हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए

Ravish Kumar : इंडियन एक्सप्रेस में छपे पैराडाइस पेपर्स और द वायर की रिपोर्ट pando.com के बिना अधूरा है… हिन्दी के पाठकों को आज का अंग्रेज़ी वाला इंडियन एक्सप्रेस ख़रीद कर रख लेना चाहिए। एक पाठक के रूप में आप बेहतर होंगे। हिन्दी में तो यह सब मिलेगा नहीं क्योंकि ज्यादातर हिन्दी अख़बार के संपादक अपने दौर की सरकार के किरानी होते हैं। कारपोरेट के दस्तावेज़ों को समझना और उसमें कमियां पकड़ना ये बहुत ही कौशल का काम है। इसके भीतर के राज़ को समझने की योग्यता हर किसी में नहीं होती है। मैं तो कई बार इस कारण से भी हाथ खड़े कर देता हूं। न्यूज़ रूम में ऐसी दक्षता के लोग भी नहीं होते हैं जिनसे आप पूछकर आगे बढ़ सकें वर्ना कोई आसानी से आपको मैनुपुलेट कर सकता है।

इसका हल निकाला है INTERNATIONAL CONSORTIUM OF INVESTIGATIVE JOURNALISTS ने। दुनिया भर के 96 समाचार संगठनों को मिलाकर एक समूह बना दिया है। इसमें कारपोरेट खातों को समझने वाले वकील चार्टर्ड अकाउंटेंट भी हैं। एक्सप्रेस इसका हिस्सा है। आपको कोई हिन्दी का अख़बार इसका हिस्सेदार नहीं मिलेगा। बिना पत्रकारों के ग्लोबल नेटवर्क के आप अब कोरपोरेट की रिपोर्टिंग ही नहीं कर सकते हैं।

1 करोड़ 30 लाख कारपोरेट दस्तावेज़ों को पढ़ने समझने के बाद दुनिया भर के अख़बारों में छपना शुरू हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस में आज इसे कई पन्नों पर छापा है। आगे भी छापेगा। पनामा पेपर्स और पैराडाइस पेपर्स को मिलाकर देखेंगे तो पांच सौ हज़ार लोगों का पैसे के तंत्र पर कब्ज़ा है। आप खुद ही अपनी नैतिकता का कुर्ता फाड़ते रह जाएंगे मगर ये क्रूर कुलीन तंत्र सत्ता का दामन थामे रहेगा। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। उसके यहां कोई नैतिकता नहीं है। वो नैतिकता का फ्रंट भर है।

राज्य सभा में सबसे अमीर और बीजेपी के सांसद आर के सिन्हा का भी नाम है। जयंत सिन्हा का भी नाम है। दोनों ने जवाब भी दिया है। नोटबंदी की बरसी पर काला धन मिटने का जश्न मनाया जाने वाला है। ऐसे मौके पर पैराडाइस पेपर्स का यह ख़ुलासा हमें भावुकता में बहने से रोकेगा। अमिताभ बच्चन, अशोक गहलोत, डॉ अशोक सेठ, कोचिंग कंपनी फिट्जी, नीरा राडिया का भी नाम है। आने वाले दिनों में पता नहीं किस किस का नाम आएगा, मीडिया कंपनी से लेकर दवा कंपनी तक मालूम नहीं।

एक्सप्रेस की रिपोर्ट में जयंत सिन्हा की सफाई पढ़ेंगे तो लगेगा कि कोई ख़ास मामला नहीं है। जब आप इसी ख़बर को PANDO.COM पर 26 मई 2014 को MARKS AMES के विश्लेषण को पढ़ेंगे तो लगेगा कि आपके साथ तो खेल हो चुका है। अब न ताली पीटने लायक बचे हैं न गाली देने लायक। जो आज छपा है उसे तो MARK AMES ने 26 मई 2014 को ही लिख दिया था कि ओमेदियार नेटवर्क मोदी की जीत के लिए काम कर रहा था। यही कि 2009 में ओमेदियार नेटवर्क ने भारत में सबसे अधिक निवेश किया, इस निवेश में इसके निदेशक जयंत सिन्हा की बड़ी भूमिका थी।

2013 में जयंत सिन्हा ने इस्तीफा देकर मोदी के विजय अभियान में शामिल होने का एलान कर दिया। उसी साल नरेंद्र मोदी ने व्यापारियों की एक सभा मे भाषण दिया कि ई-कामर्स को खोलने की ज़रूरत है। यह भाजपा की नीति से ठीक उलट था। उस वक्त भाजपा संसद में रिटेल सेक्टर में विदेश निवेश का ज़ोरदार विरोध कर रही थी। भाजपा समर्थक व्यापारी वर्ग पार्टी के साथ दमदार तरीके से खड़ा था कि उसके हितों की रक्षा भाजपा ही कर रही है मगर उसे भी नहीं पता था कि इस पार्टी में एक ऐसे नेटवर्क का प्रभाव हो चुका है जिसका मकसद सिर्फ एख ही है। ई कामर्स में विदेश निवेश के मौके को बढ़ाना।

मुझे PANDO.COM के बारे में आज ही पता चला। मैं नहीं जानता हूं क्या है लेकिन आप भी सोचिए कि 26 मई 2014 को ही पर्दे के पीछे हो रहे इस खेल को समझ रहा था। हम और आप इस तरह के खेल को कभी समझ ही नहीं पाएंगे और न समझने योग्य हैं। तभी नेता हमारे सामने हिन्दू मुस्लिम की बासी रोटी फेंकर हमारा तमाशा देखता है। जब मोदी जीते थे तब ओमेदियार नेटवर्क ने ट्वीट कर बधाई दी थी। टेलिग्राफ में हज़ारीबाग में हे एक प्रेस कांफ्रेंस की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। जिसमें स्थानीय बीजेपी नेता शिव शंकर प्रसाद गुप्त कहते हैं कि जयंत सिन्हा 2012-13 में दो साल मोदी की टीम के साथ काम कर चुके हैं। इस दौरान जयंत सिन्हा ओमिदियार नेटवर्क में भी काम कर रहे थे। उन्होंने अपने जवाब में कहा है कि 2013 में इस्तीफा दिया।

इसमें मार्क ने लिखा है कि जयंत सिन्हा ओमेदियार नेटवर्क के अधिकारी होते हुए भी बीजेपी से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउंडेशन में निदेशक हैं। इसी फाउंडेशन के बारे में इन दिनों वायर में ख़बर छपी है। शौर्य डोवल जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बेटे हैं, वो इस फाउंडेशन के सर्वेसर्वा हैं। जयंत सिन्हा ई कामर्स में विदेशी निवेश की छूट की वकालत करते रहते थे जबकि उनकी पार्टी रिटेल सेक्टर में विदेशी निवेश को लेकर ज़ोरदार विरोध करने का नाटक करती थी। जनता इस खेल को कैसे देखे। क्या समझे। बहुत मुश्किल है। एक्सप्रेस की रिपोर्ट को the wire.in और PANDO.COM के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

क्या सही में आप इस तरह के खेल को समझने योग्य हैं? मेरा तो दिल बैठ गया है। जब हम वायर की रिपोर्ट पढ़ रहे थे तब हमारे सामने PANDO.COM की तीन साल पुरानी रिपोर्ट नहीं थी। तब हमारे सामने पैराडाइस पेपर्स नहीं थे। क्या हम वाकई जानते हैं कि ये जो नेता दिन रात हमारे सामने दिखते हैं वे किसी कंपनी या नेटवर्क के फ्रंट नहीं हैं? क्या हम जानते हैं कि 2014 की जीत के पीछे लगे इस प्रकार के नेटवर्क के क्या हित रहे होंगे? वो इतिहास का सबसे महंगा चुनाव था।

क्या कोई इन नेटवर्कों को एजेंट बनकर हमारे सामने दावे कर रहा था? जिसे हम अपना बना रहे थे क्या वो पहले ही किसी और का हो चुका था? इसलिए जानते रहिए। किसी हिन्दी अख़बार में ये सब नहीं मिलने वाला है। इसलिए गाली देने से पहले पढ़िए। अब मैं इस पर नहीं लिखूंगा। यह बहुत डरावना है। हमें हमारी व्यक्तिगत नैतिकता से ही कुचल कर मार दिया जाएगा मगर इन कुलीनों और नेटवर्कों का कुछ नहीं होगा। इनका मुलुक एक ही है। पैसा। मौन रहकर तमाशा देखिए।

वरिष्ठ पत्रकार और एनडीटीवी के चर्चित एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार ने गोवा-मणिपुर के राज्यपालों और सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की

Om Thanvi : इंडियन एक्सप्रेस का आज दो टूक सम्पादकीय…. गोवा और मणिपुर में राज्यपालों को पहले सबसे बड़ी पार्टी के नाते कांग्रेस को सरकार बनाने को आमंत्रित करना चाहिए था। गोवा की राज्यपाल का आचरण प्रश्नाकुल है। उन्होंने समर्थन के जिन पत्रों के आधार पर पर्रिकर को मुख्यमंत्री पद की शपथ का न्योता दे दिया, वे भाजपा के साथ किसी गठबंधन में शरीक़ नहीं थे। बल्कि उनमें एक पार्टी गोवा फ़ॉर्वर्ड पार्टी ने भाजपा के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था।

