‘अपने-अपने युद्ध’ जब भड़ास पर छपा तो इंटरनेट की ताकत पता चली!

Dayanand Pandey : तब प्रिंट का समय था। पर जल्दी ही नेट का समय आ गया। उस में भी यशवंत सिंह भड़ास4मीडिया ले कर उपस्थित हुए। 2001 में अपने-अपने युद्ध छपा था। 9 साल बाद 2010 में भड़ास पर ‘अपने-अपने युद्ध’ का धारावाहिक प्रकाशन शुरू किया यशवंत ने। जैसे आग लग गई। वह कहते हैं …

महिला पत्रकार सीत मिश्रा के पहले उपन्यास ‘रूममेट्स’ में मीडिया का निर्मम चेहरा!

‘रूममेट्स’ सीत मिश्रा का लिखा पहला उपन्यास है। ‘रूममेट्स’ को कुछ देर पढ़ा तो अपनी कहानी लगी, थोडा और पढ़ा तो हम सब की कहानी लगी, ख़त्म किया तो लगा यही हमारे समय का सच है। ‘मी टू मुहिम’ के दौर की यह सबसे बड़ी किताब मानी जा सकती है, जिसमें मीडिया का ऐसा निर्मम …

उपन्यास पार्ट (2) : तेरे पर भी उसकी बुरी नजर है…

पार्ट वन से आगे…. पहली ही नजर में आनंद आहूजा के पापी मन में उस अनजान लड़की के साथ आनंद लेने की कामनाएं हिलोर मारने लगी…उसने रिसेप्शन पर फोन किया कि अभी जो लड़की सक्सेना के मिलकर निकली है…उसे मेरे चैंबर में भेजो…जगजीत ने फुर्ती दिखाते हुए प्रीति को आवाज भी दी…लेकिन तब तक लिफ्ट …

उपन्यास पार्ट (1) : सक्सेना बड़ा काइयां था… नई माल देख उसके अंदर का मर्द जग गया…

जैसे ही वो लड़की लिफ्ट से निकलकर गुड़गांव यानी अभी के गुरूग्राम के डीएलएफ फेज-2 स्थित ‘साड्डा हक’ न्यूज़ चैनल के रिसेप्शन की ओर बढ़ी…सबकी आंखें खुली की खुली रह गईं…जिसने भी उसे देखा…दंग रह गया…सब उसे एकटक देखते रह गए…किसी को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था…कई तो इस कदर खो गए …

पुष्य मित्र के उपन्यास ‘रेडियो कोसी’ में रेणु की भाषा की गूंज आपको जरूर सुनाई देगी

Pushya Mitra : लीजिये। नये साल के दूसरे दिन ‘रेडियो कोसी’ सुनिये, लिंक ये https://youtu.be/oQyokiwol7c  है। परिकल्पना है Basu Mitra की। आवाज Shefali Chaturvedi की। वीडियो संयोजन दोस्त Pashupati Sharma के मित्र परवेज ने किया है। फाइनल शेप Shailendra Kumar ने दिया है, जिनका पता Avinash Gautam से मिला। Arun Chandra Roy तो चीफ प्रोड्यूसर हैं ही। पसंद उन लाखों कोसीवासियों की है जो कोसी तटबंध के बीच बसे 300 गांवों में रहते हैं।

संस्मरण : ग़ालिब छुटी शराब (भाग 1)

‘ग़ालिब’ छुटी शराब, पर अब भी कभी-कभी
पीता हूँ रोज़े-अब्रो-शबे-माहताब में

13 अप्रैल 1997। बैसाखी का पर्व। पिछले चालीस बरसों से बैसाखी मनाता आ रहा था। वैसे तो हर शब बैसाखी की शब होती थी, मगर तेरह अप्रैल को कुछ ज्यादा ही हो जाती थी। दोपहर को बियर अथवा जिन और शाम को मित्रों के बीच का दौर। मस्‍ती में कभी-कभार भाँगड़ा भी हो जाता और अंत में किसी पंजाबी ढाबे में भोजन, ड्राइवरों के बीच। जेब ने इजाजत दी तो किसी पाँच सितारा होटल में सरसों का साग और मकई की रोटी। इस रोज दोस्‍तों के यहाँ भी दावतें कम न हुई होंगी और ममता ने भी व्‍यंजन पुस्‍तिका पढ़ कर छोले भटूरे कम न बनाए होंगे।

