सुधीर मिश्रा-
कल रात कोई चैनल इस्लामाबाद कब्जे में कराता रहा…
- किसी ने सेना पाकिस्तान में घुसा दी
- किसी ने फिदायीन हमले करा दिए
- किसी ने कराची पोर्ट तबाह करा दिया
टीवी न्यूज़ देखकर अपना बीपी अपडाउन करने वालों झूठ की दुनिया से बाहर निकलो । अगर रहना ही चाहते हो तो रहो पर अख़बारों में फ़र्ज़ी ख़बरें न देखकर हैरान न हो । लोग इस कदर झूठ में डूब गए हैं कि सच पर उन्हें शक होने लगा है।
अभिषेक उपाध्याय-
इन भाई साहब को चैनलों की दुनिया में ऐसे ही नहीं वॉट्सएप और ट्विटर जनित पत्रकारिता का “मास्टर ब्लास्टर” कहा जाता है!!
डॉन ब्रैडमैन अगर आज होते तो इन्हें इनकी इस महान उपलब्धि के लिए टेंपो भेजकर नोएडा से ऑस्ट्रेलिया बुलाते और सम्मानित करते!!!
बता रहे हैं कि इनको “इनके सोर्सेज” से जानकारी मिल रही है कि राजौरी के आर्मी ठिकाने पर सुसाइड अटैक किया गया है।
ये हवा हवाई ख़बर देते हुए ये इतने उत्साह में थे कि इन्होंने आतंकियों को अपने सोर्सेज के हवाले से आर्मी के ठिकाने के अंदर भी घुसा दिया और बता दिया कि आर्मी अब उन्हें ट्रेस कर रही है!!
इस फ़र्ज़ीयापे के कुछ मिनट के अंदर ही इसका आधिकारिक खंडन भी जारी हो गया। इनके बारे में मशहूर है कि आप जब भी इनकी कोई ब्रेकिंग ख़बर देखिए तो सबसे पहले ट्विटर और वॉट्सएप ग्रुप्स खंगालना शुरू कीजिए।
वो ख़बर कहीं न कहीं, किसी न किसी ट्विटर हैंडल या फिर व्हाट्सएप ग्रुप पर कुछ मिनट या घंटे चल चुकने के बाद सुस्ताती या फिर जम्हाइयाँ लेती मिलेगी!
प्रियंका दुबे-
मैंने टीवी न्यूज़ देखना दस बरस पहले ही बंद कर दिया था. आपको भी अब भारतीय टीवी न्यूज़ की इन मूर्खताओं में शामिल होने से इंकार कर देना चाहिए. इनके अपने कम-अक्ल स्टैंडर्ड्स से भी इन्होंने बीती रात जिस जाहिलयत का परिचय दिया है, उसकी मिसाल ढूँढना मुश्किल है.
एक ओर आप सब कुछ face कर रही सेना का restrain देखिए. किस तरह प्रेस ब्रीफिंग में भी एक-एक शब्द तौल कर ध्यान से कहा जा रहा है. कोई अतिरिक्त और अनावश्यक उग्रता नहीं है. सेना को दृढ़ होने और दिखने के लिए युद्ध जैसी कठिन स्थति में आपकी इस खोखली तालीपीट और हुँकार भर परियोजना की कोई ज़रूरत नहीं. आप इतना झूठ बोल रहे हैं कि गोदी में स्थान देने वाले की गोदी में भी आपके झूठों के लिए स्थान नहीं बचेगा. फिर क्या बनेंगे? – चरण मीडिया?
कराची पर नेवी के हवाले से कार्यवाही बता रहा है तो कोई इस्लामाबाद पर फ़तह! मूर्खता और अनवेरिफाइड खबरों की हद है! कोई वीडियोगेम नहीं चल रहा है यहाँ.
इन धूर्तों को देखने सुनने से अच्छा कि जनता सीधे सेना की प्रेस ब्रीफिंग देख ले. BBC इत्यादि कुछ थोड़े बहुत क्रेडिबल sources हैं . बाक़ी हिंदी में कुछ दो-चार अपवादों को छोड़ कर समाचार का कोई ठीक ठाक सोर्स नहीं बचा है. एक तरफ़ चरण मीडिया है दूसरी तरफ़ उनसे संख्या, संसाधन और रीच में कम लेकिन बराबर के धूर्त वह लोग हैं जो पहलगाम के बाद कहते फिर रहे थे कि धर्म पूछ कर नहीं मारा.
मैंने जब से सामाजिक आँख खोली, तब से जिनको “निर्मल वर्मा ने 2002 पर नहीं लिखा इसलिए वह संघी हैं” कहते सुना. एक दशक से सुन रही हूँ. लेकिन अब पहलगाम के बाद जिनके मुँह में कहने को एक भी शब्द नहीं. दही के साथ जाने क्या-क्या जमा हुआ है. दस साल तक इनका जजमेंट सुनने के बाद भी मैं यहाँ जज नहीं कर रही हूँ क्योंकि सब साफ़ है. दुनिया में बहुत से ग़म हैं राजनीति परस्तों को जज करने के सिवाय.
यह सभी पक्ष अपनी अपनी राजनीति के ग़ुलाम हैं. एक आम हिंदू और एक आम मुसलमान का व्यवहार आज भी बहुत अच्छा और restrained है. आप गोदी मीडिया वाले इन चिरकुटों और हिंदी के इन तमाम बौद्धिक बेईमानों से बचिए.
युद्ध कोई उत्सव की चीज़ नहीं. पहले फुर्सत में यह मूर्खतापूर्ण टीवी न्यूज़ देखना बंद चाहिए. सिर्फ़ प्रामाणिक माध्यमों से आने वाली सूचनाओं पर ही ध्यान दें. फालतू की उत्सवधर्मिता और उत्पात न फैलाएँ.
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