जस्टिस पुंछी आयोग ने इस बारे में जो दिशा-निर्देश सुझाए उनमें एक यह भी था कि राज्यपाल को चाहिए कि किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में पहले सबसे पड़ी पार्टी या चुनाव से पहले हुए गठबंधन की सबसे बड़ी संख्या को देखकर सरकार बनाने का न्योता देना चाहिए। सरकारिया आयोग ने भी केंद्र-राज्य संबंधों की पड़ताल करते हुए यही राय रखी थी।

इंडियन एक्सप्रेस ने सर्वोच्च न्यायालय की भी आलोचना की है: “भले अदालत ने राज्यपाल द्वारा दी गई 15 दिन की मोहलत को घटाकर 48 घंटे कर दिया, पर यह आधा उपचार है। सर्वोच्च न्यायालय का सबसे बड़ी पार्टी को पहले आमंत्रित करने के सिद्धांत की रक्षा करने में हिचकिचाना विवादास्पद है।”

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गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है। वह सरकार बना पाए न बना पाए, उसे इसका अवसर मिलना चाहिए था। पर मिलेगा नहीं। क्योंकि मोदी भले दावा रिवायतें बदलने का करें, भाजपा को वे और उनके पार्टी अध्यक्ष कांग्रेस के रास्ते ही हाँक रहे हैं। यानी येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने की लिप्सा कांग्रेस में भी कम न थी। पर भाजपा में उतावली और ज़्यादा दिखाई देती है। उनके राज्यपाल और उतावले हैं। … जिसकी लाठी, उसकी भैंस। लोकतंत्र गया तेल लेने।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

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मोदीजी गोयनका अवार्ड बांटने से पहले इंडियन एक्सप्रेस की ये सच्चाई भी जान लेते…

जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की तरफ से मेरा एक सवाल है देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से। सवाल पूछने का मुझे दोहरा हक़ है। मोदी जी काशी के सांसद हैं। मैं भी काशी का हूँ और उनका मतदाता भी। रामनाथ गोयनका पुरस्कार वितरण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने में पत्रकारिता की भूमिका अहम है. प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर पुरस्‍कार पाने वालों को बधाई दी. उन्‍होंने कहा कि हर किसी की कलम देश को आगे बढ़ाने में योगदान देती है। मैं मोदी जी से पूछना चाहता हूँ जिस इंडियन एक्सप्रेस के दरबार में आपने हाजिरी लगायी क्या यहाँ आने से पहले आपने पूछा इंडियन एक्सप्रेस प्रबंधन से कि आपने जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू की, क्या आपने सुप्रीम कोर्ट की बात मानी। 

महाराष्ट्र के श्रम आयुक्त ने सुप्रीमकोर्ट में अपनी जो रिपोर्ट भेजी है उसमें साफ़ लिखा है कि इंडियन एक्सप्रेस और लोकसत्ता ने तथा फाइनेंशियल एक्सप्रेस एवं लोकप्रभा समाचार पत्र ने अपनी आर्थिक स्थिति खराब बताकर मजीठिया वेज बोर्ड पूरी तरह लागू नहीं किया है। इस अखबार के कार्यालय में श्रम विभाग की टीम 23 जून 2016 को पहुंची तो पता चला कि कंपनी ने सिर्फ परमानेन्ट वर्करों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश का लाभ दिया, वो भी सिर्फ दो क़िश्त जबकि दो किश्त देना अब भी बाकी है। आज की पत्रकारिता पर चुटकी लेते हुए मोदी जी कहा कि मीडिया खबरों को सनसनीखेज बना देती है। सही बात है और इसी सनसनी को बनाने वाले प्रिंट मीडिया के पत्रकार आज शनि के साढ़ेसाती के शिकार हो गए और पूरे देश में आपके मजीठिया के प्रति आँख मूंद लेने से अखबार मालिक चांदी काट रहे हैं।

महाराष्ट्र के लेबर कमिश्नर की रिपोर्ट में साफ़ लिखा है कि कंपनी का कहना है कि उसने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिश लागू कर दी है जबकि कामगारों का कहना है कंपनी ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन नहीं दिया है। इंडियन एक्सप्रेस समूह में कर्मचारियों की संख्या को लेकर भी गड़बड़झाला है। इसके बारे में मुझे आरटीआई से पता चला है। इंडियन एक्सप्रेस में जर्नलिस्ट कैटगरी में 24 लोग हैं। एडमिन स्टाफ में 95 कर्मचारी हैं। फैक्ट्री में 27 जबकि इंडीविजुअल कांट्रेक्ट /कैजुअल में 313 कर्मचारी मुम्बई में हैं। यानी परमानेन्ट से ज्यादा कांट्रेक्ट पर इंडियन एक्सप्रेस में लोग काम करते हैं।

रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह का आयोजन इंडियन एक्सप्रेस का सुरक्षा कवच साबित हो सकता है. आप बताइये अब लेबर कमिश्नर या चीफ सेक्रेटरी की क्या बिसात होगी कि वे इन्डियन एक्सप्रेस के खिलाफ ठोस कार्रवाई करें। शर्म आनी चाहिए उन पत्रकारों को भी जो प्रधानमन्त्री से मिले लेकिन जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के बारे में बोलने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी। फिर काहे की पत्रकारिता  जब आप पत्रकारों की बात ही नहीं रख पाए रहे हैं। एक फ्रेम बनाइये। मोदी जी के साथ का अपना फोटो लगाइये और अवार्ड को सजाइये लेकिन दिल से बताइये क्या आप चाहते तो पत्रकारों की समस्या प्रधानमंत्री को नहीं बता सकते थे। आप कहेंगे नौकरी चली जाती। फिर काहे की पत्रकारिता। यानी आप पत्रकारिता नहीं, नौकरी करते हो। अगर हाँ, तो पत्रकारिता क्यों।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिविस्ट
9322411335

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राजकमल झा, आपने इस भाषण के जरिए सम्पादक नाम की संस्था के मान की न केवल रक्षा की है, बल्कि उसे बढ़ाया भी है

Satyanand Nirupam : किसी सम्पादक के विवेक, समय पर उसकी अचूक पकड़ के साथ उसकी निर्णय-क्षमता की धार देखनी हो तो इस लिंक पर जाकर इंडियन एक्सप्रेस अखबार के प्रधान सम्पादक राजकमल झा का छोटा-सा लेकिन महत्वपूर्ण भाषण सुनिए जो उन्होंने अपने संस्थान द्वारा दिए जाने वाले रामनाथ गोयनका अवार्ड के समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में दिया…

लिंक ये है : 

https://youtu.be/KIOC8bKT4m8 

राजकमल झा, आपने इस भाषण के जरिए सम्पादक नाम की संस्था के मान की न केवल रक्षा की है, बल्कि उसे बढ़ाया भी है। सलाम आपको!

Sarvapriya Sangwan के सौजन्य से इस भाषण का एक हिन्दी पाठ भी यहाँ पेश है :

आपके शब्दों के लिए बहुत आभार। आपका यहाँ होना एक मज़बूत सन्देश है। हम उम्मीद करते हैं कि अच्छी पत्रकारिता उस काम से तय की जाएगी जिसे आज की शाम सम्मानित किया जा रहा है, जिसे रिपोर्टर्स ने किया है, जिसे एडिटर्स ने किया है। अच्छी पत्रकारिता सेल्फी पत्रकार नहीं परिभाषित करेंगे जो आजकल कुछ ज़्यादा ही नज़र आ रहे हैं, जो हमेशा आपने आप से अभिभूत रहते हैं, अपने चेहरे से, अपने विचारों से जो कैमरा को उनकी तरफ रखते हैं, उनके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती है, उनकी आवाज़ और उनका चेहरा। आज के सेल्फी पत्रकारिता में अगर आपके पास तथ्य नहीं हैं तो कोई बात नहीं, फ्रेम में बस झंडा रखिये और उसके पीछे छुप जाइये। आपके भाषण के लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर, आपने साख/भरोसे की ज़रूरत को अंडरलाइन किया। ये बहुत ज़रूरी बात है जो हम पत्रकार आपके भाषण से सीख सकते हैं।  आपने पत्रकारों के बारे में बहुत अच्छी बातें कही जिससे हम थोड़ा नर्वस भी हैं। आपको ये विकिपीडिया पर नहीं मिलेगा, लेकिन मैं इंडियन एक्सप्रेस के एडिटर की हैसियत से कह सकता हूँ कि रामनाथ गोयनका ने एक रिपोर्टर को नौकरी से निकाल दिया जब उन्हें एक राज्य के मुख्यमंत्री ने बताया कि आपका रिपोर्टर बड़ा अच्छा काम कर रहा है। इस साल मैं 50 का हो रहा हूँ और मैं कह सकता हूँ कि इस वक़्त जब हमारे पास ऐसे पत्रकार हैं जो रिट्वीट और लाइक के ज़माने में जवान हो रहे हैं, जिन्हें पता नहीं है कि सरकार की तरफ से की गयी आलोचना हमारे लिए इज़्ज़त की बात है। इस साल हमारे पास इस अवार्ड के लिए 562 एप्लीकेशन आयीं। ये अब तक की सबसे ज़्यादा एप्लीकेशन हैं। ये उन लोगों को जवाब है जिन्हें लगता है कि अच्छी पत्रकारिता मर रही है और पत्रकारों को सरकार ने खरीद लिया है। अच्छी पत्रकारिता मर नहीं रही, ये बेहतर और बड़ी हो रही है। हाँ, बस इतना है कि बुरी पत्रकारिता ज़्यादा शोर मचा रही है जो 5 साल पहले नहीं मचाती थी। 

