और गतिविधियां भी आयोजित हुई. आईसीएसएसआर द्वारा प्रायोजित तथा संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी का आरंभ हबीब तनवीर सभागार में भारत रत्न और देश के 11वें राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल अब्दुल कलाम को श्रद्धांजलि अर्पित कर हुआ. अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ के अध्यक्ष प्रो. देवराज ने अपनी कविता ‘एक छतनार महावृक्ष धरती पर आ गिरा’ के माध्यम से दिवंगत श्री कलाम को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की. साथ ही उदघाटन सत्र में संगोष्ठी स्मारिका और शोध पत्र आधारित पुस्तक का लोकार्पण भी उनके द्वारा हुआ. ‘मीडिया के सरोकार’ विषय पर आयोजित एक सत्र में वक्ताओं ने अपनी बात रखी. इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध टीवी पत्रकार और लेखक डॉ. मुकेश कुमार ने की। इसके साथ ही मशहूर कार्टूनिस्ट मो. इरफान खान, समय राजस्थान न्यूज चैनल के संपादक रवि पराशर और मीडिया अध्ययन केंद्र स्वामी रामतीर्थ मराठवाडा विद्यापीठ नांदेड के निदेशक प्रो. दीपक शिंदे ने सत्र को संबोंधित किया.

मुकेश कुमार ने आध्यात्मिकता के केंद्र में आत्म चिंतन और आत्म शोधन की प्रक्रिया पर बल देते हुए कहा कि अगर मीडिया आत्म चिंतन करे की उसमें क्या-क्या खामियां है और उसका शोधन करें तो समाज में बदलाव आएगा. उन्होंने कहा कि खबरों का मुंह विज्ञापनों से ढका हुआ है और सत्य कहां है. आज के समय में 95 प्रतिशत पत्रकार के लिए अवसर नहीं है. उन्होंने बताया कि मुनाफा कमाने के लिए अनैतिक तरीके अपनाए जाते है तब दिक्कत आती है. मीडिया के सरोकार ने बाजार का मीडिया, समाज और आध्यात्मिकता और अंर्तसंबंधों को उजागर किया है. रवि पराशर ने अपने वक्तव्य में कहा कि जनमाध्यमों के सरोकार को सांस्कृतिक वैचारिकता से जोड़कर देखा जाना चाहिए और साथ ही आध्यात्मिक नैतिकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. उन्होंने यह सवाल किया कि अगर मीडिया जायज तरीके से तरक्की कर रही है तो इसमें बुराई क्या है। उन्होंने मजीठिया आयोग की सिफारिशों को लागू करने की अनुशंसा की। देश में ज्यादातर पत्रकारों की हालात को बदत्तर कहते हुए उन्होंने पत्रकारों के दर्द को बयां किया. उन्होंने कहा कि मीडिया समाज में आए मूल्यों के गिरावट से बच नहीं सकता.  

इस सेमिनार में एक अहम सत्र कार्टूनेां की दुनिया पर रहा, जिसे मशहूर कार्टूनिस्ट इरफान ने संबोधित किया. उन्होंने कार्टून के जरिये और उसके बहाने संबंधित विषय को विस्तार से बताया. उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी और कार्टून कला मानव में जन्मजात होती है. जिसे अभिव्यक्ति की समझ कहते हैं. कार्टून कभी बेलगाम नहीं होते। यह डायलिसिस मशीन की तरह काम करता है. जिससे समाज में सुधार होता है। उन्होंने कहा कि ऐसे कार्टून नहीं बनाए जाने चाहिए जिससे समाज में अशांति और तनाव न उत्पन्न हो. प्रो. दीपक शिंदे ने भी मीडिया के व्यावसायिक होने की तरफदारी की. साथ ही उन्होंने पेड न्यूज और सोशल मीडिया के पक्ष में बात रखी.

तीन दिवसीय संगोष्ठी में दूसरे दिन ‘मीडिया, संस्कृति एवं बाजार तथा आध्यात्मिकता और मीडिया’ विषयों पर अतिथि वक्ताओं ने अपने विचार रखे। इस सत्र में बाबासाहेब अंबेडकर मराठवाडा विश्वविद्यालय, औरंगाबाद के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ. धारुरकर, इंक मीडिया इंस्टीट्यूट आफ मास कम्यूनिकेशन, सागर के निदेशक आशीष द्विवेदी, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के असोसिएट प्रोफेसर मो. फरियाद, दूरदर्शन के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक प्रभु झींगरन, मदन मोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी के पूर्व निदेशक प्रो. राम मोहन पाठक, वरिष्ठ पत्रकार श्याम कश्यप, आगरा पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष डॉ. गिरिजा शंकर शर्मा तथा मूल्यानुगत मीडिया के संपादक एवं शिक्षाविद प्रो. कमल दीक्षित ने अपने विचारों से सेमिनार के केद्रीय विषय को एक सार्थक गति दी. डॉ. धारुलकर ने मीडिया की नैतिकता एवं मूल्य संकट की ओर तो आशीष द्विवेदी ने कार्टून और अभिव्यक्ति पर आधारित अपना वक्तव्य दिया। डॉ. गिरिजा शंकर शर्मा ने गांधी और अंबेडकर के पत्रकारिता का उद्धरण देते हुये आज के बाजारवादी पत्रकारिता पर कटाक्ष किया। डॉ. फरियाद ने कहा कि वर्तमान समय में बाजार संस्कृति पर हावी हो गया है और मीडिया पूरी तरह इसकी चपेट में है। प्रभु झींगरन ने सोशल मीडिया के वर्चस्व की बात को अलगकृअलग आायामों के साथ समझाया. प्रो. पाठक ने कहा संस्कृति जड़ नहीं बदलाव चाहती है, यह परंपरा चलती रहती है, इसे मानव चला रहा है। प्रो. श्याम कश्यप ने कहा कि संस्कृति से परंपरा का निर्माण होता है। अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. कमल दीक्षित ने कहा कि बुद्धिजीवियों के विचार जब तक लोगों तक पहुँचते हैं तभी असली संस्कृति बनती है।

विश्वविद्यालय के समता भवन में इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में शोध पत्रों की प्रस्तुति के लिए समानांतर सत्र आयोजित किया गया,जिसमें कुल सात विशेष कक्ष जैसे गणेश शंकर विद्यार्थी, माधव राव स्प्रे, माखन लाल चतुर्वेदी, युगल किशोर शुक्ल, बाल गंगाधर तिलक, मदन मोहन मालवीय एवं बाबूराव विष्णु पड़ाकर आदि में कुल 245 शोध पत्रों की प्रस्तुति हुई। इंटरैक्टिव सत्र के रूप में प्रतिभागियों के लिए मीडिया क्विज का भी आयोजन हुआ। 

संगोष्ठी के अंतिम दिन और समाहार सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने किया. इस सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में दैनिक भास्कर के समूह संपादक प्रकाश दुबे, मुख्य वक्ता के रूप में प्रतिकुलपति प्रो. चित्तरंजन मिश्र, जय महाकाली शिक्षण संस्थान, वर्धा के अध्यक्ष पं. शंकर प्रसाद अग्निहोत्री और प्रसिद्ध टीवी पत्रकार मुकेश कुमार मंच पर मौजूद थे। सत्र की शुरुआत अभिषेक द्वारा बनाई गई डॉ. कलाम पर बनी डोक्यूमेंट्री से हुई। संगोष्ठी के दौरान भावेश चव्हाण द्वारा बनाए गए देश के विख्यात पत्रकारों और सामाजिक बदलाव से जुड़े महत्वपूर्ण लोगों के स्केच की प्रदर्शनी लगाई गयी और सभी गणमान्य लोगो ने विचार रखे। 

समापन सत्र में शोधार्थी अनुपमा कुमारी ने सभी सत्रों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। सत्र का आभार ज्ञापन संचार एवं मीडिया अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. अनिल कुमार राय ने तथा संचालन डॉ. अख्तर आलम ने किया। समारोह में प्रो. अनिल कुमार राय और डॉ. अख्तर आलम की संपादित पुस्तक ‘आध्यात्मिकता, मीडिया और सामाजिक बदलाव’ का विमोचन किया गया। टीवी पत्रकार मुकेश कुमार की पुस्तक ‘टीआरपी, न्यूज और बाजार’ तथा विश्वविद्यालय के दो पूर्व शोधार्थी डॉ. गजेंद्र प्रताप सिंह और राहुल मीणा की पुस्तक ‘मानवाधिकार हनन और मीडिया’  तथा कविता संग्रह ‘कलम, कैमरा और कठपुतली पत्रकारिता’ का भी विमोचन किया गया। इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान जनमाध्यमों के सरोकार, मीडिया के समकालीन प्रश्न, मीडिया संस्कृति और बाजार, आध्यात्मिकता और मीडिया, मीडिया का राजनैतिक अर्थशास्त्र जैसे विषयों पर विचारको ने अपने मत रखे। 

प्रस्तुति- अनुपमा कुमारी

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आलोचना की संस्कृति खतरे में है : प्रो.मैनेजर पाण्डेय

लखनऊ : आज के भारत में लोकतंत्र और आलोचना की संस्कृति – यह विषय था लखनऊ में जन संस्कृति मंच के तत्वाधान में आयोजित संगोष्ठी का। अध्यक्षता की वरिष्ठ लेखक रवींद्र वर्मा ने। मुख्य वक्ता थे -वरिष्ठ आलोचक प्रो.मैनेजर पाण्डेय। प्रो.पाण्डेय ने इंगित किया कि पश्चिम में डेमोस अर्थात जनसाधारण शब्द का प्रयोग होता है। अब्राहम लिंकन ने कहा था जनता का शासन, जनता द्वारा और जनता के लिए। हमारे देश में केंद्र में सरकार है और अनेक राज्यों की सरकारें हैं। मालूम नहीं चलता कि कौन सी सरकार है जनता के लिए और जनता द्वारा? यहां पूंजीतंत्र है – अंबानी और अडानी का तंत्र है। दबंगों का राज्य है। वही नेता हैं, वही विधायक हैं। वही कानून बनाते हैं और खुद को कानून से ऊपर रखते हैं। 

लखनऊ में जनसंस्कृति मंच की संगोष्ठी को सम्बोधित करते प्रो.मैनेजर पांडेय

उन्होंने कहा कि यहां लोकतंत्र का एक ही लक्षण दिखता है – चुनाव। सुबह से शाम इसी की चर्चा होती है। विडंबना है कि दस साल तक एक ऐसा प्रधानमंत्री रहा जिसने कभी पंचायत का चुनाव तक नहीं लड़ा। तमाम एमपी-एमएलए पूंजीपति हैं। नीति वही बनाते हैं। अमेरिका और इंग्लैंड में बैठ कर उपदेश दिए जाते हैं। 80% कानून ब्रिटिेश पीरियड के हैं। लोकतंत्र एक मानसिकता है, वैचारिक चेतना है। नैतिक, राजनैतिक और सामाजिक चेतना है। जहां असहमति और विरोध का सम्मान न हो वो लोकतंत्र हो ही नहीं सकता। लोकतंत्र की मांग यही है कि विरोधी विचारों को दबायें नहीं। बहस करें। अभी एक समाज सुधारक अंधविश्वास के प्रति चेतना पैदा कर रहे थे, उनकी हत्या हो गयी। एक लेखक ने लिखा – हम लोकतांत्रिक हैं क्या? उन पर दो पुलिस केस हो गए। एक लेखक ने कई बरस पहले लेख लिखा था। आज पता चला कि किसी छोटे से समुदाय की भावनायें आहत हो गयीं। उन्हें लेख वापस लेते हुए कहना पड़ा – लेखक के रूप में आज मैं मर गया। 

