‘हिन्दुस्तान’ और ‘प्रभात खबर’ अखबारों में भड़ास पर लगा प्रतिबन्ध

बिहार और झारखण्ड में हिन्दुस्तान और प्रभात खबर जैसे अखबारों में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम को देखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. जो कोई अपने मोबाईल पर भी इसे देखते पाया जायगा उसके  खिलाफ कारवाई की चेतावनी मौखिक रूप से दे दी गयी है. इन अखबारों के आफिसों में रखे कंप्यूटरों पर भड़ास को पहले से ही बैन किया हुआ है. मजीठिया वेज बोर्ड संबंधी खबरों और इन अखबारों की मदर कंपनियों के खिलाफ खबरों के लगातार प्रकाशन और मैनेजमेंट की काली करतूतों का भंडाफोड़ करने से भड़ास पर प्रतिबंध लगाया गया है.

प्रबंधन को शायद यह नहीं पता कि जिन चीजों पर जितना ज्यादा प्रतिबंध लगाया जाता है, उनको देखने पाने की अकुलाहट उतनी ही बढ़ जाती है. लोग आफिस में भड़ास नहीं देखेंगे पढ़ेंगे तो घर आकर देखेंगे पढ़ेंगे. इस कदम से इन अखबारों का अलोकतांत्रिक चरित्र सामने आता है. जो खुद अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देकर अपना बचाव करते रहते हैं वही अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने पर आमादा हैं.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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नज़र रखिए, NDTV का ओपिनियन पोल आएगा जिसमें बीजेपी की सरकार यूपी में बनती दिखेगी!

Dilip C Mandal : एनडीटीवी बाक़ी समय सेकुलरिज्म का नाटक करता है, ताकि चुनाव के समय जब वह BJP का समर्थन करे तो लोग उस पर भरोसा करें। 2004, 2009, 2015….NDTV ने हर बार ग़लती की। हर बार BJP के पक्ष में ग़लती की। यूपी चुनाव में NDTV क्या करेगा? यह ट्विट आज भी बरखा दत्त के ट्विटर हैंडल पर मौजूद है। बिहार में BJP को दो तिहाई बहुमत दिला रही थीं मोहतरमा।

नज़र रखिए। फ़िल्म की पूरी स्क्रिप्ट कुछ इस तरह नज़र आ रही है। यूपी चुनाव तक NDTV पूरी आक्रामकता के साथ मुस्लिम पक्षधरता दिखाएगा। दूसरी तरफ़ उतनी ही आक्रामकता से ZEE न्यूज एंड कंपनी हिंदू पक्षधरता से चैनल चलाएगी। दोनों पक्ष मिलकर माहौल को हिंदू-मुसलमान बनाने की कोशिश करेंगे। दोनों ही पक्ष जाति के प्रश्न को इग्नोर करेंगे। जाति ही वो जगह है जहाँ RSS का दम फूलता है। इसलिए दोनों तरह के चैनल वहाँ नहीं जाएँगे। जाति जनगणना या आरक्षण पर कोई बातचीत चैनलों में नहीं होगी। हिंदू और मुसलमान की हर बहस RSS के पक्ष में होती है। वही कराई जाएगी। NDTV मुस्लिम उत्पीड़न के सवाल उठाएगा। जो वाजिब सवाल होंगे। इसी दौरान कभी NDTV का ओपिनियन पोल आएगा जिसमें बीजेपी की सरकार बनती दिखेगी।

एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय और किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने अपने जाम टकरा कर एक TV चैनल खोला था। NDTV Good Times. लगभग 200 करोड़ रुपए माल्या ने लगाए थे। चैनल के लोगों पर किंगफिशर की चिड़िया को याद कीजिए। यह 200 करोड़ उन्हीं 9,000 करोड़ रुपए में से हैं, जिसे दबाकर माल्या देश छोड़कर भाग गया। अब प्रणय रॉय को इस बात से क्यों दिक़्क़त हो कि विजय माल्या बीजेपी के समर्थन से राज्य सभा पहुँचा था? 513 करोड़ रुपए की कंपनी NDTV के लिए 200 करोड़ रुपए बड़ी रक़म है। एंकर्स और बाक़ी स्टाफ की सैलरी शायद इसी से आई होगी।

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक दिलीप मंडल की एफबी वॉल से. 

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गौर से देखा जाए तो NDTV जीत कर भी हार गया है!