-राजकमल झा, संपादक, इंडियन एक्सप्रेस

Daya Shankar Shukla Sagar : इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने बड़ी शानदार बात कही है। अच्छी पत्रकारिता क्या है ये ‘सेल्फी पत्रकार’ तय नहीं कर सकते। ये सिर्फ अखबार करते हैं हालांकि ज्यादातर अखबारों ने ये काम अब छोड़ दिया है। ‘सेल्फी पत्रकार’ वे हैं जो आजकल टीवी चैनलों पर चीखते है या फिर कभी सौम्यता का लाबादा ओढ़ कर प्रवचन करते दिखते हैँ। वे अपने विचारों और चेहरे से खुद ही अभिभूत व आत्ममुग्‍ध रहते हैं। जैसे वे कोई सेलीब्रेटी हों। रंगे पुते चेहरे। कुछ कुछ बालीवुड के चेहरों की तरह। उनके चहेरे कैमरे के सामने होंते हैं दिमाग टीआरपी के आसमान पर। जैसा झा ने कहा उनके लिए सिर्फ एक ही चीज़ मायने रखती है, उनकी आवाज़ और उनका चेहरा। इसके अलावा सब कुछ पृष्ठभूमि में होता, यानी बेमतलब का शोर। इस सेल्फी पत्रकारिता में अगर आपके पास तथ्य नहीं हैं तो कोई बात नहीं, फ्रेम में बस झंडा लहराइए और उसके पीछे छुप जाइये।

पत्रकार सत्यानंद निरुपम और दया शंकर शुक्ल सागर की एफबी वॉल से. 

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मध्य प्रदेश सरकार ने छल वेबसाइटों को 4 साल में दिए 14 करोड़ के सरकारी विज्ञापन, इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित की रिपोर्ट

वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव की रिपोर्ट में खुलासा, पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों की ओर से संचालित की जा रही हैं वेबसाइट, 10 हजार रूपए से लेकर 21 लाख 70 हजार रुपए तक विज्ञापन दिए गए, कांग्रेसी विधायक बाला बच्चन ने विधानसभा में उठाया था सवाल

-दीपक खोखर-

भोपाल, 10 मई। मध्य प्रदेश में 4 साल के दौरान 244 छल वेबसाइटों को 14 करोड़ रूपए के सरकारी विज्ञापन दिए गए। इनमें से ज्यादातर वेबसाइट पत्रकारों और उनके रिश्तेदारों की ओर से संचालित की जा रही हैं। इन वेबसाइट को वर्ष 2012 से वर्ष 2015 के बीच 10 हजार रूपए से लेकर 21 लाख 70 हजार रूपए के विज्ञापन दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने इस बारे में सोमवार 9 मई के अंक में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है। वरिष्ठ पत्रकार श्याम लाल यादव की रिपोर्ट में यह तमाम खुलासे हुए हैं। दरअसल कांग्रेस विधायक बाला बच्चन ने विधानसभा में सवाल उठाया था। जिसके बाद उन्हें दिए गए जवाब में तमाम जानकारी हासिल हुई।

इंडियन एक्सप्रेस हमेशा ही अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए अलग पहचान रखता है और इस रिपोर्ट में भी इस प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने बेहतरीन पत्रकारिता का नमूना पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश सरकार की ओर से 26 वेबसाइट को 10 लाख रूपए से ज्यादा के विज्ञापन जारी किए गए। जिनमें से 18 वेबसाइट पत्रकारों के रिश्तेदारों द्वारा संचालित की जा रही हैं। 81 वेबसाइट को 5 से 10 लाख रूपए के विज्ञापन दिए गए। 33 वेबसाइट तो ऐसी हैं जो मध्य प्रदेश सरकार द्वारा भोपाल में आवंटित भवन से संचालित हो रही हैं। एक बात और जिस वेबसाइट को सबसे ज्यादा 21 लाख 70 हजार रूपए मिले हैं, वह अश्वनी राय के नाम से हैं, जो भाजपा के एक पदाधिकारी के कार्यालय में काम करते हैं। राय स्पष्टीकरण देते हैं कि वे भाजपा के लिए काम करते हैं, लेकिन वेबसाइट से उनका कोई लेना-देना नहीं है।

वेबसाइट अलग-अलग नाम से, सामग्री एक समान

यहीं नहीं खास बात यह है कि कई वेबसाइट अलग-अलग नाम से हैं, लेकिन उन सबमें सामग्री एक ही है। ज्यादातर वेबसाइट ने तो अपने बारे में कोई जानकारी भी नहीं दी है। इस बारे में पूछे जाने पर मध्य प्रदेश के जनसंपर्क विभाग के आयुक्त अनुपम राजन कहते हैं यह न्यू मीडिया है और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इन्हें कौन संचालित कर रहा है। हालांकि साथ ही वे कहते हैं कि अपनी विज्ञापन पॉलिसी में बदलाव कर रहे हैं और यह देखा जा रहा है कि वेबसाइट चल रही है या नहीं। उधर, विधायक बाला बच्चन का सीधे तौर पर आरोप है कि भाजपा से जुड़े लोगों को ही फायदा पहुंचाया गया, जबकि वास्तविक पत्रकार की वेबसाइट को ही विज्ञापन मिलने चाहिए।

विस्तृत जानकारी के लिए इंडियन एक्सप्रेस की मूल खबर की कटिंग उपर अपलोड किया गया है. इसी मुद्दे पर इंडियन एक्सप्रेस ने एक अन्य खबर भी प्रकाशित की है जो नीचे है. पढ़ने के लिए नीचे की न्यूज कटिंग पर क्लिक कर दें ताकि अक्षर साफ साफ पढ़ने में आ सकें.

दीपक खोखर की रिपोर्ट. संपर्क- 09991680040

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राजकमल झा और इंडियन एक्सप्रेस की टीम को मेरा लाल सलाम

Samar Anarya : Most of the Indians in Panama Papers are patriots like Amitabh Bachchan, Adani who keep chanting Bharat Mata Ki Jai. Some of them are even Padma Awardees. Bharat Mata ki Jai. पनामा पेपर्स में सामने आए ज़्यादातर भारतीय नाम अडानी से अमिताभ बच्चन जैसे राष्ट्रवादियों के हैं जो अक्सर भारत माता की जय बोलते रहते हैं। कुछ तो पद्म पुरस्कृत भी हैं! भारत माता की जय।

Virendra Yadav : छात्रों, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, सोशल एक्टिविस्टों और वामपंथियों के बाद अब अखबार भी ‘देशद्रोही’ होते जा रहे हैं. ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ का यह दुस्साहस कि ‘सदी के महानायक’ अमिताभ बच्चन, उनकी बहू ऐश्वर्या राय और अडानी आदि सरीखे ‘देशभक्तों’ को बेनकाब कर रहा है. जिन अमिताभ बच्चन की शपथ खाकर नैतिकता अपना कारोबार कर रही है, जो गुजरात के ब्रांड अम्बेसडर के रूप में अपनी आभा बिखेर रहे हैं और जिनकी महान छवि तले ज्ञानपीठ सम्मान भी कराह रहा है, ‘भारत माता’ के ऐसे भारत-पुत्र के बारे में राजकमल झा सरीखे अदना से अखबारनवीस का यह दुस्साहस कि वह ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ में यह न्यूजस्टोरी छापे. अच्छा ही हुआ कि राजकमल झा असफल उपन्यासकार सिद्ध हुए. लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व अंगरेजी उपन्यासों पर लिखे अपने लेख में मैंने इनके उपन्यास ‘दि ब्लू बेडस्प्रेड’ का पोस्टमार्टम किया था. साहित्य ने जिसे उलीच दिया वह पत्रकारिता का नगीना सिद्ध हुआ. तब मुझे नहीं पता था कि यह असफल उपन्यासकार एक दिन इतना साहसी और भंडाफोडू पत्रकार सिद्ध होगा. राजकमल झा और ‘इन्डियन एक्सप्रेस’ की टीम को मेरा लाल सलाम.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर और जाने माने आलोचक वीरेंद्र यादव के फेसबुक वॉल से.

