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एक पत्रकार का संघर्ष: धर्मेंद्र प्रताप सिंह बनाम दैनिक भास्कर केस की पूरी कहानी!

विक्रांत पाटील-

यह कहानी है दैनिक भास्कर के एक वरिष्ठ पत्रकार धर्मेंद्र प्रताप सिंह की, जिन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के तहत अपने और अपने सहकर्मियों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। उनकी इस मुहिम का नतीजा यह हुआ कि उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद शुरू हुई न्याय के लिए एक लंबी और कठिन कानूनी लड़ाई, जो मुंबई के लेबर कोर्ट से होते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुँची। यह केवल एक व्यक्ति की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पत्रकारों के हकों और नियोक्ता की जवाबदेही की एक महत्वपूर्ण गाथा है।

विवाद की चिंगारी: मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई

धर्मेंद्र प्रताप सिंह दैनिक भास्कर में ‘प्रिंसिपल करेस्पॉन्डेंट’ के पद पर कार्यरत थे। वे सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि एक ‘जुझारू पत्रकार’ के रूप में जाने जाते थे, जो मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए मुंबई ब्यूरो में कर्मचारियों का नेतृत्व कर रहे थे। उनकी यही जुझारू भूमिका उन्हें प्रबंधन की नजरों में ले आई।

टकराव की शुरुआत

कर्मचारियों के अधिकारों के लिए सिंह की वकालत ने उन्हें सीधे प्रबंधन के साथ टकराव में ला खड़ा किया। कंपनी ने पहली जवाबी कार्रवाई करते हुए 2017 में उनका तबादला राजस्थान के सीकर में कर दिया। हालांकि, अदालत ने इस ट्रांसफर आदेश पर रोक लगा दी।

ट्रांसफर की कोशिश नाकाम होने के बाद, प्रबंधन ने सिंह के खिलाफ और भी गंभीर कदम उठाने का फैसला किया।

आरोप और जवाबी कार्रवाई

जब ट्रांसफर के जरिए बात नहीं बनी, तो प्रबंधन ने धर्मेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ एक औपचारिक आरोप-पत्र जारी कर संघर्ष को और बढ़ा दिया।

मुख्य आरोप: इस आरोप-पत्र में कुल 9 आरोप लगाए गए थे, जिन्हें मुख्य रूप से इन श्रेणियों में बांटा जा सकता है:

अनुशासनहीनता और अपमानजनक भाषा: इसमें 12.02.2018 को कंपनी के विधि प्रमुख (Legal Head) श्री सचिन गुप्ता के साथ दुर्व्यवहार और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का गंभीर आरोप शामिल था।

आदेशों की अवहेलना: 16.10.2017 को एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने के निर्देश को अस्वीकार करने का एक विशिष्ट आरोप लगाया गया।

अस्पष्ट आरोप: सबसे खास बात यह थी कि 9 में से 7 आरोप बहुत सामान्य और अस्पष्ट थे। उनमें किसी विशिष्ट घटना की तारीख या विवरण का कोई उल्लेख नहीं था, जिससे बचाव करना लगभग असंभव था।

इन आरोपों के आधार पर, कंपनी ने एक आंतरिक जांच शुरू की, जिसके कारण अंततः उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।

आंतरिक जांच और सेवा समाप्ति का फैसला

आरोप-पत्र के आधार पर, डी.बी. कॉर्प ने एक घरेलू जांच (domestic enquiry) शुरू की। 11 सितंबर, 2019 को जांच अधिकारी की रिपोर्ट आई, जिसमें धर्मेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही पाया गया। इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर प्रबंधन ने 24 सितंबर, 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। सिंह ने हमेशा यह दावा किया कि यह पूरी कार्रवाई मजीठिया वेज बोर्ड की मांगों को दबाने और उन्हें परेशान करने की एक सोची-समझी साजिश थी।

कंपनी के इस फैसले के खिलाफ, धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी कानूनी लड़ाई की शुरुआत लेबर कोर्ट से की।

लेबर कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

‘पार्ट I’ पुरस्कार का अर्थ

औद्योगिक विवादों में, कूपर इंजीनियरिंग मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार, सुनवाई दो भागों में होती है। ‘पार्ट I’ में, अदालत केवल यह तय करती है कि नियोक्ता द्वारा की गई आंतरिक जांच निष्पक्ष थी या नहीं, और उसके निष्कर्ष सबूतों पर आधारित थे या ‘तर्कबाह्य’ (Perverse) थे।