Vishnu Gupt : एनडीटीवी के सामने मोदी सरकार ने किया समर्पण, प्रतिबंध किया स्थगित, एनडीटीवी के खिलाफ अभियान चलाने वाले ठगे गये… यह मोदी सरकार की वीरता नहीं है। मोदी सरकार की यह दूरदृष्टि नहीं है। मोदी सरकार ने उन लाखों देशभक्तों के प्रयास पर पानी फेर दिया जो एनडीटीवी के राष्ट्रविरोधी प्रसारणों और इसकी पाकिस्तान परस्ती के पोल खोलने में लगे थे। जब औकात नहीं थी तो फिर मोदी सरकार को यह कदम उठाना ही नहीं चाहिए था, अगर कदम उठाया था तो उस पर अमल करना चाहिए। लग रहा था कि पहली बार कोई सरकार हिम्मत दिखायी है। पर मोदी सरकार भी डरपोक, रणछोड़ निकली। हमारे जैसे लोग जिन पर विश्वास करता है वही रणछोड हो जाता है, वही डरपोक हो जाता है। अब एनडीटीवी सहित पूरे मीडिया का देशद्रोही और पाकिस्तान परस्ती पत्रकारिता सिर चढकर बोलेगी।

प्रकाश कुकरेती : जैसा कि मैं पहले भी व्यक्तिगत बातचीत में कहता रहा हूँ कि NDTV को सरकार के एक दिन के बैन के फैसले के खिलाफ अदालत नहीं जाना चाहिए था. बैन से NDTV को जबरदस्त सहानुभूति मिल रही थी. मगर NDTV ने अदालत जाकर गलती कर दी. इस कारण सरकार ने बैन स्थगित कर दिया. हां, बैन रद्द नहीं किया है. NDTV की याचिका भी ख़ारिज नहीं हुई है. मने अब अदालत में बहस इस बात पर होगी कि NDTV पर बैन लगाना सही था या नहीं. वहां पर NDTV को यह साबित करना होगा कि उसकी रिपोर्टिंग देश हित के खिलाफ नहीं थी. अगर वह यह साबित कर भी देता है तो इससे सरकार पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. अगर NDTV यह साबित नहीं कर पाता है तो वह यह साबित करने की कोशिश करेगा कि सभी चैनलों ने इसी तरह की रिपोर्टिंग की, मगर राजनैतिक कारणों से उसे ही निशाना बनाया गया. अगर अदालत में यह साबित हो जाता है तो सुप्रीम कोर्ट सरकार को आदेश दे सकता है कि वह सब चैनलों पर एक समान कार्यवाही करे. दोनों मामलों में गौर से देखा जाए तो NDTV जीत कर भी हार गया है.

दक्षिणपंथी विचारधारा के पत्रकार विष्णु गुप्त और प्रकाश कुकरेती की एफबी वॉल से.

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NDTV पर नहीं लगेगा बैन, आदेश स्थगित

केंद्र सरकार ने एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन के बैन लगाने के अपने आदेश को स्थगित कर दिया है. इस प्रतिबंध को NDTV ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कल यानी मंगलवार को इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति दी थी.

सूचना प्रसारण मंत्रालय ने NDTV इंडिया पर पठानकोट एयरफोर्स बेस पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान संवेदनशील जानकारी का प्रसारण करने का आरोप लगाते हुए बुधवार, 9 नवंबर को उसे एक दिन के लिए ऑफएयर रखने का आदेश दिया है.

एनडीटीवी का कहना है कि अन्य चैनलों तथा समाचारपत्रों ने भी वही जानकारी दिखाई या रिपोर्ट की थी. इस प्रतिबंध की चौतरफा आलोचना हुई. लोगों ने इसे इमरजेंसी के समान बताया, जब प्रेस की आज़ादी सहित सभी मूल संवैधानिक अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन किया गया था.

एडिटर्स गिल्ड ने कहा कि अपनी तरह के इस पहले आदेश से पता चलता है कि केंद्र सरकार समझती है कि “उसे मीडिया के कामकाज में दखल देने और जब भी सरकार किसी कवरेज से सहमत न हो, उसे अपनी मर्ज़ी से किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार है…” देश के सभी बड़े समाचारपत्रों तथा पत्रिकाओं के संपादकों के समूह ने कहा कि अगर सरकार को किसी मीडिया कवरेज में कुछ आपत्तिजनक लगता है, तो वह कोर्ट जा सकती है.

