अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो तो ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ उपन्यास ज़रूर पढ़ें

DN Pandey

दयानंद पांडेय

मैं दयानंद जी के ‘बांसगांव की मुनमुन’ उपन्यास को भी पढ़ चुकी हूं जो एक सामाजिक उपन्यास है। समय के साथ हर चीज़ में परिवर्तन होता रहा है। चाहें वो प्रकृति हो या इंसान, सामाजिक रीति-रिवाज या किसी व्यावसायिक संस्था से जुड़ी धारणाएं। इस उपन्यास ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ में समय के बदलते परिवेश में अखबारी व्यवस्था का बदलता रूप दिखाया गया है। जिस किसी भी को अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो उन से मेरा कहना है कि वो इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। उपन्यास के आरंभ में सालों पहले अस्सी के दशक की दुनिया की झलक देखने को मिलती है जो आज के अखबारों की दुनिया से बिलकुल अलग थी। धीरे-धीरे अखबार के मालिक, संपादक और कर्मचारियों के संबंधों में बदलते समय की आवाज़  गूंजने लगती है।

पहले अखबारों के मालिक और संपादक के बीच अच्छे व सहज संबंध होते थे। संपादक के हाथ में पावर होती थी और उस के निश्चय की मालिक कदर करते थे। और वह संपादकों के प्रति विनम्रता से पेश आते थे। मालिक को अगर संपादक से मिलना हो तो उनकी सहूलियत के बारे में पूछते थे। और अब मालिकों के बच्चे उन की जगह संपादक को हुकुम देते हैं, इस का उदाहरण लेखक के शब्दों में मिलता है,’’जरा जल्दी आ जाइए हमें कुछ बात करनी है। और जो संपादक कहते कि अभी तो अखबार के काम का समय है।’’ तो मालिकान कहते,’’फिर बाद में हमारे पास समय नहीं होगा। आप फौरन आइए ।’’ आज व कल की अखबारी दुनिया में ज़मीन आसमान का फर्क है। लेखक ने उस समय व आज की अखबारी व्यवस्था की आपस में तुलना करते हुए इस से जुड़ी हर समस्या व हकीकत की बारीकियां  अपने इस उपन्यास में दिखाई हैं। उन दिनों सालों पहले भारत में ‘आज़ाद भारत’ नाम का अखबार छपता था जिस में कोई विशेष विषय वस्तु ना होने पर भी इस  की मांग बहुत थी। क्यों कि ये एक पुराना व सब का जाना पहचाना अखबार था। और इस की हर दिन एक लाख से ऊपर प्रतियां छपती थीं। उन दिनों अखबारी व्यवस्था में सभी एक दूसरे का सम्मान किया करते थे, एक दूसरे के प्रति विनम्र रहते थे। मालिक का संपादक पर पूरा इत्मीनान था। कर्मचारी अपने को खुशकिस्मत समझते हुए वफ़ादारी व लगन से काम किया करते थे व उन में  एक तरह की स्वछंदता व मस्ती थी। धीरे-धीरे मीडिया में इंकलाब आने लगा। और अखबारी दुनिया की इमेज बदलने लगी। समय पलटने से पत्रकारिता का रूप तो बदला ही साथ में लोगों की सोच व राजनीति में भी बदलाव आने लगा। पुराने मालिक की जगह अब उन की नई पीढ़ी के बच्चे काम संभालने लगे तो उन के व संपादक के बीच संबंध भी वैसे ना रहे