लेबर कोर्ट के दोहरे निष्कर्ष

लेबर कोर्ट ने 4 अप्रैल, 2025 को दिए अपने ‘पार्ट I’ पुरस्कार में दो विरोधाभासी लेकिन महत्वपूर्ण निष्कर्ष दिए, जिन्हें इस तालिका में समझा जा सकता है:

निष्कर्ष (Conclusion): किसके पक्ष में (In Favor Of)

  1. जांच प्रक्रिया ‘उचित और निष्पक्ष’ थी। – नियोक्ता (D.B. Corp)
  2. जांच अधिकारी के निष्कर्ष ‘तर्कबाह्य’ (Perverse) थे – कर्मचारी (Dharmendra Singh)

दूसरा निष्कर्ष—कि जांच के परिणाम ‘तर्कबाह्य’ थे—धर्मेंद्र सिंह के लिए एक बहुत बड़ी जीत थी। इस फैसले ने कंपनी की आंतरिक जांच की पूरी रिपोर्ट को ही अविश्वसनीय बना दिया और इसी को कंपनी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।

आइए जानते हैं कि लेबर कोर्ट और बाद में हाई कोर्ट ने जांच को इतना त्रुटिपूर्ण क्यों माना।

जांच की छह बड़ी खामियां: क्यों कोर्ट ने निष्कर्षों को ‘तर्कबाह्य’ माना

लेबर कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट, दोनों ने माना कि कंपनी द्वारा प्रस्तुत किए गए सबूतों और जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं। इन छह प्रमुख खामियों के कारण ही जांच के निष्कर्षों को ‘तर्कबाह्य’ करार दिया गया:

  1. सबसे बड़ा सबूत, सबसे बड़ा झोल (NC रिपोर्ट में गड़बड़ी): अदालत ने नॉन-कॉग्निजेबल (NC) रिपोर्ट में एक “स्पष्ट तर्कबाह्यता” पाई। आरोप था कि घटना 12.02.2018 को हुई, लेकिन पुलिस में दर्ज एनसी रिपोर्ट पर तारीख 10.02.2018 की थी, यानी घटना से दो दिन पहले की। कंपनी ने इसे ‘लिपिकीय त्रुटि’ बताया, लेकिन अदालत ने इस दलील को अविश्वसनीय माना।
  2. मुख्य शिकायतकर्ता ही गवाही से गायब: यह कंपनी के मामले की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक थी। 12.02.2018 की कथित घटना के मुख्य शिकायतकर्ता, यानी कंपनी के विधि प्रमुख (Legal Head), को जांच के दौरान गवाह के रूप में कभी पेश ही नहीं किया गया। एक कानूनी अधिकारी की गवाही से अनुपस्थिति ने आरोपों की गंभीरता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
  3. अधूरे और अस्पष्ट आरोप:” जैसा कि पहले बताया गया है, 9 में से 7 आरोपों में किसी घटना की विशिष्ट तारीख या विवरण नहीं था। इस वजह से धर्मेंद्र सिंह के लिए अपना प्रभावी बचाव करना असंभव था।
  4. कमजोर और सुनी-सुनाई गवाहियां: कंपनी के गवाह कथित अनुशासनहीनता की किसी भी घटना की तारीख या समय के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं दे सके। वे देरी के दावों को साबित करने के लिए ऑफिस का समय भी नहीं बता सके और उन्होंने स्वीकार किया कि मुख्य घटना के बारे में उनका ज्ञान सुनी-सुनाई बातों पर आधारित था। ऐसी गवाही घरेलू जांच में सबूत के बोझ को पूरा करने के लिए अपर्याप्त थी।
  5. गलत समय के सबूत: कंपनी को बदनाम करने के आरोप को साबित करने के लिए जिन व्हाट्सएप संदेशों को सबूत के तौर पर पेश किया गया, वे आरोप-पत्र जारी होने के बाद के थे। इसलिए, अदालत ने माना कि उन्हें मूल आरोपों को साबित करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
  6. प्रक्रिया में हितों का टकराव: जांच प्रक्रिया में एक बुनियादी खामी थी। कंपनी की एजीएम (एचआर), अक्षता करंगुटकर ने ही आरोप-पत्र जारी किया, जांच अधिकारी की नियुक्ति की और फिर खुद प्रबंधन की मुख्य गवाह के रूप में पेश हुईं। एक ही व्यक्ति द्वारा इन तीनों भूमिकाओं को निभाना निष्पक्ष जांच के सिद्धांतों का उल्लंघन है और यह पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता से गंभीर रूप से समझौता करता है।