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एनडीटीवी पर प्रस्तावित बैन के खिलाफ देहरादून में धरना (देखें तस्वीरें)

देहरादून। जन संवाद मंच के आह्वान पर विभिन्न संगठनों ने गांधी पार्क पर धरना दिया। इस दौरान आयोजित सभा को संबोधित करते हुए अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क के पदाधिकारी विजय भट्ट ने कहा कि, इधर कुछ महीनों से संवैधानिक व जनतांत्रिक संस्थाओं पर हमला बढ़ता जा रहा है । तथाकथित हिंदूवादी संगठन कभी गौहत्या के बहाने तो कभी गोमांस सेवन के बहाने तो कभी लव जेहाद या तीन तलाक के बहाने हमें लड़ा रहे हैं। अब इन्होंने मीडिया पर हमला बोल दिया है हमें इस तरह के खतरों के प्रति सचेत होना पड़ेगा।

जनवादी महिला सभा की इंदू नौडियाल ने एनडीटीवी पर थोपे गये एक दिन के प्रतिबंध को लोकतंत्र पर हमला बताते हुए कहा कि यह अघोषित आपातकाल है। कभी लघु भारत कहे जाने वाले जेएनयू पर हमला बोला जाता है तो कभी रोहित वेमूला के बहाने दलितों पर। अब तो लोकतंत्र के चौथे खंभे को भी नहीं बख्शा जा रहा है। मोदी सरकार लगातार लोकतांत्रिक संस्थाओं का गला घोंट रही है।

चेतना आंदोलन के सयोंजक त्रेपन सिंह चौहान ने कहा है की आज जहां अधिकाँश टी वी जहाँ भूत प्रेतों को दिखा कर अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं। वही एनडी टीवी जान समस्याओं के साथ सरकारों के छालों को भी लोगों के सामने लाता रहा है। किसी भी समाचार माध्यमों पर प्रतिबन्ध लगाना केवल अभिब्यक्ति की आजादी का पर हमला ही नहीं है बल्कि फासीवाद का एक क्रूर चेहरा भी होता है। क्योकि फासीवाद सबसे ज्यादा अभिभयक्ति की आजादी से डरता है। मोदी जी को समझना चाहिए की उनका फासीवाद देश नकार चुका है। तभी दिल्ली विहार में मुंह की कहानी पडी और अब यूपी में भी लोग जबाब देगें।

कार्यक्रम में लोक दस्तक, भारत ज्ञान-विज्ञान समिति, अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति उत्तराखंड नव निर्माण संघ सहित विभिन्न संगठनों के लोग शामिल थे। जन संवाद मंच के लोगों ने जनगीत प्रस्तुत किया। आयोजकों ने केंद्र सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ 9 नवंबर को धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया है। इस दिन गांधी पार्क से एक मार्च निकाला जाएगा। राजधानी की आबादी व महत्व को देखते हुए इसमें शिरकत करने वालों की संख्या काफी कम थी। जो भी लोग आये वो एक एस एम एस व फोन पर। जिनके (पत्रकार) लिए धरने का आयोजन किया गया था उस तबके से ही कोई नहीं आया था।

धरने की तस्वीरें देखने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें :

http://bhadas.blogspot.in/2016/11/blog-post_7.html

अरुण श्रीवास्तव
देहरादून
07017748031

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एनडीटीवी पर यह व्‍यर्थ का हंगामा

लोग सही कहते हैं कि जब प्रभावशाली व्‍यक्‍ति, समूह, संस्‍था किसी निर्णय से प्रभावित होते हैं तो उसका असर दूर तक जाता है, उसके पहले भले ही कई प्रभावित होते रहे हों किंतु उनकी सुनने वाला कोई नहीं होता। ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार ने एनडीटीवी इंडिया के प्रसारण के पूर्व किसी ओर चैनल के द्वारा गलत जानकारी के सार्वजनिक किए जाने के बाद दण्‍ड स्‍वरूप उस पर रोक न लगाई हो, जिसने की न दिखाने वाली सामग्री का प्रसारण किया है। पर इस बार की बात कुछ ओर है, क्‍यों कि इस बार केंद्र के घेरे में एनडीटीवी आया है, जहां रवीश जैसे श्रेष्‍ठ एंकर हैं और उसे देखनेवाले दर्शक भी देश-दुनिया में बड़ी संख्‍या में मौजूद हैं।

