
संजय कुमार सिंह
नरेन्द्र मोदी सरकार को पेट्रोलियम पदार्थों या ईंधन की कीमत बढ़ानी पड़ रही है, दस दिन में तीन बार बढ़ाई गई और इसमें सीएनजी भी है – अपने आप में बड़ी खबर है। इतनी बड़ी कि अमूमन सरकार समर्थक खबरों को प्राथमिकता देने वाले अमर उजाला ने भी इसे ली़ड बनाया है। यह खबर आज देशबन्धु में भी लीड है। शीर्षक में दस नहीं, नौ दिन में ही तीन बार बढ़ाने की बात है। नवोदय टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। मेरे छह अंग्रेजी अखबारों में यह खबर सिर्फ द हिन्दू में लीड है। द टेलीग्राफ में यह खबर बिजनेस पेज पर होने की सूचना पहले पन्ने पर प्रमुखता से है। दि एशियन एज में पहले पन्ने पर है लेकिन तीन कॉलम की छोटी सी खबर फोल्ड के नीचे है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह दो कॉलम की खबर है और शीर्षक के अनुसार दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 100 रुपए लीटर के करीब हो गई है। आप जानते हैं कि पहले पेट्रोल और डीजल की कीमत में बड़ा अंतर होता था। मोदी सरकार ने उस अंतर को कम कर दिया। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कम थीं तो उसका लाभ देश या जनता को नहीं दिया लेकिन युद्ध के नाम पर कीमत बढ़ाने का मौका नहीं चूक रही है। इसके अलावा, शुरू में कहा गया था कि एलपीजी के साथ पीएनजी में दिक्कत नहीं है लेकिन पेट्रोल-डीजल के विकल्प सीएनजी की कीमत भी बढ़ाई गई है। इस तरह, मुख्यमंत्री रहते हुए जो नरेन्द्र मोदी और उनकी टीम पेट्रोल की कीमत बढ़ने पर भारी विरोध करते थे वे अब नौ-दस दिन में तीन बार कीमत बढ़ाने को मजबूर हैं या जनता की परेशानी से मुक्त बढ़ाए जा रहे हैं। मीडिया इसे बताने या महत्व देने से भी बच रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह दो कॉलम की खबर है और इसके ऊपर या लीड के बराबर में तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, केंद्र ने जिमखाना (क्लब का) परिसर 5 जून तक सौंपने का आदेश दिया। खबर के अनुसार, सरकार ने 1928 में क्लब को 27.3 एकड़ जमीन पट्टे पर दी थी और अब उसे वापस लेना चाहती है तो 15 दिन का भी समय नहीं दिया है। यह क्लब 2, सफदरजंग रोड पर 1913 से चल रहा था। तब इसका नाम इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब था और मौजूदा परिसर का निर्माण 1930 में हुआ था। तब से इसका नाम दिल्ली जिमखाना क्लब है। ऐसे पुराने क्लब को बंद करना और बिल्डिंग के साथ जमीन सरकार को सौंपने का आदेश निश्चित रूप से बड़ी खबर है।
भारतीय कुश्ती महासंघ को फटकार
दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में पहलवान विनेश फोगाट को एशियाई खेलों के चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी है। न्यायालय ने भारतीय कुश्ती महासंघ की नीति को ‘बहिष्कारी’ करार दिया और स्पष्ट किया कि मातृत्व को महिला खिलाड़ियों के बहिष्कार का आधार नहीं बनाया जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश की खास बातों में मातृत्व का सम्मान शामिल है। कोर्ट ने कुश्ती महासंघ को फटकार लगाते हुए कहा कि मातृत्व कोई कमजोरी या अपराध नहीं है, बल्कि यह सम्मान की बात है। मां बनने के बाद वापसी करने वाली एथलीट के साथ भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। इसलिए, अदालत ने निर्देश दिया कि विनेश को एशियन गेम्स के चयन ट्रायल में शामिल होने का पूरा मौका मिलना चाहिए। कोर्ट ने कुश्ती महासंघ द्वारा विनेश फोगाट को घरेलू प्रतियोगिताओं में अयोग्य घोषित करने और कारण बताओ नोटिस जारी करने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई। यही