अर्णव गोस्वामी जिन्हें ‘शहरी नक्सली’ बता कर भोंक रहा, जानिए वो सुधा भारद्वाज हैं कौन!

Ajeet Singh : मजदूर नेता, सामाजिक कार्यकर्ता और मजदूरों आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए 40 साल की उम्र में लॉ की पढ़ाई करके अधिवक्ता बनने वाली सुधा भारद्वाज को ‘शहरी नक्सली’ घोषित करने का घृणित प्रयास किया जा रहा है। रिपब्लिक टीवी ने बुधवार को अपने एक कार्यक्रम में यह दावा किया कि ‘कामरेड अधिवक्ता सुधा भारद्वाज’ द्वारा किसी ‘कामरेड प्रकाश’ को एक पत्र लिखा गया था। उक्त पत्र में ‘कश्मीर जैसे हालात’ निर्मित करने की बात कही गई है। रिपब्लिक टीवी द्वारा इस कथित पत्र का हवाला देते हुए माओवादियों और अलगाववादियों के बीच संबंध-संपर्क स्थापित करने की कोशिश की गई। Continue reading

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‘रिपब्लिक टीवी’ से इस्तीफा देने वाली श्वेता कोठारी ने लंबा-चौड़ा खुलासा कर किया धमाका, आप भी पढ़ें

श्वेता कोठारी ने ‘रिपब्लिक टीवी’ से इस्तीफा दे दिया है. वे सीनियर करेस्पांडेंट पद पर थीं. उन्होंने 11 अक्टूबर को इस्तीफा दिया और इसकी सूचना फेसबुक से अपने सभी जानने वालों को दी. उसके बाद उन्होंने एक लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर अपने इस्तीफे का कारण गिनाया तो रिपब्लिक टीवी में भूचाल आ गया.. श्वेता के इस्तीफानामा की आंच से सुपारी संपादक अर्नब गोस्वामी तक झुलस गए… फेसबुक और ट्वीटर पर श्वेता का इस्तीफानामा खूब शेयर और रीट्वीट किया जा रहा है. आप भी पढ़ें…

Shweta Kothari : I have resigned from my current position as a Senior Correspondent with Republic TV with immediate effect. Below is the sequence of events that led to my resignation.

On a eventful evening on 30th August 2017, my reporting manager (an editor who I would not like to name) came up to me and said that Arnab Goswami suspects me of being a mole planted by Shashi Tharoor in the organisation, the reason being, Mr Tharoor follows me on Twitter.

If the proposition wasn’t ridiculous enough, I was further told that I have signed a petition on Change.org pertaining to Mr Tharoor a few years back, which has further raised suspicions.

The witch-hunt did not end there. Later that day I was informed by my colleagues that it was in fact my Reporting Manager who diligently spent time going through my social network profiles and later proposed that I maybe a SPY and also took it up with Arnab Goswami.

The humiliation continued for a few more days. My financial status was inquired (proposing that I may have been getting paid by Mr Tharoor); my colleagues were questioned on whether I try to extract information.

My twitter cover picture was misinterpreted to question my loyalty (A famous poem that still continues to be my cover picture).

It was only in late September when I finally raised it up with Arnab. I narrated the ordeal to him and the fact it has taken a hit on my morale. There was no concrete response.

To set the record straight, I have never met/contacted/known Mr Tharoor in any capacity.

Nobody bothered to clarify. I was left in the lurch. My loyalty questioned, my vanity hurt.

I am not the first person to have faced this scrutiny of character, before me there were other colleagues who have faced worst. I am confident, I am not the last. Question is-how long before the organization pulls the plug?

This isn’t the first time either that this sort of humiliation was meted out to me. On 30th May, 2017 I had done a sting operation on a sitting SHO for a story.

Later at around 7 PM, the Editor in question called me up and accused me of ‘flirting’ with the SHO. When I protested, she threatened to make the conversation public and destroy my career.

The culture of fear, intimidation and harassment I have seen in the last few months is unparalleled. My only concern, it goes unquestioned.

Last nail in the coffin came on 9th of October when I was unceremoniously dropped from the Special Projects team at 1.30 AM. When I tried questioning the rationale behind it, my reporting manager said, “it is beneath my dignity to talk to you”.

Sadly, when I once again brought to the notice of the top bosses, there was no intervention.

I have previously been associated with two fantastic organizations and have worked with industry stalwarts. Never have I witnessed such vindictive and vicious conduct.

While I am thankful to the organisation for giving me a great learning experience and abundant opportunities, I hope this pattern of vilification of employees on the basis hearsay ceases to exist.

It has taken a great amount of courage to pen this down, against the advice of many of my well wishers who believe that this may hamper my career prospects.

Perhaps it will, but if I don’t speak up today, what good am I as a journalist?

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रिपब्लिक टीवी की महिला पत्रकार का यह चेहरा स्तब्ध करता है!

Prakash K Ray : जिस तरह से फ़ेक न्यूज़ और बुली चैनल रिपब्लिक की रिपोर्टर माइक छीनने झपट रही है, उसे देख कर लगता है कि किसी दिन लफंगे एंकर और लुम्पेन रिपोर्टर तार से गला घोंट कर गेस्ट/पैनलिस्ट की हत्या कर डालेंगे. दूसरे घामड़ चैनल टाइम्स नाउ वाली रिपोर्टर तुलनात्मक रूप से शक्तिशाली लग रही है, अन्यथा खींचतान में उस भले आदमी को चोट भी आ सकती थी. 

Dilip Khan : रिपब्लिक टीवी के लिए Shehla Rashid की निंदा करने वालों को वो वीडियो ज़रूर देखना चाहिए, जिसमें रिपब्लिक की पत्रकार प्रद्युम्न के पिता की कॉलर से लेपल माइक झटक देती है। रायन इंटरनेशनल स्कूल अभी मीडिया के लिए बिकाऊ माल है। कंसर्न वगैरह की दलील मत दीजिएगा, मीडिया शुद्ध रूप से इस घटना को बेच रहा है। TIMES NOW पर प्रद्युम्न के पिता लाइव कर रहे थे, रिपब्लिक की रिपोर्टर भी वहीं खड़ी थी। चैनल से फोन आया होगा कि लाइव चाहिए। एक संवेदनशील पत्रकार क्या करता/करती?  टाइम्स नाऊ के लोगों से वो लड़की कहती कि उसे भी लाइव लेना है, थोड़ा शॉर्ट रखें। लेकिन रिपब्लिक की रिपोर्टर ने क्या किया? लाइव के दौरान झपट्टा मारकर प्रद्युम्न के पिता के कॉलर से माइक खींचने लगी।  टाइम्स नाऊ और रिपब्लिक की दोनों लड़कियां कुश्ती लड़ने लगीं। यही संवेदनशीलता है?  अब ये मत कह दीजिएगा कि ये एक रिपोर्टर की चूक या ग़लती है और इसे उसी चैनल के दूसरे रिपोर्टर के साथ कंपेयर नहीं करना चाहिए। ये बेसिकली ट्रेनिंग का मामला है जो रिपब्लिक नाम की संस्था और इसके डॉन अर्नब गोस्वामी ने सभी स्टाफ को दी है।  रिपब्लिक टीवी के पक्ष में सिर्फ़ उसी दिन आऊंगा, जिस दिन डिसेंट के लिए सरकार उसपर कोई कार्रवाई करेगी। वरना सिविल सोसाइटी के लोग इनको गरियाए, लतियाए मैं उसे “‘मीडिया” और “मीडिया की आज़ादी” पर हमला नहीं मानूंगा।  सारा खेल आइडियोलॉजिकल है। रिपब्लिक चैनल बेसिकली गुंडई कर रहा है। असंवेदनशील और तलुवाचाट है।

संबंधित वीडियो ये है :

वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश के. रे और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

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भड़ास संपादक की ताजा पोस्ट : रिपब्लिक टीवी वाले कटहे कुक्कुर की तरह गैर-भाजपाई नेताओं के पीछे भों-भों करते भाग रहे

Yashwant Singh : भाजपा वित्त पोषित रिपब्लिक टीवी वाले कटहे कुक्कुर की तरह गैर-भाजपाई नेताओं के पीछे भों भों करते टहल रहे हैं. मेरा उपरोक्त वाक्य यह बताने के लिए काफी है कि मीडिया यानि चौथा खंभा आजकल सियासी आधार पर बंट गया है. भाजपाई मीडिया, कांग्रेसी मीडिया, मुस्लिम परस्त मीडिया, हिंदूवादी मीडिया. इन सभी का एक ही मकसद, सबसे बड़ा बाजारू यानि कारपोरेट मीडिया बनना.

अरनब गोस्वामी ने लगता है अपने राजनीतिक साहब लोगों के हितों का ध्यान रखते गैर-भाजपाई नेताओं को नंगा करने का अभियान चला दिया है. लालू यादव दूध के धुले नहीं हैं और न चिदंबरम के पाप कम हैं. लेकन आपका कैमरा और R लिखा डंडा पकड़े आपका रिपोर्टर कभी अमित शाह के पीछे पीछे क्यों नहीं कठिन कठोर सवालों को लेकर भागता है.

उसे नरेंद्र मोदी के पीछे क्यों नहीं देखा जाता जब वह किसी प्रोग्राम या मीटिंग से निकल कर बाहर आते हैं.

क्यों नहीं तब अरनब का आदमी तमंचा की तरह माईक आईडी थामे और तोप की तरह कैमरा उठाए मोदी के पीछे चिल्लाते सवाल पूछते भागता है कि हे हे मोदी जी, जरा बताइए कि आपकी डिग्री का सच कब सामने आएगा, क्या वाकई इतना पढ़े हैं, जितना दावा किए हैं या सब जुमला ही था.

मोदी सर सर, प्लीज वन क्वेश्चन, आपका स्टेटस क्या है जशोदा बेन से रिश्ते को लेकर. क्या तलाक हो गया है, क्या अलग अलग हैं, क्या उन्हें आप अपनी पत्नी मानते हैं, क्या जशोदा बेन के जो सवाल हैं, उनके जवाब उन्हें देंगे आप….

माननीय मोदी जी प्लीज एक सवाल… आपने विकास और रोजगार का वादा किया था यहां तो भयंकर रूप से उद्योग धंधे चौपट हो गए और बेरोजगारी चरम पर है… किसान का दुख कम करने का जो वादा था, वह यह उलटा रूप ले चुका है कि किसान सुसाइड अब महाराष्ट्र या विदर्भ का मसला नहीं रह गया है बल्कि यह पूरे देश में आग की तरह फैल गया है, कब आखिर अडानी अंबानी की तरह किसानों के अच्छे दिन आएंगे… कब किसान खुद को लाश में तब्दील होने से रोक सकेंगे…

मोदी जी क्या बताएंगे कि देश के जेनुइन सवालों को टालने के लिए ही कहीं आप लोग बार बार हिंदू गाय गोबर राष्ट्र सेना पाकिस्तान मुसलमान ट्रपिल तलाक आदि के मुद्दे तो नहीं उठाते ताकि जनता इसी में उलझी रहे और चैनल वाले इन्हीं हवाई मामलों पर दिन रात बहस चलाकर जनता के दिमाग में जहर भरते रहें… आखिर आपने अभी तक धारा 370 खत्म क्यों नहीं किया, राम मंदिर क्यों नहीं बनवा दिया और पाकिस्तान पर हमला बोलकर उसका नामोनिशान क्यों नहीं खत्म कर दिया…

यकीन मानिए, ये सवाल रिपब्लिक टीवी वाले नहीं पूछेंगे… क्योंकि रिपब्लिक टीवी में पैसा जो भाजपा पोषित लोगों का लगा है… साहब के हित को साधने के लिए इन दिनों रिपब्लिक टीवी और अरनब गोस्वामी के लोग किसी गली छाप गुंडे की तरह मोदी विरोधी नेताओं से मुश्किल से मुश्किल सवाल पूछ कर उन्हें उकसा रहे हैं ताकि वे गाली दें, मारें और वो फिर दिखाएं कि ये देखो, मीडिया पर हमला हो गया है जी… आप लालू और चिदंबरम के कुकर्म खूब दिखाओ, लेकिन मोदी और शाह को क्यों बख्शे हैं जी… इसी को कहते हैं सुपारी पत्रकारिता, इसी को कहते हैं पेड पत्रकारिता, इसी को कहते हैं मीडिया का माफियावाद… इसी को कहते हैं सत्ता के चरणों में पोषित पत्रकारिता…

शेम शेम अरनब गोस्वामी…

शेम शेम रिपब्लिक टीवी….