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टेलीग्राफ ने पिछले एक महीने में जो हेडिंग दी, वह बहुत आसान काम नहीं है

Ambrish Kumar : सिर्फ दो अखबार… अपनी जो पोस्ट पब्लिक में थी उसमें बहुत से अंजान लोग भी आए. कई आहत थे तो कई आहत करने का प्रयास कर गए. उनकी एक नाराजगी अपन के पत्रकार होने के साथ पूर्व में इंडियन एक्सप्रेस समूह का पत्रकार होने से ज्यादा थी. वे मीडिया की भूमिका से नाराज थे. पर यह नाराजगी दो अखबारों से ज्यादा थी. अपनी प्रोफाइल में इंडियन एक्सप्रेस है ही जो एक अख़बार था तो दूसरा टेलीग्राफ. दोनों की दिल्ली में सांकेतिक मौजूदगी है, बड़े प्रसार वाले अखबारों के मुकाबले. एक्सप्रेस से अपना लंबा संबंध रहा है और उसका इतिहास भूगोल सब जानते भी हैं. चेन्नई अब कहा जाता है पर आजादी से पहले के मद्रास में किस तरह अंग्रेजों से यह अख़बार नुकसान सहकर लड़ा, यह कम लोग जानते है.

आपातकाल में जब तथाकथित देशभक्त मीडिया इंदिरा गांधी तो दूर वीसी शुक्ल के चरणों में लोट रहा था तब यह तनकर खड़ा था. उसके बाद भी बोफोर्स से लेकर ठाक्कर कमीशन हो या अन्य विवाद. इसे टकराते भिड़ते देखा. बाद में इसके हरावल दस्ते का एक सिपाही भी बना. जनसत्ता ने चौरासी के दंगों में जिस तरह सिखों की आवाज उठाई वह बेमिसाल है. उसके बाद भी यह तेवर बरक़रार रहा. इसलिए इंडियन एक्सप्रेस आज भी अख़बारों की भीड़ में अलग है. टेलीग्राफ ने पिछले एक महीने में जो हेडिंग दी कवरेज की वह बहुत आसान नहीं है. टेलीग्राफ का शानदार इतिहास रहा है. टेलीग्राफ के साथी पीयूष बताते हैं कि किस तरह एक एक स्टोरी पर रात दो बजे तक पूरी टीम काम करती है. आप असहमत हो सकते हैं. पर समूचे अख़बार को निशाने पर लें, यह ठीक नहीं. सही तरीका यह है कि इन्हें न पढ़ें. समस्या खत्म. तनाव ख़त्म. अखबारों की भीड़ है. कोई भी विश्व का या देश का बड़ा अख़बार उठाएं और पढ़ें. आप भी खुश हम भी खुश.

अख़बार अख़बार में फर्क है. हिंदी में जो नहीं मिलेगा वह अंग्रेजी में मिल जायेगा. हिंदी की चुटीली हेडिंग के साथ. टाइम्स आफ इंडिया ने सुभाष चंद्र बोस के परिजन सांसद सुगाता बोस का भाषण दिया है. राष्ट्रभक्ति पर कम से कम नव राष्ट्रवादियों को उसे पढना चाहिए पर चैनल की तरह हिंदी वालों ने इससे बचने का प्रयास और ढंग से दिया ही नहीं, कहीं पाठक ज्यादा जागरूक न हो जाए. पाठक ही अख़बार नहीं बनाता है, अख़बार भी पाठक को बनाता है. अब यह भूमिका अंग्रेजी अख़बार ज्यादा बेहतर ढंग से निभा रहे है. बहरहाल आज का टेलीग्राफ फिर देखें.

Sanjaya Kumar Singh : दि टेलीग्राफ का शीर्षक आज भी सबसे छोटा सबसे चुटीला है। जब प्रधानमंत्री को दो साल में देश की मीडिया को संबोधित करने का समय न मिले, दीवाली मिलन के नाम पर पत्रकारों को बुलाकर सेल्फी खींचने का सत्र चलाया जाए तो अखबारों के शीर्षक पर चर्चा करना, वह भी, तब जब स्टार मंत्री के ‘शानदार’ भाषण की तारीफ ना हो, भक्तों को क्यों पसंद आएगा। भक्ति में लगे लोगों को इसपर चर्चा से भी परहेज है।

वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार और संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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मजीठिया वेज बोर्ड और इंडिया एक्सप्रेस मुंबई : यूनियन के पदाधिकारी कंपनी के हाथों बिक गए!

मुंबई से मीडिया के एक साथी ने इंडियन एक्सप्रेस मुंबई की अंतरकथा लिख भेजी है. इस कहानी को पढ़ने से पता चलता है कि किस तरह आम मीडियाकर्मियों के भले के लिए बनी यूनियनें आजकल मालिकों के हित साधन का काम कर रही हैं. यही कारण है कि मीडिया के एक बड़े मसले मजीठिया वेज बोर्ड को लागू कराने को लेकर यूनियनों का रवैया बेहद नपुंसक है.

कायदे से यूनियनों को आपस में मोर्चा बनाकर मीडिया हाउसों के मुख्यालयों से लेकर दिल्ली का जंतर-मंतर घेर लेना चाहिए और रोजाना सौ की तादाद में मीडियाकर्मियों को मालिकों के घरों-आफिसों के बाहर धरने पर बैठना चाहिए. लेकिन यह सब काम कराने के लिए जिन यूनियनों को पहल करना था, वह मालिकों से सेटिंग गेटिंग करके मौन साधे हैं और कभी कभार बयान जारी करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं. सबसे उपर यूनियन की तरफ से जारी किया गया पत्र है. नीचे मीडियाकर्मी साथी द्वारा भेजा गया पत्र है. -यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

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HT, IE among 47 Delhi newspapers have dared not to implement Majithia Award

Except four newspapers namely; The Hindu, The Tribune, The Decan Herald and Bennet Coleman & Company (publishers of The Times of India, Economic Times and Navbharat Times) and one news agency i.e. the Press Trust of India no newspaper/news agency being published from Delhi has implemented the Majithia Award. This has been revealed in the affidavit of the Government of Delhi submitted by Dr. Madhu Teotia, Labour Commissioner of Government of NCT of Delhi.

According to the report, the Labour Department carried out the inspection in 77 newspaper establishments and 2 news agencies, which included 26 one-man establishments in which Wage Boards are not applicable. Out of remaining 53 newspapers, establishments/news agencies only four above named newspapers establishments have implemented the Award. Other newspapers have not at all implemented the Award.

Strangely, three important newspapers namely; Dainik Jagran, Dainik Bhaskar and Hind Samachar have skirted the implementation in the name of Section – 20j of the Majithia Wage Board recommendations. It will be interesting to know that according to Section – 20j of the Majithia Wage Board recommendations, the employees could exercise the option of not taking the advantage of the Wage Revision provided they were satisfied with wages, they have already been getting. The wages, which are being given to the employees of Dainik Jagran, and Dainik Bhaskar are less than 1/3rd of the Wage Boards recommendations.

It is all the more interesting to know that the option was to be utilised by the employees within three weeks of the notification of the Award. However, if the employees were highly satisfied with the ‘princely amount’ of wages given by these newspapers, then what was the need for these newspapers to have filed Writ Petitions in the Supreme Court of India against the Award? Further, if the employees were so satisfied with the ‘handsome’ salaries, then why did they approach the Hon’ble Supreme Court of India for the implementation of the Award? And if the Hon’ble Supreme had accepted their version then what was the need for it to appoint the special labour Inspectors to find out the status? Thus, it appears that these newspapers are telling the blatant lie with no fear to the law or law enforcing agencies.

What is highly baffling is that the important newspapers like the Hindustan Times (H.T. Media Ltd.), Hindustan Media Venture Ltd., the Statesman, India Today, Amar Ujala and Sahara India have openly dared to have not implemented the Award. Indian Express is another major newspaper, which has been audacious enough not to provide any information to the Labour Department.

Meanwhile, the Government of Jharkhand has also filed its status report and the same will be shared tomorrow.

Parmanand Pandey

Secy. Gen.

IFWJ

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मजीठिया वेज बोर्ड : सुप्रीम कोर्ट में आज की सुनवाई, भविष्य की रणनीति और लड़ने का आखिरी मौका… (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : सुप्रीम कोर्ट से अभी लौटा हूं. जीवन में पहली दफे सुप्रीम कोर्ट के अंदर जाने का मौका मिला. गेट पर वकील के मुहर लगा फार्म भरना पड़ा जिसमें अपना परिचय, केस नंबर आदि लिखने के बाद अपने फोटो आईडी की फोटोकापी को नत्थीकर रिसेप्शन पर दिया. वहां रिसेप्शन वाली लड़की ने मेरा फोटो खींचकर व कुछ बातें पूछ कर एक फोटो इंट्री पास बनाया. पास पर एक होलोग्राम चिपकाने के बाद मुझे दिया. जब तक कोर्ट नंबर आठ पहुंचता, केस की सुनवाई समाप्त होने को थी.