नहीं, निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए, कोर्ट ने ट्रायल्स की वीडियो रिकॉर्डिंग कराने का आदेश दिया। इसके अलावा, भारतीय खेल प्राधिकरण और भारतीय ओलंपिक संघ के स्वतंत्र पर्यवेक्षकों को ट्रायल के दौरान उपस्थित रहने को कहा गया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया है कि एक विशेषज्ञ समिति बनाई जाए जो महिला एथलीटों की गर्भावस्था और प्रसव के बाद की शारीरिक चुनौतियों का मूल्यांकन करे ताकि भविष्य में किसी भी महिला खिलाड़ी को इसका नुकसान न उठाना पड़े। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भी एक महत्वपूर्ण और बड़ी खबर है। देशबन्धु ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया, दि एशियन एज और द टेलीग्राफ की लीड अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की यात्रा से जुड़ी है। शीर्षक अलग हैं लेकिन प्रचार यही है कि अमेरिका के साथ सब ठीक-ठाक है। द टेलीग्राफ का शीर्षक सबसे अलग है और प्रस्तुति मौके के अनुसार – आप भी देखिए। बाकी सब खबर ‘सकारात्मकता’ फैलाने की कोशिश भर है। संभव है, इसीलिए इस खबर को महत्व दिया गया हो। जैसे अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, “अमेरिका की हिन्द-प्रशांत रणनीति का भारत प्रमुख आधार, अहम साझेदार भी : रुबियो”। खबर में प्रचार की कुछ और बातें हैं उपशीर्षक के रूप में हैं जैसे ईरान को वैश्विक ऊर्जा बाजार को बंधक नहीं बनाने देंगे। आप जानते हैं कि ईरान के आगे अमेरिका की चल नहीं रही है और वह मुस्तैदी से अमेरिका के खिलाफ डटा हुआ है। दुनिया इस संकट के लिए अमेरिका और ट्रम्प को जिम्मेदार मान रही है। इसलिए कुछ प्रचार और नैरेटिव बनाने का काम जरूरी लगा होगा। इस खबर से वह भी हो रहा है। सरकार के अनुकूल माहौल बनाने वाला दूसरा बिन्दु है – दोनों देशों के बीच व्यापारिक व रक्षा सहयोग गहरा करने पर सहमति। देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, रणनीतिक साझेदारी व वैश्विक शांति से जुड़े मुद्दे पर की चर्चा। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, भारत अमेरिका का एक अहम साझेदार : रूबियो। अंग्रेजी अखबारों के शीर्षक में भी पूरी विविधता है और जाहिर है, यह द टेलीग्राफ जैसी नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है – करार या युद्ध, 50-50 की स्थिति, आज फैसला हो सकता है: ट्रंप। द हिन्दू की खबर का शीर्षक है – अमेरिका की भारत-प्रशांत नीति में दिल्ली की अहम भूमिका है : रुबियो। इंडियन एक्सप्रेस – रुबियो ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की, कहा कि अमेरिका भारत की ऊर्जा आपूर्ति में विविधता ला सकता है। हिन्दुस्तान टाइम्स – रूबियो के साथ बैठक में प्रधानमंत्री ने शांति प्रयासों का समर्थन किया। दि एशियन एज का शीर्षक है – रुबियो ने मोदी से मुलाकात की, संबंधों को ठीक करने के लिए एक नई कोशिश का संकेत दिया। द टेलीग्राफ ने लिखा है कि रुबियो ने ऊर्जा पर ही ज्यादा बात की। यह तथ्य भी हो तो इससे जो संदेश जा रहा है वह सरकार के लिए अनुकूल है। कहने की जरूरत नहीं है कि खबर वही होगी, जो कहा गया होगा और उसी हिसाब से प्रमुखता मिलती है। लेकिन अभी जब सरकार अपनी छवि बनाने या बचाने में लगी है तो इन खबरों से वही सब होता दिख रहा है जबकि दूसरी खबरों को प्रमुखता दी जा सकती थी। नौ-दस दिन में तीन बार कीमत बढ़ना और उसे लीड नहीं बनाकर अमेरिकी प्रतिनिधि के दौरे से जुड़ी बातें प्रचारित करना जो ईंधन की उपलब्धता से ही संबंधित है – संपादकीय विवेक का मामला है और मैं उसी को रेखांकित करना चाहता हूं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


