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बिग बॉस जैसे शो फ्रस्ट्रेशन में रह रहे लोगों को टीवी पर अवसाद निकालने का मौका देते हैं!

नदीम अख्तर-

स देश में बिग बॉस जैसे टीवी शो का प्रसारण बंद होना चाहिए। ये समाज में पहले से ही मौजूद विषाक्त माहौल को और खराब करता है। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव ये है कि ऐसे शो युवा पीढ़ी में गाली गलौज और चीखने चिल्लाने को नॉर्मल बना देते हैं। सबको लगता है कि ये सबकुछ करना एकदम सामान्य है। बहुत ही सामान्य।

टीवी में सार्वजनिक प्रसारण के लिए code of conduct होते हैं लेकिन अमूमन वह बड़ी कंपनियों द्वारा प्रोड्यूस और विदेशी नकल पर आधारित ऐसे शो पर लागू नहीं होते। #बिगबॉस जैसे शो मानसिक हिंसा को बढ़ावा देते हैं और मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि जो लोग भी इस शो को देखते हैं, कहीं ना कहीं उनकी मानसिक स्थिति को डॉक्टर की मदद की ज़रूरत है। एक नॉर्मल इंसान ये सब बैठकर चाव से कभी नहीं देखेगा। वैसे भी इस देश में mental health को लेकर जागरूकता बहुत कम है। लोगों को लगता है कि उन्हें कुछ नहीं हुआ है लेकिन अंदर गहरे वह दिमागी रूप से बीमार होते हैं। अभी विदेश में अर्नेस्ट एंड यंग में काम करने वाली लड़की ने आत्महत्या कर ली। कहा गया कि कंपनी उस पे काम का ज्यादा दबाव बना रही थी।

अरे भाई! लड़की चार्टर्ड अकाउंटेंट थी, कहीं भी नई नौकरी मिल सकती थी, आत्महत्या की क्या जरूरत थी? कहने का मतलब है कि उसे और उसके घर वालों को कभी पता ही नहीं चला कि वह धीरे धीरे एक गहरे अवसाद में जा रही है। बिग बॉस जैसे शो फ्रस्ट्रेशन में रह रहे लोगों को अपना अवसाद टीवी पर निकालने का मौका देता हैं। उन्हें दूसरों की जिंदगियों में झांकना और चीखना चिल्लाना मज़ा देता है।

टीवी पर एक शो अमीर खान भी करते थे, जिसमें वह किसी एक सामाजिक मुद्दे पर लोगों से बातचीत करते थे और जनता को जागरूक करते थे। भारत जैसे गरीब, विकासशील और मीडिया लिटरेसी के घोर अभाव वाले देश में ऐसे ही टीवी शो की ज़रूरत है, बिग बॉस जैसे घटिया और वाहियात शो की नहीं। मुझे तो अचरज होता है कि being human का झंडा बुलंद करने वाले सलमान खान ऐसे शो को कैसे होस्ट करते हैं और एपिसोड दर एपिसोड वह पार्टिसिपेंट्स के झगड़ों की फर्जी पंचायती क्यों और कैसे कर लेते हैं? पैसा ही सबकुछ नहीं होता। कुछ आपके सामाजिक दायित्व भी होते हैं।आज जब फेसबुक और सोशल मीडिया पर ही देखता हूं कि लोग चंद रुपयों के लिए पाला बदल रहे हैं, उनकी लेखनी बदल गई है, मिजाज़ बदल गया है तो यही कहता हूं – इंसान, इंसान को क्या देगा? जो देगा, वह सिर्फ और सिर्फ परवरदिगार देगा।

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