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में भड़ास यानि Bhadas4Media.com की पहल पर दायर सैकड़ों याचिकाओं की सुनवाई आज थी. जो साथी छुपकर लड़ रहे हैं, उनको मैं रिप्रजेंट कर रहा हूं. कोर्ट नंबर आठ में आइटम नंबर तीन था. दूसरे कई पत्रकार साथी और उनके वकील भी आए हुए थे. मामले की सुनवाई शुरू होते ही टाइम्स आफ इंडिया की तरफ से आए एक वकील ने कहा कि उनके खिलाफ जिस कर्मचारी ने याचिका दायर की थी, उसने वापस लेने के लिए सहमति दे दी है. इस पर कर्मचारी के वकील ने विरोध किया और कहा कि ये झूठ है. इसको लेकर न्यायाधीश ने लड़-भिड़ रहे दोनों वकीलों को फटकार लगाई और इस प्रकरण को अपने पास रोक लिया. इसी तरह वकील परमानंद पांडेय के एक मामले में जब दूसरे पक्ष के वकील ने कहा कि मजीठिया मांगने वाला कर्मी इसके दायरे में आता ही नहीं तो न्यायाधीश ने परमानंद पांडेय से पूछ लिया कि क्या ये सही है. पांडेय जी फाइल देखने लगे. तुरंत जवाब न मिलने पर न्यायाधीश ने इस मामले को भी होल्ड करा लिया. बाकी सभी मामलों में  कोर्ट ने सभी मालिकों को नोटिस भेजने का आदेश दिया है. इस नोटिस में कहा गया है कि क्यों न अखबार मालिकों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा शुरू किया जाए. मामले की सुनवाई की अगली तारीख 28 अप्रैल है.

दोस्तों, एक मदद चाहिए. सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े चाहिए. जो साथी इसे मुहैया करा सकता है वह मुझे yashwant@bhadas4media.com पर मेल करे. अखबार मालिक अपने बचाव के लिए जो नई चाल चल रहे हैं, उसका काउंटर करने के लिए ये आंकड़े मिलने बहुत जरूरी हैं ताकि आम पत्रकारों को उनका हक दिलाया जा सके. मालिकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख बहुत तल्ख है. आज की सुनवाई से यह लग रहा है कि 28 अप्रैल की डेट पर सुप्रीम कोर्ट अखबार मालिकों के खिलाफ कोई कड़ा आदेश जारी कर सकता है. अगली डेट पर मालिकों की तरफ से क्या क्या नई चाल चली जाने वाली है, इसके कुछ डिटेल हाथ लगे हैं. उसी के तहत आप से सभी अखबारों की डीएवीपी में दिखाई जाने वाली प्रसार संख्या, आरएनआई में दायर किए जाने वाले रिटर्न का डिटेल और कंपनी बैलेंस शीट आदि के आंकड़े मांगे जा रहे हैं. आप लोग जिन-जिन अखबारों में हो, उन उन अखबारों के उपरोक्त डिटेल पता लगाएं. मैं भी अपने स्तर पर इस काम में लगता हूं.

दोस्तों बस कुछ ही दिनों का खेल है. जी-जान से सबको लग जुट जाना है. ये नहीं देखना है कि उसका वकील कौन है मेरा वकील कौन है. जो भी हैं, सब अच्छे हैं और सब अपने हैं. जो साथी अब तक इस लड़ाई में छुपकर या खुलकर शरीक नहीं हो पाए हैं, उनके लिए अब कुछ दिन ही शेष हैं. आप सिर्फ सात हजार रुपये में सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से बनने वाली अपनी सेलरी व अपना एरियर का हक पाने के लिए एडवोकेट Umesh Sharma​ के मार्फत केस डाल सकते हैं. एडवोकेट उमेश शर्मा से उनकी मेल आईडी legalhelplineindia@gmail.com या उनके आफिस के फोन नंबर 011-2335 5388 या उनके निजी मोबाइल नंबर 09868235388 के जरिए संपर्क कर सकते हैं.

आज यानि 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर एडवोकेट उमेश शर्मा ने जो कुछ मुझे बताया, उसे मैंने अपने मोबाइल से रिकार्ड कर लिया ताकि आप लोग भी सुनें जानें और बूझें. क्लिक करें इस लिंक पर: https://www.youtube.com/watch?v=KTTDbkReQ1k

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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भड़ास की पहल पर दायर याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार, 27 मार्च को होगी सुनवाई

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इंडियन एक्सप्रेस में छपा रिबेरो का लेख हर पाठक को हिला गया : ओम थानवी

1989 में जब मैंने चंडीगढ़ जनसत्ता का कार्यभार संभाला, जूलियो रिबेरो आतंकवाद से जूझ रहे पंजाब में राज्यपाल के सलाहकार थे। राष्ट्रपति राज में राज्यपाल और उनके सलाहकार ही शासन चलाते थे। राजभवन के एक आयोजन में जब मैं रिबेरो से मिला, वे कहीं से ‘सुपरकॉप’ नहीं लगते थे; उनमें अत्यंत सहजता और विनम्रता थी, खीज या उत्तेजना उनसे कोसों दूर नजर आती थी। मेरी जिज्ञासा पर अपने पर हुए एक जानलेवा हमले का किस्सा उन्होंने हंसते हुए सुनाया था।

इंडियन एक्सप्रेस में छपा उनका लेख हर पाठक को हिला गया होगा। उनमें इस किस्म की खीज, उत्तेजना और हताशा का भाव देखना दुखी कर गया। मुसलमानों के बाद अब ईसाई समुदाय और उनके गिरजे जगह-जगह निशाने पर हैं। रिबेरो कहते हैं – “86वें वर्ष में हूँ, मगर आहत और अवांछित महसूस करता हूँ, मानो अपने ही देश में अजनबी की हैसियत में सिकुड़ गया होऊं। … जैसे मैं भारतीय ही नहीं रहा, कम से कम हिन्दू राष्ट्र के उन्नायकों की नजरों में। …

“… मदर टेरेजा के बारे में मोहन भागवत के बयान के बाद मैं अपने आपको भी निशाने पर समझने लगा हूँ। … मैं क्या करूँ? अपना आत्मविश्वास फिर से कैसे अर्जित करूँ। मैं इसी देश में जन्मा। मेरे पूर्वज भी। पांच हजार साल पहले या उससे भी पीछे। अगर मेरा डीएनए देखेंगे तो वह भागवत के डीएनए से अलग नहीं निकलेगा। मेरा डीएनए देश के रक्षामंत्री से भी मिलेगा … इतिहास का यह महज संयोग रहा कि मेरे पूर्वजों ने धर्म बदल लिया, भागवत के पूर्वजों ने नहीं। मुझे नहीं पता, और न मैं कभी जान पाउँगा, कि किन परिस्थितियों में मेरे पूर्वजों ने ऐसा किया होगा।”

प्रधानमंत्रीजी, आप देर से सही बोले तो हैं, पर अपनी आवाज में असर कब दिखाएंगे – रिबेरो का आर्तनाद आपसे यही पूछता है।

वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.

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That’s Called True Journalism… Salute to Mr Praveen Swami….

इंडियन एक्सप्रेस में कार्यरत वरिष्ठ और खोजी पत्रकार प्रवीण स्वामी ने अपनी एक इनवेस्टीगेटिव रिपोर्ट के जरिए बताया कि जिस नाव को उड़ाया गया, वह ड्रग तस्करों की नाव थी. जाहिर है, इससे मोदी सरकार का फर्जीवाड़ा खुलना था, जो दावे कर रही थी कि इस नाव में बारूद का जखीरा था और पाक प्रशिक्षित आतंकवादी थे, भारत का बहुत बड़ा नुकसान करने आ रहे थे, उन्हें उड़ा दिया गया ब्ला ब्ला ब्ला. प्रवीण स्वामी जब सच सामने ले आए तो यह दक्षिणपंथियों को बर्दाश्त नहीं हुआ और हिंदू सेना वालों ने प्रवीण स्वामी के खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस आफिस के सामने नारेबाजी की और उनकी तस्वीरें जलाईं. इस मसले को लेकर सोशल मीडिया में लोग हिंदू सेना और केंद्र सरकार की निंदा कर रहे हैं और ऐसे कुकृत्य को सेंसरशिप से जोड़कर देख रहे हैं.

इस प्रकरण पर खुद प्रवीण स्वामी ने फेसबुक पर जो लिखा है, वह इस प्रकार है…

Praveen Swami : Hindu Sena activists protest my investigation of the government’s terror boat claims at The Indian Express office in New Delhi today. The photos they’re using, ironically, were made by a pro-Islamist group protesting my Indian Mujahideen coverage in 2008.