एनडीटीवी इंडिया को लेकर जब से यह निर्णय आया है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 9 नवम्‍बर को एनडीटीवी इंडिया के प्रसारण पर एक दिन के लिए रोक का आदेश दिया है, तब से देशभर में माहौल गर्म है। कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार मीडिया पर सेंसरशिप लगा रही है, लेकिन क्‍या यह सच है?  सरकार पर आरोप लगानेवालों की बाते सुनने के पहले यह भी जानना जरूरी है कि आखिर ये चैनल या मीडिया के तमाम उपक्रम ऐसा कार्य करते ही क्‍यों हैं कि उन्‍हें कटघरे में खड़ा करने में  सरकारें सफल हो जाती हैं। आज जो लोग या मीडिया से जुड़े संस्‍थान सरकार के इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं, क्‍या उनके लिए ये माना जाए कि वे देश की सुरक्षा से ऊपर घटना के प्रेषण को मानते हैं ? क्‍या यह माना जाए कि उनके लिए उन तमाम नियमों का कोई अर्थ नहीं जो मीडिया के लिए भारत सरकार ने बनाए हैं? इसके मायने यह भी निकल रहे हैं कि सरकार के इस निर्णय का विरोध कर मीडिया से जुड़े ये लोग भारतीय संविधान में भी कोई विश्‍वास नहीं करते, क्‍यों कि भारत का संविधान अभिव्‍यक्‍ति की आजादी देता है, जिसमें प्रेस की आजादी भी निहित है, लेकिन साथ में यह भी स्‍पष्‍ट करता है कि कोई भी वह सूचना सार्वजनिक नहीं की जा सकती जिससे भारत संप्रभू राष्‍ट्र को उस सूचना के प्रसारण से कोई खतरा पैदा होता हो या हो सकता है।

जरा सोचिए, एनडीटीवी इंडिया के द्वारा जब आतंकियों के हमले और आर्मी, पुलिस कार्रवाही का पठानकोट कवरेज किया जा रहा था, उस समय की सभी लाइव सूचनाओं का लाभ लेते हुए आतंकवादी अपनी रणनीति बनाते तो क्‍या अनर्थ हो जाता। देश की सुरक्षा से जुड़ी वे सभी सूचनाएँ जिन्‍हें एनडीटीवी ने सार्वजनिक किया, उसका जरा भी लाभ उठाने में यदि आतंकी सफल हो जाते तो जितना नुकसान इस हमले और आतंकियों के विरुद्ध जवाबी कार्रवाही में हुआ, उसकी तुलना में कई ज्‍यादा जान-माल का नुकसान होता। दुनियाभर में भारत की किरकिरी होती सो अलग बात है।

सभी यह ठीक से जान लें कि आखिर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा गठित अंतरमंत्रालय समिति ने एनडीटीवी इंडिया के इस विवादित प्रसारण पर कहा क्‍या है, उसने कहा कि गत 4 जनवरी को पठानकोट के वायुसैनिक अड्डे पर जब आतंकवादी हमला हुआ था, उस दौरान एनडीटीवी इंडिया ने सामरिक दृष्टि से संवेदनशील महत्वपूर्ण सूचनाएं अपने चैनल पर प्रसारित की थीं। न्यूज चैनल ने कुछ ऐसी बातें बता दी जो देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकती थी। इस संबंध में पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टीवी चैनल को कारण बताओ नोटिस जारी किया। मंत्रालय ने इसके बाद केबल टीवी नेटवर्क(नियमन) के प्रावधानों के तहत कार्रवाई करते हुए 9 नवम्बर को रात एक बजे से दस नवम्बर रात एक बजे तक पूरे देश में चैनल के प्रसारण या पुनर्प्रसारण पर केबल टीवी चैनल एक्ट की धारा 20 की उपधारा 2 व 3 का उपयोग करते हुए 24 घंटे के लिए ऑफ एयर करने का निर्देश दिया।

विदित होना चाहिए कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने जून 2015 में प्रोग्राम कोड में संशोधन करते हुए एक नया नियम जोड़कर आतंकियों के खिलाफ पुलिस के ऑपरेशन के कवरेज को लेकर चैनलों पर बैन लगाया था। इस नियम के अनुसार, जब तक ऑपरेशन खत्म नहीं हो जाता तब तक सरकारी प्रवक्ता जो जानकारी देंगे, मीडिया बस उसे ही प्रसारित कर सकता है, इसके अलावा नहीं। फिर ऐसा भी नहीं है कि एकाएक एक दिन चैनल बंद रखने का फरमान सरकार ने सुनाया है, इसके पहले एनडीटीवी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया गया लेकिन जब वे ठीक से जवाब नहीं दे पाए और अपने प्रसारण को लेकर ये नहीं बता सके कि वह प्रोग्राम इस रूप में दिखाया जाना जनता के हित में कैसे था, तब जाकर सजा के रूप में यह निर्णय लिया गया कि चैनल एक दिन के लिए बंद रहेगा।