जैसे कि पहले मालिक के साथ हुआ करते थे। नई पीढ़ी हिंदी की जगह अंग्रेजी अखबार पढ़ना पसंद करने लगी। अखबारों की बदलती व्यवस्था में संपादक को हुकुम देना, संपादक से सीधे बात न कर के मैनेजमेंट के जरिये बात-बात पर स्पष्टीकरण मांगना कि कौन सी खबर छपनी चाहिए  कौन सी नहीं आदि बातें होने लगीं। जब इंसान को अपने हर निर्णय पर किसी का कंट्रोल होता महसूस हो तो मन खुद व खुद उखड़ जाता है। और यही होता है ‘आज़ाद भारत’ के एक योग्य 27 साल अनुभवी संपादक के साथ जो इस तरह मैनेजमेंट की गुलामी में काम करने की वजाय अपना इस्तीफ़ा देना अच्छा समझता है। किंतु इतने पुराने और अनुभवी कर्मचारी को कोई आसानी से तो नहीं छोड़ना चाहता। इंसान की खुद्दारी भी कोई चीज़ होती है। इस बात पर दयानंद जी की एक प्रेम कहानी ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ के नायक विष्णु प्रताप जी की याद आ गई जो एक कंपनी में जनरल मैनेजर थे और इसी उपन्यास के संपादक की तरह अनुभवी खुद्दार व आल राउंडर थे, यानि तमाम विषयों की जानकारी रखते थे। उन्हें भी उन की कंपनी खोना नहीं चाहती थी और यहां ‘आज़ाद भारत’ अखबार के संपादक को भी मालिक आसानी से खोना नहीं चाहते। लेकिन अपना अपमान होने पर इस्तीफ़ा देने के बाद विष्णु जी की ही तरह इस संपादक को भी गेट पर रोक कर किताबें या पर्सनल चीजें नहीं ले जाने दीं गईं । ये दुनिया कितनी मतलबी व अवसरवादी है ये इस बात से ही पता चल जाता है कि इतने पुराने संपादक के इस्तीफ़ा देने पर भी किसी कर्मचारी या पत्रकार ने उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की, विरोध नहीं किया। और ना ही किसी ने उन से सहानुभूति ही जताई, सब को जैसे सांप सूंघ गया। इंसान की मानसिकता कितनी जल्दी बदल जाती है लोगों के प्रति। और इतने अनुभवी संपादक के काम छोड़ कर जाने पर भी लोगों की संवेदनहीनता देख कर लगता है जैसे ‘तू नहीं और सही। ’ और उन की जगह मुकुट नाम के एक अयोग्य व निकम्मे इंसान को संपादक बना दिया जाता है। बिल्ली के भाग छींका टूटा ! मुकुट जी के तीन सपनों में से एक संपादक बनने का भी सपना था जो पूरा हो जाता है। पर उस समय किसी को पता नहीं होता कि वे संपादकीय कार्यभार संभालने में सक्षम नहीं। उन के सहयोगी उन्हें बात-बात में उल्लू बनाते रहते हैं। इस तरह के संपादक का कोई कर्मचारी सम्मान भी नहीं करता और कुछ लोग तो काम दूसरी जगह तलाश करने लगते हैं। बाकी के लोगों को प्रबंधन प्रमोशन की रिश्वत दे कर रोक लेता है। इतना सब कुछ होने पर भी मुकुट जी के नसीब में ज़्यादा दिनों तक संपादक बनना नहीं लिखा था। जो इंसान संपादकीय स्तंभ तक लिखने की क्षमता ना रखता हो वह कैसे उस पोस्ट को संभाल सकता है। उन की अयोग्यता पर उन्हें वहां से दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया जाता है।