कानपुर के पत्रकार जफर इरशाद फेसबुक पर लिखते हैं- Zafar Irshad : That’s Called True Journalism…Salute to Mr Praveen Swami…. इंडियन एक्सप्रेस बिल्डिंग के बाहर प्रदर्शनकारियों ने पत्रकार प्रवीण स्वामी की तस्वीरों को आग के हवाले किया। प्रवीण स्वामी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा था– ‘जिस बोट में आग लगी, उसमें आतंकवादी सवार नहीं थे बल्कि कुछ छोटे-मोटे तस्कर थे जो पाकिस्तान से डीजल और शराब की तस्करी करते हैं।’

Rajeev Bhatt : what rubbish act by misguided people. Praveen Swami, as far as I know you personally and professionally for last 20 yrs that we have worked together, these acts will never deviate you from what ever you are doing. In fact this is a new year gift for you to carry on your superb reportage further more.

Nadim S. Akhter : देश में घोषित ना सही, अघोषित इमरजेंसी ही सही. कल भी आप थे, आज भी आप हैं, कल आप कहां थे, आज आप कहां हैं, पर ये याद रखिएगा कि…. टेबल के किनारे बदल जाने से वतन की तकदीरें बदला नहीं करतीं.

फेसबुक से.

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संगम पांडेय, शिल्पी गुप्ता, अभिनय, सीपी शुक्ला, सुधीर द्विवेदी, योगेश पढियार के बारे में सूचनाएं

साहित्यिक मैग्जीन ‘हंस’ से सूचना मिली है कि यहां कार्यकारी संपादक के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार और लेखक संगम पांडेय ने इस्तीफा दे दिया है. सूत्रों का कहना है कि ‘हंस’ के संचालन समेत कुछ मुद्दों को लेकर प्रबंधन से मतभेद के बाद संगम ने खुद ही इस्तीफा दे दिया. संगम पांडेय स्टार न्यूज समेत कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

इंडियन एक्सप्रेस से सूचना है कि एचआर हेड शिल्पी गुप्ता ने इस्तीफा दे दिया है. एचआर हेड की अब अतिरिक्त जिम्मेदारी जीआर सक्सेना को दे दी गई है जो एडमिन हेड के रूप में कार्यरत हैं. शिल्पी गुप्ता के इस्तीफे का कारण पता नहीं चल पाया है.

दैनिक जागरण, बरेली से सूचना है कि यहां अभिनय सिंह ने एक बार फिर से नई पारी की शुरुआत की है. अभिनय जागरण से इस्तीफा देकर राजस्थान पत्रिका चले गए थे. अब वो फिर लौटकर जागरण आ गए हैं. बरेली से एक अन्य सूचना के मुताबिक अमर उजाला बरेली के सीनियर जर्नलिस्ट सीपी शुक्ला ने इस्तीफा देकर कैनविज टाइम्स ज्वाइन कर लिया है. शुक्ला लंबे समय से अमर उजाला में देहात डेस्क के प्रभारी थे. हिंदुस्तान टाइम्स, बरेली के साथ सुधीर द्विवेदी ने एक बार फिर नई पारी की शुरुआत की है. सुधीर दो साल पहले एचटी से इस्तीफा देकर पायनियर देहरादून गए थे. अब वो बरेली मंडल के प्रभारी बनकर एचटी में लौटे हैं.

दिव्य भास्कर, राजकोट से योगेश पढियार ने इस्तीफा दे दिया है. वे प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में कार्यरत थे. दिव्य भास्कर ने योगेश को बिना मजीठिया का लाभ दिए ही निकाल दिया. इसको लेकर नाराज योगेश कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं.

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शेखर गुप्ता अब अपनी मीडिया कंपनी शुरू करेंगे, अखबार से लेकर टीवी तक लांच करेंगे

दूसरों की नौकरियां करते करते उब चुके शेखर गुप्ता अब खुद की नौकरी करेंगे. यानि अपनी मीडिया कंपनी बनाएंगे. इस कंपनी के बैनर तले वह अखबार, वेबसाइट, चैनल सब लांच करेंगे. पता चला है कि शेखर गुप्ता ने अपनी खुद की मीडिया कंपनी वर्ष 2000 में ही बना ली थी लेकिन उसे लेकर बहुत सक्रिय नहीं थे क्योंकि उनका पूरा वक्त इंडियन एक्सप्रेस समूह की सेवा में जाता था. अब जब वह इंडियन एक्सप्रेस से लगाकर इंडिया टुडे तक से हटाए जा चुके हैं तो उनके पास अपनी कंपनी को देने के लिए वक्त खूब है.

इसी कारण वह साल 2000 में पंजीकृत अपनी कंपनी ‘मीडियास्केप प्राइवेट लिमिटेड’ के तहत वे एक अखबार, टीवी शो और डिजिटल न्यूज़ प्रोडक्ट्स शुरू करने की प्रक्रिया में हैं. बताया जा रहा है कि शुरुआत के लिए शेखर गुप्ता एनडीटीवी के अंग्रेज़ी न्यूज़ चैनल के लिए दो टीवी शो लॉन्च करेंगे. फिलहाल गुप्ता एनडीटीवी 24×7 के लिए साक्षात्कार आधारित शो ‘वॉक द टॉक’ की मेजबानी करते हैं. शेखर गुप्ता का कहना है कि वह प्रिंट मीडिया में भी जाने की योजना बना रहे हैं.

शेखर गुप्ता ने अपनी मीडिया कंपनी के लिए भर्ती शुरू कर दी है. शेखर गुप्ता की इंडियन एक्सप्रेस में 9 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी. मुंबई में एक्सप्रेस टावरों के इस साल की शुरुआत में बेच दिए जाने से गुप्ता की हिस्सेदारी 1.2 प्रतिशत तक नीचे आ गई. पर उन्होंने उस ट्रांसेक्शन में पैसा बनाया है. वाइस चेयरमैन और एडिटर-इन-चीफ के रूप में इंडिया टुडे ग्रुप में शेखर गुप्ता का कार्यकाल इस साल सितंबर में अचानक खत्म हो गया. अटकलें लगाई गई थी कि उनके और संस्थापक-प्रमोटर और चेयरमैन अरुण पुरी के बीच मतभेद थे.

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सलाखों के भय से ‘चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस’ ने मजीठिया आधा-अधूरा लागू किया, …लेकिन भास्कर कर्मियों का क्या होगा?

सबके दुख-सुख, विपदा-विपत्ति, परेशानी-मुसीबत, संकट-कष्ट, मुश्किल-दिक्कत, आपत्ति-आफत आदि-इत्यादि को अपनी कलम-लेखनी, कंप्यूटर के की-बोर्ड से स्टोरी-आर्टिकल, समाचार-खबर की आकृति में ढाल कर अखबारों, समाचार पत्रों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाने की अनवरत मशक्कत-कसरत करने वाले मीडिया कर्मियों को अपने ही गुजारे के लिए मिलने वाली पगार अमृत समान हो गई है। हां जी, अमृत समान! मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लेकर अखबारों के कर्मचारियों और मालिकान के बीच चल रही लड़ाई शायद इसी पौराणिक कथा का दूसरा, पर परिवर्तित रूप लगती है।

लंबे और अथक संघर्ष के बाद कर्मचारियों के समक्ष मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियां प्रकट हुईं लेकिन उस पर अमल कराने, उसे हासिल करने के लिए कर्मचारियों को फिर सर्वोच्च अदालत की शरण में जाना पड़ा। ठीक है, गए। सर्वोच्च अदालत ने कर्मचारियों-कामगारों की पीड़ा को समझते हुए मालिकान को तत्काल आदेश दिया कि दो महीने में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से कर्मचारियों को वेतन, बकाया और उससे जुड़े समस्त लाभ अदा करो और अपने किए का लेखा-जोखा अगली तारीख 2 जनवरी, 2015 को हमारे समक्ष प्रस्तुत करो। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़, दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण के कर्मचारियों की अवमानना याचिकाओं पर बीते 13 अक्टूबर को दिया था। अपने को कानून-व्यवस्था, यहां तक कि भगवान से भी स्वयं को ऊपर समझने वाले अखबार मालिकों के होश इस आदेश ने उड़ा दिए क्यों कि इसका पालन नहीं करने का अर्थ है सलाखों के पीछे भेजे जाने की सजा।

इससे डरे इंडियन एक्सप्रेस के मालिक विवेक गोयनका ने आखिरकार मजीठिया लागू कर दिया है। क्यों कि दो महीने की अवधि 13 दिसंबर को समाप्त हो रही है और इसी अवधि में लागू करना है। चलिए, लागू तो कर दिया है, पर जिस तरह, जिस तरीके से लागू किया है उससे वेतन की स्थिति कहीं और बिगड़ गई है। इस वेज बोर्ड के सुझावों के मुताबिक वेतन-पगार कई गुना बढऩी चाहिए, लेकिन इंडियन एक्सप्रेस चंडीगढ़ के इस वेज बोर्ड की परिधि में आने वाले 69 कर्मचारियों में से 38 का वेतन पहले से हजारों रुपए कम हो गया है, उनका वेतन माइनस में चला गया है। यही नहीं क्लासीफिकेशन के हिसाब से पहले यह अखबार क्लास 2 में था, जिसे अब क्लास में 3 में कर दिया है। इसके पीछे वही चिरपरिचित दलील कि अखबार की कमाई घट गई है और ऊपर मजीठिया की तलवार लटक गई है। जब कि सच तो यह है कि विवेक गोयनका की बेहद मोटी गर्दन और उससे भी कहीं मोटी खाल को मजाल क्या कि ये तलवार खरोंच भी लगा सके! फिर भी रोना वही का वही। हालांकि इन घडिय़ाली आंसुओं की हकीकत किसी से छिपी नहीं है।