उन्होंने कहा कि राजनैतिक दल और सरकारें भी लोकतंत्र की हत्या करती हैं। सरकार ने कुछ नहीं किया। पुलिस शिकारी को नहीं शिकार को पकड़ती है। इस देश के लोग इतने संवेदनशील हैं कि बात बात पर उनकी भावनायें आहत होने लगी हैं। जहां विचार की कद्र नहीं, जहां व्यंग्य बर्दाश्त नहीं, वहां लोकतंत्र कैसा? शंकर वीकली में जवाहरलाल नेहरू पर कार्टून छपा। पैर बड़े और सर छोटा दिखाया गया। भक्त ने कहा कि नेहरू का अपमान हुआ। लेकिन नेहरू ने कहा – नहीं। ठीक है यह व्यंग्य। मैं चलता ज्यादा हूं और सोचता कम हूं।  डॉ लोहिया का भी कार्टून बना। लेकिन सर बड़ा और पैर छोटे। भक्तों को गुस्सा आया। लोहिया ने डांटा – ठीक बनाया। सर बड़ा, सोच बड़ी। 

जीने की स्वतंत्रता पर वेस्ट यूपी और हरयाणा में खाप पंचायतों ने अंकुश लगा रखा है। खाप ने परंपरा की रक्षा का ठेका लिया है। प्रेम की स्वतंत्रता नहीं है। सभ्य कहना भी संकोच का मुद्दा बन जाता है। अजंता-ऐलोरा की गुफाओं में बने भित्तिचित्र देखें। खुजराओ के मंदिर में दीवारों पर बनी मूर्तियां देखें। शर्म आ जाएगी। लेकिन कलाकार प्रजापति कहलाता है, ईश्वर के सबसे करीब। असहनशीलता लोकतंत्र की परम दुश्मन है। आलोचना की संस्कृति को बर्दाश्त न करने के कारण ही सोवियत संघ का विघटन हुआ। अमेरिका जीवित इसलिए है कि वहां असहमति को बर्दाश्त किया जाता है। सरकारी नीतियों की जम कर धज्जियां उड़ाई जाती हैं। 

भारत में सिविल सोसाइटी विभाजित है। जातिवाद का बोलबाला है। लेफ्ट ने भी कोई सुसंकृतज्ञ नीति नहीं अपनायी। जब तक समाज में जातिवाद का अंत नहीं होगा, साम्यवाद नहीं लाया जा सकता। अब तक तो गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है। यह सवाल तब भी था और आज भी है। प्रेमचंद इसी वयवस्था से लड़ते रहे।  इस देश में स्त्रियों की पूजा होती है। लेकिन सत्ता देवताओं के हाथ में है। पितृ सत्ता स्थापित है। संस्कृत के नाटकों में स्त्रियां दास की भाषा बोलती थीं।  स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं। इनमें से किसी एक न रहने से इनका अस्तित्व नहीं। यह लोकतंत्र के लिए अनिवार्य नारा है।  यह अतुल्य भारत है। प्रकृति का क्या होगा? पूंजीपति को इसकी चिंता नहीं है। 

उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में बौद्धिकता और विवेकवाद दिखता है। यहां आलोचना को स्थान है। देखी तुम्हारी काशी। काशी की आलोचना है। निराला में आलोचनात्मक चेतना थी। रघुवीर सहाय ने ‘जन गण मन.…पर ज़बरदस्त व्यंग्य लिखा। लेकिन आज आलोचना गंभीर खतरे में है। आज कविता सर्वनाशी माहौल में खड़ी है। बहुत दूर तक जाना है। जो कविता मनुष्य के पक्ष में खड़ी होगी, वही मनुष्य की कविता होगी। 

लेखक और जनसंदेश टाइम्स के संपादक सुभाष राय ने प्रश्न उठाया कि आलोचना और विचार की संस्कृति आज खतरे में है, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता क्या है? प्रो.पांडे ने इस पर कहा – राम के सामने भी यह संकट था। सत्य की भौतिक कल्पना करो। मार्क्स ने कहा था कि मानव समाज कोई ऐसी समस्या पैदा नहीं करता जिसका समाधान वो स्वयं न खोज सके। संकट देशव्यापी है तो समाधान भी देशव्यापी होना चाहिए। जनता को जगाने के ज़रूरत है। जो साहसी और कर्तव्यनिष्ठ है, उससे विरोध को सामने लाईये। इष्टमित्रों को खोजना होगा। मनुष्य विरोधी माहौल से तभी मुक्ति मिलेगी। नेहरू ने कहा था कि सबसे बड़ा पाप भय है। इस भय से मुक्त होने पर ही आलोचना की संस्कृति के विरोधी को जवाब देने की क्षमता बढ़ेगी। डॉ अंबेडकर आलोचना की संस्कृति के सबसे बड़े सबूत थे। और हम हैं कि अंदर के झगड़ों और अंतर्विरोधों से नहीं निपट पा रहे हैं। 

वरिष्ठ लेखक रवींद्र वर्मा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि जिस माहौल से हम गुज़र रहे हैं ऐसे माहौल से हम गुज़र चुके हैं। लोकतंत्र की प्रक्रिया को गहरा किया जाए। हमें धर्म के प्रति दृष्टि को साफ़ करने के ज़रूरत है। अगर हम अपने आस-पास देखें तो लोकतंत्र सबसे कम ख़राब व्यवस्था है। फासीवाद से समझौता न करें। अन्य भाषाओँ का अपने समाज से गहरा रिश्ता है। हिंदी वालों में यह कमी है कि समाज से नहीं जुड़ पाये। 

इस संगोष्ठी का संचालन कौशल किशोर और डॉ रविकांत ने किया। संगोष्ठी में नरेश सक्सेना, वीरेंद्र यादव, राकेश, जुगल किशोर, रूप रेखा वर्मा, केके चतुर्वेदी, नलिन रंजन सिंह, विजयराज बली माथुर आदि अनेक गणमान्य लेखक, कवि, रंगकर्मी और समाजसेवी उपस्थित थे। 

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पंडित नेहरू ने कृपलानी से कहा था- तुमसे पूछने की जरूरत क्या है?

नई दिल्ली : प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं महात्मा गाँधी के अनन्य सहयोगी आचार्य जेबी कृपलानी की ३३वीं पुण्यतिथि पर आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा ‘कृपलानी स्मृति व्याख्यान’ का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए राज्य सभा सांसद जनार्दन द्विवेदी ने मौजूदा राजनीति पर करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज राजनीति व्यक्तिवादी हो गई है। इससे कोई दल अछूता नहीं है। सब एक ही तरह की राजनीतिक धारा में बह रहे हैं। यह स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के विपरीत है। एक ज़माने में समाजवादी कार्यकर्ता रहे जनार्दन द्विवेदी का कहना था कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा सिलसिला चल गया है, जिसमें व्यक्ति बिना कार्यकर्ता हुए पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंच जाता है। यह तो वैसे ही है जैसे आप कभी विद्यार्थी रहे नहीं और अध्यापक बन गए।

आचार्य कृपलानी के बारे में मुख्य अतिथि ने कहा कि वे राजनीतिक जरूर थे लेकिन उनका दिमाग गैरसरकारी था। वे हमेशा जनसरोकार के बारे में सोचते थे। जब 1978 में कृपलानी ने राजनीतिक जीवन से संन्यास लेने की घोषणा की थी तो वह सशर्त थी। उन्होंने कहा था कि यदि जनता को जरूरत पड़ी तो मैं फिर राजनीति के मैदान में कूद पडूंगा। आचार्य कृपलानी स्मृति व्याख्यान की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं आचार्य कृपलानी के जीवनी लेखक पद्मश्री रामबहादुर राय ने कहा कि बतौर कांग्रेस अध्यक्ष जेबी कृपालनी ने गांधी जी को अपना त्यागपत्र सौंप कर एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा किया था। वह तब भी प्रासंगिक था और आज भी है। वे आगे कहते हैं कि जब अध्यक्ष रहते हुए कृपलानी ने सरकार के मुखिया पंडित जवाहर लाल नेहरू से पार्टी अध्यक्ष की राय न लेने की वजह पूछी थी तो पंडित नेहरू ने कहा तुमसे पूछने की क्या जरूरत है। सरकार के मुखिया और पार्टी अध्यक्ष के बीच संबंध को लेकर जो सवाल कृपलानी ने खड़ा किया था, वह कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए यक्ष प्रश्न है। उन्होंने मुख्य अतिथि जनार्दन द्विवेदी को जेबी कृपलानी की राह का अनुगामी बताया।

मुख्य अतिथि के वक्तव्य के बाद ट्रस्ट की वेबसाइट (www.kripalanimemorialtrust.org) का लोकार्पण भी किया गया। व्याख्यान में श्रोता के रूप में उपस्थित महत्वपूर्ण लोगों में पी. गोपीनाथन नायर, सतपाल ग्रोवर, पी.वी. राजगोपालन, पी.एम. त्रिपाठी, मंजू मोहन, कुसुम शाह, इंदु बहन, बी. मिश्रा, पत्रकार एवं लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी एवं अरुण तिवारी जैसे लोग शामिल रहे। वैसे कार्यक्रम में हर उम्र के अनेक गणमान्य लोग मौजूद थे लेकिन इतने गंभीर कार्यक्रम में युवाओं की अच्छी संख्या में उपस्थिति उत्साहवर्द्धक थी। सभी श्रोता कार्यक्रम के अंत तक जमे रहे। अंत में, गाँधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री सुरेन्द्र कुमार ने अतिथियों एवं श्रोताओं के प्रति धन्यवाद एवं आभार प्रकट किया।

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मुक्त अर्थव्यवस्था आने के बाद से मीडिया में संपादक की जगह ब्रांड मैनेजर लेने लगे

