संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में दीवाली के बाद प्रदूषण बड़ी चिन्ता तो है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में भाजपा और आम आदमी पार्टी की राजनीति और दि एशियन एज में बिहार चुनाव की राजनीति की खबर भाजपा को फायदा पहुंचाने या उसके लिए लिखी गई लगती है। द टेलीग्राफ की खबर का शीर्षक है, अमित शाह ने बिहार में कम से कम तीन भाजपा के बागियों को मुकाबले से अलग करवाया है। आप समझ सकते हैं कि ज्यादातर अखबारों का उद्देश्य भाजपा का प्रचार और उसे एक अच्छी पार्टी के रूप में दिखाते रहना है। इस क्रम में आज लंदन विश्वविद्यालय में हिन्दी की विद्वान को भारत में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दिए जाने और उन्हें हवाई अड्डे से ही वापस भेज दिए जाने की खबर है। यह हिन्दी के अखबारों में पहले पन्ने की खबर नहीं है। दूसरी ओर, हिन्दी की एक विदेशी, महिला प्रोफेसर से भारत सरकार इतना डर गई कि उसे हवाई अड्डे से ही वापस कर दिया गया। मुझे नहीं पता है कि वे बिना वीजा भारत कैसे पहुंची होंगी और जब वीजा था (या गलती से जारी हो गया था) तो वापस भेजने की क्या मजबूरी या महानता रही होगी। खबर के अनुसार, वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने बताया कि हिंदी की एक प्रमुख विद्वान और लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस) की प्रोफेसर फ्रांसेस्का ओरसिनी को सोमवार देर रात देश में प्रवेश करने से रोक दिया गया और दिल्ली हवाई अड्डे से वापस भेज दिया गया। गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने दावा किया कि उनकी पिछली यात्राओं के दौरान “वीज़ा शर्तों का उल्लंघन” उन्हें देश में प्रवेश से वंचित करने का आधार बना। कारण चाहे जो हो, सच यह है कि हिन्दी की एक रिटायर (साठ पार) महिला विदेशी प्रोफेसर जो दशकों से भारत में रह रही हैं और काम करती रही हैं उन्हें वीजा शर्तों के उल्लंघन की न तो सूचना दी गई ना कोई चेतावनी और यहां पहुंचने पर सबसे आसान व मनमानी कार्रवाई की गई कि उन्हें वापस भेज दिया गया।
कहने की जरूरत नहीं है कि एक महिला से, हिन्दी वाली से, विदेशी नागरिक से भारत सरकार का यह व्यवहार किसी भी सूरत में स्तरीय या सोचा-समझा तो नहीं ही कहा जा सकता है। दिलचस्प यह कि हिन्दी के अखबारों को यह खबर नहीं मिली या उन्होंने इसे पहले पन्ने लायक नहीं माना। अगर इंडियन एक्सप्रेस या द वायर ने इसे महत्व दिया है तो इससे हिन्दुओं की रक्षा करने वाली सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और मतदाताओं तथा समर्थकों को यह शायद ही समझ में आए कि विदेशों में भारत की छवि इससे खराब होती है और यह शायद ही कभी मुद्दा बने। इस मामले को पूरी तरह समझने के लिए फ्रांसेस्का ओरसिनी को जानना- समझना जरूरी है। पेश है, इंडियन एक्सप्रेस की खबर के एक हिस्से का हिन्दी अनुवाद, लंदन वापस जाने वाली उड़ान में सवार ओरसिनी टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं थीं, द वायर ने पहले उनके हवाले से कहा था कि उन्हें दिल्ली हवाई अड्डे पर रोके जाने का कोई कारण नहीं बताया गया था। उन्होंने कहा, “मुझे निर्वासित किया जा रहा है। मुझे बस इतना ही पता है।” ओरसिनी के पति पीटर कोर्निकी, जो कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में जापानी भाषा के एमेरिटस प्रोफेसर और ब्रिटिश अकादमी के फेलो हैं, ने द इंडियन एक्सप्रेस से पुष्टि की कि ओरसिनी हांगकांग से दिल्ली पहुँची थीं और उन्हें हांगकांग निर्वासित कर दिया गया। उन्होंने कहा कि कोई कारण नहीं बताया गया। वीज़ा उल्लंघन के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर, उन्होंने कहा कि उन्हें “इन मामलों की कोई जानकारी नहीं है”। यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने हाल ही में भारत में किसी सम्मेलन में भाग लिया है, उन्होंने कहा कि उन्हें किसी सम्मेलन की जानकारी नहीं है।
मूल रूप से इटली की रहने वाली ओरसिनी ने वहीं हिंदी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। बाद में केंद्रीय हिंदी संस्थान और दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। ओरिसिनी, ‘द हिंदी पब्लिक स्फीयर 1920-1940:लैंग्वेज एंड लिटरेचर इन द एज ऑफ नेशनलिज्म’ की लेखिका हैं। यह 2002 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित हुई थी। यह उनके पीएचडी के लिए एसओएएस में किए गए कार्य का हिस्सा था। यह कार्य हिंदी भाषा को राष्ट्रवाद और साहित्य के संदर्भ में परखता है। उन दशकों में, उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रेडक्लिफ संस्थान में 14 पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा का अध्ययन किया। ओरसिनी 2013 में फेलो थीं। एसओएएस से जुड़ने के बाद, उन्होंने 2021 