चार दिन की चाँदनी और फिर अंधेरी रात
एम डी ने धकिया दिया मार पिछाड़े लात।   

उन की इस दशा पर ग़ालिब का एक शेर भी याद आ रहा है:

‘निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले। ‘

अखबारी दुनिया में एक क्रांति सी आने लगती है। अखबार छापने की नई मशीनें, नए प्रिंटर्स और कंप्यूटर्स आने से लोगों में कार्यक्षमता बढ़ने लगती है। लेकिन साथ में भ्रष्टाचार भी छूत के रोग की तरह फैलना शुरू हो जाता है। लोगों के जो काम बिना रिश्वत के हो जाते थे अब बिना पैसे का लेन-देन के कोई काम बनना मुश्किल होने लगा, हर जगह भ्रष्टाचार पसरने लगा। मुकुट जी के जाते ही उन की जगह अखबार के मालिक को रिश्वत देकर मुख्यमंत्री की सिफ़ारिश पर उन के एक रिपोर्टर चमचे की नियुक्ति हो जाती है। जो हर तरह के अवैध कामों में माहिर है। एक और अख़बार का संपादक व्यभिचारी है व गुंडई के काम करता व करवाता रहता है। लोगों ने इसे भइया नाम दे दिया। और भइया जैसे लोग बड़े शातिर होते हैं जो अपने मालिकों और मैनेजमेंट की चमचागिरी करके, अकसर उन के काम बनवा कर उन का दिल जीत लेते हैं; फिर आफिसों में बैठे मनमानी करते हैं। इस नए संपादक से लोग खुश हैं क्यों कि यह अपने सहयोगियों को चीजें उधार दे कर उन का भी दिल जीत लेता है। फिर कोई उस की करतूतों पर चूं नहीं करता। इधर दूसरे अखबार ‘आज़ाद भारत’ से होड़ लेने लगते हैं और इस की नींव हिलने लगती है। अन्य नए अखबारों की संख्या बढ़ती है और फ्रीलांस जर्नलिज़्म की बाढ़ सी आने लगती है। ऐसे समय में लालच और लोभ का मारा अखबार का मालिक अपने अंग्रेजी अखबार की जयंती मनाते हुए मौका देख कर प्रधान मंत्री का इस्तेमाल कर के अपने लिए फैक्ट्रियों के लाइसेंस साइन करा लेता है। ऊपर से साफ सुथरी इमेज और अंदर ये काले कारनामे। इस उपन्यास में अखबार के मालिकों की काली करतूतों के खुलासे हैं जिन की कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पढ़ते हुए ऐसे ढोंगी लोगों की तसवीरें दिमाग में उभरने लगती हैं। अखबारी काम को व्यवसाय बना कर ये लोग इस तरह बड़ी-बड़ी मिलें और शिपिंग कंपनी तक खरीद कर उन के भी मालिक बन बैठते हैं। पैसे के लोभी चेयरमैन और मालिकों की दुनिया में शराब आदि के ठेकों की डील करने में मंत्रियों को भारी रकम दी जाती है। इस तरह के खेलों में जेल जाना भी इन की जिंदगी का एक हिस्सा बन जाता है। पर ये लोग जल्दी ही कोई तिकड़मबाजी करके जमानत होने पर छूट भी जाते हैं। इन की आंखों में वैभव की चमक होती है शर्म नहीं। अखबारों की दुनिया के बाहर भी इन लोगों की दुनिया शराब और व्यभिचार से भरी है। क्या-क्या चालें ये खेलते हैं इन्हें इस उपन्यास में पढ कर मन दंग रह जाता है। मन सोचता है कि क्या वाकई में अखबार के मालिकों व संपादकों का इतना मानसिक पतन हो चुका / रहा है कि उन का जीवन राजनीति, गुंडई, चाटुकारिता और व्यभिचार की दुनिया में उलझ कर रह गया। पर जेल जाने या कोई और बदनामी होने पर भी इन की महिमा कम नहीं होती।