: साहित्य और पत्रकारिता के रिश्तों की चिंता में डूबे दो दिन  : साहित्य अकादमी व उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी में पहुंचे देश भर के साहित्यकार व पत्रकार :  हल्द्वानी : देश के वरिष्ठ साहित्यकारों व पत्रकारों ने पत्रकारिता से साहित्य को हाशिये पर धकेल दिए जाने को अफसोसनाक बताया। लेकिन उन्होने सोशल मीडिया को आशा की नई किरण बताया, साथ ही शंका भी जाहिर की कि इसमें भी साहित्य के बहस का स्तर गिर रहा है। सभी ने साहित्य का स्तर ऊंचा उठाने के लिए एकजुटता की बात की। हल्द्वानी में साहित्य अकादेमी और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर से आये विद्वतजनों ने अपनी-अपनी राय जाहिर की। साहित्यकारों का कहना था कि विश्व स्तर पर मीडिया पर विज्ञापनों का दबाव बढ़ने के कारण साहित्यिक पत्रकारिता हाशिए पर चली गयी है, जो कि देश और समाज के लिए बेहद निराशाजनक है।

संगोष्ठी में माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति अच्युतानंद मिश्र का कहना था कि सारी दुनिया में साहित्य को जनता तक सरल रूप में पहुंचाने का काम पत्रकारिता ही करती रही है। साहित्य के दर्जनों नोबेल पुरस्कार विजेता साहित्यकार पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं। हिन्दी में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने खड़ी बोली गद्य का विकास हिंदी पत्रकारिता के माध्यम से ही किया। साथ ही दुनियाभर के मुद्दों से पाठकों को परिचित करवाया। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान तिलक और गांधी जी ने प्रतिरोध की पत्रकारिता की, जिसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा। उस समय पत्रकारिता ने ही सबसे पहले स्वदेशी और बंगाल विभाजन जैसे ज्वलंत मुद्दों को उठाया था।

साहित्यिक पत्रकारिता ही उस समय मुख्य धारा की पत्रकारिता थी। लेकिन आज हालात एकदम बदल गये हैं। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता इतनी मजबूत बना दी थी कि लोग अखबार में लिखी गई खबर को झूठ मानने को तैयार ही नहीं होते थे। बाद के दौर में विज्ञापनों के दबाव के चलते साहित्यिक पत्रकारिता हाशिए पर जाने लगी. दुर्भाग्य से किसी ने इसका विरोध नहीं किया। यही वजह है कि एक-एक कर हिंदी की नामी साहित्यिक पत्रिकाएं बंद हो गईं।

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति सुभाष धुलिया का कहना था कि भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद के आने के बाद से मीडिया में अपराध, सेक्स और दुर्घटनाओं की खबरों को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है। इसका कारण यह है कि इसे साधारण पाठक भी सरलता से समझ लेता है, जबकि साहित्यिक पत्रकारिता को समझने में उसे कुछ मुश्किल आती है। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि संपादकीय और साहित्यिक पृष्ठ पढ़नेवाले 10-12 प्रतिशत पाठक ही समाज का नेतृत्व करते हैं। इसलिए संचार माध्यमों में साहित्यिक और वैचारिक सामग्री को रोका नहीं जा सकता है. मुक्त अर्थव्यवस्था आने के बाद से मीडिया में संपादक की जगह ब्रांड मैनेजर लेने लगे। ये मैनेजर अखबार को ऐसा उत्पाद बनाने लगे जिसे विशाल जनसमूह खरीदें। इस वजह से साहित्यिक और सांस्कृतिक विमर्श हाशिए पर चले गए। पत्रकारिता सेवा से व्यापार में बदल गई। इसका उद्देश्य मुनाफा कमाना बन गया। इसी वजह से समाचार उत्पाद बन कर रह गया। पत्रकारिता का उद्देश्य विवेकशील नागरिक बनाना न होकर ज्यादा क्रय शक्ति वाला उपभोक्ता बनाना हो गया। उन्होंने कहा कि न्यू मीडिया अब असंतोष और असहमति को अभिव्यक्ति देने का काम कर रहा है, लेकिन इंटरनेट जैसे माध्यम की पहुंच अभी जनसंचार के माध्यमों की तरह नहीं है।

उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं मीडिया अध्ययन विद्या शाखा के निदेशक प्रो. गोविंद सिंह ने साहित्य पत्रकारिता के हो रहे ह्रास पर अपने विचार रखे। उनका कहना था कि बाजारवाद के हावी हाने के कारण ही आज साहित्यिक पत्रकारिता इस स्तर पर पहुंची है। उन्होंने यह भी कहा कि संगोष्ठी में कई ऐसे मुद्दे उठे जिन पर आगे शोध या संगोष्ठियां हो सकती हैं। जानेमाने पत्रकार एवं कवि मंगलेश डबराल का कहना था कि पत्रकारिता इतिहास का पहला ड्राफ्ट होती है और साहित्यिक रचना अंतिम ड्राफ्ट होती है। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रानिक मीडिया में हत्या, बलात्कार, आपदा और झगड़े की खबरें भी मनोरंजन बन गई हैं। हिंदी पत्रकारिता हिंदी साहित्य से ही निकली है। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर रघुवीर सहाय तक साहित्यकारों ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान किया।

हिन्दी के जाने-माने कवि लीलाधर जगूड़ी ने कहा कि केवल बाज़ार को कोसने से कुछ नहीं होगा। बाज़ार तो हजारों वर्षों से हमारी संस्कृति का अंग रहा है. यह भी सच है कि वैश्विक बाजार से हमारे स्थानीय बाज़ार को पंख लगे हैं। इसलिए बाजार का नहीं, अनैतिक बाजार का विरोध होना चाहिए। उन्होंने कहा कि महान साहित्यकारों ने भी पत्रकारिता के जरिये ही साहित्य में कदम रखे.उन्होंने मार्खेज और अर्नेस्ट हेमिंग्वे का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह से पत्रकारिता में उन्होंने साहित्य का पहला पाठ सीखा.

वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार राजकिशोर का कहना था कि साहित्य, पत्रकारिता और मीडिया तीन पीढ़ियां हैं। उन्होंने कहा कि यह भ्रम है कि साहित्य मीडिया को नहीं समझ सकता है। साहित्य में मीडिया पर कई किताबें लिखी गई हैं। जब से खबर देना पेशा बना है, तब से ही खबर देनेवाला अपने हितों को साधने के लिए इसे इस्तेमाल करने लगा है। साहित्य कपड़ा, खिलौना या फिल्म उद्योग की तरह नहीं है। यह समस्या को समझने में मदद करता है,  समाज की समझ बनाता है। साहित्य में मनोरंजन कम नहीं है। साहित्य अतुल्य है। पत्रकारिता में यदि साहित्य नहीं होगा तो सिर्फ मनोरंजन ही रह जाएगा।

साहित्यकार डॉ. प्रयाग जोशी ने कहा कि अखबार के बाद रेडियो ही आकर्षित करता है. क्योंकि वह हमारे कामकाज में व्यवधान नहीं डालता. आज भी उसमें बहुत अच्छे और शिक्षाप्रद कार्यक्रम आते हैं। लेकिन टेलीविजन और अन्य मीडिया इसे दबाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का अपना अलग महत्व है।सबसे पहले इसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 10 लाख के सूट का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि एक जमाना था जब साहित्य से पहला परिचय करवाने का काम पत्रकारिता ही करती थी, अब यह नहीं हो रहा. डॉ चन्द्र त्रिखा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब की पत्रकारिता का उल्लेख करते हुए पत्रकारों की शहादत को याद किया। उन्होंने कहा कि इस दौर में बड़े अखबार समूहों ने घुटने टेक दिए थे। लेकिन छोटे अखबार और साहित्यिक पत्रिकाएं झुकी नहीं। उन्होंने कहा कि बाजार की चुनौती को हौवा नहीं बनाना चाहिए। प्रसार संख्या बढ़ाना इसका एक तोड़ हो सकता है।

लाइव इंडिया वेबसाईट की सम्पादक गीताश्री ने मीडिया पर दोष मढने वाले साहित्यकारों को आडे हाथों लिया। उन्होंने मीडिया और साहित्य को दो अलग धाराएं बताया। उनका कहना था कि साहित्यकार साहित्यिक शुचितावाद को पकड़े हुए हैं। जबकि ज़माना आगे बढ़ गया है. पुराने मूल्यों के नष्ट होने पर ही नए मूल्य आएंगे।  वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि पंकज सिंह ने कहा कि साहित्य लिखने वालों को पत्रकार नहीं माना जाता। साहित्यिक पत्रकारिता और राजनीतिक पत्रकारिता दोनों अलग-अलग चीजें हैं. अखबार में सभी वर्गों को जगह मिलनी चाहिए। अखबार सिर्फ साहित्य से नहीं भरा जा सकता है।
पत्रकार एवं साहित्यकार रामकुमार कृषक ने समसामयिक साहित्यिक पत्रिकाओं की सीमाओं और संभावनाओं पर चर्चा की और कहा कि इन पत्रिकाओं को प्रकाशित करना साहस और संकल्प का छोटी पूंजी का बड़ा उद्यम है। जबकि वरिष्ठ पत्रकार मधुकर उपाध्याय, साहित्य अकादमी के उप सचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी व पत्रकार एवं साहित्यकार श्याम कश्यप का कहना था कि पत्रिकाओं को प्रासंगिक होना चाहिए। जिस पत्रकारिता का अपना व्यक्तित्व होता है, वे ही प्रासंगिक बन सकती हैं। उन्होंने समाज में पढने की रूचि घटते जाने पर खेद प्रकट किया। हल्द्वानी में हुई यह संगोष्ठी मुक्त मंडी के इस दौर में भुला दिए गए साहित्य को नया जीवन देने में इसलिए भी कामयाब रही कि दोनों दिन बड़ी संख्या में कुमाऊँ भर से लोग श्रोता बन बैठे रहे.

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A lecture on ‘Role of Media in Intellectual Growth of the Nation’ was organised by Journalism University

Bhopal, January 30: Every nation has its own nature and behaviour. And development could b achieved only when the policies are made according to the nature otherwise there will be deformation. The first intellectual development of the human beings occur at the home and then in the society. Today, media has to play a great role in the intellectual growth of the human beings. Therefore, media should first understand the cultural India then transfer the knowledge to the people.

These views were expressed by the Governor of Haryana, Prof. Kaptan Singh Solanki while addressing a function organised to mark the death anniversaries of Father of Nation Mahatma Gandhi and one of the greatest poet, journalist and freedom fighters of the country Makhanlal Chaturvedi. The function was organised on the subject, ‘Role of Media in Intellectual Growth of the Nation’ by Makhanlal Chaturvedi National University of Journalism and Communication wherein Prof. Solanki was present as Chief Guest.

Member of the freshly-constituted Central Film Censor Board of India and senior journalist, Ramesh Patange was also present as the keynote speakers on the occasion. Prof. Solanki, in his address, further said that India is a nation built by the sages and saints. He said that the lives of Mahatma Gandhi and Makhanlal Chaturvedi are the reflection of the India’s culture and philosophy and therefore, it is not only India that derives inspiration from them but the entire world. He said that American President Barack Obama always quotes Mahatma Gandhi’s name in his addresses all over the world. While underlining the role of journalism in shaping India’s future, Haryana Governor said that journalists would have to take lessons from the practices and values of Makhanlal Chaturvedi. He said that January 30 is a pious day for the country who gave to great sons to India who devoted a major part of their lives to journalism and cultivated a seed of development and enlightenment in the society through it.