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और एसओएएस में पढ़ाया, इससे पहले कि वह संस्थान से तीन दशकों से अधिक समय तक जुड़ी रहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर और ओरसिनी के एक मित्र ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “भारत के साथ उनका चार दशक से भी ज़्यादा पुराना नाता रहा है और उन्होंने यहीं हिंदी का अध्ययन किया है। वे समकालीन भारत की विद्वान हैं और उन्होंने यहीं हिंदी और मध्यकालीन हिंदी साहित्य का अध्ययन किया है। उनका ज़्यादातर अध्ययन मौखिक है, इसलिए वे लोगों से बात करती थीं, जानकारी इकट्ठा करती थीं और विद्वानों से मिलती थीं। उन्होंने कई विद्वानों को सलाह भी दी है और ग्रंथों का अनुवाद भी किया है। यह उनकी सामान्य वार्षिक यात्राओं में से एक थी।”
मुझे लगता है कि आज इस खबर से भारत में हिन्दुओं की सरकार का हिन्दी और हिन्दी वालों के प्रति व्यवहार का पता चलता है। इस खबर को महत्व नहीं मिलने से हिन्दी पत्रकारिता और सरकार के काम काज का अनुमान लगाया जा सकता है। इसलिए इसके बाद ही आज की दूसरी खबरों की चर्चा कर रहा हूं क्योंकि मेरी राय में यह स्थिति इस सरकार और ऐसी पत्रकारिता के कारण ही है। हालांकि, यह भी अलग मुद्दा है। जहां तक सरकार, उसके समर्थकों की कार्यशैली, मनमानी और पारदर्शिता तथा मितव्ययिता का सवाल है आज एक और दिलचस्प खबर है। खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी है और यहां शीर्षक है, सात सदस्यों वाले लोकपाल ने सात बीएमडब्ल्यू कारों के लिए टेंडर निकाला, भृकुटियां तनीं। मुझे लगता है कि इस खबर के साथ सात सदस्यों का नाम और उनकी विशेष योग्यता भी जान लें तो बहुत संभवाना है कि यह उनके सरकार अनुकूल काम का ईनाम होगा। अब ऐसी रिपोर्टिंग होती नहीं है। आज भारत से तालिबान के संबंधों का यू-टर्न पूरा होने की भी खबर है। इसके अनुसार, काबुल में भारत के मिशन को एमबैसी का दर्जा दे दिया गया है। इन दिनों मैं कंधार अपहरण के समय भारत सरकार के लिए जासूसी कर रहे विष्णु मिश्रा की किताब पढ़ रहा हूं तो लग रहा है कि सब मिलीभगत हो सकती है। इसपर लिखना पहले स्वतंत्र और सत्ता विरोधी पत्रकारिता होती अब देश विरोधी करार दिया जा सकता है। बिहार चुनाव से संबंधित खबरों में ज्यादातर जब इंडिया गठबंधन की कमजोरी और रणनीति की खामियां बताने वाली होती हैं तब टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज बिहार चुनाव की एक खबर दी है जो राजग के बारे में है। आजकल ऐसी खबरें कम मिलती हैं। इसके अनुसार, बिहार में राजग के उम्मीदवारों में यादव कम हैं और लगता है कि यह राज्य में आधार मजबूत करने की कोशिश है। देशबन्धु के अनुसार इस बार दीवाली के बाद दिल्ली में प्रदूषण पांच साल में सबसे ज्यादा था। टाइम्स ऑफ इंडिया ने दीवाली की हवा को चार साल में सबसे बुरा बताया है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है, पटाखे छोड़े गए शहर में जहरीली धुंध छाई। द हिन्दू में खबर लीड नहीं, सात कॉलम का बॉटम है। शीर्षक वही है, दीवाली की आतिशबाजी ने दिल्ली की हवा की गुणवत्ता को पांच साल में सबसे खराब के करीब पहुंचा दिया। अमर उजाला ने भी प्रदूषण को लीड बनाया है। शीर्षक है, दीवाली के बाद 16 शहरों में हवा जहरीली दिल्ली में चार साल में सर्वाधिक प्रदूषण। अमर उजाला के उपशीर्षक के अनुसार, हरियाणा का जीन्द सबसे प्रदूषित रहा – एक्यूआई 421 दर्ज, दिल्ली एनसीआर में भी 300 के पार। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, हरित पटाखे धुंआ-धुंआ। उपशीर्षक है, रेड जोन में रही दिल्ली की वायु गुणवत्ता, एक्यूआई 351। दि एशियन एज में पहले पन्ने पर दिल्ली के प्रदूषण पर कोई खबर नहीं है। ऐसा ही कोलकाता के द टेलीग्राफ में है। सबसे अलग या दिलचस्प इंडियन एक्सप्रेस में है। दिल्ली के (भाजपाई) मंत्री ने कहा आम आदमी पार्टी ने पंजाब में किसानों को पराली जलाने के लिए ‘मजबूर’ किया। यही नहीं, दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मंजिन्दर सिंह सिरसा ने त्यौहार को ‘बदनाम’ करने के लिए केजरीवाल पर हमला किया और अखबार ने इसे भी उपशीर्षक में बताया है। क्योंकि मुख्य शीर्षक है, दीवाली के बाद दिल्ली की हवा ‘बेहद खराब’ हो गई, भाजपा और आप ने राजनीतिक आतिशबाजी छेड़ दी। मुझे लगता है कि फ्लैग, मुख्य और उप – तीन शीर्षक में एक ही काम की बात है या दूसरे अखबारों से अलग है। वह यह कि पूरे एनसीआर में पटाखों से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का उल्लंघन हुआ। (जारी)
लिंक – https://www.bhadas4media.com/sarkaar-jo-kar-rahee-hai-aur-media-jo-chhipa/
अगली किस्त पढ़ें – सरकार जो कर रही है और मीडिया जो छिपा रहा है वह खबरों से ही पता चल जा रहा है

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


