गीतों की चांदनी में एक माहेश्वर तिवारी का होना

गीतों की चांदनी में एक माहेश्वर तिवारी का होना दूब से भी कोमल मन का होना है । गीतों की चांदनी में चंदन सी खुशबू का होना है । मह-मह महकती धरती और चम-चम चमकते आकाश का होना है । माहेश्वर तिवारी के गीतों की नदी में बहना जैसे अपने मन के साथ बहना है । इस नदी में प्रेम की पुरवाई की पुरकशिश लहरें हैं तो चुभते हुए हिलकोरे भी । भीतर के सन्नाटे भी और इन सन्नाटों में भी अकेलेपन की महागाथा का त्रास और उस की फांस भी । माहेश्वर के गीतों में जो सांघातिक तनाव रह-रह कर उपस्थित होता रहता है ।  निर्मल वर्मा के गद्य सा तनाव रोपते माहेश्वर के गीतों में नालंदा जलता रहता है ।  खरगोश सा सपना उछल कर भागता रहता है ।  घास का घराना कुचलता रहता है ।  बाहर का दर्द भीतर से छूता रहता है , कोयलों के बोल / पपीहे की रटन / पिता की खांसी / थकी मां के भजन बहने लगते हैं।  भाषा का छल , नदी का अकेलापन खुलने लगता है।  और इन्हीं सारी मुश्किलों और झंझावातों में किलकारी का एक दोना भी दिन के संसार में उपस्थित हो मन को थाम लेता है ।

हिंदी के चंबल का एक बाग़ी मुद्राराक्षस

अगर मुद्राराक्षस के लिए मुझ से कोई एक वाक्य में पूछे तो मैं कहूंगा कि हिंदी जगत अगर चंबल है तो मुद्राराक्षस इस चंबल के बाग़ी हैं । जन्मजात बाग़ी । ज़िंदगी में उलटी तैराकी और सर्वदा धारा के ख़िलाफ़ चलने वाला कोई व्यक्ति देखना हो तो आप लखनऊ आइए और मुद्राराक्षस से मिलिए। आप हंसते , मुसकुराते तमाम मुर्दों से मिलना भूल जाएंगे। हिप्पोक्रेटों से मिलना भूल जाएंगे । मुद्राराक्षस की सारी ज़िंदगी इसी उलटी तैराकी में तितर-बितर हो गई लेकिन इस बात का मलाल भी उन को कभी भी नहीं हुआ । उन को कभी लगा नहीं कि यह सब कर के उन्हों ने कोई ग़लती कर दी हो । वास्तव में हिंदी जगत में वह इकलौते आदि विद्रोही हैं। बहुत ही आत्मीय किस्म के आदि विद्रोही। पल में तोला , पल में माशा ! वह अभी आप से नाराज़ हो जाएंगे और तुरंत ही आप पर फ़िदा भी हो जाएंगे । वह कब क्या कर और कह बैठेंगे , वह ख़ुद नहीं जानते। लेकिन जानने वाले जानते हैं कि वह सर्वदा प्रतिपक्ष में रहने वाले मानुष हैं ।

तो क्या नीलाभ डूब जाएंगे भूमिका के इस भंवर में ?

कभी राजेंद्र यादव-ज्योति कुमारी, कभी नीलाभ अश्क-भूमिका द्विवेदी….यह हिंदी वाले अंगरेजी वालों से रचना के स्तर पर प्रेरणा बहुत लेते हैं , जीवन के स्तर पर भी क्यों नहीं लेते? यह वी एस नायपाल, यह सलमान रुश्दी वगैरह तो यह सब करते हुए भी अभी जीवित हैं। और बिना किसी थुक्का-फज़ीहत के । यह नारायण दत्त तिवारी बनने की फज़ीहत ज़रुरी है ? और फिर नीलाभ अश्क तो लंदन वगैरह भी रह चुके हैं और एक शानदार लेखक भी हैं। एक बड़े लेखक उपेन्द्र नाथ अश्क के पुत्र हैं। पिता की चार पत्नियां देख जान चुके हैं । उन पर लिख चुके हैं । अश्क जी पर लिखे संस्मरण के बहाने । बहुत ही दिलचस्प संस्मरण । हालां कि लखनऊ से लगायत इलाहाबाद , बनारस और दिल्ली आदि तक हिंदी में भी कई चैंपियन हैं जो यह सब कुछ बड़ी शालीनता से कई-कई जगह निभा रहे हैं। क्रीज़ पर डटे हुए हैं बाक़ायदा बैटिंग करते हुए , बाऊंसर झेलते हुए। असल में यह शौक पालने से पहले महिलाओं के बाऊंसर झेलने की क्षमता जो नहीं रखेगा , ऐसे ही शर्मसार होता रहेगा । 

