उप-चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा में मोदी की स्वीकार्यता और बढ़ेगी

भाजपा के खिलाफ आये लगातार तीन उप-चुनावों के नतीजों को जो लोग मोदी की गिरती साख से जोड़ कर देख रहे हैं वे कहीं न कहीं या तो बड़ी गलती कर रहे या फिर जानबूझ कर हकीकत से मुंह मोड़ रहे हैं। सच्चाई यही है कि उप-चुनावों के नतीजों ने यह साबित कर दिया है कि मोदी के बिना भारतीय जनता पार्टी अधूरी है। भले ही पार्टी के कई दिग्गज नेता मोदी को अपने समकक्ष मानते हों लेकिन उप-चुनाव के नतीजों ने यह दिखा दिया है कि मोदी के कद का कोई नेता पार्टी में मौजूद नहीं हैं। अगर ऐसा न होता तो तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री और भाजपा की राज्य इकाइयां मोदी के प्रचार के बिना भी उप-चुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में ला सकते थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उप-चुनावों के नतीजों के बाद निश्चित ही पार्टी में मोदी की स्वीकार्यता और बढ़ेगी।

मोदी की राजनैतिक ताकत और हैसियत को समझने के लिये अतीत में जाना होगा, जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आये थे। पूरे देश में भाजपा ने रिकार्ड तोड़ प्रदर्शन किया था, लेकिन भगवा खेमें के बुजुर्ग नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी से लेकर राजस्थान की मुख्यमंत्री वंसुधरा राजे सिंधिया, मध्य प्रदेश के शिव राज चैहान, सुषमा स्वराज जैसे तमाम नेताओं ने इसका श्रेय मोदी को नहीं दिया। दबी जुबान से कोई इसे भाजपा कार्यकर्ताओं की जीत बताता तो मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्य में भाजपा की जीत का सेहरा अपने सिर बांधने में लगे हुए थे। ऐसी ही कुछ आवाजें यूपी से भी उठी थीं।

मोदी यह सब चुपचाप सुनते और देखते रहे। उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही विकास के एजेंडे सहित पड़ोसी मुल्कों से संबंध बेहतर बनाने, मंहगाई पर लगाम लगाने, काला धन वापस लाने के चुनावी वायदों पर तेजी से काम शुरू कर दिया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली। मोदी की छवि राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय दोनों ही स्तरों पर तेजी से बदल रही थी, उनके ऊपर वर्षों पूर्व लगा साम्प्रदायिकता का धब्बा धीर-धीरे फीका होता जा रहा था। मोदी ने सत्ता संभालते ही कहा था कि वह अगले चार साल तक काम करेंगे और पांचवे साल राजनीति करेंगे। उन्होंने यह करके भी दिखाया। इस दौरान कुछ राज्यों में उप-चुनाव हुए, ज्यादातर विधान सभा सीटों के लिये उप-चुनाव हो रहा था, वह कहीं भी प्रचार करने नहीं गये।

इतना ही नहीं उनके करीबी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी उप-चुनावों की राजनीति में फंसने के बजाये अपना सारा ध्यान हरियाणा, महाराष्ट्र और उन राज्यों पर केन्द्रित रखा जहां अगले कुछ माह में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। उप-चुनावों में किसको टिकट देना है और किसे नहीं यह भी राज्य इकाई के नेताओं ने ही तय किया। इस बीच सबसे पहले उत्तराखंड और उसके बाद बिहार में उप-चुनाव हुए। दोनों ही जगह भाजपा को वैसी सफलता नहीं मिल पाई, जैसी लोकसभा चुनाव में हासिल हुई थी। उत्तराखंड में तो भाजपा तीन में से तीनों विधान सभा सीटें हार गई। यह सिलसिला 13 सिंतबर को हुए उत्तर प्रदेश सहित गुजरात, राजस्थान के उप-चुनावों में भी बद्स्तूर जारी रहा। यूपी में भाजपा को 11 विधान सभा सीटों में से मात्र तीन सीटों पर सफलता हाथ लगी।

इसी तरह से राजस्थान में चार विधान सभा सीटों में से भाजपा तीन हार गई। गुजरात की 09 विधान सभा सीटों पर भी उप-चुनाव हुआ था। गुजरात में भी कांग्रेस ने भाजपा से तीन सीटें झटक लीं। भाजपा को मात्र 06 सीटों पर ही जीत कर संतोष करना पड़ा। कायदे से इस हार के लिये गुजरात, राजस्थान की भाजपा सरकार और बिहार, उत्तर प्रदेश की राज्य इकाई को जिम्मेदार ठहराना चाहिए था। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया जब लोकसभा चुनाव में मिली जबर्दस्त जीत का सेहरा मोदी के सिर नहीं बंधने दे रही थीं तो हार का ठीकरा मोदी के सिर कैसे फोड़ा जा सकता है। ऐसी ही कुछ हालात गुजरात के हैं। गुजरात की जनता या तो मोदी के दिल्ली जाने को पचा नहीं पाई है अथवा वह मौजूदा मुख्यमंत्री के कामकाज से संतुष्ट नहीं थी।