‘गुनाहों का देवता’ अंग्रेजी में ‘चंदर एंड सुधा’

1949 में प्रकाशित ‘गुनाहों का देवता’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘चंदर एंड सुधा’ के नाम से आया है। अनुवाद पूनम सक्सेना ने किया है और पेंगुइन ने प्रकाशित किया है। मैंने अनुवाद अभी नहीं पढ़ा है पर उसकी तारीफ पढ़ी है। हालांकि मुझे अंग्रेजी का नाम ही नहीं जम रहा है। विभिन्न भारतीय भाषाओं में इसके सौ के करीब संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इससे इसकी लोकप्रियता का अंदाजा लगता है और ऐसे में इसके नाम का बहुत मतलब नहीं है। किताब अपने नाम से ज्यादा लेखक और इसकी बेहद रोमांटिक प्रेम कहानी के लिए पढ़ी जाएगी। इस उपन्यास की लोकप्रियता के मद्देनजर कहा जा सकता है कि अंग्रेजी अनुवाद काफी देर से आया है। ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो एक समय इसे पसंद करते थे पर अब उन्हें इसमें कुछ खास नहीं लगता। खुद धर्मवीर भारती ने उपन्यास के नए संस्करण के दो शब्द में लिखा है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ? अधिक-से-अधिक मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता उन सभी पाठकों के प्रति व्यक्त कर सकता हूँ जिन्होंने इसकी कलात्मक अपरिपक्वता के बावजूद इसको पसन्द किया है। मेरे लिए इस उपन्यास का लिखना वैसा ही रहा है जैसा पीड़ा के क्षणों में पूरी आस्था से प्रार्थना करना, और इस समय भी मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं वह प्रार्थना मन-ही-मन दोहरा रहा हूँ, बस…।

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार प्रदीप सौरभ के नए उपन्यास ‘और सिर्फ तितली” के कुछ अंश पढ़ें…

सबसे पहले आप जानें कि उपन्यास ”और सिर्फ तितली” के बारे में वरिष्ठ विश्लेषक और आलोचक सुधीश पचौरी का क्या कहते हैं: ”प्रदीप सौरभ का नया उपन्यास  ‘और सिर्फ तितली’,  पब्लिक स्कूली शिक्षा के भीतरी परतों को एक-एक कर खोलते हुए पब्लिक स्कूली शिक्षा जगत की अंदर की खुश्बू और सड़ांध को कुछ इस तरह पेश करता है कि आप पहली बार इस अनजाने, अनकहे जगत के समक्ष खडे़ हो जाते हैं, और अपने आप से पूछने लगते हैं कि आखिर वे क्या कारण है, जिनके चलते हमारी स्कूली शिक्षा और  शिक्षण पद्धति अपनी सारी चमक दमक और दावों के बावजूद इस कदर खोखली और संस्कारविहीन हो चली है?  छोटे-छोटे बच्चों की मासूमियत, उनकी जिज्ञासा एवं उनकी ज्ञान-पिपासा, उनका सोच-विचार, उनकी रचनात्मकता, उनका साहस, उनकी प्रयोग-प्रियता किस तरह से कुंठित होती जाती है? किस तरह से सुयोग्य, अच्छे और गुणी अघ्यापक और अघ्यापिकाएं अपने संस्थान के प्रबंधन की दोहन एवं शोषण नीति के चलते उत्साहविहीन होते जाते हैं? किस तरह से उनका शोषण किया जाता है? किस तरह वे आपसी मनमुटाव, टुच्ची गुटबाजी भरी राजनीति के चलते अपने सपनों को चकनाचूर होते देख मनोरोगों तक के शिकार होते रहते हैं? और किस तरह शिक्षा के इस महंगे तिलिस्म का कोई तोड़ नहीं है?  और अगर कोई उसे तोडने की कोशिश करता है तो उसका क्या हश्र होता है? इन्हीं तमाम पहलुओं पर यह उपन्यास दिलचस्प शैली में रोशनी डालता है। उपन्यास की खासियत यह है कि आप इसे एक ही सीटिंग में पढ़ते चले जा सकते हैं। यही प्रदीप सौरभ की कथा-कलम की विशेषता है, जो उनके पहले के उपन्यासों ‘मुन्नी मोबाइल’, ‘तीसरी ताली’ और ‘देश भीतर देश’ में भी पूरी शिद्दत के साथ मौजूद है।

