मजीठिया वेज बोर्ड : मैंनेजमेंट के गुर्गों ने अफवाह फैला रखी थी कि इन केसों में कुछ नहीं हो सकता, सारे जज बिक गए हैं!

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से खुला उम्मीदों का आसमान

महीनों की उमड़-घुमड़ के बाद निराशा के रंग अब छंटते दिख रहे हैं और उम्मीद का आसमान रंग भरे बादलों से आच्छादित होने लगा है। सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, घूमते-घामते, मिलते-जुलते, बोलते-बतियाते आस-निराश के जो साये हर वक्त घेरे रहते थे, उनसे पीछा छूटता दिख रहा है। वजह है इंसाफ के मंदिर की घंटियों की घनघनाहट। इन घंटियों की आवाज ने मृग मरीचिका का तिलिस्म तोड़ दिया है। जमीन पर उतारने का उपक्रम कर दिया है उस हकीकत को जो मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन को लेकर हम प्रिंट मीडिया के कर्मचारी वर्षों से प्रयासरत थे। संघर्ष कर रहे थे। जूझ रहे थे। कई बार अन्यमनस्क हो रहे थे-हो गए थे। अनेकानेक बार ख्याल यह तक आया कि किस झंझट में फंस गए, कहां उलझ गए। इतने पैसे खर्च किए, इतनी भागदौड़ की, इतनी मुसीबत-परेशानी-मुश्किल-संकट-दिक्कत उठाई, पर पल्ले पड़ता कुछ दिख नहीं रहा। इसकी वापसी किसी कोने से होने के आसार नहीं नजर आ रहे। थक-हार कर अंतत: मान लिया कि चलो यह भी हमारी किस्मत का ही एक हिस्सा है। इसी में संतोष कर लेना पड़ेगा।

लेकिन नहीं, नाउम्मीदी का घटाटोप और चांद-सितारों रहित अंधियारी रात उस वक्त समर्पण कर गई जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उजियारा आ धमका। इस उजियारे ने हर तरह के धुंधलके को चीर कर रख दिया। 14 मार्च 2016 के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने अखबार मालिकों की नाकों में नकेल डाल दी है। उनके गले में खतरे की घंटी बांध दी है। उनको उनकी औकात बता दी है कि तुम्हारी यह सीमा है। अगर इसका उल्लंघन करोगे तो अंजाम का भी अंदाजा करके रखो। तुम खुद को संविधान-कानून-न्यायपालिका से ऊपर समझने-मानने का भ्रम त्याग दो। यहां तक कि तुम स्वयं को ईश्वर मानने लगे हो-मानने लगे थे। सपनों के इस संसार से बाहर निकलो। और जानों कि वास्तव में तुम भी एक अदना से मनुष्य हो। यह जरूर है कि तुम्हारे पास थोड़ी दौलत है, लेकिन वह भी तो तुमने कर्मचारियों-मेहनतकशों-मजदूरों की गाढ़ी कमाई को हड़प करके बनाई है। इसलिए श्रीमानों-माननीयों-महानुभावों कर्मचारियों को उनका हक, उनका मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन-बकाया-सुविधाएं सब यथासंभव जल्द से जल्द निर्धारित समयावधि में दे दो। मुहैया करा दो। उपलब्ध करा दो। अन्यथा न्याय के सबसे बड़े मंदिर की अवमानना के जुर्म में सजा भुगतने को तैयार रहो।

माननीय सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश श्री रंजन गोगोई और श्री पी.सी. पंत ने अखबार मालिकों के खिलाफ दायर ढेरों अवमानना याचिकाओं के संदर्भ में 14 मार्च 2016 को जो आदेश दिए वे उन्हें नोंच डालने के लिए पर्याप्त हैं। आदेश में कहा गया है कि जिन अखबारों ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को अभी तक लागू नहीं किया है वे तत्काल 11.11.2011 से लागू करें और सारा एरियर एवं दूसरी अन्य सुविधाएं तद्नुसार क्रियान्वित करें। इसमें कर्मचारियों को एश्योर्ड कॅरियर प्रमोशन का लाभ देना और न्यूजपेपर इस्टेब्लिसमेंट के ग्रॉस रेवेन्यू के मुताबिक सेलरी देना शामिल है। लेकिन जैसा कि जानते हैं दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, प्रभात खबर, इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स आदि अखबारों ने इन मानकों का निरंतर उल्लंघन किया है। इन अखबारों ने बेइंतहा-बेहिसाब कमाई की है-कर रहे हैं, पर वेज बोर्ड की व्यवस्था को बराबर तोड़ा-मरोड़ा है। और अपने निहितार्थ में इस्तेमाल किया है। दैनिक भास्कर की विज्ञापनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा उसकी अन्य दूसरी कमाई वाली कंपनियों में समावेश किया जाता है। इस्तेमाल होता है और मोटा मुनाफा कमाया जा रहा है।

