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46,000 साल पुराना ज़िंदा कीड़ा, साधुओं की समाधि और मिस्र के पिरामिड: क्या है लंबी ‘नींद’ का राज़?

अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

46,000 साल पुराना कीड़ा, साधुओं की समाधि और मिस्र के पिरामिड: क्या है लंबी ‘नींद’ का राज़?

वैज्ञानिकों ने साइबेरिया में 46,000 साल पुराना एक सूक्ष्म कीड़ा (नेमाटोड) ज़िंदा किया है। यह कीड़ा हज़ारों साल तक बर्फ़ की तहों में ठंडा पड़ा रहा, पर जैसे ही इसकी बर्फ़ पिघली, वह अचानक से जाग उठा!

इस किस्से ने विज्ञान और आम लोगों के बीच ख़ूब दिलचस्पी जगाई है। आइए, ज़रा सोचें कि इस खोज को हम उन मान्यताओं से कैसे जोड़ सकते हैं जो हमारे भारतीय साधु-संतों की समाधि या मिस्र (इजिप्ट) के पिरामिडों के पीछे के रहस्यमय विश्वासों को बयान करती हैं।

  1. 46,000 साल पुरानी ‘नींद’ से जागता कीड़ा
    साइबेरिया के पर्माफ्रॉस्ट (हमेशा जमी रहने वाली बर्फ़) में दबी इस वर्म प्रजाति को पैनाग्रोलेमस कोलिमेन्सिस नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों ने जब बर्फ़ पिघला कर इसे एक प्रयोगशाला डिश में रखा, तो यह वापस सक्रिय हो गया, खाना खाने लगा और प्रजनन भी किया। यह सब देखकर ऐसा लगा मानो वह किसी ‘लंबी नींद’ से जागा हो।

“सस्पेंडेड एनिमेशन” (या जीवन-क्रिया को रोके रखना) का यह कमाल विज्ञानियों के लिए एक पहेली है। इस खोज ने हमारी इस धारणा को मज़बूत किया है कि जीवन जितना हम सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा लचीला है।

  1. हिंदू साधु-संतों की समाधि
    भारत में प्राचीन काल से ही कई साधु-संतों और योगियों की कहानियाँ प्रचलित हैं, जो समाधि में लीन हो जाते थे। समाधि एक ऐसी अवस्था बताई जाती है, जिसमें व्यक्ति सांसारिक क्रियाओं से ऊपर उठकर शरीर की क्रियाओं (श्वसन, चयापचय आदि) को इस क़दर नियंत्रित कर लेता है कि वह एक तरह की ‘अचेतन नींद’ में चला जाता है।

कई कथाओं में सुनने को मिलता है कि ये महापुरुष महीनों, कभी-कभी सालों तक बिना आहार, बिना जल, एक ही स्थान पर बैठे रहते थे और फिर साधना ख़त्म होने पर सामान्य जीवन शुरू कर देते थे। क्या यह वर्म वाले वैज्ञानिक घटना से किसी तरह जुड़ा है?

वैज्ञानिक दृष्टि से कहें, तो वर्म की कहानी बताती है कि कुछ जीव अपने शरीर की क्रियाओं को लगभग ठप कर सकते हैं — यह बात समाधि का एक वैज्ञानिक सिरा जोड़ती है, जहाँ शरीर की गतिविधियाँ अत्यंत धीमी हो सकती हैं।

हालाँकि, इंसान और कीड़े की संरचना बेहद अलग है, लेकिन यह घटना यह ज़रूर दिखाती है कि जैविक रूप से “ठहराव” (suspended animation) कोई असंभव बात नहीं।

  1. मिस्र के पिरामिड और ‘जीवित होने’ का रहस्य
    मिस्र के प्राचीन लोग अपने फ़राओ (राजाओं) को ममी बनाकर विशाल पिरामिडों में दफ़्न करते थे। उनके मुताबिक़, मृत्यु के बाद भी आत्मा किसी अन्य लोक में रहती है। भविष्य में फ़राओ की “वापसी” की मान्यता भी रही है, जिसके लिए शरीर को सुरक्षित रखा जाता था।

