डॉ देवेंद्र नाथ तिवारी-
आखिर ‘सीजफायर’ कैसे हुआ? ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अपनी एक रिपोर्ट में विस्तार से बताया है। 6-7 मई 2025 की दरमियानी रात, जब भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर सटीक हमले किए, दक्षिण एशिया एक बार फिर युद्ध की कगार पर खड़ा था। चार दिन तक चला यह सैन्य टकराव, जिसमें मिसाइलें, ड्रोन और वायुसेना अड्डों की तबाही शामिल थी, न केवल भारत-पाकिस्तान के बीच गहरे अविश्वास का प्रतीक बना, बल्कि वैश्विक शांति के लिए भी एक चेतावनी बनकर उभरा।
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी मध्यस्थता के बाद 10 मई को दोनों देश ‘सीजफायर’ पर सहमत हुए, लेकिन यह तनाव क्षेत्रीय सुरक्षा की जटिलताओं और परमाणु संकट की आशंका को सामने लाता है। क्या यह ‘सीजफायर’ केवल एक अस्थायी विराम है, या यह दक्षिण एशिया में स्थायी शांति की ओर कदम हो सकता है? यह सवाल हर उस व्यक्ति के मन में है जो इस क्षेत्र के भविष्य को लेकर चिंतित है।
भारत की सैन्य कार्रवाई का आधार साफ था। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के अनुसार, भारत ने पीओके में पांच और पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के बहावलपुर, मुरीदके, शकर गढ़ और सियालकोट के निकट चार आतंकी ठिकानों को नष्ट किया। भारत का दावा था कि ये ठिकाने आतंकी संगठनों के लिए संचालन और प्रशिक्षण केंद्र थे, जो भारत के खिलाफ साजिश रच रहे थे। यह कार्रवाई भारत की ‘आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस’ की नीति का हिस्सा थी, जिसे उसने बार-बार दोहराया है। लेकिन इस हमले ने पाकिस्तान को जवाबी कार्रवाई के लिए उकसाया, और स्थिति तेजी से अनियंत्रित होती चली गई।
पाकिस्तान ने भारत के हमलों का जवाब ड्रोन और मिसाइल हमलों से दिया, जिसमें पठानकोट और श्रीनगर के वायुसेना अड्डों सहित 26 ठिकानों को निशाना बनाया गया।
‘द गार्जियन’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने पाकिस्तान पर नागरिक ढांचों को निशाना बनाने का आरोप लगाया, जिसने इस संघर्ष को नैतिक और कूटनीतिक रूप से और जटिल बना दिया। जवाब में, भारत ने पाकिस्तान के 11 वायुसेना अड्डों को नष्ट कर दिया, जिसमें इस्लामाबाद के निकट रणनीतिक नूर खान बेस भी शामिल था। यह हमला इस टकराव का सबसे संवेदनशील पहलू बन गया, क्योंकि नूर खान बेस पाकिस्तान की परमाणु सुविधाओं के करीब है।
‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का मानना है कि इस हमले ने अमेरिका में चिंता की लहर पैदा कर दी, क्योंकि इससे परमाणु टकराव की आशंका बढ़ गई थी। विशेषज्ञ रॉल्फ मोवाट-लार्सन जैसे विश्लेषकों ने इसे ‘परमाणु संकट’ की संभावना से जोड़ा, जो पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार की सुरक्षा पर सवाल उठाता है।
इस संघर्ष में भारत की सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता स्पष्ट रूप से सामने आई। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की मिसाइलों ने पाकिस्तान के चीन निर्मित हवाई रक्षा सिस्टम्स, जैसे HQ-9 और LY-80, को पूरी तरह नाकाम कर दिया। यह न केवल पाकिस्तान की रक्षा प्रणाली की कमजोरी को उजागर करता है, बल्कि चीन की सैन्य विश्वसनीयता पर भी गहरा आघात था, जिसने इन सिस्टम्स को अभेद्य के रूप में प्रचारित किया था। भारत ने अपने प्रमुख लक्ष्य हासिल किए। आतंकी ठिकानों का विनाश, लगभग 100 आतंकियों का खात्मा, और पाकिस्तान के परमाणु दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना। यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत था, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
जैसे-जैसे यह टकराव बढ़ता गया, वैश्विक समुदाय, खासकर अमेरिका, ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 10 मई को अपने सोशल मीडिया मंच ट्रुथ सोशल पर घोषणा की कि 48 घंटे की गहन कूटनीतिक बातचीत के बाद भारत और पाकिस्तान ‘पूर्ण और तत्काल सीजफायर’ पर सहमत हो गए। इस मध्यस्थता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वैंस और विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भूमिका अहम थी। लेकिन भारत और पाकिस्तान के इस ‘सीजफायर’ को देखने के नजरिए में अंतर साफ दिखा।
भारत ने इसे ‘सैन्य गतिविधियों का निलंबन’ करार दिया, जिससे उसने अपनी रणनीतिक स्थिति को कमजोर नहीं होने का संदेश दिया। वहीं, पाकिस्तान ने इसे ‘अमेरिकी मध्यस्थता से हुआ सीजफायर’ बताया, ताकि वह अपनी जनता के सामने कूटनीतिक जीत का दावा कर सके। यह अंतर दोनों देशों के बीच प्रचार युद्ध और गहरे अविश्वास को जाहिर करता है।
इस संघर्ष के दीर्घकालिक प्रभाव चिंताजनक हैं। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का अनुमान है कि आने वाले दिनों में सैटेलाइट तस्वीरें पाकिस्तान के वायुसेना अड्डों में हुई तबाही को उजागर करेंगी, जिससे उसकी रक्षा प्रणाली की कमजोरियाँ वैश्विक मंच पर सामने आएंगी। यह पाकिस्तान की सैन्य विश्वसनीयता को और कमजोर कर सकता है। साथ ही, इस टकराव ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यदि उसकी रक्षा प्रणाली इतनी आसानी से भेदी जा सकती है, तो परमाणु शस्त्रागार की सुरक्षा भी संदिग्ध है।
यह वैश्विक समुदाय के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि परमाणु हथियारों का गलत हाथों में जाना एक वैश्विक तबाही को जन्म दे सकता है। इसके अलावा, यह तनाव भारत-पाकिस्तान संबंधों में पहले से मौजूद अविश्वास को और गहरा करता है। कश्मीर, आतंकवाद और क्षेत्रीय प्रभुत्व जैसे मुद्दे दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बने रहेंगे। चीन की भूमिका, जो पाकिस्तान का प्रमुख सैन्य और आर्थिक साझेदार है, इस क्षेत्र में और जटिलताएँ पैदा कर सकती है।
यह ‘सीजफायर’ भले ही तात्कालिक राहत लेकर आया हो, लेकिन यह दक्षिण एशिया में शांति की गारंटी नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच गहरे मतभेद, परमाणु हथियारों की मौजूदगी, और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की होड़ इस क्षेत्र को बारूद के ढेर पर बैठा हुआ दर्शाती है। युद्ध और टकराव का रास्ता न केवल उनके लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी होगा। क्या दोनों देश अविश्वास की इस खाई को पाट पाएंगे? यह सवाल भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इसका जवाब दक्षिण एशिया के भविष्य को निर्धारित करेगा
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