Senior journalist and Member of Central Film Censor Board, Ramesh Patange while addressing the students, said four kinds of independence are important for a society for its inclusive growth: political, social, economic and intellectual. He said that political freedom has been achieved and the nation is in the process of achieving social and economic freedom and would be achieved in the days to come. But the struggle for intellectual freedom is the toughest and the most important one. Media could play a vital role in it and therefore, it should rethink how this freedom could be achieved. While presiding over the function, vice-chancellor of the university, Prof. Brij Kishore Kuthiala said that besides, the education imparted at schools, colleges and universities, media too plays a key role in giving an intellect to the society. It is the responsibility of the media to take the intellectual level of the society to the zenith.

Prof. Kuthiala further said, “Realizing their responsibilities, media-persons should disseminate information to the society only after a thorough analysis according to their intellectual abilities.” He also exhorted the student to take into account the points brought to the fore during the function and think and imbibe them to shape themselves into responsible and competent journalists. Earlier, the function began with the lighting of the traditional lamp by the guests and recitation of Saraswati Vandana and Makhanlal Chaturvedi’s poems by students. The guests also paid tribute to Father of Nation Mahatma Gandhi and Makhanlal Chaturvedi by garlanding their portraits.

The function was coordinated by the head of Mass Communication Department, Sanjay Dwivedi. Among those present on the occasion were many eminent citizens from the city, heads of different departments of the Journalism University, faculty members, officers, employees and large number of students.

Dr. Pavitra Shrivastava
Director – Public Relations

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फिल्मों ने किया देश को एकजुट : लेख टंडन

मुम्बई। भारतीय सिनेमा ने देश को एकजुट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। पहले फ़िल्मों में एक बड़ा उद्देश्य होता था, लेकिन अब उददेश्य को लेकर नहीं, व्यावसायिक दृष्टि से फिल्में बनाई जा रही हैं, इससे आम आदमी सिनेमा से दूर होता जा रहा है। यह बात प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक एवं पटकथा लेखक श्री लेख टंडन ने “भारतीय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन अपने संबोधन में कहीं। मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 5-6 जनवरी को महाविद्यालय के सभागार में किया गया। अपने संबोधन में निर्देशक लेख टंडन ने कहा कि फिल्में समाज पर अपना गहरा प्रभाव छोडती हैं। भारत एक महान देश है जहां व्यक्ति को अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता है। अब यह तो फिल्मकार या साहित्यकार पर निर्भर है कि वह इस स्वतंत्रता का प्रयोग कैसे करता है।

सम्मेलन के पहले दिन उद्घाटन वक्तव्य देते हुए सुप्रसिद्ध पटकथा लेख श्री अतुल तिवारी ने कहा कि सामाजिक यथार्थ और फ़िल्मी यथार्थ में बहुत अंतर होता है। साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है लेकिन दर्पण कभी सच नहीं बोलता। दर्पण हमारे अक्स को उलटा दिखाता है। फ़िल्म की स्थिति भी कुछ इसी तरह की है। कहना मुश्किल है कि फ़िल्म समाज के यथार्थ को कितना सच और कितना झूठ दिखाती हैं?

सतना से आए फिल्म विशेषज्ञ श्री प्रहृलाद अग्रवाल ने दर्शकों की सिनेमाघरों में घट रही संख्या पर चिंता जताते हुए कहा कि सिनेमा कॉमन मैन का मीडिया है। कॉमन मैन को सिनेमा हाल से बाहर करने की साजिश रची जा रही है। समाज के कॉमन मैन को देख कर फिल्मों का निर्माण नहीं किया जा रहा है। वर्तमान में मल्टीपलेक्स सिनेमा की संस्कृति बढ गई है और उसी के अनुसार फिल्में बनाई जा रही हैं। इस महाबाजार ने सिनेमा हाल को समाप्त कर दिया है और आम आदमी को उससे बाहर।

इस कार्यक्रम में कथाकर एवं पटकथा लेखक सुधा अरोड़ा ने एक सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि सिनेमा समाज का पूरा यथार्थ प्रस्तुत नहीं करता है। सिनेमा चीज़ों को भटका देता है और उनके सही संदर्भ भी नहीं बताता है। कुछ फ़िल्में बहुत गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। भारतीय सिनेमा और सामाजिक यथार्थ विषय पर आयोजित इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश से आए लगभग 200 प्रतिनिधियों, प्रोफेसरों और शोधार्थियों ने हिन्दी, अंग्रेजी, मराठी और गुजराती भाषाओं में अलग-अलग समानांतर सत्रों में प्रतिभागिता की एवं अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए।

मुम्बई विश्वविद्यालय के प्रो. रतन कुमार पाण्डेय, मुम्बई की फिल्म विशेषज्ञ डॉ. वंदना शर्मा, डॉ. हूबनाथ, फिल्मिस्तान फ़िल्म के क्रिएटिव निर्देशक अशोक पुरंग सहित कई शिक्षाविदों, फिल्मों से जुडे लोगों ने भी सिनेमा के सामाजिक परिदृश्य पर प्रकाश डाला।
 
मॉंट्रियल विश्वविद्यालय, कनाडा से आए प्रो. मैथ्यू बॉज़वर्ट ने तीसरे सत्र की अध्यक्षता करते हुए कहा कि इस तरह के आयोजन बहुत आवश्यक हैं क्योंकि चर्चा और विमर्श से ही समाज और सिनेमा के बदलते परिदृश्य को समझा सकता है। नेपाल से आए फिल्म निर्देशक आलोक लमसाल ने गिटार के साथ नेपाली गीत प्रस्तुत किए। इसके साथ ही नेपाल के संगम पंत ने सारंगी बजाकर दर्शकों को मंत्र मुग्ध कर दिया। आलोक लमसाल और संगम पंत ने नेपाली सिनेमा पर भारतीय सिनेमा के प्रभाव पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
हरियाणा के अखिल भारतीय जाट सूरमा स्मारक महाविद्यालय, रोहतक से आए वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. रामिन्द्र हुडडा, सहायक प्रोफेसर डॉ. जसमेर सिंह हुडडा, डॉ. समशेर सिंह धनखड, डॉ. राजेश्वर लाठर ने सिनेमा के सामाजिक संदर्भों और खाप-पंचायतों को लेकर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।

राजस्थान से आए डॉक्यूमेंटरी फिल्म निर्देशक डॉ. सुधीर सोनी ने पहले सत्र में बोलते हुए सिनेमा के सामाजिक सरोकारों पर प्रकाश डाला। वहीं उच्च शिक्षा विभाग राजस्थान की अध्यापिका डॉ. अनिता नायर ने सिनेमा में नारी की स्थिति पर अपनी प्रस्तुति दी। सिम्पली जयपुर पत्रिका के प्रबंध संपादक व राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल के प्रबंधक श्री सोमेन्द्र हर्ष ने कहा कि आज फ़िल्में व्यापार के लिए बन रही हैं न कि आम आदमी के लिए। जयपुर से आई राजस्थान इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल, जयपुर की प्रबंधक श्रीमती अंशु हर्ष ने फ़िल्मों में आई स्वतंत्रता का स्वागत करते हुए कहा कि समाज में आए परिवर्तन से फ़िल्मों में भी परिवर्तन का दौर आया है।

समापन समारोह में कथाकार सूर्यबाला ने कहा कि फ़िल्मों ने समाज के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह पूरी तरह से नहीं किया है। फ़िल्मों में बहुत शक्ति है लेकिन इसे सही दिशा में होना चाहिए। एस.एन.डी.टी. विश्वविद्यालय की पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष प्रो. माधुरी छेड़ा ने कहा कि भारतीय सिनेमा ने सौ साल की अपनी यात्रा में बहुत बड़े कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसमें सिनेमा ने अन्य सभी माध्यमों को पीछे छोड़ दिया है। 

कॉलेज की प्राचार्या प्रो. हर्षदा राठोड़ ने सभी अतिथियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि उनके आने से कॉलेज का सम्मान हुआ है। देश भर के विभिन्न भागों से आए हुए प्रतिभागियों ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. रवीन्द्र कात्यायन ने सभी अतिथियों व प्रतिभागियों का धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके आने से ही कार्यक्रम सफल हुआ है।  

इस मौके पर सेंट जेवियर्स कॉलेज की उप-प्राचार्य डॉ. आशा नैथानी दायमा, बनारस के कलाकार आशुतोष पाठक, एलजेएनजे महिला महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. स्मृति भोसले, शिवाजी विश्वविद्यालय कोल्हापुर के प्रोफ़ेसर अर्जुन चव्हाण, उच्च शिक्षा विभाग अजमेर के डॉ. संदीप अवस्थी, युवा संगीत इतिहासकार एवं गायक हार्दिक भटट, अभिनेत्री असीमा भटट ने भी अपने संबोधन में सिनेमा के सामाजिक यथार्थ और उसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला।

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हमारा लोकतंत्र दलितों, आदिवासियों और मुस्लिमों को सिर्फ जेल दे पाया : शिवमूर्ति

लखनऊ । रिहाई मंच ने ‘अवैध गिरफ्तारी विरोध दिवस’ के तहत यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में ’अवैध गिरफ्तारियां और इंसाफ का संघर्ष’ विषयक सेमिनार का आयोजन किया। आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए खालिद मुजाहिद जिनकी पुलिस व आईबी अधिकारियों द्वारा मई 2013 में हत्या कर दी गई थी, उनकी 2007 में हुई फर्जी गिरफ्तारी की सातवीं बरसी पर यह आयोजन किया गया। सेमिनार को संबोधित करते हुए साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि आज जेलों में तमाम लोग 10-10 सालों से उन मामलों में बंद हैं जिसमें अधिकतम सजा ही दो साल है। इनमें बड़ी संख्या दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की है। इससे साबित होता है कि पूरी व्यवस्था ही इन तबकों के खिलाफ है। सबसे शर्मनाक कि सामाजिक न्याय के नाम पर सत्ता में आई पार्टियों के शासन में भी यह सिर्फ जारी ही नहीं है बल्कि इनमें बढ़ोत्तरी ही हो रही है। खालिद का मामला इसका उदाहरण है। यह सिलसिला तभी रुकेगा जब मुसलमानों को आतंकवाद के नाम पर फंसाने और उन्हें फर्जी एंकाउंटरों में मारने वाले जेल भेजे जाएंगे जैसा कि गुजरात में देखने को मिला।