टीवी न्यूज़ मीडिया पर चंदन की शीघ्र प्रकाशित होनेवाली किताब ‘काजल की कोठरी’ के कुछ अंश…

चैनल का मालिक समय से पहले चैनल चलानेवाले अधिकारी को कर्मचारियों की पगार दे देता था। लेकिन वो अधिकारी पहली या सात तारीख़ को भी कर्मचारियों को पगार नहीं देता था। बताते हैं कि वो उस रक़म को ब्याज़ की ख़ातिर व्यापारियों को दे देता था। कम पगार वाले कर्मचारियों के बहुत रोने –गाने पर वो 20-22 तक सैलरी देता था। यानी हाड़ तोड़ मेहनत करनेवाले कर्मचारियों को उनकी मेहनत का पैसा जैसे-तैसे महीने के आख़िर में मिलता था। मझोले और बड़े कर्मचारियों का तो और भी बुरा हाल था। उन्हें तो पगार उस समय मिलती थी, जब दूसरा महीना ख़त्म होने वाला होता था। कोढ़ पर खाज वाली बात तो ये भी थी कि चैनल के एक कार्यकारी संपादक महोदय सीईओ साहिब को रोज़ ये ज्ञान देते थे कि पत्रकारों को समय पर और ज़्यादा पैसे नहीं देने चाहिए। क्योंकि ज़्यादा सुखी होने पर ऐसे मुलाज़िम सीनियरों को दुखी करने की राजनीति करने लगते थे।

अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो तो ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ उपन्यास ज़रूर पढ़ें

DN Pandey

दयानंद पांडेय

मैं दयानंद जी के ‘बांसगांव की मुनमुन’ उपन्यास को भी पढ़ चुकी हूं जो एक सामाजिक उपन्यास है। समय के साथ हर चीज़ में परिवर्तन होता रहा है। चाहें वो प्रकृति हो या इंसान, सामाजिक रीति-रिवाज या किसी व्यावसायिक संस्था से जुड़ी धारणाएं। इस उपन्यास ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ में समय के बदलते परिवेश में अखबारी व्यवस्था का बदलता रूप दिखाया गया है। जिस किसी भी को अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो उन से मेरा कहना है कि वो इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। उपन्यास के आरंभ में सालों पहले अस्सी के दशक की दुनिया की झलक देखने को मिलती है जो आज के अखबारों की दुनिया से बिलकुल अलग थी। धीरे-धीरे अखबार के मालिक, संपादक और कर्मचारियों के संबंधों में बदलते समय की आवाज़  गूंजने लगती है।

गांधीवादी राजनीति का सपना देखने वाला, आज की जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति से हारता आनंद

DN Pandey

दयानंद पांडेय

आज के जमाने में सिद्धांतों और आदर्शों पर चलना हर किसी के वश  की बात नहीं। इंसान जीवन के आदर्शों को अपने स्वार्थ की खातिर भेंट चढ़ा देता है, कभी विवशता से और कभी स्वेच्छा से। दयानंद जी के इस उपन्यास ‘वे जो हारे हुए ‘ में राजनीति में उलझे या ना उलझे लोगों का ऐसा जखीरा है जिस में इंसान किसी और इंसान की कीमत ना आंकते हुए दिन ब दिन अमानवीय होता जा रहा है।

अपने-अपने युद्ध (9)

शांति प्रिय और आध्यात्मिक स्वभाव वाले आईएएस अफसर मुकेश पांडेय बिहार में बक्सर के जिला मजिस्ट्रेट हुआ करते थे. एक शाम वे सर्किट हाउस में अकेले रुकते हैं और खुद का एक वीडियो रिकार्ड करने लगते हैं. यह वीडियो अब उनके जीवन का अंतिम वीडियो बन चुका है. यह वीडियो उनकी निजी जिंदगी की दिक्कतों और जीवन के प्रति उनके नजरिए का गवाह बन जाता है. सुसाइड से ठीक पहले रिकार्ड किए गए इस वीडियो में उन्होंने पांच मिनट में ही काफी सारी बातें कही हैं.