माननीय अदालत के आदेश का दूसरा अहम पहलू अकेले इंप्लाइयों से संबंधित है। याद करें, 28 अप्रैल 2015 के आदेश में जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एन.वी. रमना की बेंच ने राज्य सरकारों को मजीठिया अवॉर्ड क्रियान्वयन के बारे में स्टेटस रिपोर्ट देने का आदेश दिया था। कुछ प्रदेश सरकारों को छोडक़र बाकी राज्य सरकारों ने स्टेटस रिपोर्ट नहीं दी। मौजूदा सुनवाई में कोर्ट ने इस बात का बहुत संजीदगी से संज्ञान लिया है। यही नहीं, 12 जनवरी 2016 की सुनवाई में कोर्ट के समक्ष अन्य सच्चाइयों-तथ्यों के अलावा कर्मचारियों के मालिकान-मैनेजमेंट द्वारा उत्पीडऩ के मामले उठे तो माननीय न्यायाधीश हैरान रह गए। उन्होंने मजीठिया की मांग करने पर मालिकान-मैनेजमेंट द्वारा तरह-तरह से प्रताडि़त करने, नौकरी से निकाल देने, निलंबित कर देने, ट्रांसफर कर देने, वेतन रोक लेने, अपमानित करने, नीचा दिखाने, गैर जरूरी कामों में लगा देने, जूनियर के मातहत उसे काम करने पर मजबूर करने, नाकाबिल-निकम्मे को उस पर धौंस जमाने की आजादी देने आदि मामलों-कारनामों-करतूतों के खिलाफ बतौर सबूत कोर्ट में एफीडेविट जमा करने का आदेश पारित कर दिया। माननीय सुप्रीम कोर्ट उस समय हैरान रह गया जब उसके समक्ष कर्मचारियों के एफिडेविट के ढेर रख दिए गए। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि इतनी बड़ी तादाद में कर्मचारियों का मालिकान-मैनेजमेंट द्वारा हैरेसमेंट हो रहा है।

कर्मचारियों के इतने बड़े पैमाने पर उत्पीडऩ, अखबार मालिकों द्वारा मजीठिया की ओर से आंख मूंद लेने और अनेक राज्य सरकारों द्वारा स्टेटस रिपोर्ट न पेश करने के मद्देनजर जस्टिस श्री रंजन गोगोई और जस्टिस श्री पी.सी. पंत की बेंच ने 14.3.2016 को बहुत सख्ती से ये आदेश जारी किए :—

1. जिन राज्य सरकारों ने स्टेटस रिपोर्ट फाइल नहीं की है वे 5 जुलाई 2016 तक रिपोर्ट जरूर फाइल कर दें। अन्यथा संबंधित राज्यों के चीफ सेक्रेटरीज स्वयं कोर्ट में हाजिर हों और रिपोर्ट दाखिल न करने की वजह का खुलासा करें।

2. हैरेसमेंट के शिकार कर्मचारी संबंधित लेबर कमिश्नर से खुद संपर्क करें और अपनी बनती सेलरी और बकाए आदि का ब्योरा उन्हें सौंपें। लेबर कमिश्नर की ड्यूटी होगी कि वे कर्मचारियों का हक दिलवाएं और उस बारे में रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करें।

3. बावजूद इसके, वे अखबार मालिक जिन्होंने न सुधरने की ठान रखी है, सर्वोच्च न्यायालय का आदेश न मानने की कसम खा रखी है, उन्हें दंड भोगने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। कंटेम्प्ट शुरू हो जाएगा। राज्य सरकारों की स्टेटस रिपोर्टों और जिरह-बहसों के आधार पर अखबार मालिकान को सजा मिलनी लाजिमी है। 

तो साथियों! न्याय मंदिर की घनघनाती घंटियों की आवाज पर कान देने का यह सुनहरा अवसर है। इसे हाथ से जाने न दें। मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के हिसाब से, अखबार इस्टेब्लिशमेंट के ग्रॉस रेवेन्यू के हिसाब से आपकी जो सेलरी बनती है, 11.11.2011 से आपका जो बकाया-सुविधाएं बनती हैं, उसे लेबर कमिश्नर, डिप्टी लेबर कमिश्नर, असिस्टेट लेबर कमिश्नर को बताएं। उसे दिलवाने और उसकी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में 19 जुलाई 2016 से पहले पहुंचाने की जिम्मेदारी उनकी है। क्यों कि 19 जुलाई 2016 को फाइनल हियरिंग यानी आखिरी सुनवाई है। फिर भी अगर मालिकान की ऐंठन बनी रही, नहीं सुधरे तो उन पर अवमानना का डंडा अनिवार्यत: गिरेगा। इससे उन्हें कोई नहीं बचा सकेगा।

