सियासत राजनीति के जंगल में औरतों के भूखे न जाने कितने भेड़िये रहते हैं जो उन की देह चाटते रहते हैं अब तक मैं दयानंद जी की 25 कहानियों में गोता लगा चुकी हूं ...यानि उन्हें पढ़ चुकी हूं। जिन में कुछ प्रेम कहानियां ,... October 9, 2014
सियासत अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो तो ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ उपन्यास ज़रूर पढ़ें दयानंद पांडेय मैं दयानंद जी के ‘बांसगांव की मुनमुन’ उपन्यास को भी पढ़ चुकी हूं जो एक सामाजिक उपन्यास है। समय के साथ हर... October 9, 2014
सियासत गांधीवादी राजनीति का सपना देखने वाला, आज की जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति से हारता आनंद दयानंद पांडेय आज के जमाने में सिद्धांतों और आदर्शों पर चलना हर किसी के वश की बात नहीं। इंसान जीवन के आदर्शों को अपने... October 8, 2014