संजय सिन्हा-
वैधानिक चेतावनी – पोस्ट लंबी है। यह मेरी भड़ास है। अगर पढ़ने का मन हो तभी पढ़ें, नहीं तो सुबह का समय रील वगैरह देखकर भी काट सकते हैं।
कहानी शुरू-
बात 1999 की है। मैं जनसत्ता छोड़कर ज़ी न्यूज़ ज्वाइन कर चुका था। प्रिंट से टीवी की दुनिया में कदम रख चुका था। अखबार की दुनिया में तस्वीर की जिम्मेदारी फोटोग्राफर की होती है, लेकिन टीवी की दुनिया में विज़ुअल की जिम्मेदारी रिपोर्टर पर होती है। शूटिंग का काम भले कैमरामैन करता हो, पर यह तय करना कि क्या शूट होगा, रिपोर्टर का ही काम होता है।
आप सोच रहे होंगे कि संजय सिन्हा फिर यादों के झरोखों से बाहर आ गए हैं। बिल्कुल नहीं। यह कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है।
1999 की हल्की सर्दियों की सुबह थी। देश भर में मतदान हो रहा था। उस समय ‘आजतक’ 24 घंटे का चैनल नहीं था, लेकिन ‘ज़ी न्यूज़’ था। सुबह से ही रिपोर्टरों में हलचल मची थी। उत्साही मतदाताओं की कतार का वीडियो सबसे पहले भेजने की होड़ थी।
तब केवल स्टार और ज़ी ही चौबीसों घंटे के चैनल थे। बाकी चैनलों के रिपोर्टर भी सुबह-सुबह शूट कर रहे थे, हालांकि उनका वीडियो शाम के बुलेटिन के लिए काम आता। फिर भी ताजा फुटेज सभी को चाहिए था।
सुबह के दस बजे अचानक हलचल मच गई। खबर आई कि भोपाल के एक मतदान केंद्र पर भारी भीड़ है। दुश्मन चैनल रिकॉर्डेड तस्वीरें दिखा रहा था, लेकिन हमारे पास वह फुटेज नहीं था। मतदान के दिन सुबह अधिकतर लोग ड्यूटी पर चले जाते हैं, तो चैनल के सीईओ भी दफ्तर आ गए थे। वे गुस्से में कमरे से बाहर निकले। उन दिनों शैलेश चैनल के इनपुट हेड थे।
सीईओ चीख रहे थे, “भोपाल के रिपोर्टर ने सुबह का पहला वीडियो नहीं भेजा? सो रहा है क्या? यहां मजाक चल रहा है?” शैलेश जी ने असाइनमेंट डेस्क पर बैठी गौरी से पूछा।
गौरी ने बताया कि भोपाल से अभी तक वीडियो नहीं आया है। सीईओ रिपोर्टर रूम तक पहुंच गए और जोर से चीखे, “हू इज रिपोर्टर? टर्मिनेट हिम।” शैलेश जी रोकते रहे, समझाते रहे कि कोई तकनीकी दिक्कत हो सकती है, लेकिन सीईओ नहीं माने। भोपाल के रिपोर्टर की नौकरी चली गई।
कहानी यहीं खत्म हो सकती थी, लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है।
संजय सिन्हा वहीं खड़े थे। सब देख रहे थे। वह रिपोर्टर का नाम नहीं बता रहे, क्योंकि नाम यहां महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण सवाल यह था, क्या सिर्फ विज़ुअल देर से आने पर किसी की नौकरी जा सकती है?
तब विज़ुअल में होता क्या था? मतदान के लिए आए पुरुष और महिलाएं कतार में खड़े दिखते थे। मतदान के दिन रिपोर्टरों को खास पास मिलता था, जिससे वे मतदान केंद्र के भीतर एक सीमा तक शूट कर सकते थे। उस समय चुनाव आयोग की ओर से सीसीटीवी की व्यवस्था नहीं होती थी। टीवी चैनल का विज़ुअल इतना भरोसेमंद माना जाता था कि कहीं गड़बड़ी होने पर आयोग भी उसी पर भरोसा करता था।
असल बात यह थी कि किसी न्यूज चैनल के लिए ताजा विज़ुअल ही उसकी जान है। किसी ने कभी नहीं सोचा था कि मतदान के लिए आए लोगों की तस्वीर दिखाना निजता का उल्लंघन माना जा सकता है। महिलाएं हों या पुरुष, उनकी लाइन में खड़े होने की तस्वीरें लेना और भेजना पत्रकार का रोज़ का काम था।
इस बात की अहमियत इतनी थी कि भोपाल के रिपोर्टर की नौकरी चली गई। संजय सिन्हा समझ गए थे कि टीवी न्यूज की दुनिया ‘रेस अगेंस्ट टाइम’ है। पहली तस्वीर मतलब वाहवाही, देर से आया वीडियो मतलब शून्य।
हाल में जब चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि ऐसे फुटेज को सार्वजनिक करना निजता का उल्लंघन है, तो सवाल खड़ा हुआ, क्या 1999 में उस रिपोर्टर को निकाला जाना सही था?