इस वेज बोर्ड में कर्मचारियों को नियमित पदोन्नति देने, इन्क्रीमेंट देने का पूरा बंदोबस्त किया गया है, लेकिन एक्सप्रेस प्रबंधन की आंखों में यह चुभ रहा है। वह इस पर अमल से विमुख होती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक चार समान किस्तों में एरियर का भुगतान करना है, पर विवेक गोयनका साहब का इस पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं है। माननीय मजीठिया जी ने कर्मचारियों को उनकी योग्यता, काबिलियत के हिसाब से एश्योर्ड करिअॅर डेवलपमेंट का प्रावधान किया है। लेकिन स्व.रामनाथ गोयनका के महामहिम दत्तक पुत्र को यह प्रावधान निरर्थक, बेमतलब, बेकार लगता है। यही नहीं, प्रबंधन ने मजीठिया देने के एवज में कर्मचारियों को पहले से मिल रहीं अनेक या कहें कि वो तमाम भत्ते-सुविधाएं छीनने की तैयारी कर ली है, या कि छीन ली है जिसे कर्मचारियों ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है। इन सुविधाओं-सहूलियतों में कई तो ऐसी हैं कि जिनके बगैर अखबार का काम हो ही नहीं सकता। खासकर इंडिसन एक्सप्रेस की जिसके लिए, जिसकी बिना पर एक अलग पहचान है, वह तो इन संबंधित सुविधाओं के छिन जाने के बाद एक्सप्रेस की छवि मटियामेट हो जाएगी। विवेक साहब का न जाने कैसा विवेक है कि इस सच को नहीं जान-समझ पा रहा है कि मात्र मशीनों-टेक्नोलॉजी से अखबार नहीं छपते-निकलते हैं। उसमें मानवीय श्रम, मस्तिष्क, ऊर्जा, ज्ञान, समझ, विवेक आदि की खपत होती है तब कहीं अपने पाठकों तक पहुंचता है। और तब लोग उसे लपक कर पढ़ते हैं और अपने मतलब-रुचि की पाठ्य सामग्री में गोता लगाते हैं।

चंडीगढ़ इंडियन एक्सप्रेस इंप्लाई यूनियन ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए अपने साथियों के संग मिलकर बहुत मजबूत, अटल-अटूट लड़ाई लड़ी है। लेकिन मैनेजमेंट की नई बदमाशियों, करतूतों, शरारतों से नए सिरे से लडऩे की कटिबद्धता, तत्परता एक बार फिर अनिवार्य हो गई है। हालांकि प्रबंधन फूट डालो और अपना हित साधो की प्राचीन रीति, डगर पर चलने से पीछे नहीं हटेगी। ऐसे में कर्मचारियों का अपने बुनियादी हक के लिए फिर से मैदान में उतरना लाजिमी लगने लगा है।

… लेकिन दैनिक भास्कर कर्मियों का क्या होगा?
 अब यह गोपनीय नहीं रह गया है कि दैनिक भास्कर के महामहिम मालिकान भी अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों से उपकृत करने जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार एक जनवरी 2015 से इन संस्तुतियों पर क्रियान्वयन की मंशा-नीयत उन्होंने जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार दो महीने की मियाद तो 13 दिसंबर को खत्म हो रही है। तो फिर जनवरी में अमल का ऐलान भास्कर के महानुभावों ने जो किया उसका अर्थ-निहितार्थ क्या है, क्या हो सकता है, इसे भास्कर का कोई भी कर्मचारी बता पाने, व्याख्यायित कर पाने में असमर्थ है। वैसे भी, खासकर चंडीगढ़ संस्करण के कर्मचारियों को मजीठिया से शुरू से कोई मतलब नहीं रहा है। यदि दबे-छिपे किसी को रहा भी है तो वह समझ ही नहीं पाया कि मजीठिया है क्या बला। क्यों कि यहां जिसको भी जो और जितनी पगार मिलती है, वह वेज बोर्ड के नियमों के अनुसार-अनुकूल नहीं होती है। बल्कि वह पहुंच-पहचान और सिफारिश के मुताबिक होती है। एक ही पद के व्यक्तियों-शख्सों का वेतन अलग-अलग होता है। यहां अनुभव, वरिष्ठता, कनिष्ठता, योग्यता आदि का कोई मतलब नहीं होता है। यहां का माहौल-कल्चर है मानव रूपी कर्मचारी को मशीन-यंत्र में तब्दील कर देना। बुदबुदाते रहो, पर खुल कर बोलना मना है। ऐसा करना गंभीर गुनाह के समान है। अफसरों को सर, सर कहते रहो। जो कहें सुनते-गुनते रहो।

बहरहाल मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने में उससे संबद्ध सभी नियमों-कानूनों को मानना-पालन करना होगा मालिकान को। ऐसे में इस वेज बोर्ड के मुताबिक कर्मचारियों को कितना वेतन मिलना चाहिए, इसकी जानकारी कर्मचारियों को भी होना अनिवार्य है। तभी तो वे वेतन वृद्धि-वेतन संशोधन, वेतन निर्धारण, उससे जुड़े दूसरे लाभों को अर्जित करने के तरीके-उपाय अपनाने में सक्षम होंगे कर्मचारी। लेकिन जितनी जानकारी उपलब्ध है, भास्कर के अधिकांश पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी ने मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को पढ़ा ही नहीं है। सबसे अहम यह है कि भास्कर क्लासिफिकेशन के अनुसार किस क्लास में आता है, यह भी शायद ही किसी को पता हो। क्यों कि मैंने जितने लोगों से पूछा है किसी ने भी इस बारे में कुछ नहीं बताया। सबने कहा – हमें नहीं मालूम है। हां, भास्कर के नंबर वन होने की बात सभी सगर्व कहते हैं।

चलिए हमीं बता देते हैं। दैनिक भास्कर के 67 संस्करण प्रकाशित होते हैं। डीबी कार्प की मार्च 2014 तक की कुल सालाना आमदनी 1850 करोड़ रुपए से अधिक है। इस हिसाब से दैनिक भास्कर तो क्लास 1 में आता है क्योंकि इस श्रेणी में 1000 करोड़ रुपए या इससे अधिक के अखबार मजीठिया के अनुसार क्लास 1 में आते हैं। ऐसे में भास्कर के किसी उप संपादक या रिपोर्टर का मासिक वेतन 42-45 हजार रुपए से कम नहीं होना चाहिए। यह भी लागू होना है 11 नवंबर 2011 से। यानी इधर के वर्षों में इन्क्रीमेंट एवं अन्य लाभ भी जुड़ेंगे। साफ है कि इस हिसाब से काफी एरियर भी मिलना चाहिए। स्पष्ट है कि कर्मचारियों को अपना हिसाब किताब बहुत चुस्ती से बनाना होगा तभी भास्कर मैनेजमेंट से निपट पाएंगे।

इससे जुड़ा एक और बड़ा सवाल है कि मैनेजमेंट कितने कर्मचारियों को उपकृत करने के मूड है? कहीं ऐसा तो नहीं है चुनिंदा लोगों को मजीठिया का चॉकलेट थमा दिया जाए और बाकी लोग हमको भी- हमको भी कहते ही रह जाएं और मालिकान अंतत: तेज निगाहों से घूर कर उन्हें खामोश करा दें। 

इस संदर्भ में अब वह यूनियन भी याद हो आई है जिसे भास्कर मालिकान ने चंडीगढ़ संस्करण के शुरुआती काल में अपने खास खुशामदियों की अगुआई एक दैनिक भास्कर कर्मचारी यूनियन बनवा दी थी। जो कागजों में अभी भी है। वैसे वह सक्रिय ही कब थी कर्मचारियों के हित में। हां, मौजूदा परिस्थिति में उन यूनियन नेताओं को चुप्पी तोडक़र वाचाल हो जाना चाहिए, तभी उनके यूनियन नेता होने की सार्थकता उजागर-साबित होगी। अब भी खामोश रह गए तो यह अवसर फिर कभी नहीं पकड़ पाएंगे। हाथ रह जाएगी निराशा-पछतावा।

सूरमा रजनीश रोहिल्ला:
एक सूरमा है रजनीश रोहिल्ला, जिसने दैनिक भास्कर प्रबंधन की बदमाशियों के आगे नहीं झुका। उन्हें ‘मजीठिया नहीं चाहिए’ फार्म पर दस्तखत कराने के अनेक उपक्रम प्रबंधन की ओर से किए गए। पर उन्होंने साइन नहीं किए। इसी खफा मैनेजमेंट ने उनका तबादला कर दिया। लेकिन वे नहीं गए। आखिर में उन्होंने मजीठिया के लिए सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगा दी। उनकी फरियाद सुनी गई और मालिकों से साफ कह दिया गया- दो महीने में लागू करो। नहीं लागू करेंगे तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के जुर्म में जाना होगा सलाखों के पीछे।

चंडीगढ़ से भूपेंद्र प्रतिबद्ध की रिपोर्ट. संपर्क: 09417556066

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हिंदी अखबार के उप संपादक छोकरे और अंग्रेजी अखबार की कन्या का लव जिहाद!