अपने-अपने युद्ध (10)

बेचारा. पहले तो गिर गया. दाएं बाएं नहीं बल्कि गहरे नाले में. उसे निकालने फायर ब्रिगेड वाले आए और अंदर घुसे. उसे निकालने से पहले नाले में ही फायर ब्रिगेड कर्मियों ने जमकर पीटा. जब उसे बाहर निकाल दिया गया तो अब बारी पुलिस वालों की थी. इसे ही कहते हैं एक शराबी का बुरा दिन. इस महान शराबी का नाम है सुखवीर. मामला आगरा में थाना लोहामंडी क्षेत्र के नालबंद चौराहे का है. यहीं पर गहरे नाले में सुखवीर नाम यह शराबी नशे की हालत में गिर गया था.

अपने-अपने युद्ध (8)

भाग (7) से आगे… तब वह दिल्ली में जंगपुरा एक्सटेंशन में रहता था। घर पहुंच कर संजय ने रगड़-रगड़ कर नहाया। पर रीना की देह गंध जैसे उसके अंग-अंग में समा गई थी, निकल ही नहीं रही थी। “रात भर कहां थे?” होंठ गोल करते हुए उसके ऊपर रहने वाले श्रीवास्तव ने पूछा। श्रीवास्तव भी …

अपने-अपने युद्ध (7)

भाग (6) से आगे… नीला लंबी छुट्टी पर चली गई। पर अचानक महीने भर में ही छुट्टियां कैंसिल कर वह वापस आ गई। क्या तो, वह लीव विदआउट पे हो रही थी। लगातार बच्चे पैदा करने में छुट्टियां पहले ही खत्म हो चुकी थीं। और घर वालों को उसकी तनख्वाह की आदत पड़ गई थी। …

अपने-अपने युद्ध (6)

पार्ट (5) से आगे…. एक बार राजेश खन्ना नाइट दिखाने की तल्ख ने उसे पेशकश की। वह खुशी-खुशी मान गई। तल्ख ने राजेश खन्ना नाइट में दो मिले कार्डों में से एक उसे दिया। दोनों पर सीट नंबर थे। दोनों ही सीटें साथ की थीं। तल्ख मगन था टेलीफोन आपरेटर को कार्ड देकर कि बगल …

अपने-अपने युद्ध (5)

भाग (4) से आगे… शाम को उसका मन हुआ कि आज वह नाटक देखने न जाए। पर चूंकि पंजाबी लेखिका अजीत कौर की आत्मकथा “खानाबदोश” का मंचन था सो वह जाने का लोभ छोड़ नहीं पाया। खानाबदोश वैसे भी उसने पढ़ रखी थी। खानाबदोश के पहले उसने दो और महिला लेखिकाओं की आत्मकथा पढ़ी थी। …

अपने-अपने युद्ध (4)

भाग (3) से आगे…. संजय अब तक बस से उतर कर अपने घर वाले बस स्टाप पर आ गया था। उसने बस स्टाप वाली पान की गुमटी से सिगरेट की डब्बी खरीदी और एक माचिस भी। हालांकि रस्सी यहां भी जल रही थी। पर पता नहीं क्यों रस्सी से सिगरेट सुलगाने में उसका मजा खराब …

अपने-अपने युद्ध (3)

भाग-2 से आगे…. उस रात अजय बड़ी देर तक मैकवेथ के डायलाग्स सुनाता रहा कई-कई अंदाज में। डायलाग्स सुनते-सुनते संजय दुष्यंत कुमार के शेर सुनाने लग गया। फिर जाने कब फिल्मी गानों पर बात आ गई और दोनों गाने गुनगुनाने लगे। एक बार हेमंत के गाए किसी गीत पर झगड़ा हो गया कि साहिर ने …

अपने-अपने युद्ध (2)

भाग-1 से आगे…. खैर, अजय अलका को लेकर बाहर आया। बाहर आकर अलका ने अपने घुंघरू उतारे। और दूसरे दिन उसने कथक नृत्य को तो नहीं पर कथक केंद्र को अलविदा कहने की सोची। अजय को उसने रोते-रोते यह बात बताई। जो अजय को भी नहीं भाई। अजय ने उसे ढांढस बंधाया और कहा कि …

अपने-अपने युद्ध (1)

वह तब भी फ्रीलांसर था जब देवेंद्र से बारह बरस पहले मिला था। और आज जब फिर देवेंद्र से मिल रहा था तो फ्रीलांसिंग भुगत रहा था। फर्क बस यही था कि तब वह दिल्ली में मिला था और अब की लखनऊ में मिल रहा था। …..और देवेद्र? कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद …