फैजाबाद के हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबार के ब्यूरो चीफों को साहित्य से इतनी घृणा क्यों है?

Anil Kumar Singh : कुछ दिनों पहले इलाहाबाद वि वि में मेरे प्राध्यापक रहे प्रो राजेंद्र कुमार जी का फैजाबाद आना हुआ. वे एक बेहद संजीदा इन्सान होने के साथ ही एक बहुत ही अच्छे शिक्षक भी हैं. एम् ए फाइनल में वे हम लोगों को उर्दू साहित्य का वैकल्पिक पेपर पढ़ाते थे. हमारी जो भी साहित्य, संस्कृति की समझ बनी उसमे गुरुदेव का बड़ा योगदान है. हम लोगों ने उनसे अनुरोध करके फैजाबाद प्रेस क्लब में मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ कविता पर उनका व्याख्यान आयोजित किया.

व्याख्यान बहुत ही अच्छा हुआ. उसकी रिपोर्ट फैजाबाद के हिंदुस्तान और दैनिक जागरण को छोड़ सभी अख़बारों में छपी. ये दोनों अख़बार लगातार हमारी गतिविधियों को अनदेखा कर रहे हैं. कहने को तो जागरण के अवस्थी जी और हिंदुस्तान के शुक्ल जी दोनों ही दोस्त हैं. ये कहां की दोस्ती है भाई? लगता है हम सचमुच एक फासिस्ट समय में आ गये है जहां कुछ भी सच नहीं. न दोस्ती न भाईचारा. साहित्य से इतनी घृणा क्यों है आप लोगों को.

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तिमिर में झरता समय (कवि मुक्तिबोध की कविता पर केन्द्रित प्रो. राजेन्द्र कुमार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय का व्याख्यान)… दिनांक 17 अक्टूबर, 2014 को फैजाबाद के प्रेस क्लब में जनवादी लेखक संघ के तत्वावधान में हिन्दी के चर्चित कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के 50 वर्ष पूरे होने पर उनके काव्य-कर्म पर केन्द्रित प्रो. राजेन्द्र कुमार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय का व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि मुक्तिबोध ने संवेदनशील मनुष्य के रूप में अपने समय से मुठभेड़ का दायित्व निभाया। उनकी कविताएँ किसी गहन वैचारिक उलझन का परिणाम थीं, इसीलिए मुक्तिबोध काव्य-वैविध्य के कवि नहीं हैं। उनकी कविताओं में जिस वैचारिकता का स्वर बारम्बार प्रतिध्वनित होता है, वह दोहराव नहीं अपितु अभिव्यक्ति का आत्मसंतोष न हो पाने की बेचैनी है। उन्होंने इस तथ्य का भी उद्घाटन किया कि ‘अंधेरे में’ नाम से मुक्तिबोध की एक कहानी भी है। प्रो. राजेन्द्र कुमार ने इस कहानी का जिक्र करते हुए यह रेखांकित किया कि मुक्तिबोध के कथा नायक या काव्य नायक किसी संवेदना के साथ इकहरे रूप में सम्मिलित नहीं होते, बल्कि द्वन्द्वात्मक होते हैं। उन्हांेने स्पष्ट किया कि उत्तर आधुनिकता के दौर में शब्दक्रीड़ा बहुत हुई है, किन्तु मुक्तिबोध पश्चिम की ओर से आने वाली हवाओं से इधर-उधर होते रहने वाले कवि नहीं हैं। उनकी रचनाओं में मूल बेचैनी इसकी है कि कुछ शुरू हो जो ‘रचनात्मक विवक प्रक्रिया’ की परिणति क्रिया में करने में समर्थ हो, इसी क्रियागत परिणति के अभाव में हिन्दुस्तान ‘अधूरी क्रान्तियों का देश’ बनता गया है। मुक्तिबोध माक्र्सवाद की वैचारिकता के पक्षधर होतु हुए भी उसकी यान्त्रिकता से क्षुब्ध थे, इसीलिए वे ‘मुझे कदम कदम पर मिलते हैं चैराहे’ जैसी काव्य पंक्तियाँ रचते हैं। प्रो. राजेन्द्र कुमार ने मुक्तिबोध के समय के अंधेरे को आज से सम्बद्ध करते हुए स्पष्ट किया कि आज ऐसी रोशनियों से सावधान रहने की आवश्यकता है, जो अकुण्ठ नहीं हैं। जनता को मोहक व्यापकता के पीछे की संकीर्णता को समझ लेना चाहिए, यह भी कि क्यों वह लाचार और असहाय व्यक्तियों के झुण्ड में बदल दी गयी है। प्रो. राजेन्द्र कुमार ने मध्यवर्ग की भूमिका की अस्पष्टता को सम्पूर्ण सामाजिक परिवर्तन के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बताया। उन्होंने कहा कि मध्यवर्ग को अपनी श्रेष्ठता ग्रन्थि छोड़नी होगी। यह भी प्रश्न उन्होंने उठाया कि मुक्बिोध जनकवि हैं या नहीं? अतिबौद्धिकता के प्रश्न को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध की असंगत आलोचना ने उन्हें अतिबौद्धिकीकरण कर दिया। व्याख्यान के सार-तत्व के रूप में उन्होंने यह कहा कि मुक्तिबोध की कविता की व्याख्या आसान है पर उसकी भीतरी पुकार पर अमल कठिन है, कई अर्थों में वे निराला से आगे के कवि हैं। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि मुक्तिबोध के बाद के पचास वर्ष उनके समय से विडम्बनाओं से मुक्ति का साक्ष्य नहीं देते बल्कि और गहरे अंधेरे में डूबने का साक्ष्य देते हैं। इससे पहले रघुवंशमणि ने प्रो. राजेन्द्र कुमार को महत्वपूर्ण आलोचकों में से एक बताते हुए उनकी पुस्तकों ‘प्रतिबद्धता के बावजूद’, ‘शब्द घड़ी में समय’ आदि की चर्चा की। उन्होंने कहा कि आलोचना को सभ्यता-समीक्षा की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रो. राजेन्द्र कुमार की है। मुक्तिबोध की आलोचना पर उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है, ‘मुक्तिबोध और अंधेरे में’ पुस्तक इसका प्रमाण है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने कहा कि मुक्तिबोध ने समय के मुश्किल सवालों की व्याख्या की। मुक्तिबोध के समय का अंधेरा आज बहुत गाढ़ा हो गया है। वे माक्र्सवादी चेतना के कवि हैं और जनता की पक्षधरता की बात करते हैं। कार्यक्रम का संचालन अनिल कुमार सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन जनवादी लेखक संघ, फैजाबाद के संयोजक विशाल श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम में पत्रकार के.पी. सिंह, विजय रंजन, डा. बुशरा खातून, डा. नीता पाण्डेय, दिनेश सिंह, आफाक, विन्ध्यमणि, आर.डी. आनन्द, आशाराम जागरथ, सीपीएम के जिला सचिव का. माताबदल सिंह, का. सत्यभान सिंह जनवादी सहित शहर के बुद्धिजीवी वर्ग एवं साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति रही।