मोदी, शाह और भाजपा का लठैत बनकर सुपारी पत्रकारिता करना बंद करो…

भड़ास4मीडिया के एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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बजरंद दल वाले स्टिंग पर वीएचपी ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अरनब गोस्वामी को लिखा पत्र, पढ़ें

Mr Arnab Goswami
Republic TV

Sub: Contents shown on Republic TV  with the intention to malign Bajrang Dal’s image.

Dear Arnab,

This has reference to the fake sting operation telecasted on your news channel ‘Republic Tv’ under the caption of ‘Hindu Fringe Exposed’ on 5th June 2017 with prime time debate No. 2 at 10.10 PM ( https://www.youtube.com/watch?v=f-8rMhrNk-c ) and its repeat telecasts thereafter, with a sole intent to defame, malign and tarnish the image of our youth wing ‘Bajrang Dal’. Your channel Republic Tv, under the garb of ‘sting’ has attempted to portray our dedicated self-less nationalist cadres in bad light.

An individual’s quote / bite has been depicted as the bite of Bajrang Dal leader, is absolutely wrong, baseless and uncalled for since, he is not the leader of Bajrang Dal. The incidents telecasted in the name of sting dates back to many years, having no connection whatsoever with Bajrang Dal and a part of telecast shown as sting was actually an interview (not sting). Fights and acts of violence telecasted on the channel have nothing to do with the Bajrang Dal and its cadres.

The language used by yourself, your reporters & some panelists in the aforesaid telecast against ‘Bajrang Dal’ is highly objectionable, condemnable, derogatory & humiliating in nature and it clearly exposes you as yet another ‘subversive force’ working on an agenda against the Nationalistic people/organizations of this country. You have willfully accused Hindu organizations of distorting facts to suit your agenda and have always ridiculed the Hindutva movement/organizations, desperately trying to impose your degenerated notions upon the viewers, claiming yourself to be self-appointed champion of progressivism, modernity, equality and liberty.

You have time and again condemned all those cadres/groups/organizations as ‘regressive’ who work for preserving Hindu Culture, something which is actually highly unethical, immoral on your part and dangerous for the democracy and the credibility of journalism. We also noticed that your reporter also tried to portray Bajrang Dal using the term ‘immoral police’, etc. and showing violent images which didn’t involve ‘Bajrang Dal’ cadres.

The propaganda that you intend to promote through your channel shall not be allowed at the cost of the reputation of our cadres like Bajrang Dal, who have earned it through lot of sacrifice. We know what motivates you and your promoters, who by such irresponsible reporting (yellow journalism) are bringing the fourth estate into disrepute and let us remind you that Bajrang Dal or any of its Cadre is not working for earning fame or monetary gains like you and your channel.

Our youths are determined, committed & law abiding people with specific intent of protecting the culture, traditions & Dharma and committed towards SEVA / SURAKSHA & SANSKAR for our motherland Bharat, something we doubt that people motivated by TRPs with shallow knowledge of its glorious cultural legacy would understand.

It has been noticed in the past also that you have attempted to ridicule, malign the Hindu organizations, their movement and acts of valor without any justifiable cause and it appears that you take pride in using derogatory remarks against Nationalistic people / organizations, as a measure of securing your ‘secular’ credentials. You and your channel’s conduct of airing such false, defamatory, malicious content on your channel against Bajrang Dal and its cadres is unethical, unwarranted & clearly misuse of the right to expression which has crossed all limits of professional journalism. We also seek an unconditional apology from you and your channel ‘Republic Tv’ at the earliest failing which we reserve our right to take appropriate legal action against you and your channel as per law.

Thanking you
Dr. Surendra Kumar Jain
(Int’l Joint Gen Secretary)
Vishwa Hindu Parishad


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टाइम्स नाऊ वालों ने टेप न चलाने के वास्ते लालू यादव और शशि थरूर से कौन-सी डील की थी!

Saurabh Bhaarat : टाइम्स नाउ चैनल ने अपने पुराने सम्पादक अर्नब गोस्वामी और रिपब्लिक चैनल पर FIR कर दी है। टाइम्स नाउ का आरोप है कि चाराचोर लालू और माफिया शहाबुद्दीन के बीच बातचीत और सुनन्दा पुष्कर हत्या केस में शशि थरूर से जुड़े जो टेप अर्नब ने अपने चैनल पर दिखाकर टीआरपी बटोरी, वो दरअसल टाइम्स नाउ के पास बहुत पहले से थे और अर्नब ने बिना टाइम्स नाउ की अनुज्ञा के ये टेप अपने चैनल पर चला दिये।

बकौल टाइम्स नाउ, अर्नब ने टाइम्स नाउ में काम करते हुए एक तरह से ये टेप चोरी कर लिये और वहाँ से हटने के बाद अपने खुद के चैनल पर इन्हें प्रसारित कर दिया। टाइम्स नाउ का दावा कितना सही है यह तो बाद की बात है लेकिन इस आरोप से अब टाइम्स नाउ के मालिकों पर ही यह सवाल उठना चाहिए कि अगर वे टेप इनके पास पहले से थे तो अब तक इन लोगों ने छिपाये क्यों रखा? क्या टेप छिपाये रखने के लिए लालू या शशि थरूर से कुछ लेन देन की थी चैनल के मालिकों ने?

सौरभ भारत की एफबी वॉल से.

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‘रिपब्लिक’ न्यूज चैनल में किस पार्टी ने लगाया पैसा, सपा नेता ने अर्नब के सामने लाइव कर दिया खुलासा (देखें वीडियो)

रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने लाइव डिबेट शो में समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता घनश्याम तिवारी को खूब खरी खोटी सुनाई। अर्नब सपा प्रवक्ता पर इतने नाराज हो गए कि ये तक कह डाला कि तुम होते कौन हो मुझसे इस तरह बात करने वाले। तुम्हें राजनीति में जितना समय नहीं हुआ उससे 10 गुना ज्यादा समय से मैं पत्रकारिता कर रहा हूं।

दरअसल रिपब्लिक टीवी पर सेना के जवानों पर अखिलेश यादव के बयान पर चर्चा के लिए डिबेट शो का कोर्यक्रम हो रहा था। इस प्रोग्राम में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की तरफ से सफाई देने के लिए समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता घनश्याम तिवारी स्टूडियो में मौजूद थे। डिबेट के दौरान शो की एंकरिंग कर रहे अर्नब गोस्वामी ने सपा प्रवक्ता से कहा कि मैं आपकी मजबूरी समझ सकता हूं कि आपने आज ही समाजवादी पार्टी ज्वॉइन की है, इसीलिए किसी भी हाल में अखिलेश यादव का बचाव कर रहे हैं। अर्नब की इस बात पर घनश्याम तिवारी ने कहा कि आप मुझसे ऐसी बात कहेंगे तो मैं भी कह सकता हूं कि आपकी भी अखिलेश की खिंचाई करना मजबूरी है क्योंकि आपके चैनल में बीजेपी के पैसे लगे हैं।

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता की इस बात पर अर्नब आग बबूला हो उठे। गुस्साए अर्नब ने सपा प्रवक्ता से कहा कि या तो आपना आरोप साबित करो या फिर जो बाला है उसपर माफी मांगो। अर्नब को गुस्से में आता देख घनश्याम ने अपने आरोप वापस ले लिए लेकिन अर्नब यहीं नहीं रुके। उन्होंने डांटते हुए सपा प्रवक्ता से कहा कि बिना फैक्ट के मुझसे बात मत करना। जितने दिन से तुम राजनीति में हो उससे 10 गुना समय पहले से मैं पत्रकारिता में हूं। मैंने एक के बाद एक कई नेताओं को बेनकाब किया है..तुम होते कौन हो।

अर्नब को लगातार हमलावर होता देख धनश्याम तिवारी ने उन्हें बीच में रोकने की कोशिश की तो वो और उग्र हो गए। इसके बाद अर्नब ने कहा कि आज के बाद मेरे सामने कभी लाइन क्रॉस मत करना। तुम्हारे जैसा दलबदलू नेता होता कौन है मुझसे इस तरह बात करने वाला। मैंने अपना खुद का चैनल खोला है, तुम जब अपनी पार्टी बना लेना तो मुझसे बात करना। संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

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पत्रकारिता का अर्नबीकरण!

Sanjaya Kumar Singh : अर्नब गोस्वामी को मैं नहीं देखता। भाजपा से उसके संबंध जानने और उसके झुकावों को देखने के बाद अर्नब को निष्पक्ष नहीं माना जा सकता है। ऐसे में कल नए चैनल के उद्घाटन को लेकर भी दिलचस्पी नहीं रही। लालू यादव से संबंधित ऑडियो के प्रसारण और उसमें गैंगस्टर शहाबुद्दीन का लालू यादव से कहना, “खत्तम है आपका एसपी” – ऐसा कोई मतलब नहीं देता है जो बताया और बनाया जा रहा है। एक साल पुराने इस मामले को जिस तरह पेश किया गया है वह भाजपा समर्थन और लालू-नीतिश विरोध ज्यादा पत्रकारिता या रिपोर्टिंग कम है। ठीक है, अंग्रेजी का यह चैनल बिहार के मतदाताओं पर क्या प्रभाव छोड़ पाएगा। फिर भी…

इस रिपोर्ट में नीतिश की राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आने की संभावना के मद्देनजर उनपर टीका टिप्पणी ज्यादा है, उन्हें जवाब देना होगा, नहीं देंगे तो आप (भाजपा वाले) क्या करेंगे जैसे सवाल आदि का वीडियो देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि सब कुछ भाजपा की राजनीति का हिस्सा है। भाजपा कहती तो यह है कि कांग्रेस के लोग बेईमान हैं, पैसे कमाए हैं पर चैनल उसके समर्थकों के ज्यादा है। नया चैनल भी उसी के समर्थक का आया। तब, जब भ्रष्टाचार से कमाई बंद है और तमाम चैनलों की माली हालत खराब है। किसी कांग्रेसी का चैनल आया हो तो मुझे पता नहीं है। लेकिन होगा भी तो छोटा-मोटा। पर वह अलग मुद्दा है।

फिलहाल तो मुद्दा है यह है कि भाजपा की राजनीति का जवाब दूसरी पार्टी के लोग उसी की भाषा में क्यों नहीं दे रहे हैं। ये लव लेटर लिखने वाले लव लेटर ही लिखेंगे? पूछेंगे नहीं कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा है। पांच साल के लिए फर्जी सर्टिफिकेट पर सांसद चुनी गई ज्योति धुर्वे का मामला अदालत में तय हो यह अगर ठीक भी हो तो पिछली बार पांच साल में रिपोर्ट ही नहीं आने पर कार्रवाई कौन करेगा? देश की राजनीति में सिर्फ भाजपा ही सक्रिय लग रही है बाकी सब भाजपा की चालों को झेल रहे हैं, जवाब देना या दे पाना तो बहुत दूर।

सबका “काला धन” खत्म हो गया और लगता है सिर्फ भाजपा के पास सफेद धन था, है और बचा हुआ है। पत्रकारिता पर एक कार्यक्रम में कल एक मित्र ने “टीवी का अर्नबीकरण” कहा। मैं कहता हूं अर्नब से पत्रकारिता सीखिए। नए स्टार्टअप में मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिलेगी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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‘रिपब्लिक’ की लांचिंग के दिन अर्नब गोस्वामी सुपारी जर्नलिस्ट नज़र आए!

पूरा नेशन जानना चाहता था कि अर्नब गोस्वामी जिस चैनल को लेकर आ रहे हैं उसके तेवर कैसे होंगे? मीडिया की घटती विश्वसनीयता के बीच वो किन खबरों को तव्वजो देंगे। लेकिन ये कहने में कोई संकोच नहीं कि अर्नब ने न केवल दर्शकों को बल्कि पत्रकारों को भी निराश किया। सुबह करीब 10 बजे से लेकर रात के 1 बजे तक वो लालू प्रसाद और डॉन शाहबुद्दीन की कथित ऑडियो टेप को बार-बार दिखाते रहे। जिसमें शाहबुद्दीन लालू प्रसाद यादव से सीवान के एसपी को हटाने की बात कर रहे हैं। ऑडियो में शाहबुद्दीन को ‘आपका एसपी खत्म है’ कहते हुए सुनाया गया।

इस टेप की विश्वसनीयता को लेकर तमाम सवाल खड़े किए जा सकते हैं और हो सकता है कि टेप गलत या सही भी हों। लेकिन जरा गौर कीजिए। इस टेप के समर्थन में कौन लोग सामने आए। अमित शाह, रविशंकर प्रसाद, वैंकैया नायडू, सुशील कुमार मोदी, रीता बहुगुणा जोशी और रामविलास पासवान। तो क्या बिहार में बाकी नेताओं ने इसे कोई तव्वजो नहीं दी। कांग्रेस के टॉम वडक्कन को रिपब्लिक की टीम ने पकड़ा जरूर, लेकिन उनसे कोई ऐसी बात नहीं कहलवा पाए जो इनके टेप के दावे को मजबूत करता हो।

एक नए न्यूज चैनल का पहला दिन बहुत खास होता है। जो बताता है कि आने वाले दिनों में उसका रंग-रूप और उसकी दिशा क्या होने जा रही है? पर अर्नब के रिपब्लिक टीवी ने पहले दिन ही बता दिया कि वो आने वाले दिनों में क्या करने जा रहे हैं? एक ही बात को बार बार कहना और खुद को सबसे बड़ा तीसमारखान बताना यही इशारा करता है कि वो बड़बोलेपन के जाल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। टीवी पर चिल्लाने से कोई खबर बड़ी नहीं हो सकती और वो एक खास वर्ग को ही प्रभावित करती है। जो एक खास विचारधारा और खास पार्टी के जरखरीद गुलाम होते हैं।

लालू यादव भले ही आज भी आरजेडी के अध्यक्ष हों, लेकिन राजनीति में वो पतन की कगार पर ही है। चारा घोटाले में दोषी करार दिए गए हैं। फिलहाल जमानत पर रिहा हैं। ना तो चुनाव लड़ सकते हैं और ही कोई पद ग्रहण कर सकते हैं। ऐसे में उनके उनपर गदा प्रहार कर अर्नब गोस्वामी क्या साबित करना चाह रहे थे? वो भी दिनभर के लगातार प्रसारण में।

हमें उम्मीद है कि अर्नब गोस्वामी को अच्छी तरह पता होगा कि बीते दशकों में जेल मैनुअल में काफी सुधार हुआ है। अब जेल को य़ातना गृह के रूप में नहीं बल्कि कैदी सुधार गृह के रूप में देखा जाता है। जहां कैदियों के लिए अपने परिवार को सरकारी खर्च पर फोन करने की सुविधा होती है। अपने रिश्तेदारों से हफ्ते में कम से कम एक बार जेल में मिलने की इजाजात होती है। और अगर कैदी का आचरण अच्छा रहा तो उसे परोल पर अपने परिवार के बीत महीने-दो महीने रहेने की इजाजात भी दी जाती है। कई आदर्श जेल तो ऐसे हैं, जिनमें कैदी दिन में बाहर जाकर अपना रोजगार कर सकते हैं और शाम को फिर जेल में वापिस लौट सकते हैं। ऐसे में अगर आरजेडी सुप्रीमो से अगर आरजेडी नेता ने जेल से बात ही कर ली तो इसमें कौन सा तूफान टूट पड़ा।

देशभर के दूरदराज के जेलों की बात तो छोड़ दें, दिल्ली की तिहाड़ जेल में ही सैकड़ों बार मोबाइल, शराब, ड्रग्स लेकर गांजा, अफीम, चरस तक मिलने और पकड़े जाने की खबरें आती रहीं हैं। अगर आपको याद हो तो एक स्टिंग ऑपरेशन में तिहाड़ जेल की हकीकत को एक युवा पत्रकार रवि शर्मा ने आजतक न्यूज चैनल में तार-तार कर दिया था। ऐसे में एक नेता का दूसरे नेता के साथ बात करना, चाहे बातचीत जेल के भीतर से ही क्यों ना की गई हों, इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि उसे एक चैनल अपनी लांचिंग के दिन 14 घंटे तक दिखाता रहे और बाकी किसी खबर को कोई तव्वजो ना दे।

किसी भी न्यूज चैनल से दर्शकों को उम्मीद होती है कि उसे एक घंटे में दिनभर की सारी छोटी-बड़ी खबरें मिल जाएं। अगर हम कल की ही बात करें तो तुगलकाबाद में गैस रिसने से 475 छात्राएं बीमार पड़ गईं। बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया। कश्मीर में बिगड़ते हालात और महबूबा मुफ्ती की चिंता थी। स्कूली बच्चों की पत्थरबाजी थी। जिस पर गंभीर चिंतन के साथ कार्यक्रम प्रस्तुत किए जा सकते थे। सबसे बड़ी बात महबूबा मुफ्ती का वो बयान था जिसमें उन्होंने कश्मीर में हालात सामान्य करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई और उन्हें वाजपेयी जी की तरह ठोस कदम उठाने को कहा। आम आदमी पार्टी के भीतर मचे कोहराम और कुमार विश्वास के करीबी जल संसाधन मंत्री को हटाए जाने की खबर भी छोटी नहीं थी। लेकिन ये खबरें रिपब्लिक टीवी की हेडलाइंस से गायब नजर आई। गैस रिसाव से 475 छात्राओं के बीमार होना तो रिपब्लिक के पहले दिन की खबरों में जगह भी नहीं पा सकी।

देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक कई ऐसी खबरें थीं, जिस अर्नब आज खबर बना सकते थे। कशमीर के ताजा हालात, तमिलनाडु के किसानों की समस्याएं, तेलंगाना के मिर्ची उगाने वाले किसानों के दर्द, भीषण गर्मी में पानी के लिए देश के कई हिस्से में त्राहिमाम्, उत्तर प्रदेश समेत देशभर में गौ रक्षकों की गुंडागर्दी, समंदर में मछली पकड़ने वाले मछुआरों की समस्याओं, किसानों की एमएसपी, बैंको के लाखों करोड़ के डूबे कर्ज, नोटबंदी से देश की इकोनॉमी को हुए नुकसान, नक्सलवाद की समस्याएं जैसे कई मसले थे, जिन्हें रिपब्लिक अपने लांचिंग के दिन बड़ी खबर के रूप में संजीदा तरीके से पेश कर सकता था। लेकिन अर्नब गोस्वामी ने मुंह दिखाई के दिन लालू को ध्वस्त करने की ठान ली। अर्नब को अच्छी तरह मालूम है कि उस तरह खबरें भले ही उन्हें टीआरपी दे दे, लेकिन पत्रकारिता के लिहाज से इसे सनसनी फैलाने वाली खबर ही माना जाएगा। जिसका आम जिंदगी से कोई खास सरोकार नहीं हो सकता।

अर्नब गोस्वामी को आमतौर पर सत्ता के करीबी पत्रकार के तौर पर ही देखा जाता है। जो चिल्लाते ज्यादा हैं और काम की बात कम करते हैं। उनके चैनल की फंडिंग को लेकर भी इसी तरह की बातें सामने आ रहीं हैं। ऐसे में हम उम्मीद करते हैं कि आनेवाले दिनों में अर्नब और उनकी टीम कुछ संजीदा खबरों के साथ सामने आएंगे। जिनसे देश की आवाम को सरकार के सामने अपनी आवाज बुलंद करने में थोड़ी सहूलियत होगी। कहते हैं ना कि मरे हुए को तो कोई भी दो लात मार सकता है लेकिन आपको ताकतवर तब माना जाता है जब आप अपने से बड़े और रसूखदार लोगों पर वार करते हैं और अंजाम की परवाह नहीं करते। 

लेखक संजय कुमार राज्यसभा टेलीविजन के एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं. उनसे संपर्क sanjaykumary2kok@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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बधाई, एक और ‘निष्पक्ष’ चैनल बाजार में आ गया :)

अर्नब गोस्वामी और राजीव चंद्रशेखर का रिपब्लिक टीवी अब लॉन्च हो गया है। इस मौक़े पर ज़रा मालिक राजीव चंद्रशेखर के बारे में बता दूं। फ़िलहाल वो राज्यसभा सांसद हैं और केरल में NDA के उपाध्यक्ष हैं। डिफेंस पर स्टैंडिंग कमेटी में भी वो हैं। उनकी कंपनी को भारतीय एयरफोर्स के एयरक्राफ्ट्स में तकनीकी सहयोग का ठेका मिला हुआ है। बीते साल ये ठेका मिला। चैनल जब शुरू हुआ तो उनकी कंपनी जुपिटर कैपिटल के CEO अमित गुप्ता ने एडिटोरियल को मेल लिखा कि कंटेंट “प्रो मिलिट्री” होना चाहिए। मिलिट्री नैशनलिज़्म चंद्रशेखर की आइडियोलॉजी में फिट बैठता है, लेकिन इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण ये फैक्ट है कि मिलिट्री के साथ उनका धंधा चलता है। बिजनेस इंटरेस्ट है।

बाक़ी अर्नब के पास बीजेपी को छोड़कर हर पार्टी को गरियाने का एक बढ़िया मंच मिला है। लालू यादव से शुरुआत भी हो गई। टीवी में एक और बीजेपी चैनल खुल गया है। बाक़ी चंद्रशेखर एशियानेट के भी मालिक हैं। बाय द वे, रिपब्लिक में 14 लोगों का शेयर है, जिनमें अर्नब और उनकी पत्नी भी शामिल हैं। किसका कितना शेयर है, ये नहीं पता।

The Wire ने राजीव चंद्रशेखर, अर्नब और रिपब्लिक पर दो लेख छापे। चंद्रशेखर ने सिद्धार्थ वरदराजन पर मानहानि का मुक़दमा कर दिया। एक लेख Sandeep Bhushan का था और एक सचिन राव का। कहा क्या गया था लेख में कि चंद्रशेखर बिलबिला गए? किन बातों से बिलबिलाए? फैक्ट लिखा गया था। मैं उसी तरह का फैक्ट फिर से लिख रहा हूं।

-चंद्रशेखर की कंपनी जुपिटर कैपिटल का Axiscades Engineering Technology Limited में निवेश है, जोकि रक्षा उत्पाद से जुड़ी कंपनी है।

-जुपिटर को रक्षा मंत्रालय ने सेना और एयरफोर्स के लिए 18 महीने तक Aircraft Recognition Training Systems सप्लाई करने का ठेका दिया। दशक भर से ऊपर का मेनटेंनेंस भी इसी कंपनी को मिली।

-मार्च 2016 में रक्षा मंत्रालय और जुपिटर की ये डील हुई।

-चंद्रशेखर फ़िलहाल संसद की रक्षा संबंधी स्थाई समिति के सदस्य हैं। वे रक्षा पर परामर्श समिति के भी सदस्य हैं। वे NCC के भी केंद्रीय परामर्श समिति के सदस्य हैं।
मुझे कोई समझाएं कि ये कैसे हितों का टकराव (conflict of interest) नहीं है?

-जुपिटर के CEO ने चैनल लॉन्च होने से पहले अर्नब समेत एडिटोरियल के टॉप लोगों को मेल लिखकर साफ़ कहा कि कंटेंट “प्रो-मिलिट्री” होना चाहिए। ये मिलिट्री को बचाने के लिए है या फिर अपना धंधा बचाने के लिए?

