मोदीजी गोयनका अवार्ड बांटने से पहले इंडियन एक्सप्रेस की ये सच्चाई भी जान लेते…

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की तरफ से मेरा एक सवाल है देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से। सवाल पूछने का मुझे दोहरा हक़ है। मोदी जी काशी के सांसद हैं। मैं भी काशी का हूँ और उनका मतदाता भी। रामनाथ गोयनका पुरस्कार वितरण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने में पत्रकारिता की भूमिका अहम है. प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर पुरस्‍कार पाने वालों को बधाई दी. उन्‍होंने कहा कि हर किसी की कलम देश को आगे बढ़ाने में योगदान देती है। मैं मोदी जी से पूछना चाहता हूँ जिस इंडियन एक्सप्रेस के दरबार में आपने हाजिरी लगायी क्या यहाँ आने से पहले आपने पूछा इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन से कि आपने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू की, क्या आपने सुप्रीम कोर्ट की बात मानी। 

महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त ने सुप्रीमकोर्ट में अपनी जो रिपोर्ट भेजी है उसमें साफ़ लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस और लोकसत्ता ने तथा फाइनेंशियल एक्सप्रेस एवं लोकप्रभा समाचार पत्र ने अपनी आर्थिक स्थिति खराब बताकर मजीठिया वेज बोर्ड पूरी तरह लागू नहीं किया है। इस अखबार के कार्यालय में श्रम विभाग की टीम 23 जून 2016 को पहुंची तो पता चला कि कंपनी ने सिर्फ परमानेन्ट वर्करों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश का लाभ दिया, वो भी सिर्फ दो क़िश्त जबकि दो किश्त देना अब भी बाकी है। आज की पत्रकारिता पर चुटकी लेते हुए मोदी जी कहा कि मीडिया खबरों को सनसनीखेज बना देती है। सही बात है और इसी सनसनी को बनाने वाले प्रिंट मीडिया के पत्रकार आज शनि के साढ़ेसाती के शिकार हो गए और पूरे देश में आपके मजीठिया के प्रति आँख मूंद लेने से अखबार मालिक चांदी काट रहे हैं।

महाराष्ट्र के लेबर कमिश्नर की रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि कंपनी का कहना है कि उसने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दी है जबकि कामगारों का कहना है कंपनी ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं दिया है। इंडियन एक्सप्रेस समूह में कर्मचारियों की संख्या को लेकर भी गड़बड़झाला है। इसके बारे में मुझे आरटीआई से पता चला है। इंडियन एक्सप्रेस में जर्नलिस्ट कैटगरी में 24 लोग हैं। एडमिन स्टाफ में 95 कर्मचारी हैं। फैक्ट्री में 27 जबकि इंडीविजुअल कांट्रेक्ट /कैजुअल में 313 कर्मचारी मुम्बई में हैं। यानी परमानेन्ट से ज्यादा कांट्रेक्ट पर इंडियन एक्सप्रेस में लोग काम करते हैं।

रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह का आयोजन इंडियन एक्सप्रेस का सुरक्षा कवच साबित हो सकता है. आप बताइये अब लेबर कमिश्नर या चीफ सेक्रेटरी की क्या बिसात होगी कि वे इन्डियन एक्सप्रेस के खिलाफ ठोस कार्रवाई करें। शर्म आनी चाहिए उन पत्रकारों को भी जो प्रधानमन्त्री से मिले लेकिन जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में बोलने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। फिर काहे की पत्रकारिता  जब आप पत्रकारों की बात ही नहीं रख पाए रहे हैं। एक फ्रेम बनाइये। मोदी जी के साथ का अपना फोटो लगाइये और अवार्ड को सजाइये लेकिन दिल से बताइये क्या आप चाहते तो पत्रकारों की समस्या प्रधानमंत्री को नहीं बता सकते थे। आप कहेंगे नौकरी चली जाती। फिर काहे की पत्रकारिता। यानी आप पत्रकारिता नहीं, नौकरी करते हो। अगर हाँ, तो पत्रकारिता क्यों।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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