इस अवसर पर दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन ने कहा कि अवैध गिरफ्तारियों का सवाल सामान्य नहीं है। यह एक बिजनेस माडल है। इसका एक ग्लोबल स्ट्ररक्चर है और इसे समझने की जरूरत है। यह सवाल दरअसल देश की बहुसंख्यक आवाम से जुड़ा है। देश के 85 प्रतिशत लोगों की सत्ता में कोई भागीदारी नहीं है। वे कोई आवाज न उठाएं इसीलिए यह सब हथकंडे हैं। उन्होंने कहा कि विचार तंत्र को नियंत्रित करने वाले संगठनों में अमीरों का कब्जा है। सारी लड़ाई इस लुटेरे आर्थिक तंत्र को वैधता प्रदान करने की कोशिशों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि आज देश के दलित, आदिवासी और मुस्लिम समाज के लोगों का स्थान अपनी आबादी से अधिक जेलों में है। इसके लिए सिर्फ पुलिस ही नहीं बल्कि देश का राजनीतिक ढांचा भी जिम्मेदार है। पश्चिमी यूपी में जिस तरह दलितों और मुस्लिमों में सापंद्रायिक तनाव भड़काया जा रहा है ऐसे में दलितों को सोचना होगा कि जिस हिन्दुत्वादी अस्मिता के तहत वे कभी बसपा तो कभी भाजपा के साथ जाते हैं उस राजनीति ने उन्हें क्या दिया।

उन्होंने कहा कि गुजरात में पहली बार आईपीएस जेल गए और फर्जी एनकाउंटर बंद हो गए। खालिद के मामले में निमेष कमीशन ने भी दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफरिश की है। अगर इस पर अमल हो गया तो फर्जी गिरफ्तारियों में काफी कमी आ जाएगी। मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडे ने कहा कि रिहाई मंच की इस लड़ाई ने सरकार पर एक दबाव बनाया और उसके बाद सरकार ने हर जिले में एक शासनादेश भेजा कि सांप्रदायिक सौहार्द्र के लिए बेगुनाह छोड़े जाएं। जबकि होना यह चाहिए था कि सरकार मामलों की पुर्नविवेचना के बाद उनको छोडने की बात करती। इससे सरकार ने न्याय के इस सवाल को साम्प्रदायिक राजनीति के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की। इसलिए निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर अमल कराने के लिए संघर्ष जारी रखना होगा।

इस अवसर पर रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब ने कहा कि हम आतंकवादियों को छुड़ाने की बात नहीं करते बल्कि बेगुनाहों को छोड़ने की बात करते हैं। सरकार ने वादा किया था कि वह इन नौजवानों को छोड़ेगी और उनका पुर्नवास करेगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अभी भी कई बरी लोग पुर्नवास की बाट जोह रहे हैं। रामपुर के जावेद उर्फ गुड्डू, ताज मोहम्मद, मकसूद बिजनौर के नासिर हुसैन और लखनऊ के मोहम्मद कलीम जैसे बेगुनाह बरी होने के बावजूद किसी भी तरह के पुर्नवास से वंचित है। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों बाराबंकी पुलिस द्वारा खालिद मुजहिद की हत्या पर की गई झूठी विवेचना को खारिज करते हुए न्यायालय ने इस मामले की जांच बाराबंकी एसपी को पुनः कराने का निर्देश दिया था। आज खालिद के चचा जहीर आलम फलाही ने उन्हें बताया कि आज वही दरोगा उन्हें फोन किया था कि वे आकर अपनी गवाही दें। दोषपूर्ण विवेचक द्वारा पुनः विवेचना कराना न सिर्फ न्यायालय की अवमानना है, इससे यह भी साबित होता है कि यूपी की सपा सरकार किसी भी हाल में खालिद के हत्यारोपी पुलिस अधिकारी विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा व अन्य आईबी व पुलिस अधिकारियों को हर कीमत पर बचाना चाहती है। जिससे कि आतंकवाद के मामलों में पुलिस व आईबी के गठजोड़ से पर्दा न उठ सके।

मौलाना खालिद मुजाहिद के चचेरे भाई शाहिद ने कहा कि पूरी दुनिया जानती है कि मेरे भाई को गलत तरीके से उठाया गया। निमेष रिपोर्ट भी इसकी तस्दीक करती है। लेकिन बावजूद इसके उन्हें पांच साल तक जेल में रखा गया और आखिर में मार डाला गया। लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि इंसाफ के इस संघर्ष के कारण उनके हत्यारे जरूर जेल जाएंगे। सपा सरकार उनको बहुत दिनों तक बचा नहीं पाएगी। सामाजिक न्याय मंच के अध्यक्ष राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि सवाल केवल खालिद की अवैध गिरफ्तारी का नहीं है, अवैध गिरफ्तारियां आज भी लगातार जारी हैं और व्यवस्था के लिए उनके अपने निहितार्थ हैं। ऐसी अवैध गिरफ्तारियां सत्ता को अपनी हुकूमत बचाए रखने के लिए जरूरी हैं ताकि आम जनता डरकर उनके खिलाफ आवाजें उठाना बंद कर दे। उन्होंने कहा कि पश्चिमी यूपी के मुसलमानों को आधार कार्ड, राशन कार्ड के नाम पर धर्मान्तरण करवाया जा रहा है। संघ की साम्प्रदयिक साजिशों में अखिलेश यादव सरकार परदे के पीछे से खेल रही है।

सेमिनार को संबोधित करते हुए ट्रेड यूनियन नेता शिवाजी राय ने कहा कि पूंजीवाद के चरित्र में इस किस्म के अपराध होते हैं। यह सब इस व्यवस्था का अंग है। उन्होंने कहा कि सरकार ने दस लाख हेक्टेयर जमीन किसानों से छीनी हैं और विरोध करने पर फर्जी मुकदमे लादे जाते हैं। वास्तव में पुलिस का चरित्र ही उत्पीड़क है। एपवा की नेता ताहिरा हसन ने कहा कि खालिद मुजाहिद की सातवीं बरसी पर हम उन्हें याद कर रहे हैं और देश में अवैध गिरफ्तारियों के खिलाफ मजबूत विरोध के लिए इकट्ठा हुए है। खालिद की गिरफ्तारी देश के संविधान पर हमला था जिसे देश की खाकी द्वारा अंजाम दिया गया था। अगर निमेष आयोग कहता है कि खालिद बेगुनाह है तो फिर उस प्रताड़ना का जवाब कौन देगा जो उसे और उसके परिवार को मिली हैं।

सेमिनार में आदियोग, रामकृष्ण, धमेंद्र कुमार, अजीजुल हसन, राजीव प्रकाश साहिर, डा. अनवारुल हक लारी, वर्तिका शिवहरे, ज्योत्सना, रिफत फातिमा, नेहा वर्मा, प्रदीप शर्मा, सीमा राणा, एहसानुल हक मलिक, शिवनरायण कुशवाहा, जैद अहमद फारूकी, सैयद मोईद अहमद, डाॅ अली अहमद, कमर सीतापुरी, जुबैर जौनपुरी, गुफरान खान, खालिद कुरैशी, आफाक, दीपिका पुष्कर, बिलाल हाश्मी, होमेंद्र मिश्र, जाहिद अख्तर, फैजान मुसन्ना, मुजफ्फर लारी, मोहम्मद समी, अख्तर परवेज, महेश चंद्र देवा, शरद जायसवाल,, तारिक शफीक, हरेराम मिश्र, विनोद यादव, लक्ष्मण प्रसाद, शाहनवाज आलम आदि मौजूद थे।

कार्यक्रम में 6 सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया –

1- मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की विवेचना को प्रभावित करने वाले हत्यारोपी पुलिस अधिकारियों विक्रम सिंह, बृजलाल, मनोज कुमार झा, चिरंजीव नाथ सिन्हा आदि को तत्काल गिरफ्तार किया जाए।

2- अपने चुनावी वादे के मुताबिक सपा सरकार आतंकवाद के आरोपों से अदालतों से दोष मुक्त हुए मुस्लिम युवकों का पुर्नवास सुनिश्चित करे।

3- आतंकवाद के नाम पर कैद निर्दोषों को तत्काल रिहा किया जाए।

4- सपा सरकार अपने वादे के मुताबिक आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करे।

5- ‘लव जिहाद’ और ‘घर वापसी’ के नाम पर सांप्रदायिकता फैलाने वाले हिन्दुत्वादी संगठनों आरएसएस, बजरंगदल, विश्व हिन्दू परिषद सरीखे संगठनों पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए उनके दोषी नेताओं को गिरफ्तार किया जाए।

6- आतंकवाद के नाम पर हुई घटनाओं की न्यायिक जांच कराई जाए, जिसके दायरे में खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों का लाया जाए।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
प्रवक्ता, रिहाई मंच
09415254919

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इलेक्ट्रोनिक मीडिया से प्रिंट मीडिया ज्यादा विश्वसनीय है : केदारनाथ सिंह

अलवर। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली में मानद प्रोफेसर व ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार केदारनाथ सिंह ने कहा कि वर्तमान में पेड न्यूज सबसे बड़ी चुनौती है। इसने सच्ची खबरों  के बीच फासले खड़े कर दिए हैं। शुक्रवार को महावर ऑडिटोरियम में बाबू शोभाराम राजकीय कला महाविद्यालय के हिन्दी विभाग व आईसीसीएसआर की ओर से “मीडिया: अतीत, वर्तमान व भविष्य”  पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि वर्तमान में मीडिया चुनौती के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि खबर देने का काम मीडिया का है। सच्चाई भाषा के प्राण हैं। वर्तमान में मीडिया व साहित्य के बीच की दूरी बढ़ी है। नेशनल व भाषाई अखबारों का वर्गीकरण भी चिंता का विषय है।

ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार प्रोफेसर केदारनाथ सिंह ने शुक्रवार को संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया से प्रिंट मीडिया ज्यादा विश्वसनीय है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में बाजार का दबाव मीडिया पर बढ़ता जा रहा है। इससे उसकी विश्वसनीयता घट रही है। मीडिया निहित स्वार्थो को परे रखकर कार्य करे, तभी सच्चे तथ्य सामने आएंगे। उन्होंने माना कि मीडिया में अब भी अच्छी प्रतिभाएं आ रही हैं। बस उन्हें सारे दबावों को परे रखकर सच को जनता के सामने रखने का प्रयास करना चाहिए।

मुख्य वक्ता जेएनयू नई दिल्ली के प्रोफेसर ओमप्रकाश सिंह ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया को और अधिक जिम्मेदार बनने की बात कही। उन्होंने कहा कि मीडिया ने दूरियां कम की हैं, लेकिन कुछ अखबार व चैनलों ने गुमराह भी किया है। दूरदर्शन केन्द्र जयपुर के उपमहानिदेशक कृष्ण देव कल्पित ने कहा कि लोगों की आवाज उठाने की जिम्मेदारी मीडिया की है। प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल ने मीडिया पर भी कुछ पाबंदिया लगाने की बात कही। उन्होंने कहा कि कई चैनल अंधविश्वास परोस रहे हैं। उन्हें पूरी जांच-पड़ताल के बाद कार्यक्रम प्रस्तुत करने की अनुमति दी जानी चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डॉ. यशोदा मीणा ने कहा कि जनसहभागिता व पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक हैं। पत्रकारिता सत्यम शिवम व सुन्दरम होनी चाहिए। इससे पूर्व कार्यक्रम की  शुरुआत में एक डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन भी किया गया। इसमें मीडिया की विकास यात्रा को दर्शाया गया। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. कैलाश पुरोहित ने अतिथियों का स्वागत व उपाचार्य डॉ. आरसी खण्डूरी ने आभार जताया।