-चंद्रशेखर “Flags of honour” नाम से एक NGO भी चलाते हैं। इसमें वो मिलिट्री से जुड़े लोगों की हौसला-आफजाई करते हैं। चंद्रशेखर का पूर धंधा MMMM यानी मीडिया, मिलिट्री, मोबाइल और मोदी है।

-Asianet News, कन्नड़ प्रभा, सुवर्ण न्यूज़, बेस्ट FM और रेडियो इंडिगो इन्हीं की कंपनी है।

-बीपीएल मोबाइल इन्होंने ने ही खोला था।

-राज्यसभा में हैं निर्दलीय सांसद, लेकिन केरल में NDA के उपाध्यक्ष हैं।

(यह पोस्ट फेसबुक पर वायरल हो गई है. इसके ओरीजनल लेखक कौन हैं, इसका पता नहीं चल पाया है.)

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अरनब गोस्वामी का खुलासा- प्रबंधन ने मुझे टाइम्स नाऊ के स्टूडियो जाने से रोक दिया तो देना पड़ा इस्तीफा

केजरीवाल पर निशाना साधा था जिसके कारण मुझे मेरे स्टूडियो में ही जाने से रोक दिया गया… इसके दो दिन बाद मैंने टाइम्स नाऊ छोड़ दिया… टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल छोड़कर द रिपब्लिक मीडिया वेंचर शुरू करने वाले पत्रकार अरनब गोस्वामी ने खुलासा किया है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधने पर उन्हें उनके स्टूडियो में जाने पर ही रोक दिया गया था। अरनब गोस्वामी ने यह बात बीएजी फिल्म्स के मीडिया इंस्टीट्यूट आईसॉम्स द्वारा आयोजित मीडिया फेस्ट मंथन 2017 में कही।

गोस्वामी ने कहा, ‘टाइम्स नाऊ छोड़ने से दो दिन पहले मुझे प्रोग्राम करने से बंद कर दिया गया। मुझे कहा गया कि आप प्रोग्राम नहीं कर सकते। मैंने बोला कि आप डरिए मत। 18 नवंबर 2016 टाइम्स नाऊ में मेरा आखिरी दिन था। मुझे मेरे स्टूडियो में जाने से रोक दिया। मैंने वह स्टूडियो बनाया था। मैं इसके बाद बहुत दुखी थी। जब आपने कोई स्टूडियो बनाया और उसमें घुसने ना दे तो दुख होता है। मुझे रोक दिया गया था। 14 नवंबर को मैंने कहा था कि नोटबंदी के बाद जंतर-मंतर पर लोगों को बुलाने से अरविंद केजरीवाल को रोकना चाहिए।’

गोस्वामी मीडिया फेस्ट मंथन में मीडिया के छात्रों को संबोधित कर रहे थे। गोस्वामी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘मैं बिना किसी डर के सवाल उठाता हूं। मैं इन सवालों को इसलिए उठा रहा हूं, क्योंकि मैंने अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर दिया है। मैंने अपने आपको मीडिया से स्वतंत्र घोषित किया है। मैंने अपने आपको फर्जी मीडिया से आजाद कर लिया है। मैंने अपने आपको समझौता करने वाली मीडिया से आजाद कर लिया है।’

साथ ही उन्होंने कहा, ‘मैं और मेरे युवा पत्रकारों की टीम ये सवाल करती रहेगी। मुझे किसी की जरूरत नहीं है। मुझे सुरक्षा की जरूरत नहीं है। केवल सवाल ये है कि क्या हम कठिन सवाल पूछेंगे या फिर उन्हें नजर अंदाज कर देंगे। क्या मुझे इन सवालों को छोड़ देना चाहिए या मुझे सुरक्षित चलना चाहिए।’

अरनब गोस्वामी बतौर एडिटर-इन-चीफ टाइम्स ग्रुप के न्यूज चैनल टाइम्स नाऊ के साथ जुड़े हुए थे। टाइम्स नाऊ से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने मीडिया वेंचर ‘द रिपब्लिक’ की शुरुआत की है। हालांकि, अभी उनका ये वेंचर आधिकारिक तौर पर लॉन्च नहीं किया गया है।

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अरनब गोस्वामी के नए चैनल का नाम ‘रिपब्लिक’ होगा

अंग्रेजी न्यूज चैनल टाइम्स नाऊ के साथ 10 साल तक रहने के बाद एडिटर इन चीफ पद से इस्तीफा देने वाले अर्नब गोस्वामी ने खुद का चैनल लाने की जो घोषणा की थी, वह अब मूर्त रूप लेने लगा है. चैनल के नाम की घोषणा कर दी है. चैनल का नाम ‘रिपब्लिक’ होगा. अरनब गोस्वामी के नए वेंचर का नाम होगा Republic जो यूपी चुनाव से पहले लांच हो जाएगा. चर्चा है कि रिपब्लिक चैनल की लांचिंग रिपब्लिक डे के दिन की जाएगी. ज्ञात हो कि टाइम्स नाऊ छोड़ने के पूरे एक महीने बाद अरनब गोस्वामी ने अपने नए वेंचर के नाम की घोषणा की है.

अरनब का नया चैनल 2017 की पहली तिमाही में होने जा रहे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव से पहले शुरू हो जाएगा. अरनब गोस्वामी इस लिए भी जाने जाते हैं कि टाइम्स नाऊ पर उनके प्राइम टाइम डिबेट शो ‘The News Hour’ के कारण उस समय चैनल की 60 फीसदी कमाई सिर्फ इसी शो से होने लगी थी. अरनब के इस कार्यक्रम को सभी चैनलों से ज्‍यादा दर्शक मिलने लगे थे और इसका विज्ञापन रेट भी सबसे ज्‍यादा था.

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अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार पत्रकारिता के दो विपरीत छोर हैं : उदय प्रकाश

Uday Prakash : There have been two striking popular and leading poles in TV journalism spirited these days. One in English and the other in Hindi. I’m always skeptical about Hindi as it’s always characterized by the people who represent it, in politics, culture and media. My friends here on Facebook know about my views through my posts time and again. One of the poles, in English was Times Now, anchored by Arnab Goswami and the other, in Hindi is NDTV, with its anchor Ravish Kumar. 


The First with commanding monologues, superiority, self-righteousness, provided with Y security by the government, brilliant, eloquent, deafening and the other, always appearing inconsequential, fragile, meek and lesser.

These two belonged to the same, as Baba Saheb Ambedkar had held, Hindu priestly caste, the Brahmins, which will never allow a social change to happen. At the maximum it can act as an agent of ‘political change.’

Here, I’m not going to write a big analytical piece about the contrary roles these two anchors have been playing since last few stormy months this year but friends look at state of affairs of these two as of now.

Arnab Goswami has been made to resign from Times Now and is now trying to start a news industry on his own, after serving ten years in TOI. He is out to test his fortune in commercially competitive media business to make more money and more power. He claims to disrupt existing media news industry with his teammates and to create a private ‘independent’ channel. 

And Ravish Kumar, who just succeeded saving his career and his employer’s profession for his journalistic conscience from getting ‘banned’ for a day by the government, is seen tonight in his most sought-after and hugely watched ‘Prime Time’ talking to desperate, crying mother of Najeeb, a JNU student, missing for the last 24 days. 

Ravish represents the sanity, rationale of India’s plural, liberal, secular and democratic conscience.

Arnab Goswami might prosper becoming more moneyed and more powerful with more securities for his cover.

Geometrical ‘edge line’ between language and caste here appear blurred to me and think it’s individual who is a subject to be certified.

Friends, watch tonight’s Prime Time and see how calm and humane Ravish executes his responsibility as a noncombatant journalist.

Ravish stands with the known tradition of patriotic and sane journalism of India and Arnab Goswami ….an aberration…an anomaly. 

One has demeaned and defamed English. The other, risking his livelihood rescued almost the decomposed and treacherous casteist image of Hindi.

(Let’s celebrate the victory of Freedom of Expression against Censor-shipping and Banning politics, even if it’s a last one.)

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आईं टिप्पणियों में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Amit Kumar : अंग्रेजी, हिंदी के दो एंकरों के आधार पर बहुत विशिष्ट विश्लेषण! हिंदी टेलीविज़न पत्रकारिता का दुःखद पक्ष यह है कि रवीश जैसे एंकर ढूंढे नहीं मिलते। वहीं अंग्रेजी में अर्णव अभी भी बहुत कम हैं, उनके अनुयायी हिंदी एंकर अधिक हैं।

डॉ अरुण बुद्धिहीन : बेजोड़। एक अहंकारी , अभिजात्य एवं सत्ता का दलाल एवं दूसरा साधारण जनता से मिलता जुलता, विनम्र लेकिन पत्रकारिता धर्म का निडरता के साथ निर्वाहक।

Mazhar Kamran : Very well said. This is true in a big way across the entire culture in the country.

Prakash Badal : Rightly said. Ravish kumar and Arnav are true journalists . Thay proved the definition of journalism in their own way. And they win.

Anurag Arya : नायक कोई नहीं होता ,सिर्फ सन्दर्भ सही और गलत होते है. सिद्दांत और सामाजिक सरोकार सही या गलत होते है. कल को रविश कुमार या एन डी टी वी हमारी समझ से किसी सरोकार के खिलाफ नजर आये तो हम आलोचना से हिचकिचाएंगे नहीं ! एक प्रतिबद्ध नागरिक का कोई पक्ष नहीं होता है।

Hasnain Naqvi : Arnab and Ravish: the Poles apart!

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अर्णब गोस्वामी के बारे में इस पत्रकार ने जून महीने में ही कर दी थी भविष्यवाणी

adim S. Akhter : अर्णब गोस्वामी के बारे में इस साल जून में की गई इसे मेरी भविष्यवाणी कहिए या आशंका, पर ये सच साबित हुई। तब मैंने अपने विश्लेषण में कहा था कि पीएम मोदी के सॉफ्ट इंटरव्यू के बाद अर्णब और टाइम्स नाउ की जो छीछालेदर हुई है, उन हालात में अर्णब की जल्द ही टाइम्स नाउ से विदाई हो सकती है। और कल ही अर्णब की टाटा-बाय बाय वाली खबर आ गई। और जो लोग ये चिंता कर रहे हैं कि अर्णब के बिना टाइम्स नाऊ का क्या होगा, उनके टनाटन न्यूज़ ऑवर डिबेट का क्या होगा, टाइम्स नाऊ की टीआरपी का क्या होगा, वो ज़रा धीरज रखें। मैंने लिखा था कि आज के ज़माने में टाइम्स ग्रुप कभी संपादकों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। उनका फंडा अलग है। जो लोग टाइम्स ग्रुप में काम कर चुके हैं और जिनका थोड़ा बहुत भी मैनेजमेंट से वास्ता रहा है, वो ये बात बखूबी जानते हैं।

सो अर्णब गोस्वामी कितने भी बड़े हो जाएं, संस्थान से बड़े नहीं हो सकते। संस्थान से बड़ा वही एडिटर हो सकता है, जो चौथे स्तंभ का पत्रकार हो और लिखने-पढ़ने वाला हो। अर्णब महज़ एक मैनेजर, न्यूज़ प्रेजेंटर और डिबेटर बन के रह गए। वैसे अर्णब की शोर वाली पत्रकारिता के भी कई फैन हैं, पर व्यक्तिगत रूप से मुझे ये शोर पत्रकारिता कहीं से भी नहीं भाती। ये सच हो सकता है कि अर्णब भारत से प्रसारित होने वाले किसी अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी न्यूज़ चैनल के प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाएं। ये उनकी दिली चाहत रही है और एक कार्यक्रम में अपने दिल की ये बात उन्होंने कही भी थी, जिसका वीडियो मैंने तब फेसबुक पे शेयर किया था। पर अर्णब अगर अंग्रेजी का भारत से प्रसारित होने वाला सीएनएन टाइप न्यूज़ चैनल लाना चाहते हैं, तो इसके लिए टाइम्स ग्रुप से अच्छा प्लेटफार्म और कोई नहीं हो सकता था।

ज़ी वाले भी ऐसा एक चैनल ले के आये हैं, जिसे कोई गांधी महाशय लीड कर रहे हैं, उनका पूरा नाम अभी याद नहीं आ रहा। उनसे एक बार मुलाक़ात हुई है अपनी। पर टाइम्स ग्रुप की तो बात ही निराली है क्योंकि वो हर काम बड़े ishtyle से करते हैं। टाइम्स नाउ को ही देख लीजिए। अर्णब के बिना भी ये चैनल चलता रहेगा और मार्किट लीडर बना रहेगा। आप देखते रहिये। यही टाइम्स ग्रुप की यूएसपी है। बाकी अर्णब आगे क्या करते हैं, इस पे suspence जल्द ही खत्म हो जायेगा।

ये है जून में की गई भविष्यवाणी वाली पोस्ट…

नदीम एस. अख्तर कई चैनलों-अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. वे मीडिया शिक्षण प्रशिक्षण के कार्य से भी जुड़े रहे.

