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उत्तराखंड

देहरादून में लाइब्रेरी के लिए शुरू हुआ एक आंदोलन

शायद ही ऐसा कोई शहर या कस्बा हो जहां आये दिन आंदोलन न होता हो। कभी नौकरी की मांग को लेकर तो कभी नौकरी में हो रही ज्यादतियों के विरोध में। कभी अलग राज्य की मांग को लेकर तो कभी राज्य बनने से होने वाली समस्याओं को लेकर। लेकिन उत्तराखंड की राजधानी देहरादून को आज एक नये तरह के आंदोलन का सामना करना पड़ा। अपनी राजधानी देहरादून में सीमांत जिले पिथौरागढ़ से आए छात्र उनके अभिभावक अपने और अपने होनहारों के कालेजों में पुस्तकालय और उसमें पुस्तक की मांग कर रहे थे।

आंदोलन के गर्भ से निकले उत्तराखंड प्रदेश के लोगों में लगता है कि अब आंदोलन के लिए कोई जगह रह नहीं गयी है। लगभग 12 लाख की आबादी वाली राजधानी देहरादून के लोगों के लिए कल के भविष्य (छात्रों) के लिए कोई चिंता नहीं है। इस आंदोलन को अपना समर्थन देने के लिए 12 दर्जन लोग भी नहीं आये। यह आंदोलन पूरी तरह से स्वत:स्फूर्ति था। एक भी हायर की बड़ी क्या छोटी बस भी नहीं थी। सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को जानकारी मिली। छात्रों की इस समस्या को NDTV के रवीशकुमार ने अपने कार्यक्रम ” प्राइम टाइम” में दिखाया था। उनका कार्यक्रम देखकर भी लोग आये थे।

पुस्तक और पुस्तकालय के लिए बरसात के मौसम में सैकड़ों किलोमीटर का पहाड़ी रास्ता तय कर ये छात्र यूं ही नहीं आये थे। दसियों दिन से स्थानीय प्रशासन से अपनी समस्या के समाधान के लिए हर स्तर पर अपनी बात रखने के बाद निराश होकर पिथौरागढ़ राजकीय डिग्री कालेज के छात्रों ने राजधानी देहरादून का रुख किया।

कचहरी स्थित शहीद स्मारक में आयोजित इस धरने में उत्तराखंड के तमाम राजनीतिक दलों और नेताओं के नाम एक पत्र भी जारी किया गया। इस पत्र में उनसे शिक्षा के मामले में अपनी स्थिति साफ करने के लिए कहा गया। आंदोलनरत छात्रोग्रे का कहना है कि कांग्रेस और वामपंथी दलों के कार्यालय में इस पत्र की प्रति रिसीव कराया गया लेकिन भाजपा कार्यालय ने पत्र रिसीव करने से इंकार कर दिया गया।

छात्रों का कहना है कि पिथौरागढ़ का यह डिग्री कालेज कुमाऊँ का दूसरा सबसे बड़ा डिग्री कालेज है बावजूद इसके न तो ठीक-ठाक पुस्तकालय है और न ही पुस्तक। शिक्षकों की कमी से पूरे प्रदेश का हर शिक्षण संस्थान जूझ रहा है। यहां कहने को पुस्तकालय है, इसमें नयी पुस्तकें हैं ही नहीं जो हैं भी वो बाबा आदम के समय की। यहाँ के पाठ्य पुस्तकों के अनुसार सोवियत संघ अभी भी मौजूद है, उसका विघटन नहीं हुआ वह अब भी सुपर पावर है।

धरना स्थल पर मौजूद लोगों को प्रेम बहुखंडी, प्रदीप सती, भार्गव चंदोला, निर्मला बिष्ट, संजय भट्ट, विजय भट्ट, रेनू नेगी, तन्मय ममगाईं, हिमांशु चौहान, प्रोफेसर सचान, त्रिलोचन भट्ट ,सोनाली नेगी,सुप्रिया भण्डारी, दीपक सजवाण, महिपाल दानु, संजय कुनियाल,मनोज कुँवर,दीक्षा भट्ट सहित अनेक लोगों ने संबोधित किया वक्ताओं ने इस तरह का आंदोलन पूरे राज्य में चलाए जाने की जरूरत बताई और कहा कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को इस मामले में अपनी राय स्पष्ट करनी चाहिए। इस मौके पर प्रो. लालबहादुर वर्मा, डॉ जितेंद्र भारती, इंद्रेश नौटियाल वगुणानंद ज़खमोला सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ता और डीएवी कॉलेज के छात्र मौजूद थे।

इतिशा
छात्रा
देहरादून

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