अकबर का यह अकेलापन, यह गुस्सा, यह अवसाद

आज अल्लसुबह पांच बजे हैदराबाद एयरपोर्ट पर अचानक एम जे अकबर से भेंट हो गई। वह दिल्ली आ रहे थे और मैं लखनऊ। एक ही फ्लाइट से। हम जब पढ़ते थे तब अकबर को यंगेस्ट एडिटर के तौर पर जानते हुए उन से बहुत रश्क करते थे । पैतीस साल की उम्र में कोलकाता के आनंद बाज़ार पत्रिका के प्रकाशन में वह संडे और टेलीग्राफ दोनों के संपादक थे ।

किसी पत्रकार ने कोई सवाल नहीं पूछा, सब के सब हिहियाते हुए सेल्फी लेते रहे…

Dayanadn Pandey : लोकतंत्र क्या ऐसे ही चलेगा या कायम रहेगा, इस बेरीढ़ और बेजुबान प्रेस के भरोसे?  कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले ही कहा था कि प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब व्यवसाय की स्वतंत्रता है। और कार्ल मार्क्स ने यह बात कोई भारत के प्रसंग में नहीं, समूची दुनिया के मद्देनज़र कही थी। रही बात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तो यह सिर्फ़ एक झुनझुना भर है जिसे मित्र लोग अपनी सुविधा से बजाते रहते हैं। कभी तसलीमा नसरीन के लिए तो कभी सलमान रश्दी तो कभी हुसेन के लिए। कभी किसी फ़िल्म-विल्म के लिए। या ऐसे ही किसी खांसी-जुकाम के लिए। और प्रेस? अब तो प्रेस मतलब चारण और भाट ही है। कुत्ता आदि विशेषण भी बुरा नहीं है।

डॉ. एसबी निमसे यानि लखनऊ विश्वविद्यालय का निकम्मा कुलपति

Dayanand Pandey : लखनऊ विश्व विद्यालय के कुलपति डॉ. एसबी निमसे क्या एक निकम्मे कुलपति हैं? और कि परीक्षा विभाग उन की बिलकुल नहीं सुनता? बीएड का इम्तहान प्रैक्टिकल सहित जुलाई में खत्म हो गया। लेकिन रिजल्ट का अभी तक अता-पता नहीं है। अखबारों के जिम्मे ऐसी खबरें नहीं होतीं। अखबारों को नेताओं अफसरों के खांसी जुकाम से फुर्सत नहीं है। तो अखबार इन के ठकुर-सुहाती खबरों से लदे रहते हैं।

अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो तो ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ उपन्यास ज़रूर पढ़ें

DN Pandey

दयानंद पांडेय

मैं दयानंद जी के ‘बांसगांव की मुनमुन’ उपन्यास को भी पढ़ चुकी हूं जो एक सामाजिक उपन्यास है। समय के साथ हर चीज़ में परिवर्तन होता रहा है। चाहें वो प्रकृति हो या इंसान, सामाजिक रीति-रिवाज या किसी व्यावसायिक संस्था से जुड़ी धारणाएं। इस उपन्यास ‘हारमोनियम के हज़ार टुकड़े’ में समय के बदलते परिवेश में अखबारी व्यवस्था का बदलता रूप दिखाया गया है। जिस किसी भी को अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो उन से मेरा कहना है कि वो इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। उपन्यास के आरंभ में सालों पहले अस्सी के दशक की दुनिया की झलक देखने को मिलती है जो आज के अखबारों की दुनिया से बिलकुल अलग थी। धीरे-धीरे अखबार के मालिक, संपादक और कर्मचारियों के संबंधों में बदलते समय की आवाज़  गूंजने लगती है।