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टाइम्स की दुकान और पत्रकार से छुटकारा

अर्नब गोस्वामी ने टाइम्स नाऊ क्यों छोड़ा, वे जानें। पर जैसा कि नौकरी छोड़ने वाले ज्यादातर पत्रकारों के साथ होता है, नौकरी छोड़ने के समय हर कोई कहता है, अपना कुछ काम करेंगे। ऐसा कई पत्रकारों के मामले में हुआ है। कई साल से हो रहा है। किसी एक का क्या नाम लेना – लोग जानते हैं और जो नहीं जानते उनके लिए नाम बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। वैसे यह सच है कि नौकरी छोड़ने के बाद कइयों ने अपना काम शुरू भी किया, कर भी रहे हैं पर ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि जैसी संस्था छोड़ी वैसी ही खड़ी कर ली। या जो है वैसी होने की ओर अग्रसर है। फिर भी अर्नब गोस्वामी के बारे में कहा जा रहा है (उन्होंने नहीं कहा है) कि वे चैनल शुरू करेंगे। और फिर इससे जुड़ी अटकलें। मेरी दिलचस्पी उसमें नहीं है।

मुझे यह समझ में आ रहा है कि अर्नब जितनी तनख्वाह पाते होंगे उतने का पूरा कारोबार कर लेना भी असाधारण होगा – शुरू करने के बाद कई वर्षों तक। ऐसे में कोई स्वेच्छा से क्यों नौकरी छोड़ेगा और कोई योजना-साजिश है तो उसका खुलासा धीरे-धीरे ही होगा। इस मामले से जुड़ी एक दिलचस्प याद है। सोचा आज इस मौके पर उसी की चर्चा करूं। मौका है, दस्तूर भी। मामला पुराना है, मोटे तौर पर टाइम्स संस्थान का अपनी हिन्दी की पत्रिकाओं को बंद करना। दूसरे शब्दों में, 10, दरियागंज का इतिहास हो जाना। टाइम्स ने अचानक हिन्दी की अपनी कई अच्छी, चलती, बिकती, प्रतिष्ठित और लोकप्रिय पत्रिकाओं को बंद करने की घोषणा कर दी। हिन्दी के पत्रकार – कहां छोड़ने और मानने वाले थे। और उस जमाने में सरकार हिन्दी के पत्रकारों को नाराज कैसे कर सकती थी।

टाइम्स समूह को समझ में आया कि पत्रकारों से छुटकारा पत्रकार ही दिलाएगा और घोषणा हुई कि सभी टाइटिल्स मशहूर पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने ले लिए हैं। (दे दिया, बेच दिया, खरीद लिया – मुझे याद नहीं है और अब महत्वपूर्ण भी नहीं है)। पत्रकारों को लगा कि मालिक बदलेगा। अच्छा है, पत्रकार मालिक होगा। नौकरी यहां नहीं, वहां कर लूंगा। आंदोलन शांत। मामला ठंडे बस्ते में। वो पत्रिकाएं आज तक बाजार में नहीं दिखीं। छपती हों और नेताओं के घर डाक से जाती हों तो मुझे नहीं पता। वैसे उन दिनों साउथ एक्सटेंशन की एक बिल्डिंग पर पत्रिकाओं के बोर्ड जरूर लगे थे। कुछ दिनों बाद से ही नहीं दिखते।

अर्नब का मामला अलग है। पर हिन्दी के पत्रकारों के मालिकों से संबंध हमेशा दिलचस्प रहे हैं। आनंद बाजार समूह ने हिन्दी की पत्रिका रविवार बंद की तो फिर हिन्दी में हाथ नहीं डाला। इंडिया टुडे हिन्दी में निकलता है पर गिनती के कर्मचारियों से। हिन्दी आउटलुक का हाल आप जानते हैं। और भी कई हैं। पत्रकार से छुटकारा पाना किसी भी संस्थान के लिए मुश्किल होता है और कोई भी पत्रकार रामनाथ गोयनका बनने से कम का सपना नहीं देखता है। ऐसे में पत्रकारों खासकर हिन्दी वालों को बांटने और अमीर बनाने का खेल भी हुआ संपादक नाम की संस्था अंग्रेजी में खत्म हो गई पर हिन्दी में बची हुई है तो इसका एक कारण यह भी हो सकता है। यह अलग बात है कि आम पत्रकारों को इससे कोई लाभ नहीं है।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं.

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टाइम्स नाऊ से अरनब गोस्वामी ने इस्तीफा दिया, खुद का चैनल लांच करेंगे

मीडिया इंडस्ट्री की एक बड़ी खबर सामने आ रही है. टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल के चर्चित एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने संपादकीय विभाग की बैठक में अपने इस्तीफे का ऐलान किया. बताया जा रहा है कि अर्णब जल्द ही अपना न्यूज चैनल लांच करेंगे. टाइम्‍स नाऊ चैनल का मालिक टाइम्स आफ इंडिया अखबार समूह है जिसके मालिक विनीत जैन और समीर जैन हैं.

अरनब टाइम्‍स नाऊ के साथ साथ बिजनेस न्यूज चैनल ईटी नाऊ के भी एडिटर इन चीफ थे. अरनब गोस्वामी का शो ‘न्‍यूज आवर’ कई वजहों से सुर्खियों में रहा करता है. अरनब पर कई बार पीत पत्रकारिता करने और मोदी सरकार का बचाव करने जैसे आरोप लगे. अरनब की आलोचना शो में चिल्‍लाने और बहुत जल्‍दी आपा खो देने के लिए होती रही है.

अरनब गोस्वामी मूलत: असम के रहने वाले हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से सोशियालॉजी में बीए (आनर्स) और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से सोशल एंथ्रोपॉलजी में एमए करने वाले अरनब ने अपने करियर की शुरुआत 1995 में कोलकाता के अखबार द टेलीग्राफ से की थई. फिर वह एनडीटीवी चैनल से जुड़े. उन्होंने 2003 तक एनडीटीवी पर न्यूज आवर कार्यक्रम की एंकरिंग की. अरनब 2006 में टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ बने.

अरनब गोस्वामी के दादा असम के जाने माने वकील थे और उनके नाना गौरी शंकर भट्टाचार्य कम्युनिस्ट नेता और असम में विपक्ष के नेता रहे हैं. अरनब गोस्वामी के पिता मनोरंजन गोस्वामी सेना में कर्नल के पद से रिटायर हुए हैं. उनके पिता 1998 में भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गुवाहाटी से लोक सभा चुनाव लड़ चुके हैं. उनके मामा गुवाहाटी पूर्व से बीजेपी के विधायक हैं और असम के वर्तमान मुख्यमंत्री सरबानंद सोनोवाल से पहले पार्टी की असम इकाई के प्रमुख भी थे.

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अरनब बोले- मुझे नहीं मिली कोई सुरक्षा और न ही सुरक्षा पाने के लिए इच्छुक हूं

वाई श्रेणी सुरक्षा मिलने की खबर का टाइम्स नाउ के प्रधान संपादक अरनब गोस्वामी ने खंडन किया है. उन्होंने कहा- मैं ऐसी खबरों को पढ़ सुन कर हैरान हूं. यह बेतुकी और हास्यास्पद खबर है कि मैं वाई कैटेगरी की सिक्योरिटी और 20 सुरक्षा गार्ड के साथ चलूंगा. मैं सच में हैरान हूं. मैंने न तो कोई सुरक्षा मांगी है और न ही सरकार ने दी है.

अरनब को केंद्र सरकार द्वारा वाई श्रेणी सुरक्षा दिए जाने की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स अखबार ने ब्रेक की थी जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) के चेयरमैन रहे जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अरनब और सरकार की जमकर लानत मलानत की. उन्होंने अरनब को सरकारी खर्चे पर सुरक्षा देने को लेकर सवाल खड़े किए, साथ ही अरनब को ‘जोकर’ तक कह डाला.

Markandey Katju @mkatju :  Arnab Goswami is surely getting a huge salary from his employer. Why should he not pay for his security from his pocket? This joker Arnab Goswamy who has nothing in his head except his arrogance will get 20 guards night&day by Govt. for his security. Hari Om

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अरनब गोस्वामी ने लाइव शो से पूर्व एसीपी शमशेर पठान को बाहर निकाल दिया

पूर्व एसीपी शमशेर पठान को टाइम्स नाउ के लाइव शो न्यूजआवर से अरनब गोस्वामी ने बाहर निकाल दिया. पैनलिस्ट शमशेर पठान ने कुछ ऐसा कह दिया कि जिससे लाइव शो के दौरान टीवी एंकर अरनब गोस्वामी उखड़ गए और उन्हें गेट आउट कह दिया. अरनब गोस्वामी ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर डिबेट कर रहे थे. अरनब ने शमशेर की राय जाननी चाही तो उन्होंने अपने तर्क में महिला गेस्ट की खिल्ली उड़ानी शुरू कर दी. पठना ने शो में मौजूद पैनलिस्ट शाजिया इल्मी और एक अन्य महिला को कुछ ऐसा कह दिया जो अरनब को पसंद नहीं आया.

पठान ने शाजिया इल्मी और अन्य महिला गेस्ट से कहा कि उन्हें अपने पति से तलाक ले लेना चाहिए.  इसकी शुरुआत करें. फिर देखते हैं. इस पर अरनब नाराज हो गए और बीच शो में पठान को निकल जाने के लिए कहा. शमशेर काफी देर तक अरनब से बहस करते रहे लेकिन बाद में वे खुद ही उठकर वहां से चले गए. शमशेर पठान को जाकिर नाइक का करीबी माना जाता है. ये अवामी विकास पार्टी नाम का एक राजनीतिक दल भी चलाते हैं. शो का वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :


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लाखों सेलरी पाने वाले भक्त संपादकों अरनब-सुधीर को Y कैटगरी देने पर मोदी की लानत-मलानत

Markandey Katju :Why should Arnab Goswamy be provided Govt. security, and that too of the Y category, which means 20 guards will be with him day and night. Who will pay the salaries of these guards? It will be the government, which really means the public, because these salaries come from the taxes we pay. So we will have to pay for Arnab’s security.

Arnab is surely getting a huge salary from his employer. Why should he not pay for his security from his own pocket? There are many private security agencies which provide armed guards. Why did Arnab not hire them? Or else his employer, which is a very affluent business house, could have done so I believe some other mediapersons wh,o toe the govt. line have also been provided similar security by the Govt. Is this not deplorable? Must the public for these hired ‘tattoos’ and buffoons?

Nadim S. Akhter : अरनब गोस्वामी रिटार्यड पाकिस्तानी फौजियों-विशेषज्ञों को अपने शो में बुलाकर खूब लताड़ते हैं, दूसरों से गरियावाते हैं और बदले में उन पाकिस्तानियों को अपने शो में शामिल होने की मोटी फीस देते हैं. वरना अरनब की गाली सुनने कौन पाकिस्तानी उनके शो में शामिल होगा? फिर वही अरनब को कोई धमकी दे देता है. पाकिस्तान वाला ही कोई होगा. और अरनब को Y कैटिगरी की सुरक्षा मिल जाती है. लेकिन भारत सरकार को कोई नुमाइंदा और अरनब को सुरक्षा देने वालों में से कोई ये बताएगा कि अरनब की जिन बातों को सुनकर पाकिस्तान वालों की तरफ से उन्हें धमकी मिली है, वही आतंकी पाकिस्तान में ही रह रहे उन रिटार्यड फौजियों-विशेषज्ञों को क्यों नहीं धमकाते कि खबरदार जो अरनब के शो में शामिल हुए तो!! अरनब के शो के गेस्ट तो वहीं रह रहे हैं, उन्हें धमकाना आसाना है. अरनब तो इंडिया में है, उन्हें धमकाना मुश्किल है.