इन खामियों के उजागर होने के बाद, कंपनी की आखिरी उम्मीद बॉम्बे हाई कोर्ट थी।

हाई कोर्ट की अंतिम मुहर और संघर्ष का परिणाम

23 दिसंबर, 2025 को, बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस मनीष पितले की बेंच ने डी.बी. कॉर्प द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने लेबर कोर्ट के फैसले पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी और इस बात की पुष्टि की कि कंपनी की आंतरिक जांच के निष्कर्ष वास्तव में ‘तर्कबाह्य’ थे और उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

अब सवाल यह उठता है कि इस ऐतिहासिक फैसले के दूरगामी परिणाम क्या होंगे?

इस फैसले का क्या मतलब है?

बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले ने मामले की दिशा तय कर दी है और यह मानव संसाधन (HR) और कानूनी पेशेवरों के लिए एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बन गया है। इसके तत्काल और दूरगामी परिणाम इस प्रकार हैं:

पक्षकारों के लिए तत्काल परिणाम:

धर्मेंद्र प्रताप सिंह के लिए: यह एक बहुत बड़ी कानूनी और नैतिक जीत है। इस फैसले ने उनकी बर्खास्तगी के खिलाफ उनके मामले को बेहद मजबूत कर दिया है।

डी.बी. कॉर्प (दैनिक भास्कर) के लिए: कंपनी द्वारा की गई आंतरिक जांच की रिपोर्ट अब अमान्य हो गई है। अब कंपनी को लेबर कोर्ट में ‘पार्ट II’ की कार्यवाही के दौरान नए और ठोस सबूतों के साथ दुर्व्यवहार के आरोपों को फिर से साबित करना होगा, यानी उन्हें शून्य से शुरुआत करनी होगी।

मानव संसाधन (HR) और कानूनी पेशेवरों के लिए सबक: यह निर्णय घरेलू जांच आयोजित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है:

  1. स्पष्ट और विस्तृत आरोप-पत्र: आरोप-पत्र में प्रत्येक आरोप की तारीख, समय, स्थान और घटना का विशिष्ट विवरण होना अनिवार्य है। सामान्य और अस्पष्ट आरोप कानूनी जांच में टिक नहीं पाते हैं।
  2. मुख्य गवाहों की गवाही अनिवार्य: जिस व्यक्ति के साथ कथित दुर्व्यवहार हुआ हो, उसकी गवाही सबसे महत्वपूर्ण होती है। मुख्य शिकायतकर्ता को गवाह के रूप में पेश करने में विफल रहना मामले को घातक रूप से कमजोर कर सकता है।
  3. सबूतों की विश्वसनीयता: एनसी रिपोर्ट जैसी दस्तावेजी सबूतों में तारीख की गलती जैसी “स्पष्ट त्रुटियां” पूरी जांच की विश्वसनीयता को खत्म कर सकती हैं। सबूत पेश करने से पहले उनकी सटीकता की जांच करना महत्वपूर्ण है।
  4. भूमिकाओं का स्पष्ट पृथक्करण: जांच की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए, आरोप-पत्र जारी करने वाले अधिकारी, जांचकर्ता नियुक्त करने वाले और गवाह की भूमिकाएं अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा निभाई जानी चाहिए। एक ही व्यक्ति द्वारा कई भूमिकाएं निभाना हितों का टकराव पैदा करता है और पूरी प्रक्रिया को कमजोर करता है।

यह निर्णय उन सभी पत्रकारों के लिए एक प्रेरणादायक मील का पत्थर है जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं। यह साबित करता है कि अगर संघर्ष में सच्चाई और दृढ़ता हो, तो न्याय मिलना संभव है।

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