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बीबीसी ने बैन के बावजूद आज तड़के डॉक्युमेंटरी ‘इंडियाज़ डॉटर’ दिखा दिया…

Om Thanvi : तड़के बीबीसी ने डॉक्युमेंटरी ‘इंडियाज़ डॉटर’ दिखाई और सुबह से वह यू-ट्यूब, ट्विटर लिंक आदि के जरिए सामने है! अर्णब गोस्वामी, राजनाथ सिंह, माननीय सांसदगण, माननीय अदालत और दिल्ली पुलिस का शुक्रिया। आज के युग में बैन आगे से दिखाने के लिए लगाया कीजिए, न दिखाने के लिए नहीं – इतना तो टीवी पर उस अंगरेजी डॉक्युमेंटरी को लोग भी न देखते! और वह कलमुँहा ड्राइवर – पता नहीं फिल्म में कब आया और अपनी बकवास में अपनी ही मौत मर गया! उसके बयान (जिसमें ज्यादा समय विजुअल दूसरे ही चलते हैं) से उस रात के पाशविक कृत्य, अपराधियों की मानसिकता आदि को मुझे ज्यादा शिद्दत से समझने का मौका मिला। … इस पर चीखे अर्णब तुम सारी-सारी रात?

Om Thanvi : तड़के बीबीसी ने डॉक्युमेंटरी ‘इंडियाज़ डॉटर’ दिखाई और सुबह से वह यू-ट्यूब, ट्विटर लिंक आदि के जरिए सामने है! अर्णब गोस्वामी, राजनाथ सिंह, माननीय सांसदगण, माननीय अदालत और दिल्ली पुलिस का शुक्रिया। आज के युग में बैन आगे से दिखाने के लिए लगाया कीजिए, न दिखाने के लिए नहीं – इतना तो टीवी पर उस अंगरेजी डॉक्युमेंटरी को लोग भी न देखते! और वह कलमुँहा ड्राइवर – पता नहीं फिल्म में कब आया और अपनी बकवास में अपनी ही मौत मर गया! उसके बयान (जिसमें ज्यादा समय विजुअल दूसरे ही चलते हैं) से उस रात के पाशविक कृत्य, अपराधियों की मानसिकता आदि को मुझे ज्यादा शिद्दत से समझने का मौका मिला। … इस पर चीखे अर्णब तुम सारी-सारी रात?

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पिशाच-वृत्ति के बलात्कारी ने जो-जो भद्दी बातें कहीं (कि बलात्कार के लड़कियां जिम्मेदार होती हैं, कि वे रात को घरों से बाहर निकलती ही क्यों हैं, कि वे आधुनिक कपड़े क्यों पहनती हैं आदि) वैसी बातें हमारे पुरुष-प्रधान पितृ-सत्ता वाले समाज में क्या आए दिन कथित भारतीयता और कथित नैतिकता के ठेकेदार बने लोग नहीं करते? एक अदद डॉक्युमेंटरी फिल्म के एक हिस्से में बलात्कारी की गलीज मानसिकता (फिल्म में स्त्री समाज को लेकर खाप मानसिकता वाले वकीलों और अन्य नागरिकों के कुत्सित ‘विचार’ भी हैं) को दिखाना पूरी संसद को आहत कर गया है, सरकार ने पूरी फिल्म ही रुकवा दी है – माननीय सांसदों और सरकार का यह तेवर आए दिन सामने वाले बयानों और आधुनिक कपड़ों आदि पर छींटाकशी या अन्य दुर्व्यवहार करने वाले दुष्ट समुदाय पर जाहिर क्यों नहीं होता?