इंसान जितना बुद्धिमान होता जा रहा है उस का मानसिक पतन भी होता जा रहा है। बुद्धिमानी का दुरुपयोग कर के कुकर्मी हो रहा है, दूसरों को कुचल रहा है। पैसा, मान, इज्ज़त और ऊंचे शिखर छूने की चाहना क्या शराब की महफ़िलों, भ्रष्टाचार और व्यभिचार से ही पूरी की जा सकती है ? सीधे सरल कर्मचारियों को भी अपने से ऊंचे पद वालों का अनुसरण करना पड़ता है। फिर भी ना उन की नौकरी की गारंटी ना उन के भविष्य की सुरक्षा। अपने लालच व सुख के लिए  ये न्यूजपेपर के मालिक सब को शराब के मद सागर में बहा ले जाते हैं। इंसान के संस्कार व मान्यताओं की कोई कीमत नहीं। इस दुनिया में बड़ी मछली छोटी को निगलती जाती है। और राजनीति के जाल में फंस कर इस के छोटे कर्मचारियों की मौत होती रहती है। जहां अपनी गंदी चाल से मैनेजमेंट यूनियन के मुख्यमंत्री को भारी रिश्वत दे कर एक ही बार में खरीद लेता है और वो उन के आगे दुम हिलाने लगता है तो बाकी लोगों का क्या हो? यूनियन के कदम अपने कर्मचारी भाइयों के संग अन्याय के विरुद्ध उठने बंद हो जाते हैं। पैसा में कितनी ताकत है कि ये इंसान की इंसानियत तक खरीद लेता है। जब यूनियन का लीडर ही भ्रष्ट हो कर मैनेजमेंट के आगे दुम हिलाने लगे तो यूनियन का संगठन भंग होने में कितनी देर लगती है? सब भाईचारा एक तरफ रखा रह जाता है। और जहां तक संपादकों की बात है तो जहनी लोग शराब, व्यभिचार में डूब कर भी अच्छे संपादक हो सकते हैं। लेकिन सवाल उठता है कि किसी बड़ी पोजीशन को प्राप्त करने व किसी बड़ी संस्था में काम करने वालों को क्या शराब, भ्रष्टाचार व व्यभिचार को भी अपनाना ज़रूरी होता है? क्या इस के बिना काम नहीं चल सकता? क्या ऊंची ख्वाहिशें रखने वालों का इन सब के बिना काम नहीं चल सकता? हर जगह राजनीतिक दांव-पेंच व षड्यंत्र चल रहे हैं। कभी खुले आम तो कभी पीठ पीछे। एक मंत्री का चमचा रिपोर्टर से सीधे संपादक बन सकता है जैसा कि मुकुट जी के बाद का संपादक। जिस ने आते ही मालिक की चमचागिरी करनी शुरू कर दी और अपने कर्मचारियों की छोटी-मोटी हेल्प कर के उनके दिल जीत लिए। पब्लिक में बदनामी होती है पर इस से उस के रुतबे पर अधिक असर नहीं पड़ता क्यों कि ताकत उस के हाथ में है और कर्मचारी उस के हाथों में कठपुतलियां। पर जिस तरह एक अयोग्य संपादक अधिक दिनों अपनी पोस्ट पर बरकरार नहीं रहता उसी तरह एक प्रतिभाशाली संपादक भी अपने खराब चरित्र से कई बार अपनी पोस्ट से हाथ धो बैठता है। जैसा कि इस उपन्यास के पात्र मनमोहन कमल जी के साथ हुआ।अखबार ‘सांध्य दैनिक’ नहीं चल पाया और मनमोहन कमल अपने अवैध संबंधों के कारण मुसीबत में जो फंसे तो अपनी पोस्ट से ही हाथ धो बैठे। लेकिन वो इतने बेशर्म हैं कि बदनामी को झेलते हुए भी उन की स्त्रियों पर रीझने की आदत नहीं गई। और ये भी देखिए कि ठाठ-बाट से रहने वाले इस इंसान की किस्मत इतनी अच्छी है कि अपने लेखन की सराहना व काबिलियत के कारण ‘आजाद भारत’ के प्रधान संपादक बन बैठते हैं। इन का बुरा चरित्र लोगों की बातों का विषय रहता है पर फिर भी लोग इन की प्रतिभा के कायल रहते हैं। मतलब ये की आज की दुनिया में अपनी बदनामी से कोई चुल्लू भर पानी में डूब कर मरने की नहीं सोचता बल्कि ऐसे लोग समाज में सिर उठा कर चलते हैं। और उन के कुकर्मों पर लोग उन के मुँह पर थूकने की बजाय उन की प्रतिभा या काबिलियत के कायल रहते हैं। क्या पाप है क्या निष्पाप है इस पर लोग कुछ देर खुसुर-फुसुर करते हैं फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है तो पापी परवाह क्यों करने लगा। सुनील जैसे पुराने कर्मचारी जो ये सब खेल देखने के अभ्यस्त हो रहे हैं और अपनी जुबान चुप रखते हैं उन्हें भी नए मैनेजमेंट की चालों से इस्तीफ़ा देना पड़ता है। और मनमोहन कमल जी जैसे लोग संपादन के साथ व्यभिचार में भी निपुण होते हैं। और उन के कदमों पर चलने वाले सूर्य प्रताप जैसे रिपोर्टर जब आते हैं तो वो प्रतिभाशाली होने के साथ चुस्ती में उन से भी दो कदम आगे होते हैं। जैसे सूर्य प्रताप मनमोहन जी से मिलते ही अपने को ब्यूरोचीफ कहने लगता है।