चलते-चलते एक और चर्चा करता चलूं। मैंनेजमेंट के बहुत सारे गुर्गों, चमचों, दलालों ने अफवाह फैला रखी थी कि इन अवमानना केसों में कुछ भी नहीं हो सकता। सारे जज बिक गए हैं। अखबार मालिकों जितना पॉवरफुल कोई सत्ता-सरकार भी नहीं हो सकती। सरकार तो अखबार मालिकान चलाते हैं। न्यायपालिका-न्यायाधीश उनके सामने क्या है? अरे भई वे तो ईश्वर से भी बड़े है! ऐसे महानुभावों – सज्जनों से गुजारिश है कि वे भ्रम और गुमान से बाहर निकलें और सुप्रीम कोर्ट के फरमान को दिमाग में घुसा लें और आंखों में बसा लें। क्या पता उनका भी उद्धार हो जाए।

भूपेंद्र प्रतिबद्ध
चंडीगढ़
मो. 9417556066
bhupendra1001@gmail.com

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Comments on “मजीठिया वेज बोर्ड : मैंनेजमेंट के गुर्गों ने अफवाह फैला रखी थी कि इन केसों में कुछ नहीं हो सकता, सारे जज बिक गए हैं!

  • Kashinath Matale says:

    Bhadas4media.com ke madhyam se newspaper ke employees se sampark hota hai.
    Thanks Bhadas.
    Com. M K Rahi my mobile no. is 9822945546.
    Thanks and regards!

    Reply
  • ravi singh says:

    जागो गुलाब कोठरी जागो हरामजादे तूने तो अपने को भगवन से भी बढा समझाता हैं न अब तदखते हाँ की तुझे राधा बचती हैं या कृष्ण गद्दार हरम के कमाई खा कहकर तेरे चमड़ी बहुत मोटी हो गई है न सुधर जा बूढ़े बरना अब तेरे पाप का घड़ा भर चूका हैं तूने बहुत अत्ति कर ली हैं एक बात और तू जो अपने क़ानूनी सलाहकारों के बल जो फुल रहा गांडू ये हे तेरे लुटिया डुबोने मैं लगे हैं हरामजाड़े
    अभी भी समय हैं कुत्ते रणद्वाज दारुवज अब तेरे मौत पक्की हैं तूने कर्मचारियों को बहूत खून चूसा हैं साले आज 4 साल से तूने और तेरे कुत्तो (औलदोे) ने जो महंगाई भत्ता अवं सालाना वेतन बृद्धि जो बंद कर रखी हैं मादरचोद अब देखते हैं की कबतक और रोकेगा

    Reply
  • Satya-mev-jayate dear bhupendra ji. Kya likha hai aapney…! Aapki Lekhni ki dhaar aur kalam ka painapan, to padhte hi ban raha hai. Mazaa aa gaya padh kar. Ye sach hai ki hum sabhi karmchariyon ne bhi yahi maan rakkha thha ki ab kuchh nahin honey wala. Parantu S.Court ke Judges ne jo Mahanta aur Himmat dikhai, wah bhi kabil-e-tareef hai. Ab ye lagney laga hai ki Bhagwan iss dharti par hai, aur uss Bhagwan ka naam Ranjan Gogoi hai aur uska Mandir Supreme Court hai.
    Inn Malikon, Managers aur Directors ki bahut jald hi “Aisi-ki-Taisi” honey wali hai. Agar ye Ssaley abhi bhi nahin sudhrey, to unki khair nahin.
    Regards

    Reply
  • Kashinath Matale says:

    Com. Bhupendra Pratibad
    Bhai, bahot achha likha hai. Logonka viswas bana rahega. Bass implementation proper dhang se hona chahiye.

    Reply
  • Bhai Com. Kashinath ji namashkar. Aapka Mobile No. chahiye. Jo No. aapney diya thha, wah ab mere paas nahi hai. Pl. Bhadas ke madhyam se ya fir mere iss no. se sampark karein… 9935833496.

    Reply
  • Bhai Com. Kashinath ji, thank you very much for giving your mobile no.. I’ll call you tomorrow.
    Thanks Yashvant ji for Bhadas4media.

    Reply
  • Rajesh Mishra says:

    MAHARASTRA Ke Nagpur Me bhi Majethiya Nahi diya Ja raha…Contrect Ke Nampar Karmachriyo ka shoshan kiya ja raha hai…CM, Lebour Commishnor, Court Juj Bik chuke hai….. Navbharat, Tarunbharat, Hitwad, Lokmat, Bhaskar, Deshonnati, Sakal, Newspaper me yehi hal hai…

    Reply

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