आपका लड़का अगर गलत रास्ते पर चल पड़ेगा तो आप पहले उसे डांटेंगे-समझाएंगे या फिर मुहल्ले के उस दादा के धमकाएंगे कि खबरदार ! जो मेरे बेटे के साथ दुबारा दिखे तो !! पहले आप अपने बच्चे को ही समझाएंगे ना. फिर सीमा पार से धमकी देने वाले पहले अपने पाकिस्तानी भाइयों को ही समझाएंगे-धमकाएंगे ना कि भारत के किसी भी टीवी शो में पार्टिसिपेट ना करो. या फिर दंबूक लेकर भारत के टीवी एंकरों को ही धमकाना शुरू कर देंगे? सोचने वाली बात है. फिर भी अरनब डर गए. सरकार भी डर गई. झटपट अरनब को बड़ी वाली सुरक्षा दे दी गई. उनका शो जारी रहेगा. फुंक चुके पाकिस्तानी विशेषज्ञ उनकी शो की शान बढ़ाते रहेंगे, टाइम्स नाऊ उनकी खाली जेबें गर्म करता रहेगा और शो चलता रहेगा. सब फिक्स है. अरनब को अगर इतना ही खतरा है तो उनका संस्थान और वे खुद प्राइवेट सिक्युरिटी गार्ड क्यों नहीं रख लेते? गजब पतन हुआ है ई अरनब का. सारा किया-धरा मट्टी में मिलाई दिया रे. अब से उसे अरनब गोस्वामी नहीं, भक्त अरनब कह के बुलाया जाएगा.

जाने माने पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और पत्रकार नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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पीएम मोदी के Soft Interview का इनाम! अरनब गोस्वामी को Y कैटिगरी की सुरक्षा मिली

Nadim S. Akhter : अरनब गोस्वामी को “पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण” उसी दिन मिल गया था, जिस दिन उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का Soft Interview लिया था. भारत सरकार की ओर से अरनब को मिली Y कैटिगरी की सुरक्षा उसकी पहली कड़ी भर है. Soft Journalism का ये कमाल आगे कइयों के सिर चढ़कर बोलने वाला है. Soft रहके ही स्वादिष्ट SOFTY खाई जा सकती है. बस Softy पिघलने से पहले उसे गटकने का हुनर आना चाहिए. Soft Journalism तेजी से फैलती बीमारी है. पत्रकारों के अलावा सोशल मीडिया पर citizen journalists भी द्रुत गति से इसकी चपेट में आ रहे हैं.

Priyabh Ranjan : मैंने सुना था कि पत्रकार यदि वाकई ईमानदार होता है तो ‘सत्ता’ उसे नुकसान पहुंचाने की भरपूर कोशिश करती है। लेकिन हमारी सरकार अपने ‘प्रिय’ पत्रकारों को Y कटेगरी की सुरक्षा मुहैया करा रही है। मतलब साफ है – ‘सत्ता’ को पसंद आ रहे ये पत्रकार ‘जनता’ से जुड़े मुद्दों की पत्रकारिता नहीं कर रहे। देश के असल मुद्दों को उठाने वाले पत्रकारों को तो सरकार या उनके ‘भक्त’ तरह-तरह से परेशान करते हैं, सुरक्षा मुहैया कराने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर और प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.

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मोदी से सटने की कोशिश क्यों कर रहे अर्नब गोस्वामी?

Mukesh Kumar : अर्नब गोस्वामी की नीयत मुझे ठीक नहीं लगती। जिस तरह से चमचागीरी वाले अंदाज़ में उन्होंने पीएम को जन्मदिन पर बधाईयाँ दीं, उससे पता चलता है कि वे मोदी से सटने की कोशिश कर रहे हैं। इसके पहले मोदी का नवनीत लेपन मार्का इंटरव्यू और हर रोज़ सरकार का ढोल पीटना बताता है कि उनके इरादे पत्रकारिता से इतर कुछ और भी हैं। विनीत जैन के कहने से वे ऐसा कर रहे होंगे, ये मुझे नहीं लगता।

मेरी समझ यही कहती है कि वे राजनीति में जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने अपना दाँव उस नेता और उस पार्टी पर लगा दिया है जिसके सितारे अभी बुलंद दिखलाई दे रहे हैं। हालाँकि राजनीति में अर्श से फर्श पर आने में देर भी नहीं लगती। लेकिन इतना जुआ तो खेलना पड़ता है। लगे रहो अर्नब भाई।

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की एफबी वॉल से.

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अर्नब गोस्वामी की working style ने टाइम्स नाऊ और टाइम्स ग्रुप को असहज कर दिया!

Nadim S. Akhter : बरखा ने जो कुछ कहा, वह अर्नब द्वारा कही गई बात का जवाब भर था और मैं व्यक्तिगत रूप से बरखा से सहमत हूं कि कोई शिखर पर बैठा पत्रकार यानी अर्नब ये कैसे कह सकता है कि कश्मीर पर उनसे अलग राय रखने वाले पत्रकारों का ट्रायल हो और उन्हें सजा मिले! यानी टाइम्स ग्रुप से जुड़ा एक बड़ा पत्रकार दूसरे पत्रकारों और मूलरूप से मीडिया की आजादी पर हमला करने की हिमायत और हिमाकत आखिर कर कैसे सकता है? सो चुप्पी तोड़नी जरूरी थी और बरखा ने चुप्पी तोड़कर सही किया. वरना अर्नब और बेलगाम हो जाते.

दूसरी बात. मामला यहां अर्नब या बरखा का नहीं है. ये तो एक क्रिया की प्रतिक्रिया भर थी. मामला इससे भी कहीं ज्यादा बड़ा और खतरनाक है. सवाल ये है कि अर्नब जो बोल-कह रहे हैं, क्या उससे टाइम्स ग्रुप और उसके मालिकान इत्तेफाक रखते हैं ??!! यहां ये बताना जरूरी है कि हर मीडिया संस्थान की एक एडिटोरियल पॉलिसी होती है, अघोषित एडिटोरियल गाइडलाइन होता है, जिसे अखबार-चैनल का मालिक और मैनेजमेंट तय करता है. सम्पादक को उसी गाइडलाइन के मुताबिक काम करना होता है. ये तो सुना था कि अर्नब को टाइम्स ग्रुप ने फ्री-हैंड दिया हुआ है लेकिन वो -फ्री हैंड- ऐसा भी नहीं हो सकता कि अर्नब अपने चर्चित शो न्यूज आवर में कुछ भी कह दें-बोल दें और ग्रुप का मालिक चुपचाप सब देखता-सुनता रहे.

इससे पहले भी अर्नब ने पीएम मोदी का इंटरव्यू जिस सॉफ्ट लहजे में किया था, जिसका सोशल मीडिया पर खूब मजाक उड़ा और उस इंटरव्यू की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए थे, तब मैंने कहा था कि टाइम्स ग्रुप अपने ब्रैंड यानी चैनल की निष्पक्षता या यूं कहें कि उसकी ब्रैंड इमेज से समझौता नहीं करता. सो हो सकता है कि इस मामले में कुछ हो, जिसका असर टाइम्स नाऊ की स्क्रीन पर भी दिखे. पर ऐसा नहीं हुआ. और ये दूसरी बार अर्नब ने ऑन एयर एक ऐसी बात कह दी, जिसने बखेड़ा खड़ा कर दिया और चैनल की साख पर सवाल उठा दिए. अर्नब और टाइम्स नाऊ को -सरकार का चमचा- तक कह दिया गया.

तो क्या अर्नब ने जो कहा, वह महज slip of tongue था या फिर भावावेश में आकर बोली गई ऐसी बात, जो पत्रकारों की एक बड़ी बिरादरी को चुभ गई!!! या यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है??!! मेरे ख्याल में अर्नब जैसा मंजा हुआ एंकर ऐसी गलती नहीं कर सकता कि भावावेश में उनकी जुबान फिसल जाए और वो इतनी बड़ी विवादास्पद बात कह जाएं.

सो असल सवाल यहीं से शुरु होता है. क्या अर्नब टाइम्स नाऊ के सर्वेसर्वा बनकर जो कह रहे हैं, टीवी पर जो दिखा रहे हैं और जिस तरह से बहस (एकतरफा बहस !!) का संचालन कर रहे हैं, क्या उसे टाइम्स ग्रुप के मालिकों यानी विनीत जैन और समीर जैन की सहमति मिली हुई है??!! और अगर नहीं, तो अर्नब पर लगाम क्यों नहीं कसी जा रही. क्यों टाइम्स नाऊ की ब्रैंड इमेज से उन्हें इस कदर खिलवाड़ करने दिया जा रहा है??. ये बात हम सब जानते हैं कि आज के काल में कोई भी पत्रकार अपने मीडिया संस्थान से बड़ा नहीं होता और अगर उसे वहां नौकरी करनी है, तो उसे संस्थान के एडिटोरियल गाइडलाइन्स का पालन करना ही होगा, वरना नौकरी गई समझो. इसलिए अगर अर्नब धड़ाधड़ जिस तरह की लाइन लिए हुए हैं, क्या उसे ये माना जाए कि टाइम्स ग्रुप ने अपनी -निष्पक्ष- वाली एडिटोरियल गाइडलाइन में संशोधन करते हुए कम से कम टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल के लिए इसे बदल दिया है?

एक बात और भी मार्के वाली है. वो ये कि अगर टाइम्स ग्रुप के अंग्रेजी अखबार Times of India के ही वरिष्ठ और प्रभावशाली पत्रकारों से पूछा जाए तो उनमें से ज्यादातर अर्नब की बात से इत्तेफाक नहीं रखेंगे और ऐसा मैं दावे के साथ कह रहा हूं. कौन पत्रकार होगा, जो जुदा राय रखने वाले पत्रकारों को प्रताड़ित और सजा देने की बात करेगा? यही कारण है कि टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार की एडिटोरियल पॉलिसी में मुझे अभी तक कोई मेजर शिफ्ट नजर नहीं आया है. बैलेंस करने की वही पुरानी कोशिश आज भी बरकरार है.

तो फिर टाइम्स नाऊ में ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों चैनल को उस तरफ जाने दिया जा रहा है जिससे ये छवि बन रही है कि चैनल और उसके एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को लोग सरकार का चमचा कहने लगे हैं? टाइम्स ग्रुप के मालिक और मैनेजमेंट इस पर कुछ कर क्यों नहीं रहा? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब मिलने बाकी हैं क्योंकि अर्नब की working style ने टाइम्स नाऊ और टाइम्स ग्रुप को असहज तो किया ही है.

