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समाजकर्मी एवं पत्रकार सफी आरा की याद में संगोष्ठी : फासीवादी ताकतों से लड़े बिना औरतों के हक और बराबरी की बात नहीं की जा सकती

नई दिल्ली। समाजकर्मी एवं पत्रकार सफी आरा की याद में ‘हम बचेंगे, हम पढ़ेंगे, हम बढ़ेंगे’ (औरत के हक में विमर्श) पर संगोष्ठी का आयोजन  गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में दिन के दो बजे किया गया। निदान फाउंडेशन, न्यू इंडिया मिशन और उमंग किरण व अन्य संस्थाओं की मदद से यह  कार्यक्रम आयोजित किया गया था। संगोष्ठी की मुख्य अतिथि सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) की प्रमुख शबनम हाशमी ने कहा कि सफी आरा मरी नहीं है, वह हमारे बीच है। आज ​का दिन उसके जिन्दगी के जश्न का दिन है।

नई दिल्ली। समाजकर्मी एवं पत्रकार सफी आरा की याद में ‘हम बचेंगे, हम पढ़ेंगे, हम बढ़ेंगे’ (औरत के हक में विमर्श) पर संगोष्ठी का आयोजन  गांधी शांति प्रतिष्ठान के सभागार में दिन के दो बजे किया गया। निदान फाउंडेशन, न्यू इंडिया मिशन और उमंग किरण व अन्य संस्थाओं की मदद से यह  कार्यक्रम आयोजित किया गया था। संगोष्ठी की मुख्य अतिथि सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) की प्रमुख शबनम हाशमी ने कहा कि सफी आरा मरी नहीं है, वह हमारे बीच है। आज ​का दिन उसके जिन्दगी के जश्न का दिन है।

मौजूदा समय संकट का है। फासीवादी ताकतों से लड़े बिना औरतों के हक और बराबरी की बात नहीं की जा सकती है। वे ताकतें आज आज नफरत का जहर उगल रही है। महिलाओं की आजादी की बात करने से पहले अंतराष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर गौर करना होगा। आज हर चीज को बाजार और बस्तु की चीज समझी जा रही है और यही औरत के साथ हो रहा है। गर्भ से लेकर पैदा होने तक में संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा 2002 में गुजरात में महिलाओं के साथ क्या हुआ? यह जगजाहिर है। वही लोग आज दिल्ली के तख्त पर काबिज हैं। तरह की संस्कृति और वंदिशे लादने पर आमादा हैं। हर बड़ा बदलाव छोटे बदलाव से होता है। औरत को अपने अंदर बदलाव लाना होगा और इस बदलाव में पुरूष को भी भागीदार बनाना होगा।

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए इंडिया टुडे के पूर्व संपादक दिलीप मंडल ने पत्रकार सफी आरा के व्यक्तित्व की तुलना सावित्री वाई फुले से की। उन्होंने कहा कि 1848 में पुणे में अपने पति के साथ  सात छात्राओं के साथ उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की। उस दौर में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। लड़कियों की शिक्षा पर उस समय सामाजिक पाबंदी थी। सावित्रीबाई फुले उस दौर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया, वह भी पुणे जैसे शहर में। जब सावित्रीबाई कन्याओं को पढ़ाने के लिए जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर, विष्ठा तक फैंका करते थे।

सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं। अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती। सफी ने भी सामाजिक क्षेत्र में बहुत सारे काम किए। समाज में जाति व्यवस्था की जड़े समाज के विकास में बाधक है। बाबा साहेब ने ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की। आजाद भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्होंने महिला सशक्तीकरण के लिए कई कदम उठाए। सन् 1951 में उन्होंने ‘हिंदू कोड बिल’ संसद में पेश किया। उनका मानना था कि सही मायने में प्रजातंत्र तब आएगा जब महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा और उन्हें पुरुषों के समान अधिकार दिए जाएंगे। उनका दृढ़ विश्वास कि महिलाओं की उन्नति तभी संभव होगी जब उन्हें घर परिवार और समाज में बराबरी का दर्जा मिलेगा। शिक्षा और आर्थिक तरक्की उन्हें सामाजिक बराबरी दिलाने में मदद करेगी। इस सवाल पर उन्होंने इस्तीफा भी दिया।

संगोष्ठी के विषय पर डा सीता गौतम ने कहा कि हर मोड़ पर महिलाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्हों भ्रूण हत्या के सवाल को उठाया और कहा कि इसे रोकने की पहल घर से ही करनी होगी। नारी उत्कर्ष पत्रिका के संपादक राजीव कुमार ने महिलाओं की सुरक्षा का सवाल उठाया। वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कहा कि उसके पास भले निजी अरमानों और सपनों की कोई फेहरिश्त नहीं थी लेकिन देश-दुनिया के गरीबों के प्रति उसके मन में तारीफ करने योग्य हमदर्दी थी। उसने गरीबों की मदद करने के लिए एक संस्था निदान फाउंडेशन का गठन किया था। अभी इस संस्था को अपने प्रयत्नों से पटरी पर लाने की कोशिश में जुटी ही हुई थी कि उसकी सड़क हादसे में मौत हो गई। वह कहती थी कि लड़कियों की जिंदगी किसी के हवाले हो, उसके पहले लड़कियां अपने स्तर से अपने वर्तमान को चट्टान की तरह इतना मजबूत कर ले कि भविष्य की कोई आंधी उसे पलट न सके और सफी आरा अपने वर्तमान को इतना मजबूत कर रही थी कि भविष्य उसे पलट न सके।

संगोष्ठी का संचालन सन्निधि संगोष्ठी की संयोजिका किरण आर्या ने किया। आगत ​अतिथियों का  स्वागत और विषय प्रवेश सुशील कुमार ने किया। संगोष्ठी के उत्तरार्द्ध में स्त्री के हक में एक संवाद के तौर पर अर्चना चतुर्वेदी, शिखा सिंह और नूतन यादव (व्यंग्य), वंदना वाजपेयी (लघु कथा),गुंजन गर्ग और नेह सुनीता (हायकू) मीरा शलभ, सीमा अग्रवाल और प्रियंका राय (गीत) इंदू सिंह और निरुपमा सिनहा (क्षणिकाएं) प्रमिला काजी और सरोज सिंह (गजल व नज्म) संगीता शर्मा (मुक्तक) पारुल सिंह (लेख) शोभा मिश्रा (कहानी) वंदना ग्रोवर, परी एम् श्लोक, रचना आभा, रश्मि भारद्वाज और किरण आर्या (कविता) सरिता भाटिया (कुंडलियां) सुशीला श्योराण और शोभना मित्तल (दोहे) महिमा श्री (संस्मरण) का पाठ कर भाव वोध को अभिव्यक्ति प्रदान की। इन लोगों को मुख्य अतिथि शबनम हाशमी और इंडिया टुडे के पूर्व संपादक ​दिलीप मंडल ने प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया। इस मौके पर पत्रकार कुमार कृष्णन को भी सम्मानित किया गया।

धन्यवाद ज्ञापन उमंग किरण की अलका भारतीय ने कहा कि जीने का हम सभी का है। सफी जैसी कोई हादसे का शिकार न हो, उसके लिए हर तीन —चार किलोमीटर एबुलेंस की व्यवस्था की जाए।
संगोष्ठी में गांधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र के सचिव सुरेन्द्र कुमार, कार्यालय अधीक्षक अमृता शर्मा, विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के सचिव अतुल कुमार, अनुराधा, असम के मृगांक के साथ—साथ बड़ी संख्या में सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और प्रत्रकारों ने हिस्सा लिया।

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