बीजेपी फिर दलबदलुओं की शरण स्थली बनी

सपा-बसपा के कई दलित और पिछड़े नेता भगवा रंग में रंगे

अजय कुमार, लखनऊ

भारतीय जनता पार्टी दलितों के मुद्दे पर चौतरफा घिरी हुई है,दलित आरक्षण और कोर्ट द्वारा एससी/एसटी बदलाव के आदेश के बाद बीजेपी के खिलाफ माहौल गरम है लेकिन संभवता बीजेपी इससे कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. दलितों के नाम पर बीजेपी की जो किरकिरी हो रही है, उसके लिये बीजेपी के वह दलबदलू नेता अधिक जिम्मेदार हैं जो 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व अन्य दलों से बीजेपी में आये थे और जिसमेें से कई ने मोदी लहर में लोकसभा और फिर विधान सभा चुनाव जीत कर अपनी सियासत भी खूब चमकाई थी, मगर जब इनको लगा कि सपा-बसपा गठबंधन के बाद सूबे का सियासी माहौल बदल रहा है और भाजपा को नुकसान हो सकता है तो यह बीजेपी को ही आंखे दिखाने लगे.

ऐसे में उम्मीद यह की जा रही थी कि बीजेपी अब अतीत से सबक लेकर दलबदलुओं के लिये शरण स्थली नहीं बनना चाहेगी,परंतु तमाम किन्तु-परंतुओं को पीछे छोड़कर पार्टी आलाकमान ने विपक्षी किले पर निशाना साधना शुरू कर दिया है. 2014 जैसी फिजा बनाने के लिये भाजपा ने दूसरे दलों के प्रमुख दलित और पिछड़े नेताओं को पार्टी में शामिल कराने के लिए अभियान शुरू करते हुए सपा व बसपा के एक-एक पूर्व सांसद, एक पूर्व विधायक, एक पूर्व एमएलसी, कई पूर्व प्रत्याशी और नगर पालिका परिषदों के चेयरमैन समेत 28 नेताओं और उनके समर्थकों को बीजेपी की सदस्या दिलाकर गले लगा लिया है.




उक्त नेताओं ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की तो एक बार फिर से यह चर्चा चल पड़ी कि क्या बीजेपी अभी भी सबक लेने को तैयार नहीं है. सपा-बसपा छोड़कर जो नेता बीजेपी में आये हैं उसमें पूर्व बसपा सांसद अशोक रावत, सपा के पूर्व सांसद जयप्रकाश रावत, डुमरियागंज के पूर्व विधायक प्रेम प्रकाश उर्फ जिप्पी तिवारी, पूर्व एमएलसी हीरा ठाकुर, कुशीनगर के तमकुहीराज विधानसभा क्षेत्र से पूर्व बसपा प्रत्याशी विजय राय, उन्नाव में पूर्व बसपा प्रत्याशी पंकज त्रिपाठी सहित 28 नेता शामिल थे.

बीजेपी पूर्व सांसद जयप्रकाश रावत, अशोक रावत तथा पूर्व एमएलसी हीरा ठाकुर जैसे नेताओं के जरिये दलित और पिछड़ा समीकरण मजबूत करने की पहल की है। इन नेताओं के बैकग्राउंड की बात की जाये तो 1991 और 1996 में दो बार हरदोई में भाजपा से सांसद रहे जयप्रकाश रावत 1998 में चुनाव हारने के बाद लोकतांत्रिक कांग्रेस से 1999 में चुनाव लड़े और फिर जीत गये थे। 2004 में जयप्रकाश सपा में शामिल हो गये और लखनऊ की मोहनलाल गंज से लड़े और जीते लेकिन, 2009 में चुनाव हार गए। 2014 में वह फिर सपा से मिश्रिख क्षेत्र से चुनाव लड़े और हार गये।

अशोक रावत 2004 और 2009 में मिश्रिख से बसपा के टिकट पर चुनाव जीते, लेकिन 2014 में हार गये। खास बात यह कि मिश्रिख की भाजपा सांसद अंजू बाला 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी रहे जयप्रकाश और अशोक दोनों को भाजपा की सदस्यता दिलाने के मौके पर मौजूद रहीं थीं,जबकि दो बार एमएलसी रहे हीरा ठाकुर बसपा और सपा में सक्रिय रहने के बाद भाजपा में शामिल हुए. ठाकुर नाई समाज के प्रमुख नेताओं में हैं।

दरअसल, बीजेपी आलाकमान को लगता है कि आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट पर भाजपा के दलित सांसदों के विद्रोही तेवर से उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो उबाल आया है वह अप्रत्याशित जरूर है लेकिन इससे इन अवसरवादी नेताओं की विद्रोह से बीजेपी को चुनाव में कोई नुकसान नहीं होगा, ज्यादातर विद्रोही दूसरे दलों से भाजपा में आये थे.