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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ओम थानवी ने टाइम्स नाऊ वालों के बुलाने पर भी डिबेट में न जाने के कारणों का किया खुलासा

Om Thanvi : पिछले कुछ हफ़्तों से टाइम्ज़ नाउ से फ़ोन आता है कि अर्णब गोस्वामी के ‘न्यूज़ आवर’ में शिरकत करूँ। पर मेरा मन नहीं करता। एक दफ़ा समन्वयक ने कहा कि आप हिंदी में बोल सकते हैं, अर्णब हिंदी भी अच्छी जानते हैं आपको पता है। मुझे कहना पड़ा कि उनकी हिंदी से मेरी अंगरेज़ी बेहतर है। फिर क्यों नहीं जाता? आज इसकी वजह बताता हूँ। दरअसल, मुझे लगता है अर्णब ने सम्वाद को, सम्वाद में मानवीय गरिमा, शिष्टता और पारस्परिक सम्मान को चौपट करने में भारी योगदान किया है।

हम बोलने के अधिकार की बहुत बात करते हैं, पर उसका वध देखना हो तो ‘न्यूज़ आवर’ शायद सर्वश्रेष्ठ जगह होगी। मैं अर्णब के आग्रहों-दुराग्रहों की बात नहीं करता (किस पत्रकार के नहीं होते?), लेकिन एक शोर पैदा करने की हवस में वे किसी ‘मेहमान’ को चुन कर थानेदार की तरह हड़काएँगे, किसी को बोलने न देंगे, बाक़ी को कहेंगे कि जब चाहें बिना बारी बहस में कूदते रहें। कोई भी समझ सकता है कि इससे एक हंगामे का दृश्य तैयार होता है, जो स्वाभाविक ही भीड़ को खींचता है (भगवतीचरण वर्मा की कहानी ‘दो बाँके’ याद नहीं आपको?)। माना कि यह व्यापार है, पर व्यापार और चैनल भी करते हैं। देखना चाहिए कि किसकी मर्यादा कहाँ है।

इसके अलावा मेरा स्पष्ट सोचना यह है कि सांप्रदायिकता, छद्म राष्ट्रवाद, कश्मीर और पाकिस्तान आदि अत्यंत नाज़ुक मसलों पर निहायत ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैया आग भले न लगाए (जिसकी लपटें परदे पर अर्णब को बहुत प्रिय हैं), लोगों में दुविधा, द्वेष, अलगाव, रंजिश और घृणा ज़रूर पैदा कर सकता है। क्या इसे हम सार्थक पत्रकारिता कहेंगे?

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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बरखा दत्‍त ने अरनब गोस्‍वामी के लिए कहा- ”क्‍या यह आदमी पत्रकार है? शर्मिंदा हूं”

एनडीटीवी 24×7 की सलाहकार संपादक बरखा दत्‍त ने टाइम्‍स नाऊ के प्रमुख संपादक अरनब गोस्‍वामी के लिए एक ट्वीट में लिखा, ‘‘टाइम्‍स नाऊ मीडिया के दमन की बात करता है, वो जर्नलिस्‍ट्स पर मामला चलाने और उन्‍हें सजा दिलाने की बात करता है, क्‍या यह शख्‍स जर्नलिस्‍ट है? उस शख्‍स की तरह ही इस इंडस्‍ट्री का हिस्‍सा होने के लिए शर्मिंदा हूं.’’

बरखा दत्‍त ने सीधे अरनब का नाम तो नहीं लिया लेकिन निशाना अरनब ही थे. अरनब गोस्‍वामी ने एक दिन पहले अपने शो ‘न्‍यूज ऑवर’ में pro pak doves silent विषय पर चर्चा की. इसमें बीजेपी प्रवक्‍ता संबित पात्रा, आर्मी रिटायर्ड अफसर जनरल जीडी बक्‍शी, मेजर गौरव आर्या, कश्‍मीर के नेशनल पैंथर्स पार्टी के अध्‍यक्ष भीम सिंह, सुप्रीम कोर्ट की वकील मिहिरा सूद, पॉलिटिकल एक्‍ट‍िविस्‍ट जॉन दयाल मौजूद थे. मेजर गौरव आर्या वही शख्‍स हैं, जिनका कश्‍मीरियों को लिखा ओपन लेटर हाल ही में वायरल हुआ था. चर्चा के दौरान जीडी बक्‍शी ने मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर क्‍यों कुछ बड़े अखबारों ने बुरहान वानी की लाश की फोटो छापी? ऐसा करना क्‍यों जरूरी था? जीडी बक्‍शी ने कहा, ‘यह इन्‍फॉर्मेशन वॉरफेयर (सूचना के जरिए जंग) का युग है। हम मीडिया के हमले का शिकार हो रहे हैं।’

बक्‍शी ने कहा कि कुछ मीडिया वाले कश्‍मीरी लोगों को अलगाव के लिए भड़का रहे हैं। इस दौरान अरनब ने कहा कि वे इससे पूरी तरह सहमत हैं। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए अरनब गोस्‍वामी कहते हैं, ”जब लोग खुलेआम भारत का विरोध और पाकिस्‍तान व आतंकवादियों के लिए समर्थन जाहिर करते हैं तो ऐसे लोगों के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए?” अरनब ने कहा कि वे ऐसे लोगों को स्‍यूडो लिबरल्‍स (छद्म उदारवादी) कहते हैं। चर्चा के दौरान अरनब गोस्‍वामी ने कहा कि ऐसे लोगों का ट्रायल होना चाहिए। चर्चा के दौरान अरनब गोस्‍वामी ने एक जगह कहा यह भी कहा कि मीडिया में कुछ खास लोग बुरहान वाणी के लिए हमदर्दी दिखाते हैं। यह वही ग्रुप है जो अफजल गुरु के लिए काम करता है और उसकी फांसी को साजिश बताता है। अरनब ने कहा कि मीडिया में छिपे ऐसे लोगों पर बात होनी चाहिए।

चर्चा के दौरान बीजेपी प्रवक्‍ता संबित पात्रा ने बरखा दत्‍त पर निशाना साधा। उन्‍होंने कहा कि मुझे पता है कि हाफिज सईद यहां  कुछ लोगों को पसंद करता है और उसका वीडियो भी आजकल चर्चाओं में है। संबित का इशारा बरखा दत्‍त की ओर ही था। इंटरनेट पर वायरल हो रहे इस वीडियो में हाफिज सईद बरखा दत्‍त की तारीफ करते नजर आता है। सबसे आखिर में देखें वीडियो

बरखा ने किया यह ट्वीट..

Times Now calls for gagging of media & for journalists to be tried &punished. This man is journalist?Ashamed to be from same industry as him.
— barkha dutt (@BDUTT) July 27, 2016

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मोदी के इंटरव्यू में अर्णब गोस्वामी खुद एक्सपोज हो गए, सोशल मीडिया पर हो रही थू थू

Mukesh Kumar : बहुत बेरहम मीडियम है टीवी। आप कभी किसी को एक्सपोज़ कर रहे होते हैं तो कभी खुद भी एक्सपोज़ हो रहे होते हैं। राहुल गाँधी को आपने एक्सपोज़ किया मगर मोदी को इंटरव्यू करते हुए खुद देश के सामने। प्रधानमंत्री का पहला इंटरव्यू लेते समय न्यूज़ ऑवर के आक्रामक, दूसरों की बोलती बंद कर देने वाले या दूसरों को बोलने ही न देने वाले, बड़बोले, तर्कों और रिसर्च से लैस अर्नब गोस्वामी को क्या हो गया था? वे इतने नरम क्यों थे, बार-बार नवनीत लेपन क्यों कर रहे थे? क्या उन्होंने ये इंटरव्यू कुछ शर्तों के साथ किया? क्या प्रश्न पहले से तय थे? क्या ये पीआर एक्सरसाइज थी? और हाँ, इतना बड़ा चैनल प्रधानमंत्री का इंटरव्यू करे और तकनीकी स्तर पर इतनी बड़ी चूक करे अच्छा नहीं लगता। ऑडियो बहुत खराब था भाई।

Priyabhanshu Ranjan : एक इंटरव्यू अर्णब ने किया, जिसे पूरी भगवा ब्रिगेड सोशल मीडिया पर शेयर करते नहीं थक रही। एक इंटरव्यू करण थापर ने किया था, जिसमें मोदी को पहले पीना पड़ा था और फिर बीच में ही भागना पड़ा था। इसी इंटरव्यू के बाद मोदी दमखम वाले पत्रकारों के सामने आने से कतराते हैं। बहरहाल, असल इंटरव्यू तो करण थापर वाला ही माना जाएगा। अर्णब तो अपने स्वामी की सेवा कर रहे थे!

Mithilesh Priyadarshy : इंटरव्यू के दौरान अर्णब गोस्वामी सर्कस के ठीक उस शेर की तरह नज़र आया, जो यूं तो पिंजड़े से दहाड़कर, पंजे मारकर, गुर्राकर दर्शकों को लगातार डराता रहता है, पर जैसे ही रिंग मास्टर की इंट्री होती है, वह किसी पालतू कुत्ते की तरह चुप मारकर देह और दुम हिलाकर प्यार जताने लगता है.

Vimal Kumar : टीवी पर शेर की तरह दहड़नेवाले पत्रकार आज खामोश थे। महंगाई के मुद्दे पर साहब का काउंटर ही नहीं किया। आज वे गोले की तरह दाग नहीं रहे थे सवाल। जबाव भी चतुराई से दिए जा रहे थे यह थी निष्पक्ष पत्रकारिता।

Shikha : मोदी से कोई कहे कि औकात है तो राणा अयूब जैसी पत्रकार को इंटरव्यू देकर दिखाएl चमचों के साथ “कौन बनेगा करोड़पति” खेलकर काहे भौकाल काट रहा है? नेशन वांट्स टू नो

Panini Anand : Nation wants to know: why did Arnab lose his voice in front of Modi? The question is, what was Arnab Goswami doing? The same anchor, who can even grill tables, chairs and walls if he is alone in the studio, failed to pose any tough questions to the prime minister. The entire interview seemed to be a PR exercise, a promotional video of Modi Sarkar.

Neeti Vashisht : मोदी जी का इंटरव्यू ‘अर्णब गोस्वामी’ की जगह ‘रवीश कुमार’ या ‘करण थापर’ ले तो मोदी जी की हालत बिहार टॉपर “रुबी रॉय” जैसी ही होगी

Nadim S. Akhter : अभी-अभी मेरी एक सहेली बता रही थी कि टाइम्स नाऊ पर अर्नब गोस्वामी और नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू देखते वक्त उन्हें ये गाना याद आ रहा था—सुहाग रात है, घूंघट उठा रहा हूं मैं.. 🙂

Mayank Saxena : वीर अर्णब सवाल करते हैं… आप पहले पीएम हैं, जिनकी विदेश नीति में इतनी रुचि है…आप ने बड़ा संतुलन साधा है…आप ये कैसे कर लेते हैं… आपको ये चारण का गान लगता है या सवाल लगता है?

Ajay Setia : पता है न, सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कई बार अर्णब गोस्वामी को डांट दिया था। फिर स्वामी ने टाइम्स नाऊ पर आने से इंकार कर दिया। तब से अर्णब गोस्वामी ने स्वामी के खिलाफ अभियान शुरू किया हुया है। स्वामी का अरुण जेटली से 36 का आंकड़ा तो सब को पता ही है। रिजर्व बेंक के गवर्नर रघुराम राजन के खिलाफ स्वामी का अभियान असल में जेटली के खिलाफ ही था। स्वामी के बयानों का निशाना अक्सर जेटली ही होते हैं। इसका फायदा अर्णब ने उठाया। पहले जेटली से स्वामी के खिलाफ बयानबाजी शुरू करवाई। और, आज रिजर्व बेंक के गवर्नर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी से भी स्वामी के बारे में पूछा। मोदी का स्वामी के खिलाफ दिया गया बयान स्पष्ट करता है की मोदी का जेटली पर पूरा विश्वास बना हुया है।

सौजन्य : फेसबुक

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मोदी का टाइम्स नाऊ पर इंटरव्यू : अर्नब एक स्टूडेंट की तरह Yes Sir-Yes Sir करते जा रहे थे

Nadim S. Akhter : किसी भी समाचार संस्थान और पत्रकार की प्रतिष्ठा बनने व जनता में उसका विश्वास जमने में काफी लम्बा वक्त लगता है. ये चीजें आते-आते आती हैं. लेकिन प्रतिष्ठा गंवाने और विश्वास खोने में मिनट भी नहीं लगते. कल Times Group के चैनल Times Now पर अर्नब गोस्वानी द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी का लिया गया इंटरव्यू Modern Television Era में एक केस स्टडी साबित होने वाला है. आरोपों के अनुसार, अगर यह प्रायोजित इंटरव्यू था भी तो भी अर्नब गोस्वामी एक सुलझे हुए पत्रकार की तरह कम से कम बिहेव तो कर सकते थे !!! वो तो मोदी जी से ऐसे बात कर रहे थे कि जैसे मोदी जी उनकी क्लास ले रहे हों और अर्नब एक स्टूडेंट की तरह Yes Sir-Yes Sir करते जा रहे थे.