मनमोहन जी ने ‘आज़ाद भारत’ की रूप-रेखा तो बदली ही साथ में अपने स्टाफ में अपने जैसे जहनी व व्यभिचारी पत्रकारों की नियुक्ति कर ली। और कुछ सुंदर पत्रकार लड़कियों का चयन करके उन की तो बल्ले-बल्ले हो गई। सब कुछ उन के ही हाथ। उन्हों ने अखबार में चार चांद लगा दिए। किंतु फिर उस की चांदनी में अधिक दिनों तक नहा नहीं सके। किया तो प्रेम विवाह था किंतु पत्नी अब शायद कहीं कबाड़ की तरह पड़ी होगी। सुंदर औरतों से प्रेम के लफड़े मनमोहन कमल जैसे लोगों के जीवन में रोज की बात होती है। और अंत में उन के पतन का कारण भी एक औरत ही बनी जिस का लोगों को पहले से ही अंदेशा हो चुका था। पहले भी एक बार इसी चक्कर में फंस कर अपना जाब खो चुके थे। इतने अकलमंद हो कर भी आदत से लाचार हो कर स्त्रियों से अपने अवैध संबंधों के लिए बदनाम थे। किसी को भांग और चरस के नशे की लत होती है तो मनमोहन कमल का नशा सुंदर स्त्रियां थी। दिल्ली के आफिस में जिस सुंदर फीचर एडिटर को वो चाहते थे एक दिन उस पर सी ई ओ की आंखें भी अटक गईं और उस पर वे लट्टू हो गए। फिर क्या था बस तन गई मनमोहन और सीईओ के बीच में। मनमोहन कमल का बर्ताव हर किसी से फरक-फरक था। उन के जैसे तमाम लोग बड़ी नफासत और शालीनता से रहते हैं लेकिन उन की शालीनता के पीछे धूर्तता और कमीनापन छिपा रहता है। व्यवहार कुशलता उन के बर्ताव की खासियत होती है कभी ‘जल्लाद, सनकी और तानाशाह कभी निहायत उदार और भाईचारे वाला।’ औरतों के मामले में अपने लफंगेपन के कारण बदनाम, राजनीति, शराब, भ्रष्टाचार और व्यभिचार की काकटेल पीते हुए मनमोहन और दूसरे अखबार का संपादक भइया इन दोनों की आपस में पटरी कभी नहीं बैठी। एक तरफ नफ़ासत और शराफत का चोला पहने हुए  मनमोहन और दूसरी तरफ खुले आम अपनी गुंडई के लिए जाने वाले भइया दोनों ही अपनी पोजीशन के नशे में चूर रहते हैं। और एक दूसरे के साथ लुच्चईपने पर उतर आते हैं। अपमान करने की होड़ में पत्रकार भी पीछे नहीं रहते। लेकिन बाद में उन्हें अपनी औकात का पता चलता है। पत्रकार, संपादक आदि सभी मंत्रियों को खुश करने में क्या कुछ नहीं करते। मंत्रियों को अपनी अच्छी पब्लिसिटी करने की भूख रहती है और संपादकों को बजट पास कराने की। ये खेल ऐसा हुआ ‘तू मेरी पीठ खुजा और मैं तेरी’। इस अंधेर नगरी में सब अपने लिये रोशनी ढूंढते  फिरते हैं। और गजब तो होना ही था। पहला गजब हुआ सुंदरी फीचर एडिटर को ले कर और दूसरा हुआ जब मुख्यमंत्री की शान में ‘आज़ाद भारत’ ने ऐसे कसीदे काढ़े कि और अखबार हाथ मलते रह गए। और भइया तो पहले से ही मनमोहन कमल से जले-भुने बैठे थे। ऊपर से अब उन के चेला-चपाटे भी उन के अखबार को पत्रकार यानि दलाल की उपाधि दे बैठे। जले पे ये नमक कैसे बर्दाश्त हो? इधर हिंदी अखबार के संपादक मनमोहन जी मंत्रियों को मुट्ठी में रखने को उन के नखरे उठाने में माहिर हैं तो दूसरी तरफ अंग्रेजी अखबार के प्रधान संपादक मेहता को मनमोहन का ये अंदाज बिलकुल पसंद नहीं आता। उन्हें अपने मालिक या किसी राजनीतिज्ञ की चाटुकारिता करना बिलकुल पसंद नहीं इस लिये वे अपना इस्तीफ़ा दे देते हैं। इस बात पर दयानंद जी के एक और उपन्यास ‘वे हारे हुये’ में मुख्य भूमिका निभाने वाले पात्र आनंद की याद आ जाती है जिसे मेहता जी की तरह ही अपने उसूल प्यारे हैं। ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ को जैसे-जैसे पढ़ते जाइए  तो अखबार के व्यवसाय की आड़ में क्या-क्या अनर्थ होता है इस का खुलासा होता रहता है। अखबार जैसी संस्था में भी ऐसे कुत्सित कर्म होते हैं कि पढ़ कर आंखें खुल जाती हैं। लेकिन संबंधों को बिगड़ने में देर नहीं लगती। जब तक किसी के मन की होती रहे तो सब चंगा वरना सब किया धरा गुड़ गोबर हो जाता है। जैसे कि मुख्यमंत्री जी की याददाश्त शराब की सप्लाई की डील वाली बात पर धोखा खा जाती है और फिर उन की चेयरमैन से बिगड़ जाती है और पैसे की बात पर आंख दिखाने लगते हैं। बाद में पता चलता है कि डील का वो पैसा संपादक ने अपनी गोट कर लिया था। तो मंत्री जी को भी अपनी याददाश्त की गड़बड़ी पर कोई मलाल नहीं होता। सब के सब अपनी पोजीशन में भ्रष्ट हैं और पैसे का नाजायज फायदा उठा रहे हैं। अखबार बंद होने की नौबत आ गई और मनमोहन कमल के पैरों के नीचे धरती खिसकने लगती है। ख़बरों की दुनिया में अखबार व पत्रिकाएं  निकलते हैं और फिर अचानक बंद हो जाते हैं। राजनीति और पत्रकारिता का अब जैसे घी शक्कर सा संबंध है। ये दोनों एक दूसरे में इतने गुंथे हैं कि एक दूसरे के बिना इन का सांस लेना मुश्किल है। अखबार व्यवस्था व मालिकों के गंदे खेलों के बीच उन के कर्मचारियों  का भविष्य झूलता है। ये राजनीतिक खेलों के खिलाड़ी अपने कर्मचारियों को मोहरों की तरह इस्तेमाल करते हैं। कौन जाने कब उन्हें उठा कर फेंक दें। अखबार बंद होने पर भ्रष्ट संपादक और अखबार के मालिक पर असर नहीं बल्कि मीडिया से जुड़े अन्य कर्मचारियों पर पड़ता है। अपने से ऊपर के लोगों की मदद करते हुये वो कर्मचारी लोग बाद में फंसा दिए जाते हैं और नौकरी से निकाल दिए जाते हैं।