गौरतलब हो, भाजपा ने वर्ष 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले दूसरे दलों के कुछ प्रभावी नेताओं को न केवल पार्टी में शामिल कराया बल्कि उन्हें टिकट भी दिया थाख् परिवर्तन की आंधी में ये संसद में पहुंच गए. पर, इनकी निजी आकांक्षाएं पूरी नहीं हुई। इसके अनेक उदाहरण हैं। चार वर्षो की चुप्पी के बाद ऐसे नेताओं ने जब अपने सुर बदले तो भाजपा को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले नेता और कार्यकर्ता अनायास ही कहने लगे कि यह तो होना ही था.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखने वाले बिजनौर जिले के नगीना के भाजपा सांसद डॉ. यशवंत सिंह को ही लें. पहले रालोद और फिर बसपा से विधायक होने के बाद यशवंत 2014 से पहले भाजपा में शामिल हुए और सांसद बनने के चार वर्ष तक निष्ठावान रहे. अब अचानक विद्रोही सुर अपना लिए हैं. यह उनकी नई पारी का संकेत है.

राबर्ट्सगंज के सांसद छोटेलाल खरवार को भाजपा ने अनुसूचित जनजाति मोर्चे का प्रदेश अध्यक्ष तक बनाया लेकिन, सपा से भाजपा में शामिल हुए खरवार भी नया रास्ता तलाश रहे हैं. मायावती सरकार में मंत्री रहे इटावा के भाजपा सांसद अशोक दोहरे के खिलाफ तो वहां के भाजपा कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है। दलितों के लिए आंदोलन और रैली करने वाली बहराइच की सांसद सावित्री बाई फुले एक दशक से ज्यादा समय से भाजपा में हैं लेकिन, वह भी बामसेफ और बसपा पृष्ठभूमि की हैं। ऐसे और भी कुछ दलित सांसद हैं जो विरोध का मन बना रहे हैं।

उधर, दिल्ली में उत्तर प्रदेश निवासी सांसद उदितराज ने भी दलित हितों पर अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की है। उदितराज ने तो अपनी इंडियन जस्टिस पार्टी खत्म कर 2014 से पहले भाजपा की सदस्यता ली और पहली बार सांसद बने लेकिन, अब वह भी दलित हितों का राग अलाप रहे हैं। सोनभद्र के दुंद्धी विधान सभा क्षेत्र से अपना दल के विधायक हरिराम चेरो ने तो सीएम योगी की काबलियत पर ही सवाल खड़ा कर दिया है.चेरो को लगता है कि योगी के चलते वह अगला विधान सभा चुनाव तक हार सकते हैं. इधर भाजपा ने भी इनकी पोल खोलने के लिए अभियान चला दिया है। पहले भाजपा महामंत्री व पूर्व सांसद विद्यासागर सोनकर फिर मोहनलालगंज के सांसद व भाजपा अनुसूचित मोर्चा के अध्यक्ष कौशल किशोर ने ऐसे सांसदों पर सवाल उठाया है।

भाजपा के कार्यकर्ता दावा करते हैं कि पल भर के लिए माहौल भले बन जाए लेकिन, दलबदलुओं से जनाधार मजबूत नहीं हो सकता है। कार्यकर्ता उदाहरण देते हैं कि विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़ी जाति के एक प्रमुख नेता को भाजपा में शामिल कराया गया। टिकट का अवसर आया तो खुद के साथ परिवार और रिश्तेदारों के लिए टिकट मांगे। मंत्री बने और अब उनके रिश्तेदार दूसरे दलों में जा रहे हैं। कार्यकर्ताओं का सवाल है कि जो व्यक्ति अपने रिश्तेदारों को भाजपा से जोड़ नहीं सकता वह पूरे समाज का ठेका क्या लेगा। बाहर से आये नेताओं की ऐसी अनगिनत कहानी लोगों की जुबान पर आ गई है।

इलाहाबाद के भाजपा सांसद श्यामाचरण गुप्त भी अब विद्रोही दलित सांसदों की राह पर चलते हुए वैश्य समाज के हितों का मुद्दा उठाकर सरकार की घेरेबंदी की है। कभी भाजपा से इलाहाबाद के महापौर रहे श्यामाचरण बाद में सपा में शामिल होकर बांदा के सांसद हुए। 2014 से पहले वह भाजपा में दोबारा आये थे। बताते हैं कि पिछले निकाय चुनाव में पुत्र और पत्नी के लिए टिकट चाह रहे श्यामाचरण अपनी इच्छा पूरी न होने के बाद से ही खफा चल रहे हैं।

लेखक अजय कुमार यूपी के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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