Samar Anarya :  सिर्फ एक बात जो कोई नहीं कह रहा वह यह कि इस डाक्यूमेंट्री में मुकेश सिंह बार बार कह रहा है कि उसने बलात्कार नहीं किया, वह सिर्फ बस चला रहा था. बात गलत हो सकती है (कानूनी रूप से है, वह सजायाफ्ता है) पर उसके इंटरव्यू को आधार बना उसकी फांसी के लिए उन्माद खड़ा करने का जिम्मेदार कौन है? किसी को अपने खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, मुकेश सिंह को किसने किया? (याद रखियेगा कि प्रलोभन भी मजबूर करना है- शादी का झांसा देकर बनाया गया सम्बन्ध बलात्कार ही होता है. शर्मिंदा होइए कि ऐसे तमाम प्रगतिशील लोग भी इस डाक्यूमेंट्री में कैमरे के सामने खड़े होकर ज्ञान बाँट रहे हैं जो अब इस पर प्रतिबन्ध/स्थगन मांग रहे हैं. कितना आसान है अपने किये से मुकर जाना यह कह के कि “अगर मालूम होता कि यह डाक्यूमेंट्री ऐसा उन्माद खड़ा करने के लिए इस्तेमाल की जायेगी तो”…. आइये, मुकेश सिंहों को सड़क पर खड़ा कर उनकी खाल खींच लें, ठीक उस वक़्त जब माननीय सांसद योगी आदित्यनाथ की गरिमामयी उपस्थिति में लोग लाउडस्पीकर पर मुस्लिम औरतों की लाशों को कब्र से निकाल उनका बलात्कार करने का आह्वान कर रहे हों. [सरकारी प्रतिबंध अपनी जगह, बीबीसी ने न केवल कल ‘चैनल 4′ पर डाक्यूमेंट्री चला दी बल्कि अभी किसी ने यूट्यूब पर डाल भी दी है. (इंडिया’ज डॉटर’ नाम का चैनल है, आधिकारिक या किसी ने और पता नहीं).]

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https://www.youtube.com/watch?v=wIbC1zida-8

Dilip C Mandal : बलात्कार के अभियुक्त मुकेश सिंह ने निर्भया कांड में ऐसा क्या कह दिया कि आपकी ‘महान’ संस्कृति खतरे में पड़ गई? पास के स्टेशन में या किसी बुक स्टोर में जाइए. गीता प्रेस गोरखपुर की स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा टाइप कोई भी किताब उठाइए. मुकेश सिंह ही नहीं, उनके चाचा-ताऊ उनमें साक्षात विराजमान नजर आ जाएंगे. आप लकी है, अगर आपके घर में मर्द ऐसी ही बात नहीं करते. मुकेश सिंह तथाकथित महान, मगर वास्तव में पतनशील-मानवद्रोही सनातन संस्कृति का आदर्श, 24 कैरेट का प्रतिनिधि है.

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Kumar Sauvir : माना, कि निर्भया-काण्‍ड के अभियुक्‍त ने जो भी किया वह मानवता के चेहरे पर एक वीभत्‍स और अमिट दाग है। लेकिन क्‍या आप किसी ऐसे शख्‍स को अपनी बात भी नहीं कहने और उसे सुनने का भी माद्दा खो चुके हैं। वह जघन्‍य-हत्‍यारा है, लेकिन अरे उसे सुनने की जहमत तो उठाइये कि आखिर उसका पक्ष क्‍या है। क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता है कि किसी अभियुक्‍त का पक्ष न सुनना न्‍याय के मौलिक सिद्धान्‍तों के खिलाफ है। Pramod Joshi जी ने एक जायज सवाल उठा दिया है। वे भी कहते हैं कि:- बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री पर भारतीय मीडिया की प्रतिक्रिया विस्मयकारी और आत्मघाती है। बिना देखे, बिना जाने विरोध। आप पाबंदियों का समर्थन कर रहे हैं? आप देखिये ना, कि पूरा संसद इस मामले पर एकजुट है कि इस अभियुक्‍त पर बनी डाक्‍यूमेंट्री पर हर कीमत पर पाबन्‍दी लगायी जाए। लेकिन बीबीसी ने ऐसी पाबंदी पर अपना सख्‍त विरोध जता दिया है। तो ऐसे में किसे कानून का विरोधी माना जाए और किसे समर्थक, अब यह सवाल तो हम सब को अपने गिरेहबान में झांकते हुए देना है। है कि नहीं ? सबसे ज्‍यादा शर्मनाक रवैया तो पत्रकार समुदाय का है, एक बार भी इन लोगों ने इस डाक्‍यूमेंट्री पर पाबंदी पर ऐतराज नहीं जताया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, दिलीप मंडल, कुमार सौवीर और सोशल एक्टिविस्ट अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

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