आयोजन सचिव डॉ. उमेश कुमार राय ने परिचय कराया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रेखा अजवानी व डॉ. जयकोमल ने किया। कार्यक्रम के सह प्रायोजक राजस्थान इंस्टीट्यूट थे। एसोसिएशन ऑफ एशिया स्कोलर्स ने सहयोग प्रदान किया। राष्ट्रीय सम्मेलन में तकनीकी सत्र भी हुए। प्रथम सत्र “मीडिया ऎतिहासिक परिप्रेक्ष्य” में 12 पत्रों का वाचन किया गया। द्वितीय सत्र “मीडिया का वैश्विक परिदृष्य: सीमाएं एवं संभावनाएं” में 20 पत्रों का वाचन हुआ। तृतीय सत्र “मीडिया: नैतिकता, कानून एवं अपराध” में 16 पत्रों का वाचन हुआ। चतुर्थ सत्र खुला सत्र था। इसमें 18 पत्रों का वाचन किया गया। इस मौके पर डॉ. संजीव भानावत, डॉ. दीपक श्रीवास्तव, डॉ. फिरोज अख्तर, डॉ. भगवान साहू, डॉ. रविन्द्र कात्यायन, डॉ. प्रमोद पाण्डेय, डॉ. लवलीना व्यास, डॉ. सुधीर सोनी सहित हिन्दी के कई विद्वान, प्राध्यापक व शोधार्थी मौजूद थे।

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संस्थाओं का सृजन हो तो उसका विसर्जन भी हो : अनुपम मिश्र

नई दिल्ली । पर्यावरणविद् और ‘गांधी मार्ग’ के संपादक अनुपम मिश्र ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर सामाजिक या गैर सरकारी संस्थाओं का सृजन जरूर करना चाहिए लेकिन एक समय आने पर हमें इसके विसर्जन के बारे में भी सोचना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे टांग टूटने पर  पलास्टर लगाया जाता है, लेकिन उसके ठीक होने के बाद हम पलास्टर हटा देते हैं। मिश्र सेंटर फॉर डेवलपिंग सोसायटी की साऊथ एशियन डायलॉग आॅन इकोलाजिकल डेमोक्रेसी योजना के तहत इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित दो दिन की राष्ट्रीय कार्यशाला के आखिरी दिन एक विशेष सत्र को संबोधित कर रहे थे। इस विशेष सत्र के व्याख्यान का विषय ‘संस्था, समाज और कार्यकर्ता का स्वधर्म’ था। कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों सहित पड़ोसी देशों में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता भाग ले रहे थे।

मौजूदा दौर में ज्यादा से ज्यादा संसाधन जुटाने में जुटीं गैर सरकारी संस्थाओं के ढांचे और उनसे जुड़े लोगों के रवैए पर टिप्पणी करते हुए मिश्र ने कहा कि आज ये गैर सरकारी संस्थाएं एक-दूसरे को रौंदते हुए सबसे आगे बढ़ने की होड़ में हैं। उन्होंने हैरानी जताई कि ये संस्थाएं थोड़े ही दिनों में कैसे खुद को राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय घोषित करने की जल्दबाजी में रहती हैं। समाज की मदद के मामले में गैर सरकारी संस्थाओं की सीमाओं, भूमिकाओं और प्रयोगों का विस्तार से जिक्र करते हुए अनुपम मिश्र ने कहा कि जब सरकार नाम की संस्था लोगों की आकांक्षाओं और जरूरतों को पूरा करने में हमेशा विफल रहती आई है तो इन संस्थाओं की क्या औकात है। उन्होंने कहा कि संस्थाओं का आकार छोटा होना चाहिए, कार्यकर्ता भी कम होने चाहिए और मकसद पूरे हो जाएं तो इन्हें बंद करने में भी देरी नहीं करनी चाहिए।

मिश्र ने राजस्थान के गांवों में ग्रामीणों द्वारा बगैर सरकारों और संस्थाओं के सहयोग से पानी जुटाने की व्यवस्था पर केंद्रित स्लाइड दिखाते हुए बताया कि एक स्वस्थ समाज को संस्थाओं की कभी जरूरत नहीं होती और समाज से बड़ी कोई संस्था भी नहीं होती। उन्होंने कहा कि असल में एक धनवान संस्था बनाने के बदले हमें समाज में एक-दूसरे के प्रति ममता और समता की भावना को हमेशा जागृत करने का प्रयास करना चाहिए और उनके पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करते हुए उसका उनके उत्थान के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।

मिश्र के संबोधन के बाद शिरकत कर रहे श्रोताओं ने अनेक तरह के सवाल रखे, जिनके जवाब उन्होंने दिए। सवालों में लोगों की यह चिंता गहरी दिखी कि आज समाज का पारंपरिक ज्ञान लुप्त हो रहा है और तथाकथित विकास के सैलाब में वह सब कुछ खत्म हो रहा है, जिन पर हम निर्भर थे और जिनके गुण गाते आज भी नहीं अघाते। ज्यादातर ने यह सवाल भी अलग-अलग ढंग से उठाया कि जिस समाज में हिंदू-मुसलिम एकता और सद्भाव कायम था, वह आज तार-तार हो रहा है और सामाजिक सद्भाव के प्रतीक और धरोहर भी मिटाए जा रहे हैं। लोगों ने यह जरूरत भी बताई कि कार्यकताओं को अपने स्वधर्म का नहीं, युगधर्म का निर्वाह करना चाहिए।

दो दिन की इस कार्यशाला में दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों में पर्यावरण क्षरण पर चिंता जताते हुए इसके लिए आम लोगों में जागृति लाने और मकसद को हासिल करने के लिए संचार माध्यमों सहित विभिन्न पारंपरिक तौर-तरीकों के कारगर इस्तेमाल आदि पर भी गहन चर्चा हुई। संगठन और संघर्ष के लिए रणनीति बनाने और इसमें सभी लोगों की भागीदारी बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया गया। कार्यशाला में राजस्थान से आए छतर सिंह सहित समाज चिंतक आशीष नंदी, कमल नयन काबरा, प्रदीप गिरी, श्रवण गर्ग, केवी राजन, विजय प्रताप, रजनी बख्शी, अनिल मिश्र, राकेश दीवान, किरण शाहीन, रघुपति, अंबरीश कुमार, प्रसून लतांत, मणिमाला, औवेश, सुंदर लाल सुमन, नंद कुमार आजाद, आशुतोष, विजय शुक्ला, शाहीद कमाल और कुमार कृष्णन आदि ने भी अपने विचार रखे।

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CM Okram Ibobi hums Majithia Wage Board tune

IMPHAL : The mandatory tripartite committee comprising of working journalists, publishers and Government representatives has already been formed and the State Government is fully committed to implement the Justice Majithia Wage Board in the State, said Chief Minister Okram Ibobi while speaking at the inaugural function of the three-day National executive meeting of the Indian Journalists Union (IJU) at the banquet hall of 1st Manipur Rifles today.

All Manipur Working Journalists’ Union (AMWJU) hosted the meeting for the first time in the State after the union got affiliation from IJU last year. Chief Minister Okram Ibobi, IJU President SN Sinha, Social Welfare Minister AK Mirabai, IJU General Secretary Devulanalli Amar and AMWJU President Wangkhemcha Shamjai attended the function as chief guest, president and guests of honour respectively.

In his speech, the Chief Minister said that the mandatory tripartite committee to implement the recommendations of Justice Majithia Wage Board has already been constituted and the State Government is fully committed to implement the recommendations in the State.

Saying that the committee would classify the journalists to develop a foolproof action plan for them, the Chief Minister said that formation of the committee has already been notified in the State Gazette. Congratulating AMWJU on getting affiliation from IJU and hosting a National executive meeting in the State, the Chief Minister said that IJU, which came into being in 1989, has now more than 23,000 members.

IJU members are well represented in various Central and State Government institutions like Press Information Bureau (PIB), Press Accreditation Committee and Press Council of India (PCI), which stand for safeguarding the freedom of press and protection of the rights of journalists. Thanking IJU for allowing the journalists of the State to be a part of the journalist fraternity of the country by giving affiliation to AMWJU, Okram Ibobi said that this consent would enhance the social and cultural integrity between Manipur and the rest of the country.

The Chief Minister said that the State Government has hiked the grant for journalists pension fund from Rs 2 lakh to Rs 5 lakh to facilitate proper implementation of the pension scheme. Despite weak financial position, the State Government has also given its nod to set up a Press Club Academy to train the aspiring journalists and raise the standard of journalism, he added.

Saying that the State Government has been extending assistance to journalists through their corpus fund at the time of emergency, Okram Ibobi also urged AMWJU to suggest to the Government if the union wishes to take up any other welfare schemes for the journalists. Ibobi added that he had also directed the authority concerned to study every available points which can be adopted by the Government regarding the welfare of journalists. He added that the State Government has also agreed in principle to establish a Press Housing Colony.

Contending that Manipur is a gateway to southeast Asian countries, Ibobi also urged the visiting journalists to witness the rich cultural heritage of the State at the ongoing Manipur Sangai Festival. He also expressed hope that Manipur would play a vital role in the successful enforcement of India’s Look East Policy.

Addressing the function, SN Sinha said that IJU is holding its National executive meeting in the North East region for the third time with Sikkim and Assam being the other States which had hosted the previous meetings. The IJU president said that 150 journalists from 20 different States are taking part in the meeting.

Highlighting various challenges being faced by the media in the State, Wangkhemcha Shamjai said that many journalists have died while many others have been injured in the line of duty. He added that AMWJU is putting in efforts to implement the recommendations of Justice Majithia Wage Board to enhance the working condition of journalists in the State.