फैजाबाद के अनिल कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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Comments on “फैजाबाद के हिंदुस्तान और दैनिक जागरण अखबार के ब्यूरो चीफों को साहित्य से इतनी घृणा क्यों है?

  • मसौधा विकास खनड मे sis सिकयोरिटी का भरती का आयोजन हुआ जिसमे बेरोजगार युवको से250/-की धन उगाही हुआ और यह भी बताया गया जब आप टेनिग सेनटर आयेगे तो 10500/-लिया जायेगा कल बीकापुर मे भरती होगी जो युवक छूट जा रहे है उनका रजिस्ट्रेशन कल होगा और टेनिग के बाद 15000/-सेलरी बताया गया पता करने पर पता चला कि दर्शन नगर एस. पेपर. मिल मे बेरोजगार युवक 7000/-ही पाते है
    इससे सरकारी प्रागण मे आयोजन कर धन उगाही करना अब सरकारी विभाग मे खुलकर हो गया है ऐसा प्रतीत हो रहा है

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  • Rajneesh singh says:

    मसौधा विकास खनड मे sis सिकयोरिटी का भरती का आयोजन हुआ जिसमे बेरोजगार युवको से250/-की धन उगाही हुआ और यह भी बताया गया जब आप टेनिग सेनटर आयेगे तो 10500/-लिया जायेगा कल बीकापुर मे भरती होगी जो युवक छूट जा रहे है उनका रजिस्ट्रेशन कल होगा और टेनिग के बाद 15000/-सेलरी बताया गया पता करने पर पता चला कि दर्शन नगर एस. पेपर. मिल मे बेरोजगार युवक 7000/-ही पाते है
    इससे सरकारी प्रागण मे आयोजन कर धन उगाही करना अब सरकारी विभाग मे खुलकर हो गया है ऐसा प्रतीत हो रहा है

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