साल 1988 की बात है। मैं तब जनसत्ता में मुख्य उप संपादक था और उसी साल संपादक प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के राज्यों में प्रसार को देखते हुए एक अलग डेस्क बनाई। इस डेस्क में यूपी, एमपी, बिहार और राजस्थान की खबरों का चयन और वहां जनसत्ता के मानकों के अनुरूप जिला संवाददाता रखे जाने का प्रभार मुझे सौंपा। तब तक चूंकि बिहार से झारखंड और यूपी से उत्तराखंड अलग नहीं हुआ था इसलिए यह डेस्क अपने आप में सबसे बड़ी और सबसे ज्यादा जिम्मेदारी को स्वीकार करने वाली डेस्क बनी। अब इसके साथियों का चयन बड़ा मुश्किल काम था। प्रभाष जी ने कहा कि साथियों का चयन तुम्हें ही करना है और उनकी संख्या का भी।

मैंने आठ लोग रखे- Sunil Shah (संप्रति अमर उजाला हल्द्वानी के स्थानीय संपादक) Sanjaya Kumar Singh, Arihan Jain (इस समय वे बिजनेस स्टैंडर्ड में संपादकीय प्रभारी हैं), अजय शर्मा (संप्रति एनडीटीवी में संपादक हैं) Sanjay Sinha (आजतक समूह के में संपादक हैं) अमरेंद्र राय बहुत दिनों से मिले नहीं पर वे विजुअल मीडिया के बिग गन हैं। सातवां साथी प्रभाष जी ने दिया प्रदीप पंडित। वे चंडीगढ़ जनसत्ता से आए थे और पद में तो मुझसे ऊपर थे ही पैसा भी अधिक पाते थे। अब प्रभाष जी की इच्छा। कौन किन्तु-परन्तु करे इसलिए स्वीकार किया। उनसे मुझे भी कुछ कहने में संकोच होता पर वे थे सज्जन आदमी कभी भी कोई भी काम सौंपा ऐतराज नहीं किया बस जिम्मेदारी लेने से कतराते थे इसलिए इस डेस्क पर डिप्टी इंचार्ज मैने बेहद पढ़ाकू और जिम्मेदार तथा जिज्ञासु पत्रकार सुनील शाह को बनाया। अब बाकी का तो ठीक था लेकिन संजय सिन्हा और संजय सिंह से काम कराना बहुत कठिन।

ऐसा नहीं कि वे नाकारा थे अथवा काम नहीं करना चाहते थे बल्कि वे सबसे ज्यादा काम करते लेकिन अपनी मर्जी से। एक घंटे काम किया और दो घंटे एक्स्प्रेस बिल्डिंग के पीछे टीटू की दूकान में जाकर अड्डेबाजी करने लगे। अथवा शाम आठ बजे पीक आवर्स में जामा मस्जिद के पास वाले करीम होटल में चले गए। कभी-कभी वे अपने साथ सुनील शाह को भी ले जाते। डांट-डपट से उन्हें भय नहीं था और उन दोनों के बीच कोई भेद उत्पन्न करना भी संभव नहीं था। मेरा सारा कौशल और श्रम उनकी मान-मनौवल में चला जाता। यह देखकर मेरे समकक्ष साथी मजे लेते क्योंकि इस डेस्क का भौकाल देखकर सभी उसमें आना चाहते थे। यह एक ऐसी डेस्क थी जिसमें किसी की कुछ न चलती सिवाय मेरे व संपादक श्री प्रभाष जोशी जी के। बड़े-बड़े जनसत्ताई तीसमार खाँ इस डेस्क से बेजार थे। इसलिए ऐसे में उनके पास एक उपाय था डेस्क के साथियों को फोड़ लेना। तब मैने एक आखिरी दांव फेंका संजय सिंह और संजय सिन्हा के पास। संजय सिन्हा नरम थे और जल्दी समझाए जा सकते थे। मैने कहा कि संजय देखो मैं भी चला करूंगा तुम लोगों के साथ करीम। अकेले-दुकेले जाते हो कुछ झगड़ा वगड़ा कर बैठे तो मुश्किल होगा। एक गार्जियन नुमा कद-काठी में भारी आदमी रखना जरूरी है। संजय सिन्हा ने यह बात संजय सिंह को बताई और दोनों राजी हो गए। अब दस साढ़े दस बजे जब मैं फारिग होता तो कहता चलो। तब तक वे भी थक जाते और टाल जाते तथा कहते कि शंभू जी अब सारा काम निपटा ही लेते हैं। इस तरह मैं उनको काम पर वापस लाया।

इसी बीच बेहद दर्शनीय, मनोहारी और लड़कियों के बीच बहुत लोकप्रिय संजय सिन्हा ने शादी करने की ठानी इंडियन एक्सप्रेस की उप संपादक दीपशिखा सेठ से। अब दोहरी मुसीबत लड़का खाँटी बिहारी और कन्या ठेठ पंजाबी। ऊपर से तुर्रा यह कि लड़का हिंदी अखबार में उप संपादक और कन्या अंग्रेजी अखबार में। यह अलग बात है कि बिहार के एक अभिजात्य कायस्थ परिवार में जन्में संजय सिन्हा का पारिवारिक माहौल अंग्रेजी दां था। उनके दादा ब्रिटिश काल में कानपुर के एडीएम थे और पिता बिहार बिजली बोर्ड के निदेशक, मामा मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक। संजय की पढ़ाई विदेश में हुई थी। पर अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकारों को लगा कि अंग्रेजी पत्रकार कन्या हिंदी अखबार के पत्रकार से ब्याही जाए यह तो उनके लिए लव जिहाद टाइप का मामला हो गया। तत्काल इंडियन एक्स्प्रेस और जनसत्ता की डेस्क के बीच दीवाल चिनवा दी गई। लेकिन “जब मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी” सो शादी तो होकर रही। चोरी-चोरी घर से छिपाकर भी और दफ्तरी लोगों से भी। फिर भी वह शादी ऐतिहासिक थी। शादी तो हुई आर्य समाज मंदिर में और भात हुआ नेशनल स्पोट्स क्लब आफ इंडिया (एनएससीआई) के लान में। खूब खाया भी गया और पीया भी। बाद में इंडियन एक्सप्रेस वालों ने वह दीवाल खुद ही तुड़वा दी।

कल दिल्ली के छतरपुर स्थित जी समूह के मालिक श्री जवाहर गोयल के फार्म हाउस में संजय सिन्हा का पुनर्विवाह हुआ। मैं तब भी मौजूद था और कल भी। चौंकिए नहीं दरअसल मौका था उन्हीं संजय सिन्हा की फेसबुक पुस्तक रिश्ते का जब विमोचन हुआ तो वहां एकत्र करीब हजार के आसपास फेसबुक मित्रों और उनके मित्रों को बताया गया कि यह साल संजय व दीपशिखा सेठ की शादी के 25 साल पूरा होने का है तो सब ने कहा कि तिथि की कौन जाने आज ही संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ का फिर से जयमाल कार्यक्रम हो। और हुआ। मैं ये दोनों फोटो अपनी पुरानी यादों के साथ रख रहा हूं। संजय सिंह और मेरे अलावा वहां वे लोग ही थे जिन्होंने संजय व दीपशिखा का वह जयमाल कार्यक्रम नहीं देखा था जो 24 साल पहले हुआ था पर यकीनन यह आयोजन ज्यादा भव्य और ज्यादा उत्साह के साथ मनाया गया। संजय सिन्हा और दीपशिखा सेठ के नवजीवन की बधाई और शुभकामनाएं कि अचल रहे अहिवात तुम्हारा जब लौं गंग-जमन की धारा।

मित्रों मेरा यहां यह चिठठा लिखने का आशय यह है कि अगर आप चाहते हो कि परस्पर प्रेम के बीच आने वाले अवरोधों और दीवालें तोड़नी हैं तो पहली क्रांति सामाजिक रिश्तों की करो। रिश्ते बनाओ प्रेम से, स्नेह से परस्पर के मेल-मिलाप से। खुदा तो सिर्फ मां-बाप ही देता है और बाकी के रिश्ते तो इंसान खुद तलाशता है। रिश्तों के अवरोधों को ध्वस्त करो।

लेखक शंभूनाथ शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनका यह लिखा उनके फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है.

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