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अरनब गोस्‍वामी ने अपने शो में Rakesh Sinha को ”आरएसएस का इकलौता सोचने वाला आदमी” (RSS’s only thinking man) कह कर संबोधित किया

Abhishek Srivastava : टाइम्‍स नाउ के अरनब गोस्‍वामी आज बिहार चुनाव पर अपने शो में Rakesh Sinha को ”आरएसएस का इकलौता सोचने वाला आदमी” (RSS’s only thinking man) कह कर संबोधित कर रहे थे। अरनब शायद एबीपी न्‍यूज़ नहीं देखते, वरना वे इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते कि संघ में एक भी आदमी सोचने वाला नहीं है। शाम को जब मुनव्‍वर राणा ने एबीपी के लाइव शो में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया, तब सिन्‍हाजी ने खीझ में कह डाला कि इस पुरस्‍कार वापसी के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्‍कृति मंच हैं। अव्‍वल तो उदय प्रकाश से लेकर नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी लगायत तमाम लेखक इनमें से किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं।

Abhishek Srivastava : टाइम्‍स नाउ के अरनब गोस्‍वामी आज बिहार चुनाव पर अपने शो में Rakesh Sinha को ”आरएसएस का इकलौता सोचने वाला आदमी” (RSS’s only thinking man) कह कर संबोधित कर रहे थे। अरनब शायद एबीपी न्‍यूज़ नहीं देखते, वरना वे इस निष्‍कर्ष पर पहुंचते कि संघ में एक भी आदमी सोचने वाला नहीं है। शाम को जब मुनव्‍वर राणा ने एबीपी के लाइव शो में साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया, तब सिन्‍हाजी ने खीझ में कह डाला कि इस पुरस्‍कार वापसी के पीछे प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्‍कृति मंच हैं। अव्‍वल तो उदय प्रकाश से लेकर नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी लगायत तमाम लेखक इनमें से किसी संगठन से नहीं जुड़े हैं।

दूसरे, अब तक पुरस्‍कार लौटाने वालों में प्रलेस और जसम के एकाध लेखक भले रहे हों, जनवादी लेखक संघ से कोई नहीं दिखता। यह भी दिलचस्‍प है। बहरहाल, सिन्‍हाजी ने संघ के बचाव में इंडिया पॉलिसी फाउंडेशन के आयोजन में Mangalesh Dabral को बुलाने का जो हवाला दिया और इस बहाने वामपंथियों की असहिष्‍णुता पर प्रहार किया, वह कहीं ज्‍यादा दिलचस्‍प है। सोचिए, अगर मंगलेशजी आइपीएफ के उस कार्यक्रम में नहीं गए होते, तो राकेश सिन्‍हा किस मुंह से संघ का बचाव आज कर पाते? हम लोगों ने जब कभी वामपंथी लेखकों के संघी मंचों पर जाने का विरोध किया, तो उसके पीछे यही समझ रही है कि संघी लोग अव्‍वल तो वामपंथी लेखकों के बहाने व्‍यापक पढ़े-लिखे समाज में खुद को वैध ठहराना चाहते हैं, दूसरे वे भविष्‍य में उन्‍हें अपने छुपे औज़ारों के बतौर इस्‍तेमाल करने की ख्‍वाहिश मन में रखते हैं। वजह? सार्वभौमिक है कि संघ के पास पढ़े-लिखे लोगों का घोर अभाव है। एक नरेंद्र कोहली और दूसरे कमल किशोर गोयनका- यही दो नाम सिन्‍हाजी ले रहे थे न? हद है बौद्धिक दरिद्रता की!

किसी ने कहा है कि मूर्ख दोस्‍तों से समझदार दुश्‍मन ज्‍यादा अच्‍छा होता है। जब संघ के इकलौते सोचने वाले आदमी का यह हाल है, तो वहां पल रही घनघोर मूर्खताओं के बारे में सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है। समाज में कोई जुमला एक लंबे अनुभव के बाद बनता है। यह यूं ही नहीं है कि हिंदी के पढ़े-लिखे समाज में किसी को गरियाने के लिए अब तक सहज ही कहा जाता रहा है- संघी हो क्‍या जी? आज इतिहास का पहिया पूरा घूम चुका है। हमें अपनी जबान गंदी करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ रही है। राकेश सिन्‍हा खुद ही टीवी पर दहाड़ते हुए कह रहे हैं- हां भाई हां, मैं संघी हूं, था और रहूंगा। तो रहिए! अपनी बला से!

जनपक्षधर पत्रकार और मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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1 Comment

1 Comment

  1. rajkumar

    October 20, 2015 at 9:03 am

    kamred mitro ki yah sabse badi samsya h ki vo aapne sivay sabhi ko murkh kahte h, jab ki vo khud kue ke mendak hote h, isi liye puri duniya se vampanth samapt ho gaya, usr and chaina ne bhi nakar diya lekin srivastava ji aapne kandhe par liye ghum rahe h, congress ke tukade par palne vale kamredo ka bura din aagaye is liye bin pani jmachhali jaise tadaf rahe h

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