
बिमल कुमार यादव-
ख़बर है कि विधानसभा चुनावों में आरएसएस कैडर पूरी मुस्तैदी के साथ ज़मीन पर उतरा था। ऐसा तब होता है जब भाजपा के हाथ से मामला निकल चुका होता है। आरएसएस के कैडर्स आमतौर पर समाज में राजनीतिक व्यवहार नहीं करते लेकिन सामाजिक तौर पर इनके संबंध प्रगाढ़ होते हैं।

ये एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिसकी काट किसी ग़ैर भाजपा राजनीतिक दल के पास नहीं। भाजपा विरोधी राजनीतिक दलों को लगता है कि एक दिन कभी न कभी लोग भाजपा से ख़फ़ा हो कर उनकी झोली में गिर पड़ेंगे।
इस ग़लतफ़हमी ने इन्हें सामाजिक तौर पर निष्क्रिय कर डाला है। इन्हें लगता है कि अब परसेप्शन की राजनीति का दौर है तो बस स्क्रीन पर बने रहो, जब समय आएगा कृपा बरस जाएगी। स्क्रीन के नाम पर भी इनके पास मेनस्ट्रीम टीवी अख़बार जैसा कोई औज़ार हथियार नहीं जो जबरन हर घर में घुसपैठ कर मौज़ूद हो। बिखरा हुआ सोशल मीडिया है जो ख़ुद इसके मालिकों द्वारा भाजपा के हितों के लिए समर्पित है।
अपने अहंकार में ये न सामाजिक संगठनों के महत्व को समझते हैं न उनका कोई सम्मान करते हैं। इसके उलट यदि कोई सामाजिक संगठन स्वयं इनकी तरफ़ सहयोग का हाथ बढ़ाये तो उसका अपमान करने का कोई मौक़ा भी नहीं चूकते।
यही नहीं, ये आपसी संबंधों में भी इसी चरित्र के साथ उपस्थित होते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ कृत्रिम तौर पर गठबंधन तो बना लेती हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर एक दूसरे का अपमान करने, उन्हें नीचा और ख़ुद को ऊँचा दिखाने का कोई मौक़ा नहीं चूकतीं। कमलनाथ-अखिलेश-अजय राय प्रकरण इसका ताज़ा उदाहरण है।
इण्डिया गठबंधन को अपनी झोली फैलाये रखना चाहिये। जब पब्लिक भाजपा से ऊब जाएगी तो इनकी झोली में ख़ुद गिर पड़ेगी। तबतक वैसे ही चिल्ल करते रहना चाहिए, जैसे कर रहे हैं।
किसी समय कांग्रेस के और कम्यूनिस्टों के पीछे भी ऐसा ही समर्पित कैडर/कार्यकर्ता थे। धीरे-धीरे उनका पार्टी की कथनी और करनी में अंतर देखकर मोहभंग होता चला गया। सत्ता के लिए आदर्शवादी कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं को पूरा करना संभव ही नहीं है। भाजपा में यह प्रक्रिया बहुत प्रारंभिक अवस्था में है। इसके लिए मोदीजी जैसे को कम से कम एक कार्यकाल मिलना और जरूरी है। भाजपा का हारना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है इसके कार्यकलापों से पार्टी कार्यकर्ताओं का मोहभंग होना। -प्रेम प्रकाश गुप्ता