सुनील और सूर्य प्रताप जैसे लोग उदाहरण हैं। एक प्रतिष्ठित अखबार से निकाले जाने पर जो कड़वाहट पैदा होती है वो ‘अंगूर खट्टे हैं’ वाली बात हो जाती है। जैसे सूर्यप्रताप ने पान वाले से कहा, ‘पता है आज मैं ने इस्तीफा दे दिया इस रंडी अखबार से।’ अखबार बंद होने पर या उस का मालिक बदल जाने पर कर्मचारी अपनी रोजी-रोटी से हाथ धो बैठते हैं। गरीबी में पले सूर्य प्रताप जैसे लोग पता नहीं कितने संघर्ष सहते हुए पढ़ाई आदि पूरी कर के मीडिया में किसी पद को हासिल करते हैं और फिर एक दिन इन्हीं अखबार के मालिकों के लिए काम कर के किसी भी फ्राड में फंसा दिए जाते हैं और नौकरी छिन जाती है। जैसे रेत में बना घरौंदा मिट जाता है, ’उस की ज़िंदगी में भइया और मनमोहन कमल जैसे लोग आ गए। एक निर्दोष मासूम आदमी, एक कवि, एक जुझारू और संघर्षशील पत्रकार को इन लोगों ने अपने हितों के लिए दलाल बना दिया। दलाल पत्रकार का ठप्पा लगा दिया। सूर्यप्रताप के जुझारू तेवर को अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये कुछ राजनीतिज्ञों ने भी साधा। सुविधाओं और शराब की चाशनी में पग कर एक जुझारू पत्रकार जो सिर्फ खबरों के लिए जीता था, ख़बरों के लिए मरता था, उस का पतन हो गया।’ कितनी बार पिटाई हो जाना, जेल जाना आदि जैसे इन के जीवन का हिस्सा हो जाते हैं। और खाली सूर्यप्रताप, सुनील और मनमोहन ही नहीं बल्कि उन के जैसे ही कितने कर्मचारी अपने मालिकों की घातक चालों से तबाह हो जाते हैं। उस के बाद नौकरी के लिए ठोकरें खाते हुए फिर भटकना, किसी की चौखट पर नाक रगड़ना चालू हो जाता है। मीडिया के प्रोफेशन में भी कितने धक्के खाने होते हैं। सूर्यप्रताप कहां ब्यूरो चीफ था फिर स्ट्रिंगर पत्रकार। इंसान काम करते हुए समय की धार में अपने आदर्शों की बलि दे कर भी घुट-घुट कर मरता रहता है। अखबारों के मालिक जब कंपनी बेचते हैं तो उन के मालिक भी बदल जाते हैं। और इस सब का प्रभाव उनके नीचे काम करने वाले कर्मचारियों पर पड़ता है। अस्सी के दशक के लखन जैसे लोग जो हर जुलूस, मोर्चे, हड़ताल व आंदोलन पर हारमोनियम पर गाने लगते थे उन की हारमोनियम तोड़ दी जाती है। मीडिया के दिल भी हारमोनियम जैसे हैं जो बजते-बजते किसी पत्थर की चोट से टूट जाते हैं। सुनील जैसे लोग अपने चारों तरफ नैतिकता को स्वाहा होते देखते हैं पर खामोश रहते हैं। पर उन्हें भी भइया जैसे गुंडे संपादक नहीं छोड़ते। उन पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा कर इस्तीफा दिला कर अत्यचार करते हैं। किसी प्रकार की खुराफात व धांधलेबाजी से कोई गड़बड़ हो जाने पर जब किसी अखबार की मौत होती है तो उस के साथ उसके कितने ही कर्मचारी भी जीते जी मर जाते हैं। जीवन के उतार-चढ़ाव में आजकल माफिया, दो नंबर का पैसा, संपादकों की गुंडई, ऐयाशी और पत्रकारिता में घुसी राजनीति क्या गुल खिलाती है और कितने लोगों के जीवन बर्बाद कर देती है इसे इस उपन्यास को पढ़ कर ही जाना जा सकता है। ऐयाश लोगों की आंखों में हया नहीं लालच और वासना होती है। और मीडिया में काम करने वाले लखन जैसे लोगों की हारमोनियम जब तोड़ी जाती है तो उस के साथ-साथ कितने कर्मचारियों की नौकरियां  छिन जाती हैं। हजारों दिल चूर-चूर  हो जाते हैं जिन के टुकड़े फिर कभी नहीं जुड़ पाते। सूर्यप्रताप, लखन और सुनील जैसे कितने ही गरीब परिवार से आए संघर्ष करते हुये मीडिया की नौकरी में आकर अपने को खुशनसीब समझते हैं किंतु इस में उन का ईमान बिक जाता है। और फिर अपने अधिकारियों व मैनेजमेंट की चालों में फंस कर अपनी नौकरी से हाथ धो बैठते हैं। लखन, सुनील, सूर्यप्रताप, मेहता, भइया और मनमोहन कमल जैसे पात्रों से पहचान होने पर उन की ही तरह के अनेकों लोगों के जीवन की झांकी मिलती है। दयानंद जी ने इस उपन्यास में अखबारी दुनिया के हर पहलू व इस से संबंधित तमाम बारीकियों का उल्लेख किया है। अखबारों की व्यवसाई दुनिया का एक भयानक रूप दिखाया है। जहां  धूर्त और चालाक लोग अपनी खुदगर्जी के लिए औरों का जीवन बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। समकालीन जीवन से जुड़े इस नायाब लेखन पर लेखक को मेरा साधुवाद।

शन्नो अग्रवाल

[शन्नो अग्रवाल कोई पेशेवर आलोचक नहीं हैं। बल्कि एक दुर्लभ पाठिका हैं। कोई आलोचकीय चश्मा या किसी आलोचकीय शब्दावली, शिल्प और व्यंजना या किसी आलोचकीय पाठ से बहुत दूर उन की निश्छल टिप्पणियां पाठक और लेखक के रिश्ते को प्रगाढ़ बनाती हैं। शन्नो जी इस या उस खेमे से जुडी हुई भी नहीं हैं। यू के में रहती हैं, गृहिणी हैं और सरोकारनामा पर यह और ऐसी बाक़ी रचनाएं पढ़ कर अपनी भावुक और बेबाक टिप्पणियां अविकल भाव से लिख भेजती हैं।]

प्रस्तुत लेख वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार दयानंद पांडेय के ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है। उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है।

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