साभार- The Sangai Express

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कृपलानी ने सिद्धांतों की खातिर 57वें कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था

हमारे देश में राज्य श्रेष्ठ मान लिया जाता है, समाज दोयम। शायद यही कारण है कि राजपुरुष प्रधान हो जाते हैं और समाज का पहरुआ गौण। जी हाँ, इस देश में अगर ‘राज्य-समाज समभाव’ दृष्टिकोण अपनाया गया होता तो आज आचार्य जीवतराम भगवानदास कृपलानी उतने ही लोकप्रिय और प्रासंगिक होते जितने कि सत्ता शीर्ष पर बैठे लोग। वह व्यक्ति खरा था, जिसने गांधीजी के ‘मनसा-वाचा-कर्मणा’ के सिद्धांत को जीवन पद्धति मानकर उसे अंगीकार कर लिया। उक्त विचार मशहूर स्वतंत्रता सेनानी आचार्य जे बी कृपलानी की 126वीं जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए गए।

यह आयोजन संयुक्त रूप से आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट तथा गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की ओर से किया गया था।  मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए कृपलानी जी के निकट सहयोगी रहे दीनानाथ तिवारी ने उनसे जुड़े अनेक प्रसंगों का जीवंत वर्णन किया। उनका कहना था कि कृपलानी कभी भी हाशिये पर नहीं गए, सिर्फ चिंतन-प्रक्रिया में आये बदलाव के कारण वे थोड़ा ओझल हो गए हैं। उन जैसे व्यक्तित्व समय, देश और काल की मर्यादा से ऊपर उठकर सदैव आदरणीय और पूजनीय रहेंगे। समाजवादी सोच रखने वाले दिल्ली वि.वि. के सेवानिवृत्त प्राध्यापक डॉ. रामचन्द्र प्रधान ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कृपलानी (दादा) को उद्धृत करते हुए कहा – ‘जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा, वही सरकार चलाएगा’। कृपलानी एक मिशन के रूप में युद्ध-स्तर पर कार्य करने में विश्वास रखते थे। गांधी के सच्चे अनुयायी की तरह कुशलता में विश्वास रखते थे। उनके लिए बीच का कोई रास्ता नहीं होता था।

वरिष्ठ पत्रकार एवं कृपलानी के जीवनी लेखक रामबहादुर राय ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल (1946 -47) का जिक्र  करते हुए कहा कि उस समय देश विभाजन के दौर से गुजर रहा था लेकिन लगभग सारे नीतिगत  निर्णय सरकार के लोगों द्वारा लिए जा रहे थे। ऐसे में कृपलानी ने यक्ष-प्रश्न उठाया कि ‘पार्टी सरकार के अनुसार चलेगी या सरकार पार्टी के अनुसार?’ देश में अस्थायी सरकार का गठन 2 सितम्बर, 1946 को हो चुका था और पंडित जवाहर लाल नेहरू उपाध्यक्ष की हैसियत से शासन संचालित कर रहे थे। इसी मुद्दे पर आ. कृपलानी ने सिद्धांतों की खातिर कांग्रेस अध्यक्ष (57 वें) पद से त्यागपत्र दे दिया। पार्टी और सरकार के बीच शक्ति-पृथक्करण का यह प्रश्न आज भी जीवंत है और आचार्य कृपलानी इसके उत्तर। अध्यक्ष पद पर रहते हुए ही उन्होंने काम तलाश रहे एक युवा पत्रकार देवदत्त से कहा था कि ‘आजकल तो मैं खुद ही बेरोजगार हूँ’। रामबहादुर राय ने कृपलानी के जीवन वृतांत को पांच खण्डों में विश्लेषित कर उपस्थित श्रोताओं का ज्ञानवर्धन किया। प्रख्यात गांधीवादी रामचन्द्र राही ने बिहार के भागलपुर जिला अंतर्गत बेराई ग्रामदान का सजीव वर्णन किया। उन्होंने यह विमर्श भी छोड़ा कि आखिर क्यों सत्ता शिखर पर मौजूद व्यक्ति सर्वगुणसंपन्न मान लिया जाता है?

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए आचार्य कृपलानी मेमोरियल ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी अभय प्रताप ने कहा कि आज की पीढ़ी आचार्य कृपलानी के अवदान से ठीक से परिचित नहीं है। जबकि कृपलानी दंपत्ति आज ज्यादा प्रासंगिक और सारगर्भित हैं। देश की प्रथम महिला मुख्यमंत्री (उत्तर-प्रदेश) श्रीमती सुचेता कृपलानी एवं आचार्य जे बी कृपलानी ने सात्विक और सैद्धांतिक राजनीति को अपना आदर्श माना। अभय प्रताप ने ने ट्रस्ट द्वारा हर पखवाड़े एक गोष्ठी करने की बात कही। इस अवसर पर अभय प्रताप द्वारा संपादित पुस्तिका ‘शहादत का रास्ता’ का लोकार्पण भी किया गया। यह आ. कृपलानी के पांच महत्वपूर्ण लेखों/भाषणों का संकलन है।  कार्यक्रम की शुरुआत मणिकुंतला जी (गन्धर्व महाविद्यालय) के भजनों से हुई। अंत में, गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति की निदेशक मणिमाला ने सभी के प्रति आभार प्रकट करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का संचालन संत समीर ने किया।

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राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर उपजा ने मनाया समारोह, पत्रकारिता की जीवंतता पर छिड़ी बहस

लखनऊ। राज्य विधानसभा के अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया जगत, खासकर अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों का आह्वान किया है कि वे अच्छी खबरें लिखकर समाज में सकारात्मक सोच पैदा करें। माता प्रसाद पाण्डेय ने मीडिया काउंसिल की पुरजोर वकालत की। पाण्डेय रविवार को राजधानी में राष्ट्रीय प्रेस दिवस समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (उपजा) और इसकी स्थानीय इकाई ‘लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन’ ने संयुक्त रूप से किया था।

शीघ्र ही राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त होने जा रहे प्रदेश के वरिष्ठतम आईएएस अधिकारी जावेद उस्मानी, भारतीय प्रेस काउंसिल के सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी, राज्य के सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के लखनऊ ब्यूरो चीफ प्रमोद गोस्वामी, पूर्व सूचना आयुक्त वीरेन्द्र सक्सेना, ‘उपजा’ के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित, महामंत्री रमेश चन्द्र जैन आदि ने निडर एवं फ्री प्रेस की महत्ता पर अपने गम्भीर विचार रखे और प्रेस की मजबूती तथा स्वतंत्रता के अलावा पत्रकारों के आर्थिक हितों व उनकी सुरक्षा पर जोर दिया। कार्यक्रम का संचालन लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिशन के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ल ने किया।

सप्रू मार्ग स्थित उद्यान विभाग सभागार में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करने वाले उप्र विधानसभा के अध्यक्ष पाण्डेय ने अपने सारगर्भित सम्बोधन में कहा कि लोकतंत्र में ‘पब्लिक ओपिनियन’ का बहुत महत्व होता है। इस प्रणाली में विशेष रूप से प्रिण्ट मीडिया जनता की राय बनता है। लिहाजा उसके पत्रकारों को चाहे वे संवाददाता हों, अथवा डेस्क पर कार्यरत सम्पादक, उन्हें बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि उनकी लिखी और सम्पादित खबरें सनद व दस्तावेज बन जाती हैं जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग तो अपने समाचार प्रस्तुत करने के बाद उसे हटा भी लेते हैं।

पाण्डेय ने कहा कि खबरों, पत्रकारों और मीडिया मालिकों पर भी अंकुश रखने तथा उन्हें मार्गदर्शित करने के लिए प्रेस परिषद की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है किन्तु इसका विस्तार किया जाना चाहिए ताकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा खबरिया चैनल भी इसकी परिधि में आ सकें। इस सम्बन्ध में उन्होंने मीडिया काउंसिल बनाये जाने की पुरजोर वकालत की। उन्होने कहा कि एसोसिएशन के माध्यम से मीडिया काउंसिल के गठन के लिए एक प्रस्ताव बनाकर भारत सरकार के पास भेजना चाहिए।

इसके साथ ही पाण्डेय ने, जिनकी समाज में एक समाजवादी ‘एक्टिविस्ट’ के रूप में अहम भूमिका रही है, पत्रकारों की आर्थिक सुरक्षा बढाये जाने की जरूरत पर बल दिया। विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पाण्डेय ने पूर्व में एक बार  विधानसभा में  पत्रकारों के लिए पेश पेंशन विधेयक के  पूर्ववर्ती एक सरकार द्वारा वापस ले लेने पर अफसोस जताते हुए कहा कि पत्रकारों के लिए सरकार को कुछ अलग से देने के लिए सोचना चाहिए । पाण्डेय ने कहा कि समाज के सजग प्रहरी के नाते मीडिया के लोग खुद अपने लिए आचार संहिता बनाएं, साथ ही अपने कर्त्तव्यों को सही ढंग से समाज के व्यापक हित में निभाएं।

उत्तर प्रदेश राजस्व परिषद के अध्यक्ष जावेद उस्मानी ने (जिन्हें शीघ्र राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालना है) इस अवसर पर अत्यन्त विस्तार से पत्रकारिता के स्वरूप व इसकी महत्ता की विवेचना की। उस्मानी ने कहा कि मीडिया सर्चलाइट के समान है। स्वतंत्र प्रेस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग, घटक तथा कडी है। यह सूरज की रोशनी की मानिन्द ‘समाज के अंधेरे’ में पहुंचकर उसके सभी विकारों को खत्म कर सकता है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि मीडिया और सूचना के अधिकार अधिनियम का उपयोग लोकतंत्र में शासन-प्रशासन तथा प्रणाली की खामियों को दुरुस्त करने में करें।

राज्य के मुख्य सचिव रह चुके उस्मानी ने कहा कि अच्छे पत्रकारों को चाहिए कि वे अपनी बौद्धिकता तथा साधनों का इस्तेमाल उन लोगों के विरुद्ध करें जो अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए समाज तथा जन के हितों पर कुठाराघात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रेस की भूमिका समाज हितैषी बातों तथा सुझावों को नीति निर्माताओं तक पहुंचाना और उनकी पैरोकारी करना होनी चाहिए। प्रेस के लोग शासन के कार्यों की सही मॉनिटरिंग करें। इस मौके पर  उस्मानी ने उपस्थित पत्रकार-समुदाय को आश्वस्त किया कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद संभालने पर वे देखेंगे की जनता को सूचनाएं मिलने में कहां अवरोध हैं और उन्हें यथासम्भव दूर करने की कोशिश करेंगे।

एनयूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके व प्रेस काउंसिल के नव मनोनीत सदस्य प्रज्ञानन्द चैधरी ने अपने सम्बोधन में पत्रकारों के संकल्प तथा विजन पर जोर दिया, साथ ही कहा कि केवल लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता सम्भव हैय लिहाजा प्रेसकर्मियों, कर्मचारियों और नियोक्ताओं में बेहतर समझ होनी चाहिए। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे छद्म जीवन का मोह न रखें, और अपने कार्यों को विश्वास व समझ के साथ पूरा करें तभी प्रेस काउंसिल बनाने का लक्ष्य पूरा होगा और इसे सशक्त बनाया जा सकेगा।

