आनंद स्वरूप वर्मा-
काल तुझसे होड़ है मेरी…कोई दंभ नहीं..…कोई जिद नहीं…विजेता बनने की असंभव आकांक्षा नहीं, बल्कि एक विनम्र होड़। एक जिजीविषा।
पिछले 40 दिनों से (19 अप्रैल) एम्स में पड़ा हूँ। अगस्त से ही अस्पताल आने जाने का सिलसिला चल रहा है। इस बार दिल के माइट्रल वॉल्व औऱ किडनी दोनों के बीच कोई दुरभि संधि हो गई और मैं घेर लिया गया। इस दुरभि संधि का हिस्सा बनने के लिए लीवर भी मचलने लगा जिसे डॉक्टरों ने काबू किया।
समझ में नहीं आता कि कब तक यह चलेगा। बहुत सारे काम है जो अधूरे हैं– कुछ तो बस पूरे ही होने वाले हैं। एक किताब है जो भूटान के जनतांत्रिक आंदोलन पर केंद्रित है और जिसे अत्यंत आधिकारिक ढंग से मैं ही लिख सकता हूँ. काफी हद तक अनर्गल साहित्यिक विवाद में उलझे हिंदी के लेखक-पाठक जगत की इस पुस्तक में शायद ही दिलचस्पी हो लेकिन मेरे लिए इसका बहुत ज्यादा महत्व है।
1990 में जब न्यूनतम मानव अधिकारों और जनतंत्र की मांग कर रहे भूटानी नागरिकों को शाही भूटानी सेना के सैनिकों ने पीटते हुए देश से बाहर खदेड़ दिया, उस समय से ही उनके आंदोलन से मैं सशरीर जुड़ा रहा और यह जुड़ाव 2007 तक रहा जब तक स्वदेश वापसी के उनके आंदोलन में हमें पराजय का सामना नहीं करना पड़ा। इसके बाद एक लाख से अधिक शरणार्थियों को अमेरिका सहित 7 देशों ने अपने यहां बसा लिया।
इन 17 वर्षों के दौरान देश के अंदर सभी पार्टियों की सरकारें बनी। इन सरकारों का नेतृत्व विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेई, देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, और मनमोहन सिंह ने किया। यहां तक कि सीपीआई के इंद्रजीत गुप्ता भी देवगौड़ा के सरकार में गृह मंत्री के पद पर रहे। लेकिन इन सारी सरकारों ने भूटान के राजा का साथ दिया न कि न्यूनतम मानव अधिकारों की मांग करने वाले भूटानी नागरिकों का।
गुजराल और इंद्रजीत गुप्ता जैसे नेता जब सत्ता से बाहर होते थे, मानव अधिकार के बहुत बड़े चैंपियन बन जाते थे लेकिन सत्ता में जाते ही अनौपचारिक तौर पर यही कहते थे कि ‘जियो-पोलिटिकल कंपल्शन’ उन्हें राजा का साथ देने के लिए मजबूर करता है।
भूटान के संदर्भ में हमने देखा कि कैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र ने दुनिया के निकृष्टतम राजतंत्र को हर तरह का समर्थन दिया और वह भी जनता के आंदोलन की कीमत पर। इस दृष्टि से मुझे अपनी यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण लगती है जिसके आठ अध्याय लिख चुका हूं और तीन अध्याय बाकी हैं। सबसे पहले मुझे इस काम को पूरा करना है।
और भी कुछ विषयों मसलन संस्मरण, नेपाल, पत्रकारिता आदि पर काम कर रहा हूं और कोशिश रहेगी कि उन्हें भी पूरा कर लूं.
एक बार फिर शमशेर बहादुर सिंह का नायक याद आता है और याद आता है माओ का ‘मूर्ख’ बूढा और बिहार का दशरथ माझी– एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता/पूरब से पश्चिम को एक कदम से नापता/बढ़ रहा है/कितनी ऊँची घासे चाँद तारों को छूने-छूने को है/जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है/अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ/फिर क्यों दो बादलों के तार/उसे महज उलझा रहे हैं?
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