अगर उस समय भी यह निजता का मामला था, तो रिपोर्टर ने तो सही किया कि ऐसी तस्वीर नहीं भेजी। फिर उसे क्यों निकाला गया? अगर आज 2025 में संजय सिन्हा इस पर बहस करेंगे, तो वे कहेंगे कि उस सीईओ ने एक रिपोर्टर का करियर अनुचित रूप से खत्म कर दिया।
नौकरी खोने के बाद उस रिपोर्टर का रिपोर्टिंग करियर सदा के लिए खत्म हो गया। उसे फिर डेस्क की नौकरी तो मिली, लेकिन मैदान की नहीं। कहानी का सार यही है कि 1999 में एक रिपोर्टर को इसलिए निकाला गया कि उसने मतदान केंद्र पर खड़े लोगों की तस्वीर टीवी पर दिखाने के लिए नहीं भेजी।
संजय सिन्हा 1988 से पत्रकारिता में हैं। 1999 से 2024 तक के हर चुनाव को उन्होंने कभी रिपोर्टर बनकर, कभी मतदाता बनकर देखा। कभी तस्वीर खींची, कभी तस्वीर खिंचवाई। कभी किसी ने नहीं कहा कि मतदान की तस्वीर मत लो, मत दिखाओ, क्योंकि यह निजता का उल्लंघन होगा।
मतदान किसी बड़े पर्व से भी बड़ा पर्व है। अगर निजता का उल्लंघन इस रूप में माना जाए, तो क्या दशहरा, दिवाली, छठ या होली में ली गई तस्वीरें दिखाने से पहले भी हम सबकी अनुमति लेते हैं?
मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि क्या मैं मतदान करती माताओं, बहनों, बेटियों की तस्वीर जारी कर दूं। इस वाक्य पर आपत्ति थी। उन्हें सिर्फ ‘मतदाता’ शब्द का इस्तेमाल करना चाहिए था। किसी संबंधसूचक शब्द की जरूरत ही नहीं थी।
भारत में चुनाव आयोग मतदान केंद्र पर वीडियो रिकॉर्डिंग को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है। यह बूथ कैप्चरिंग, गड़बड़ी और फर्जी वोटिंग रोकने के लिए होता है। रिकॉर्डिंग मतदान केंद्र के बाहर, प्रवेश द्वार, कतारों और आसपास की गतिविधियों की की जाती है। मतदान कक्ष में केवल सामान्य प्रक्रिया की रिकॉर्डिंग हो सकती है, मतदाता किसे वोट दे रहा है यह कभी रिकॉर्ड नहीं किया जाता।
- EVM या VVPAT स्क्रीन कभी रिकॉर्ड नहीं होती।
- कैमरे की दिशा ऐसी तय की जाती है कि केवल मतदान की सामान्य गतिविधियां दिखें।
- तकनीकी रूप से यह गोपनीयता का उल्लंघन नहीं है।
- वीडियो केवल सुरक्षित रिकॉर्ड के रूप में रखा जाता है और आवश्यकता पड़ने पर ही देखा जाता है।
मेरी आपत्ति केवल मुख्य चुनाव आयुक्त के वाक्य-प्रयोग को लेकर है, ‘माताओं, बहनों, बेटियों’ की जगह सिर्फ ‘मतदाता’ कहना पर्याप्त था। मैं अपनी पोस्ट से आहत हुए किसी भी महिला या पुरुष परिजन से क्षमा चाहता हूं। मेरा इरादा किसी का दिल दुखाने का नहीं था।
नोट-
- पीली साड़ी वाली महिला की तस्वीर याद है? 2019 के चुनाव में यह खूब वायरल हुई थी। रीना द्विवेदी नाम की यह महिला पोलिंग ऑफिसर थीं।
- हाथ में ईवीएम लिए मतदान केंद्र जाती उनकी तस्वीर पत्रकारों ने ली थी।
- तस्वीर वायरल हुई, सराही गई, अखबारों और चैनलों पर छपी।
- किसी ने नहीं कहा कि निजता भंग हो गई। किसी ने विरोध नहीं किया। तस्वीर का कोई गलत इस्तेमाल भी नहीं हुआ।
- निजता की हत्या तस्वीर से नहीं, सोच से होती है।
- मतदान केंद्र का सीसीटीवी निगरानी का साधन है, जासूसी का नहीं।
- कैमरा केवल वही रिकॉर्ड करता है जो आम आंखें देख सकती हैं और वही जरूरत पड़ने पर दिखाया जाता है।
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