अर्णव चैट कांड पर केंद्र सरकार व मीडिया हाउसों के मौनी बाबा बनने के मायने

श्रीप्रकाश दीक्षित-

चीखने चिल्लाने की सत्ता आश्रित चैनली पत्रकारिता करने वाले अर्णव गोस्वामी के बारे में रोज ही हैरान करने वाले खुलासे हो रहे हैं. जब महाराष्ट्र सरकार ने जोड़ जुगाड़ से रिपब्लिक चैनल को नंबर- 1 बनाने की पोल खोली और अर्णव की गिरफ़्तारी हुई तो इसे बदले की कार्रवाई कहा गया.अर्णब के पक्ष में केंद्र के मंत्रियों/मुख्यमंत्रियों के आने के बाद जमानत अर्जी पर तत्काल सुनवाई के लिए सुप्रीमकोर्ट पर सबसे तीखा हमला वहाँ की बार के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने किया था.

बाद मे अर्णव गोस्वामी और बार्क के पूर्व सीईओ पार्थो दासगुप्ता के बीच चैनलों की टीआरपी साधने संबंधी पांच सौर से ज्यादा पेज़ की चैट खूब वायरल हुई.

इन चैट्स मे गोस्वामी केंद्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री ऑफिस तक से सेटिंग के दावे कर रहे हैं. अब बालाकोट चैट मामले में गोस्वामी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. इस चैट के मुताबिक,गोस्वामी को बालाकोट एक्शन की जानकारी थी. महाराष्ट्र सरकार विधि विशेषज्ञों से राय ले रही है की क्या बातचीत को लेकर अर्णव के खिलाफ ऑफीशियल सीक्रेट्स ऐक्ट के तहत कार्रवाई हो सकती है.

सवाल उठ रहे हैं की अर्णव गोस्वामी को इतनी संवेदनशील जानकारी कैसे हासिल हुई जो प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री, गृह मंत्री और कुछ चुनिंदा लोगों के पास ही होती है.

इस गोपनीय मुद्दे पर भारत सरकार के मौन और मीडिया (मालिकान) की चुप्पी पर भी सवाल उठ रहे हैं.देश की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे पर भारत सरकार के पक्ष की बेसब्री से प्रतीक्षा की जा रही है. सुशांतसिंह की ख़ुदकुशी पर आसमान उठा लेने वाले खबरिया चैनलों और बड़े अख़बारों की बोलती बंद है.

मध्यप्रदेश के बड़े हिंदी अख़बारों का तो और बुरा हाल है. बालाकोट चैट के लीक होने के बाद जब पूर्व केन्द्रीय रक्षामंत्री ए के अंटोनी और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने मीडिया के सामने अपनी बात रखी तो यहाँ के बड़े हिंदी अख़बारों ने खबर तक नहीं छापी. इनमे सबसे विश्वसनीय और नंबर-1 का दावा करने वाला दैनिक भास्कर और पत्रिका शामिल है. ( इंडियन एक्सप्रेस,टाइम्स ऑफ़ इंडिया और टेलीग्राफ की ख़बरें)

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