चुनाव नतीजे आने के बाद अहमदाबाद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह बयान आना,‘कुछ लोग नई चीजों को समझने में समय लेंगे।वे गुजरात में 12 साल के दौरान इसे नहीं समझ सके हैं।’ कई सवालों से पर्दा हटाता है। ऐसा ही नजारा यूपी में भी देखने में आया। यहां भी न मोदी आये न अमित शाह ने प्रचार किया। हकीकत तो यही है कि लोकसभा चुनाव में 80 में से 73 सीटें जीतने के बाद भाजपा की यूपी इकाई के नेताओं ने अपना आपा खो दिया था, उनके कदम जमीन पर नहीं टिक रहे थे। भाजपा के दिग्गज से दिग्गज नेता समाजवादी सरकार की नाकामियों को जनता के बीच ले जाने की बजाये, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण के सहारे जीत हासिल करने का सपना देखने लगे।

मोदी ने लोकसभा चुनाव के समय सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ ‘बाप-बेटे’ की सरकार कहकर जबर्दस्त हमला बोला था, उन्होंने प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगों के लिये कहीं भी हिन्दू-मुसलमान को कटघरे में नहीं खड़ा किया, बल्कि वह इसका ठीकरा अखिलेश सरकार और समाजवादी नेताओं के ऊपर फोड़ कर मतदाताओं में जोश भरते रहे। प्रदेश की जंगलराज को उन्होंने निशाने पर लिया। यूपी से जब ट्रेन चलकर गुजरात में प्रवेश करती है, तो बेटा कहता है कि अब मां सो जाओ, गुजरात आ गया है, अब कोई खतरे की बात नहीं है, जैसे जुमलों का इस्तेमाल करके मोदी ने जनता का मन टटोला, बिजली समस्या पर सवाल उठाये, किसानों की दुर्दशा के मर्म को पहचाना, जबकि उप-चुनाव की कमाम संभाले भाजपा ने लव जेहाद, साम्प्रदायिक धु्रवीकरण की चाहत में ऐसे उलझे कि उससे बाहर निकल ही नहीं पाये, जबकि समाजवादी नेता भाजपा को दंगा कराने और समाज को बांटने वाली पार्टी कहकर चिढ़ाती रही।

भाजपा नेताओं द्वारा अगर समाजवादी सरकार की नाकामयाबी को भुनाया जाता तो नतीजे कुछ बेहतर हो सकते थे। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठन को भी यह नहीं समझ में आया कि वह यूपी के नेताओं को बोलने का सलीका सिखाते और अनुशासन का पाठ पढ़ाते। भाजपा को सही समय पर उप चुनाव में चोट मिल गई है, इससे सबक लेकर बीजेपी नेता 2017 के विधान सभा चुनाव की तैयारी करेंगे तो उत्तर प्रदेश के नतीजों पर फर्क पड़ सकता है। खैर, बात 2012 के विधान सभा चुनावों को नजर में रखकर की जाये तो भाजपा के लिये यह बात राहत देने वाली रही कि 2012 के विधान सभा चुनाव के समय तमाम सीटों पर नंबर तीन पर खिसक गई भाजपा उप-चुनाव में नंबर दो पर मजबूती से खड़ी दिखाई दी। बसपा चुनाव नहीं लड़ी थी, फिर भी भाजपा की मौजूदा स्थिति(नंबर दो की स्थिति) इस लिये संतोषजनक कहीं जा सकती है, क्यों कि बसपा के चुनाव लड़ने की दशा में सपा को तो इसका नुकसान हो सकता है, लेकिन भाजपा पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।
   
लब्बोलुआब यह है कि आज की तारीख में मोदी के बिना भाजपा पंख कटे पक्षी के समान है जो उड़ नहीं सकती है। उप-चुनावों में भाजपा को मिली करारी हार में भी मोदी की जीत छिपी हुई है। आगे से कोई नेता जीत के लिये अपनी पीठ स्वयं नहीं थपथपा पायेगा। मौजूदा हालात में अगर मोदी को कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार करना चाहते हैं तो उन्हें लोकसभा चुनावों की तरह तमाम राज्यों के विधान सभा चुनावों के लिये भी पुख्ता रणनीति बनाकर उस पर चलना होगा। इसके अलावा पार्टी में फैली गुटबाजी, केन्द्रीय मंत्रियों और सांसदों के चुनाव के बाद जनता से दूरी बना लेने की आदत को भी बदलना होगा। भाजपा नेताओं को समाजवादी पार्टी की रणनीति पर भी ध्यान देना होगा कि किस तरह से सपा आलाकमान ने एक-एक सीट पर पूरी ताकत लगा दी। यह तब हुआ जबकि करीब चार माह पूर्व समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव बुरी तरह से हार गई थी।

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।



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