पिरामिडों के निर्माण से लेकर ममी बनाने की कला तक, मिस्रवासियों का विश्वास था कि शरीर को यदि हज़ारों साल तक सुरक्षित रखा जाए, तो किसी तरह अगला जन्म या ‘पुनर्जीवन’ संभव हो सकता है।

आज भले ही हमने ममी में ‘जान’ तो वापस नहीं देखी, लेकिन वर्म के पुनर्जीवन जैसी खोजें एक तरह से इस धारणा को बल देती हैं कि यदि कोशिकाएँ पूरी तरह नष्ट न हों तो, प्राचीन काल के जीव भी वापस जाग सकते हैं। क्या यह कोई पुनर्जीवन का संकेत है?

पूरी तरह से इंसानों पर लागू कर पाना फिलहाल संभव नहीं। लेकिन मिस्र के लोगों की यह सोच कि शरीर को लंबे समय के लिए संरक्षित रखा जाए, कहीं न कहीं आज के वैज्ञानिक ‘जीव संरक्षण’ (क्रायोजेनिक्स) विचार से मिलती-जुलती है।

  1. जीवन की कठोर सीमाएँ और नए सवाल
    46,000 साल पुराने नेमाटोड का ज़िंदा होना हमें बताता है कि जीवन की सीमाएँ हम जितनी साधारण समझ रखते हैं, वह उससे कहीं ज़्यादा आगे बढ़ सकती हैं। क्या अन्य जीव-जंतु, शायद बड़े जीव भी, इसी तरह हज़ारों सालों तक “रुके” रह सकते हैं?

क्या हमारी किसी पुरानी प्रजाति ने भी ऐसी क्षमता विकसित की थी, जो किसी आइस एज या और किसी विपरीत परिस्थिति में ज़िंदा बच गई हो? क्या भविष्य में विज्ञान इंसानों को ऐसी ही किसी अवस्था में ले जा सकता है, जब लंबी अंतरिक्ष यात्राओं में शरीर को क्रायो-फ्रीज़ करके किसी और ग्रह पर पहुंच कर “जगाया” जा सके?

इन सारे सवालों ने वैज्ञानिकों और आम लोगों की जिज्ञासा को नई उड़ान दी है।

  1. क्या सचमुच जुड़ती हैं ये कहानियाँ?
    हिंदू संतों की समाधि में जाने की कहानियाँ और मिस्र के फ़राओ के पुनर्जीवन का भरोसा कहीं-न-कहीं हमें यह अहसास कराता है कि “लंबी नींद” से जागना या “निष्क्रिय अवस्था में रहना” सदा से ही इंसानों के लिए रहस्यमय और रोमांचक अवधारणा रही है।

आज के वैज्ञानिक सबूत और प्राचीन मान्यताएँ मिलकर हमें इस बात पर फिर सोचने को मजबूर करती हैं कि शायद हमारे पूर्वजों के पास कुछ ऐसा ज्ञान था, जिसे आधुनिक विज्ञान अब धीरे-धीरे समझने लगा है।

अंत में…

इस 46,000 साल पुराने कीड़े की कहानी एक अद्भुत मिसाल है कि जीवन की लचीलापन सीमा (resilience) हमारी कल्पना से कहीं आगे जाती है। हमने चाहें इसे समाधि का नाम दिया हो, या इसे पिरामिड के रास्ते पुनर्जीवन का सपना बताया हो, मूल बात यही है कि प्रकृति के पास ऐसे कई रहस्य हैं जिनकी थाह लेना हमारे लिए अब भी बाकी है।

तो अगली बार जब आप किसी साधु-संत की समाधि के क़िस्से सुनें, या मिस्र के पिरामिडों के रहस्यमय कारनामों के बारे में पढ़ें, तो इस वर्म की कहानी याद कीजिए — और सोचिए, हो सकता है कि कभी हम खुद भी उन राज़ों को थोड़ा और समझ पाएँ, जिनसे जीवन और मृत्यु की खिड़कियाँ खुलती-बंद होती हैं।

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