गिरीश मालवीय-
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को कल बांग्लादेश की विशेष अदालत इंटरनेशनल क्राइम्स ट्राइब्यूनल ने फांसी की सजा सुना दी शेख हसीना को भ्रष्टाचार, सत्ता का गलत इस्तेमाल और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के मामले में दोषी ठहराया गया
शेख हसीना द्वारा किया गये भ्रष्टाचार की एक कड़ी भारत से भी जुड़ी है खासकर अडानी से।
यहां हम बात कर रहे हैं पावर सेक्टर की। बांग्लादेश को भारत शुरू से ही बिजली का निर्यात करता रहा है भारत से बांग्लादेश ग्रिड को जाने वाली बिजली पर सरकारी उद्यमों का ही नियंत्रण रहा. लेकिन 2014 के बाद जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो स्थितियां बदल गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जून 2015 ढाका गए थे। वहां प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ मुलाकात में उन्होंने अनुरोध किया था कि बांग्लादेश में भारत की नई ऊर्जा कंपनियों को भी मौके दिए जाएं मोदी ने कहा कि भारत बांग्लादेश के 2021 तक 24,000 मेगावाट ऊर्जा के लक्ष्य को पाने में उसकी मदद कर सकता हैं।

दो महीने बाद, 11 अगस्त 2015 को अडानी और बांग्लादेश ने एमओयू पर हस्ताक्षर किए। द डेली सन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस कार्यक्रम में बांग्लादेश पावर डिविजन के ज्यादातर अधिकारी शामिल नहीं हुए थे।
इस बिजली निर्यात के लिए अडानी कोई पॉवर प्लांट तो था नहीं तो झारखंड के गोड्डा में 1,600 मेगावाट के थर्मल पावर प्रोजेक्ट का निर्माण की नींव रखी गई।
इस प्लांट को शुरू करने के लिए मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आरईसी) से भी 700 मिलियन अमेरिकी डॉलर का लोन भी अडानी को दिलवाया गया ग्रामीण विद्युतीकरण निगम सरकारी कंपनी है और जिसका उद्देश्य भारतीय गाँवों में बिजली पहुँचाना है। लेकिन यहां तो सारी बिजली निर्यात की जानी थी तो सवाल पूछा जाना चाहिए था कि निर्यात करने वाली बिजली के लिए क्यों लोन दिया जा रहा है लेकिन यहां कौन पूछे
नवंबर 2017 में, अडानी पावर लिमिटेड ने गोड्डा स्थित अपने 1600 मेगावाट के कोयला आधारित संयंत्र से 1496 मेगावाट बिजली आपूर्ति के लिए बांग्लादेश पावर डिविजन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए।
बिजली खरीद समझौते में यह साफ किया गया था कि बिजली आपूर्ति कितनी मात्रा में और किस दर पर की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि खरीद की यह मात्रा और दरें छोटी अवधियों के लिए तय की जाती हैं ताकि ऊर्जा बाजार के उतार-चढ़ाव को ध्यान में रखा जा सके. लेकिन अडानी के साथ बांग्लादेश का करार 25 साल का किया गया।
इस समझौते में सालाना क्षमता शुल्क का प्रॉविजन था इसके अंतर्गत हर साल एक तय शुल्क बांग्लादेश को अडानी को देना पड़ता चाहे वह बिजली इस्तेमाल करे या न करे।
बांग्लादेश पावर डिविजन क्षमता शुल्क के रूप में 3.26 बांग्लादेशी टका (2.72 रुपये) प्रति किलोवाट घंटे का भुगतान करने के लिए सहमत हुआ, जो बांग्लादेश में किसी भी अन्य बिजली संयंत्र से अधिक है। इस आधार पर बांग्लादेश पावर डिविजन को सालाना क्षमता शुल्क में 3,657.23 करोड़ टका (लगभग 3,053.79 करोड़ रुपये) और संयंत्र के 25 साल के परिचालन जीवनकाल में 108,360.60 करोड़ टका (90,470.265 करोड़ रुपये) का भुगतान करना होगा। यानी अडानी का फायदा ओर बांग्लादेश का नुकसान
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि जहां भारत की सरकारी पावर कंपनियां सस्ती बिजली निर्यात कर रही थी तो अडानी से महंगी बिजली क्यों खरीदी जा रही थी?
नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन को फरवरी 2018 में एक बोली जीतने के बाद बांग्लादेश को प्रति इकाई 3.42 रुपए की दर से 300 मेगावाट बिजली आपूर्ति करने का ठेका मिला जबकि आइईईएफए के साइमन निकोल्स के मुताबिक भारत की निजी कम्पनियो से बांग्लादेश द्वारा खरीदी जाने वाली बिजली की कीमत 5.82 रुपए प्रति इकाई थी।
कमाल की बात तो ये भी है कि 2017 में भारत ने बांग्लादेश को 10 अरब डॉलर का निवेश और 5 अरब डॉलर का ऋण देने की पेशकश भी की जिसे शेख हसीना ने स्वीकार कर लिया ये भारत द्वारा किसी भी देश को दिया गया सबसे बड़ा लोन था। लेकिन कृपा यही तक नहीं रुकी मोदी सरकार ने 2018 के राष्ट्रीय चुनावों से ठीक पहले अडानी के गोड्डा पावर स्टेशन को विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) का दर्जा दे दिया, यह भारत का पहला पावर SEZ है, जो पूरी तरह से बिजली निर्यात के लिए बनाया गया इससे अडानी को रेल मार्ग और आयातित कोयले व उपकरणों सहित कई शुल्कों से छूट मिल गई।
अडानी की बिजली की बांग्लादेश में लागत लगभग 12 टका (US$ 0.1008) प्रति यूनिट थी जो भारत में अन्य निजी उत्पादकों को दी जाने वाली कीमत से 27% अधिक और भारत में सरकारी स्वामित्व वाले बिजली संयंत्रों द्वारा ली जाने वाली कीमत से 63% अधिक थी बांग्लादेश के लिए इससे भी बुरी बात यह कि बीपीडीबी को अडानी को अमेरिकी डॉलर में भुगतान करना पड़ा।
एक ओर मजे ये की बात थी दुनिया भर में झारखंड की ख्याति कोयले के अकूत भंडार के लिए है लेकिन अडानी यहां से कोयला नहीं लेने वाले थे उन्होंने करार किया कि वे वह 8,000 किमी दूर ऑस्ट्रेलिया में अपने स्वामित्व वाली कारमाइकल कोयला खदान से कोयला आयात करेंगे ताकि वे बांग्लादेश को कोयला आयात का बिल बढ़ाकर दिखा सके जैसे एक बार अडानी के बिल में दिखाया गया था कि कोयले की कीमतें 400 डॉलर प्रति टन थीं लेकिन बांग्लादेशी अधिकारी उसी कोयले के लिए 245 डॉलर प्रति टन का भुगतान कर रहे थे।
यानी अडानी जी की पांचों उंगलियां घी में ओर सिर कड़ाही में था और भुगतान कर रही थी बांग्लादेश की जनता।
अडानी जी ने गोड्डा का पॉवर प्लांट चीन की सेपको कंपनी से बनवाया ओर बिजली भेजना शुरू किया अडानी ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में बांग्लादेश को भारत में उत्पादित बिजली के लिए सबसे ज्यादा चार्ज किया 14.02 टका प्रति यूनिट।
अडानी का बिल बढ़ता गया और बांग्लादेश पेमेंट कर नहीं पा रहा था।
2023 में बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (बीपीडी) ने अडानी पावर को पत्र लिखकर समझौते को संशोधित करने का अनुरोध किया कि इतनी महंगी बिजली हम खरीद नहीं पा रहे है दर कम कीजिए।
जुलाई 2024 में जाकर शेख हसीना का भांडा फूटा और उन्हें मोदी जी ने भारत में शरण दी।
शेख हसीना की सरकार गिरते ही उनके द्वारा अडानी समूह के साथ किए गए बिजली समझौते की समीक्षा की मांग उठी और अगले कुछ ही दिनों में इसकी रिपोर्ट भी सामने आने वाली है। तो ये था क्रोनी केपेटिलिज़्म का एक ओर अनुपम उदाहरण।
संबंधित खबर…



Shambhu Arya
November 20, 2025 at 3:34 pm
इस प्रकार की गंदी पत्रकारिता करने वाले सच में अपने माता-पिता की असली संतान नहीं हो सकता है, ऐसे अवैध संतानों को नहीं पता कि बंगलादेश में कोई सरकार नहीं है, आज भी शेख हसीना ही प्रधान-मंत्री है, जब सरकार ही नहीं तो कोर्ट कैसे किस पर काम करेगा?
Shambhu Arya
November 20, 2025 at 3:36 pm
जो खुद भ्रस्टाचार के गटर में पैदा हुआ हो दुशरों को भ्रस्टाचारी कैसे कह सकता है?