विमल मिश्रा-
लेखक, पत्रकार, फिल्मकार व संस्कृति कर्मी दिवंगत अजित राय जी के व्यक्तित्व के साथ, साहित्य, नाट्य व संस्कृति जगत से लेकर विश्व सिनेमा तक विस्तीर्ण उनका विशाल फलक हमेशा से सम्मोहित करता रहा। उनसे पहली भेंट सालों पहले बनारस में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विश्वनाथ मंदिर व अस्सी घाट की चाय की अड़ी पर और आखिरी कुछ ही महीने पहले मुंबई में अदिति माहेश्वरी जी के बहुत ही कामयाब रहे ‘वाणी पुस्तक महोत्सव’ में हुई। हम दोनों ही एक – दूसरे के पाठक और प्रशंसक थे।
पिछले दिनों ही प्रतिष्ठित ‘वाग्धारा पुरस्कार’ के लिए उनका चयन किया गया था, जो आगामी 5 सितंबर को राज्यपाल महोदय के हाथों उन्हें मिलने वाला था।
अजित राय जी को मौजूदा लंदन यात्रा के बाद हमारे कॉमन लेखक मित्र धर्मेद्रनाथ ओझा जी के साथ मुंबई में मेरे घर आना था, जो इंग्लैंड में उनके आकस्मिक निधन से अब सपना बन गया है। काश, बिंदास औघड़ जिंदगी के बीच, आधी क्षमता से काम करते अपने दिल को देखते हुए वे निरंतर गिरती सेहत पर भी थोड़ा ध्यान देते तो अपने परिजनों और मित्रों को इस तरह निर्वाक स्तब्धनाक शोक में नहीं छोड़ जाते।
ऐसे बहुरंगी नामचीन व्यक्तित्व को याद करती सोशल मीडिया पर बहुत सी प्रतिक्रियाएं आज – कल में आंखों से होकर गुजरी हैं। अजित राय जी को याद करती संपादक प्रवर आदरणीय राहुल देव जी की स्मृतियां तो विभोर करने वाली हैं। पर, उनके बारे में कई अतिरंजित और गड़े मुर्दे उखाड़तीं प्रतिक्रियाओं (क्या- क्या, और क्या नहीं कहा जा रहा है!) का ‘स्वर’ विचलित भी कर रहा है।
अजित राय जी की निष्प्राण देह इस समय लंदन की एक मार्चरी के लॉकर में बंद अपनी स्वदेश वापसी की प्रतीक्षा कर रही है, जिसमें संभवतः एक सप्ताह भी लग सकता है। प्राप्त संकेतों के अनुसार उनकी अंत्येष्टि काशी में होने वाली है। अजित राय जी अगर ऊपर कहीं इन प्रतिक्रियाओं को पढ़ रहे हैं तो जूलियस सीजर की तरह जरूर उनके मुंह से निकल रहा होगा ‘यू टू, ब्रूटस!’
भारतीय परंपराओं ने हमें किसी भी इन्सान की अंतिम विदाई के तत्काल बाद अपने तमाम मतभेदों और मनभेदों के बावजूद दिवंगत व्यक्ति के बारे में कुछ भी अशोभन न बोलने के लिए संस्कारित किया है। हम सभी के व्यक्तित्व में कुछ न कुछ शेड्स होते हैं। व्यक्तिगत मेल – जोल पर और टेलिफोन पर आपसी बातचीत में हम अजित राय जी के आकस्मिक निधन पर शोक व्यक्त करते हुए मन की अपनी कोई भी बात रख सकते हैं, पर सोशल मीडिया पर उन्हें याद करते समय क्या हमें थोड़ा संयम नहीं बरतना चाहिए! खासकर उस इन्सान को लेकर, जिसकी चिता तक को अभी उसका इंतजार है … और जो अब इस दुनिया में मौजूद भी नहीं है खुद को डिफेंड करने के वास्ते!
मुझे लगा, मन में इस तरह आई अपनी बात को सबसे शेयर करना चाहिए।
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Rajeev Srivastava Ashish
July 27, 2025 at 12:53 pm
, उनके बारे में कई अतिरंजित और गड़े मुर्दे उखाड़तीं प्रतिक्रियाओं (क्या- क्या, और क्या नहीं कहा जा रहा है!) का ‘स्वर’ विचलित भी कर रहा
कृपया उन प्रतिक्रियाओं को साझा करें या मुझे मेल करें