Times Group में मैंने काम किया है, बहुत से हालात देखे हैं, अटल बिहारी वाजपेयी का केंद्र की सत्ता से जाना और सोनिया गांधी का अप्रत्याशित रूप से केंद्र की राजनीति में मजबूती से उभरना. इन परिस्थितियों में खबरों और सम्पादकीय नीति के बदलते तेवरों को भी महसूस किया है. लेकिन कल Times Now पर अर्नब ने जो किया, वो चैनल की साख के साथ-साथ खुद उनकी साख भी उड़ा ले गया. एक निष्पक्ष और जनता के प्रतिनिधि के रूप में बात करने वाले और The nation wants to know की रट लगाने वाले अर्नब की मूर्ति विखंडित हो गई. ये बहुत बड़ा झटका है, Times Now चैनल के लिए भी और अर्नब के लिए भी.

जिस तरह नीरा राडिया कांड के बाद एनडीटीवी वाली बरखा दत्त ने अपनी साख गंवाई थी और उन्हें बाहर का रास्ता ना दिखाकर चैनल भी सवालों के घेरे में आया था, उसी तरह पीएम मोदी के ताजातरीन इंटरव्यू ने टाइम्स नाऊ और अर्नब, दोनों की प्रतिष्ठा धूल-धूसरित की है. पर अपनी जानकारी के अनुसार एक बात मैं जानता हूं. टाइम्स ग्रुप के मालिक जैन बंधु इस मामले में बहुत सचेत रहते हैं क्योंकि जब ब्रैंड ही नहीं बचेगा तो बिजनेस कहां से आएगा?

ये सभी जानते हैं कि टाइम्स ग्रुप में एडिटोरियल पर ब्रांड-रिस्पॉन्स यानी मार्केटिंग कितना हावी रहता है. हां, अपवाद स्वरूप अब तक अर्नब को चैनल में काफी स्वतंत्रता मिली हुई है पर पीएम के इंटरव्यू की उनकी mishandling ने मैनेजमेंट के माथे पर चिंता की लकीरें जरूर खींची होगी. एक और बात, जैन बंधु एक सीमा तक ही किसी को बर्दाश्त करते हैं.

सो अगर एक खास पार्टी के प्रति अर्नब की एडिटोरियल पॉलिसी में मैनेजमेंट का दखल नहीं है, तो ये मिस्टर अर्नब गोस्वामी को महंगा पड़ सकता है. उनकी चैनल से विदाई तक हो सकती है क्योंकि टाइम्स ग्रुप हमेशा से ये मानता आया है कि सम्पादक नहीं, मैनेजमेंट उनका -प्रॉडक्ट- चलाता है. अगर अर्नब के इस पत्रकारीय कौशल में मैनेजमेंट की सहमति है या थी तो बहुत कुछ होने वाला है. पर एक अंदाजा लगा सकता हूं. जल्द ही आपको Times Now पर Damage Control Exercise देखने को मिल सकता है. पर साख तो साख ही है. अगर गई तो समझिए कि भैंस पानी में ही रहेगी.

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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खुद अपने बारे में भी झूठी खबर देते हैं अरनब गोस्‍वामी! देखिए, प्रसार भारती ने कैसे दिखाया आइना

जेएनयू प्रकरण में इंडिया न्यूज, इंडिया टीवी और जी न्‍यूज के साथ मि‍लकर पूरे देश के माहौल बि‍गाड़ने के दोषी अरनब गोस्‍वामी खुद अपने चैनल के बारे में सबको झूठ ही बताते रहे हैं। प्रसार भारती ने एक ट्वीट करके मामले का खुलासा कि‍या है। प्रसार भारती के ट्वीट के मुताबि‍क अरनब का 97 फीसद व्‍यूवरशि‍प का दावा पूरी तरह से खोखला है। असल में अंग्रेजी में देखे जाने वाले चैनलों में उनका कुल हि‍स्‍सा सिर्फ 37 फीसद है। टाइम्‍स नाऊ की जगह देश में डीडी न्‍यूज सबसे ज्‍यादा देखा जाता है जो कि कुल व्‍यूवरशि‍प का 62 फीसद है।

प्रसार भारती ने अपने ट्वीट में ये भी खुलासा कि‍या है कि नेशन वांट टु नो के नाम पर अरनब गोस्‍वामी ने कि‍स तरह से लोगों को बेवकूफ बनाया। प्राइम टाइम के वक्‍त जि‍न 37 प्रतिशत लोगों ने अरनब का शो देखा, उनका प्रति‍शत डीडी न्‍यूज को छोड़कर बाकी चैनलों के टोटल करने पर 97 फीसद नि‍कलकर आता है। बाकी के तीन फीसद में एक प्रति‍शत सीएनएन आइबीएन देखते हैं जबकि इंडि‍या टुडे, एनडीटीवी और न्‍यूज एक्‍स को शून्‍य फीसद लोग प्राइम टाइम के वक्‍त देखते हैं। अरनब का 97 प्रति‍शत इसी 37 और 1 को जोड़कर नि‍काला है।

पनामा पेपर्स का प भी न समझ पाने वाले अरनब हों या जेएनयू प्रकरण में डॉक्‍टर्ड वीडि‍यो चलाने वाले दीपक चौरसि‍या या सुधीर चौधरी, ये सभी पत्रकारि‍ता को लगातार शर्मसार करते चले आ रहे हैं। साथ में भारत माता की जै बोलकर ये बार बार अपनी शर्म को ति‍रंगे से ढंकने की कोशि‍श तो करते हैं लेकिन ये देखना भूल जाते हैं कि पीत पत्रकारि‍ता करके इनने खुद ही उस झंडे में इतने छेद कर रखे हैं कि इनकी पीत पत्रकारिता उससे छुप नहीं पा रही है… जनता सब देख रही है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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वेद प्रताप वैदिक बोले- अरनब गोस्वामी बहुत नीच आदमी है (देखें वीडियो)

वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं. काफी सुलझे हुए पत्रकार माने जाते हैं. भाषा और विचार के स्तर पर संतुलित माने जाते हैं. लेकिन अरनब गोस्वामी को लेकर उनका गुस्सा ऐसा फूटा कि उन्होंने अरनब गोस्वामी को ना जाने क्या क्या कह दिया, वह भी पूरी मीडिया के सामने. उपर दिए गए तस्वीर पर क्लिक करिए और वीडियो देखिए.

टाइम्स नाऊ के एडिटर इन चीफ अरनब गोस्वामी के खिलाफ सार्वजनिक रूप से किसी वरिष्ठ पत्रकार ने इतना गुस्सा पहली बार जाहिर किया है. इस वीडियो को लेकर लोगों में तरह तरह की चर्चाएं हैं :  https://www.youtube.com/watch?v=mUrI5Fp-YyM

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इस साल के सबसे ताकतवर लोगों की TOP 100 की लिस्ट में पत्रकार रवीश कुमार और अरनब गोस्वामी भी शामिल

नई दिल्ली : साल 2016 के 100 सबसे ताकतवर भारतीयों की लिस्ट जारी करते हुए इंडियन एक्सप्रेस ने जो सूची जारी की है उसमें पत्रकार रवीश कुमार का भी नाम शामिल है. सूची में राजनीति, खेल, सिनेमा, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर से इस सूची में टॉप पर हैं. इस लिस्ट में पत्रकारों को भी शामिल किया गया है जिसमें रवीश कुमार और अरनब गोस्वामी का नाम भी मौजूद है.

लिस्ट में मौजूद अन्य नेताओं में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल के नाम भी ऊपर हैं. खेल जगत से जुड़े विराट कोहली और सानिया मिर्जा भी इस सूची में जगह बनाने में सफल रही हैं.  आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत दूसरे पायदान पर हैं. टीवी एंकर अरनब गोस्वामी और रवीश कुमार भी सबसे ताकतवर भारतीयों की सूची में शामिल हैं. इंडियन एक्सप्रेस की ”100 मोस्ट पावरफुल इंडियंस 2016” की इस सूची में एक भी कवि, लेखक, पेंटर या कला जगत से जुड़ा नाम नहीं है. लिस्ट में प्रतिबंधित संगठन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) के महासचिव एम लक्ष्मण राव उर्फ गणपति, बीजेपी के महासचिव राम माधव, पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती, आरएसएस के संयुक्त महासचिव कृष्ण गोपाल, बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी और जी टीवी के मालिक सुभाष चंद्रा प्रमुख हैं. करीब 50 राजनेता, 19 उद्योगपति, आधे दर्जन से अधिक ब्यूरोक्रेट, छह खिलाड़ी, छह मीडियापर्सन इंडियन एक्सप्रेस की लिस्ट में शामिल हैं.

लिस्ट में उद्योगपतियों में सबसे ऊपर मुकेश अंबानी हैं. उनके बाद टाटा ग्रुप के चेयरमैन सायरस पी मिस्त्री हैं. गौतम अडानी भी इस सूची में शामिल हैं. भारतीय सेना अध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह 61वें नंबर पर हैं. न्यायपालिका से जुड़े लोगों में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जेएस केहर, सीनियर एडवोकेट फाली एस नरीमन और सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण लिस्ट में शामिल हैं. खिलाड़ियों में सबसे ऊपर विराट कोहली, साइना नेहवाल, सानिया मिर्जा और महेंद्र सिंह धोनी हैं. बॉलीवुड सेलेब्रिटीज में आमिर खान सबसे ऊपर हैं. सूची में करण जौहर, सलमान खान, दीपिका पादुकोण, शाहरुख खान और प्रियंका शामिल हैं. लिस्ट में केवल 16 महिलाओं को जगह मिली है. मोदी मंत्रिमंडल के 11 सदस्य इस लिस्ट में शामिल हैं. केंद्रीय मंत्रियों के अलावा उनके करीबी माने जाने वाले कई ब्यूरोक्रेट और कारोबारियों को भी सूची में शामिल किया गया है.

पढ़िए, नंबर एक पर मौजूद नरेंद्र मोदी के बारे में क्या लिखा गया है :

Rank 1: Narendra Modi, 65, Prime Minister of India

Rank in 2015: 1

Why: Because despite the storm around him — the intolerance debate, the defeat in Bihar, the Rohith Vemula suicide, the JNU crisis — he remains the unchallenged No 1. Under Modi, the PMO has become the epicentre of all important, and some not-so-important, decisions, with the ministries often being bypassed. A floundering economy and the continuing debate over the government’s Hindutva agenda have put a question mark over his leadership style, with the man, who is often criticised for speaking too much, maintaining a stoic silence over key issues. But so far, his opponents have been unable to find an answer to Modi’s popularity.

Power Punch: The surprising decision to fly in to meet Pakistan Prime Minister Nawaz Sharif for lunch on his way back from Afghanistan.

What Next: The coming Budget and the elections will be a test of his politics and his economics.

By the way: Modi likes his bhakhri and khichdi even at 7, RCR.

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टाइम्स नाऊ का लायसेंस रद्द कर अरनब गोस्वामी को जेल भेज देना चाहिए

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार का फर्जी वीडियो दिखाने में आगे रहने वाले न्यूज चैनल टाइम्स नाऊ और इसके संपादक अरनब गोस्वामी को लेकर वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने फेसबुक पर एक संक्षिप्त पोस्ट लिखी है, जो इस प्रकार है :

Mukesh Kumar : सबसे पहले तो इसी ‘टाइम्स नाऊ’ चैनल का लायसेंस रद्द होना चाहिए और उसके बड़बोले संपादक-एंकर अरनब गोस्वामी की गिरफ्तारी, जो बात-बात पर घोषणा करता रहता है कि सबसे पहले उसके चैनल ने दिखाया, खबर ब्रेक की वगैरा वगैरा। अंधराष्ट्रवाद की ज़हरीली तरंगे फैलाने में इस चैनल ने सभी हदें लाँघ दी हैं। इसे इसका दंड मिलना ही चाहिए। कानून अपना काम कब करेगा?

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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