सूचना आयुक्त स्वदेश कुमार ने सूचना के अधिकार अधिनियम को पत्रकारों के लिए ब्रम्हास्त्र बताया और इसके उपयोग से हो रहे नित खुलासों के प्रति सन्तोष प्रकट किया है। उन्होने कहा कि आरटीआई के प्रयोग से पत्रकार पारदर्शी शासन व्यवस्था कायम करने की दिशा में काम कर सकता है। स्वदेश कुमार ने सोशल मीडिया, प्रिण्ट मीडिया तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के दायित्व की चर्चा करते हुए कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सक्रियता ने अखबारों पर दबाव बढा दिया है।
वरिष्ठ पत्रकार व पीटीआई के व्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी ने समाज को दिशा तथा निर्देशन में मीडिया की अहमियत को रूपांकित करते हुए लोकतंत्र में इसकी भूमिका पर जोर दिया एवं यह भी कहा कि मीडिया और इसके लोग भी अपने गिरेबान में झांकें।  वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का कहना था कि समय तथा समाज में तेजी से बदलाव के साथ पत्रकारिता में भी जबर्दस्त गिरावट आयी है। आवश्यक है कि पत्रकार नैतिक मूल्यों पर ध्यान दें। वीरेन्द्र सक्सेना ने समूची मीडिया में बढते व्यवसायीकरण को चिन्ताजनक बताया तथा कहा कि इससे पत्रकार जगत को भारी क्षति हो रही है। उपजा के प्रदेश अध्यक्ष रतन कुमार दीक्षित ने मीडिया पर शासन प्रशासन तथा मीडिया पर कारपोरेट घरानों के बढते प्रभुत्च वर चिंता व्यक्त की। महामंत्री रमेश चन्द्र जैन ने कहा कि प्रेस काउंसिल के दायरे में अभी सिर्फ प्रिण्ट मीडिया है, इसके स्वरूप में परिवर्तन कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को भी इसकी परिधि में ले आया जाना चाहिए।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों माता प्रसाद पाण्डेय,जावेद उस्मानी, प्रज्ञानन्द चैधरी , स्वदेश कुमार व विधानसभा के  प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे को अंगवस्त्रम और प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया।  इसके पहले कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि व अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। इस मौके पर षेयसी पावगी ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन एलजेए के महामंत्री के0के0वर्मा ने किया। इस अवसर पर अनेक वरिष्ठ पत्रकारों सर्वश्री पी.के. राय, पी.बी. वर्मा, डॉ. प्रभाकर शुक्ल, सुनील पावगी, प्रदेश उपाध्यक्ष सर्वेश कुमार सिंह, वीर विक्रमबहादुर मिश्र, कोषाध्यक्ष प्रदीप कुमार शर्मा , मंत्री सुनील त्रिवेदी, एलजेए के उपाध्यक्ष भारतसिंह, सुशील सहाय, मंत्री अनुराग त्रिपाठी, एस0बी0सिंह, विकास श्रीवास्तव कोषाध्यक्ष  मंगल सिंह और समेत अनेक गणमान्य लोगों के आलावा प्रदेश के विभिन्न जिलों से आये पत्रकार इस समारोह में बडी तादाद में जिलों से वाराणसी से अनिल अग्रवाल,आगरा से अशोक अग्निहोत्री ,पंकज सचदेवा,राजीव सक्सेना,सुभाष जैन,सुल्तानपुर से अरूण जायसवाल,शहजहांपुर से सरदारशर्मा, जरीफ मलिक, राजबहादुर, बराबकी से सलीम और फरहत भाई, प्रतापगढ से सन्तोष गंगवार हरीश सैनी आदि उपस्थित रहे।        
प्रेस रिलीज    

अरविन्द शुक्ला
अध्यक्ष
लखनऊ जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन

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मीडिया ने मेरे खिलाफ खूब खबरें छापी पर मैंने इसे अपनी सहज आलोचना माना : मुलायम सिंह यादव

लखनऊ : बदलते दौर में सोशल मीडिया की प्रासंगिकता बढ़ रही है। आज के दौर में इसे नजरअंदाज कर न तो राजनीति संभव है और न ही सरकार चलाना। पूर्व रक्षा मंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने यह विचार इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) की ओर से ‘सोशल मीडिया-वरदान या अभिशाप’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में व्यक्त किए। राजनीति के शुरुआती दिनों को याद करते हुए श्री यादव ने कहा कि कई बार कहा कि मीडिया ने उनके खिलाफ खबरें छापी पर उन्होंने इसे अपनी सहज आलोचना के रूप में ही लिया।

उन्होंने कहा कि आज लोगों तक समाचारों की पहुंच आसान हुयी है। कुछ ही पलों में राजधानी में हो रही घटना से गांवों के लोग वाकिफ हो जाते हैं। पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा कि अखबारों के संपादकीय निष्पक्ष होते हैं और वो हर रोज इसे जरूर पढ़ते हैं। श्री यादव ने इस मौके पर आईएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष के विक्रम राव की वेबसाइट का विमोचन भी किया। वेबसाइट में श्री राव की 5 किताबें, 500 से अधिक लेख, परिचय और तस्वीरों का प्रस्तुतिकरण किया गया है।

परिसंवाद में बोलते हुए आल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के राष्ट्रीय महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा ने कहा कि मीडिया सरकारों को आईना दिखाने का काम करता है। उन्होंने कहा कि आज किसी भी सरकार के लिए मीडिया को नजरअंदाज करना आसान नहीं रह गया है। वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस ने सोशल मीडिया के बढ़ते हुए प्रभाव पर रोशनी डालते हुए कहा कि सोशल मीडिया संचार का लगभग एक दशक पुराना माध्यम है. उन्होंने कहा की इसका प्रचलन तब तेजी में आया जब 2008 में फेसबुक नाम की सोशल वेबसाइट अस्तित्व में आई। उन्होंने कहा कि आज सोशल साईट पर तीन तरह की जमात देखने को मिल रही है। पहली वो जिनका उद्देश्य साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देना है। दूसरी जमात उनकी जो साम्प्रदायिकता की विरोध में खड़े हैं। तीसरी जमात उस दलित चिन्तक वर्ग की है जो सदियों से मीडिया के एक वर्ग के लिए उपेक्षित रहा है। सोशल मीडिया ने ऐसे उपेक्षित वर्ग को एक प्लेटफार्म दिया जहाँ आकर वो अपनी बात रखते है. इसलिए सोशल मीडिया एक वरदान ही है।

इंडियन फेडरेषन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के अध्यक्ष के. विक्रम राव ने अपनी 40 वर्ष के पत्रकारीय जीवन के अनुभव करते हुए कहा कि हमारे समय में सूचनाओं का संवहन बड़ा मुश्किल था. सोशल मीडिया जैसा कोई भी माध्यम मौजूद नहीं था. आज सूचनाओं का संवहन सुगम है. ख़बरें तेजी से इधर से उधर भेजी जा सकती हैं और ये इसलिए संभव है क्योंकि सोशल मीडिया पर आम आदमी की पहुंच है. उन्होंने कहा कि हालाँकि अभी सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की आवश्यकता है क्योकि जहाँ एक तरफ सकरात्मक उपयोग है वही इसका नकरात्मक उपयोग किया जा रहा है. श्रोताओं में बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक शामिल थे. गोष्ठी में प्रमुख रूप से अधिवक्ता पदम कीर्ति, हिन्द मजदूर सभा के सचिव उमाशंकर मिश्र, यूनियन के पदाधिकारी हसीब सिद्धीकी, श्याम बाबू, विनीता रानी, उत्कर्ष सिन्हा ने सहभागिता करी एवं मंच का संचालन योगेश मिश्र ने किया।

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वेब मीडिया पर संगोष्‍ठी 16 अक्‍टूबर को, दस वेब लेखक होंगे सम्‍मानित

विचार पोर्टल प्रवक्‍ता डॉट कॉम ‘वेब मीडिया की बढ़ती स्‍वीकार्यता’ विषय पर एक संगोष्‍ठी का आयोजन करने जा रही है। यह संगोष्‍ठी 16 अक्‍टूबर 2014 को स्‍पीकर हॉल, कांस्टिट्यूशन क्‍लब, नई दिल्‍ली में सायं 4.30 बजे आयोजित होगी। ‘प्रवक्‍ता’ के छह साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्‍वविद्यालय, रायपुर (छत्‍तीसगढ़) द्वारा संचालित कबीर संचार अध्‍ययन शोधपीठ के सहयोग से संपन्‍न होगा।

इस संगोष्‍ठी के मुख्‍य अतिथि हैं- केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्‍यमंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) श्री प्रकाश जावडेकर, वक्‍तागण हैं- यथावत पत्रिका के संपादक श्री रामबहादुर राय, वरिष्‍ठ लेखक एवं स्‍तंभकार श्री ए. सूर्यप्रकाश, कबीर संचार अध्‍ययन शोधपीठ के निदेशक डॉ. आर. बालशंकर, साहित्‍यशिल्‍पी डॉट कॉम के संपादक श्री राजीव रंजन प्रसाद तथा कार्यक्रम की अध्‍यक्षता करेंगे कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार वि‍श्‍वविद्यालय, रायपुर (छत्‍तीसगढ़) के कुलपति डॉ. सच्चिदानंद जोशी।

उपरोक्‍त जानकारी देते हुए प्रवक्‍ता डॉट कॉम के संपादक श्री संजीव सिन्‍हा ने बताया कि वेब मीडिया रेडियो, प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया का विकल्‍प बनकर उभरा है। सुदूर देहात में जहां अभी भी समाचार-पत्र नहीं पहुंच पाते, वहां मोबाइल के जरिए समाचार पहुंचने लगे हैं। वेब मीडिया की बढ़ती स्‍वीकार्यता पर जहां संगोष्‍ठी में चर्चा होगी वहीं गत वर्ष की भांति इस बार भी दस लेखकों को प्रवक्‍ता सम्‍मान से सम्‍मानित किया जाएगा, जिनमें सर्वश्री पंडित सुरेश नीरव, श्री अशोक गौतम, श्री विजय कुमार, श्रीमती बीनू भटनागर, श्री गौतम चौधरी, श्री शादाब जाफर ‘शादाब’, डॉ. सौरभ मालवीय, सुश्री सारदा बनर्जी, श्री हिमांशु शेखर एवं श्री शिवानंद द्विवेदी ‘सहर’ के नाम उल्‍लेखनीय हैं। इसके साथ ही तृतीय प्रवक्‍ता ऑनलाइन लेख प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्‍कृत भी किया जाएगा।

प्रेस विज्ञप्ति

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संतुलित जीवनशैली और खान-पान अपना कर स्तन कैंसर से बचा जा सकता है: डॉ. अमित अग्रवाल

cancer survivor

हंसना कैंसर से लड़ रहे या निजात पा चुके लोगो के लिए आवश्यक है

बीएलके हॉस्पिटल के सीनियर डॉक्टर एवं कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर अमित अग्रवाल ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में ब्रैस्ट कैंसर वर्कशॉप सेमिनार आयोजित किया। इस सेमिनार में मुंबई की ममता गोयनका बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थीं, जो खुद एक ब्रैस्ट कैंसर सर्वाइवर है। इस सेमिनार में डॉ. अग्रवाल के उपचार से ठीक हुए लगभग 100 से अधिक मरीज़ भी मौजूद थे, जिन्होंने आपस में अपनी समस्याओ को एक दूसरे से साझा किया तथा अपनी समस्याओ के बारे में डॉ. अमित अग्रवाल से सलाह ली। Continue reading

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