ऐसे में भारत में जो लोग एनडीटीवी चैनल बंद का विरोध कर रहे हैं, उनसे सीधा पूछना है कि क्‍या यूरोप के किसी देश में वहां की मीडिया इस प्रकार का देश को खतरे में डालने वाला प्रसारण कर सकती है। फ्रांस, अमेरिका, इंग्‍लैण्‍ड से लेकर कौन सा देश है ? जहां आतंकवादियों ने कभी हमला न किया हो, लेकिन सुरक्षा मामलों से जुड़ी कोई भी सूचना कभी सार्वजनिक नहीं की  गई ।आज भारत का वह मीडिया जो इस निर्णय का विरोध कर रहा है, उसे यह बात अच्‍छे से समझ लेना चाहिए कि राष्‍ट्र की संप्रभुता से बढ़कर कुछ नहीं। नियमों की जो अवहेलना करे, संविधान में प्रदत्‍त मौलिक अधिकार बोलने की स्‍वतंत्रता का अर्थ जो मर्यादा विहीन हो जाना समझें, उनके खिलाफ कानूनी तौर पर सख्‍त से सख्‍त कार्रवाही होनी चाहिए। फिर ये कार्रवाही किसी चैनल, समाचार पत्र-पत्रिका या किसी ओर के खिलाफ क्‍यों न हो,  यह सदैव न्‍यायसंगत ही कहलाएगी।

आज एनडीटीवी इंडिया पर लगाए गए एक दिन के प्रतिबंध पर केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने बिल्‍कुल सही कहा है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनज़र उठाया गया है। भाजपा या देश के आम आदमी की ओर से जो यह कहा जा रहा है कि ‘मीडिया की स्वतंत्रता का हम समर्थन करते हैं, लेकिन राष्ट्र सर्वप्रथम है, सुरक्षा से कोई समझौता नहीं हो सकता’ बिल्‍कुल सही है। इसके विरोध में फिर भले ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, जदयू नेता शरद यादव,  ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण जैसे कुछ लोग एवं राजनेता हों, उनका यह विरोध राजनीति से ज्‍यादा कुछ ओर नजर नहीं आ रहा है। प्रश्‍न यह भी है कि इन नेताओं का यह विरोध उस समय कहां था जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। सरकार ने एएक्सएन पर दो महीने का बैन लगाया था। उस समय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का कहना था कि इसमें दिखाया गया कंटेंट अश्लील था, जिस वजह से चैनल का प्रसारण रोका गया है। इसी दौरान एफटीवी इंडिया पर दो महीने का प्रतिबंध लगाया गया था। जनमत चैनल पर 30 दिन का प्रतिबंध इसलिए लगाया गया, क्‍योंकि चैनल पर एक टीचर का स्टिंग ऑपरेशन दिखाया गया था। इन प्रतिबंधों के अलावा भी इसके पूर्व और बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने कई चैनलों को उनके गलत प्रसारण के कारण प्रतिबंधित किया है, तब तो कोई देश में अवाज उठाने वाला खड़ा नहीं हुआ, अब ऐसा क्‍या नया सरकार ने कर दिया है जो देशभर में इतना शोर मचाया जा रहा है।

इसके अलावा जो लोग सरकार के इस फैसले को तुगलकी फरमान बता रहे हैं उन्‍हें ये भी समझना चाहिए कि सरकार मीडिया की अभिव्‍यक्‍ति पर कोई अंकुश नहीं लगा रही। बल्कि मीडिया में विदेशी निवेश को सबसे पहले भाजपा की अटल सरकार ने ही हरी झण्‍डी दिखाई थी, जिसका कि सबसे ज्‍यादा विरोध उसी के घर में उससे जुड़े अन्‍य संगठनों ने किया था उसके बाद मोदी सरकार भी उसी रास्‍ते पर आगे बढ़ रही है। जिससे स्‍पष्‍ट होता है कि मीडिया पर सरकार का कोई अंकुश लगाने का इरादा नहीं है। भारतीय संविधान जिस अभिव्‍यक्‍ति का स्‍वातंत्र्य देता है, सरकार कहीं से भी उसका दमन नहीं कर रही है।

लेखिका Nivedita Sharma न्‍यूज एजेंसी की पत्रकारिता से जुड़ी हैं। उनसे संपर्क niveditachaturvedi241023@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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मुझे नहीं लगता NDTV की मोदी सरकार से भिड़ने की हैसियत है

Dilip C Mandal : NDTV आज की तारीख़ में सिर्फ 513 करोड़ रुपए की कंपनी है। उस पर फ़ेमा यानी मनी लॉन्ड्रिंग का 2031 करोड़ रुपए का और टैक्स अदायगी से संबंधित 450 करोड़ रुपए के मामले है। सरकार जिस पल चाहेगी, ऑक्सीजन रोक देगी। लेकिन जेटली जी के होते NDTV का ऑक्सीजन रुकना मुमकिन नहीं लगता। मुझे नहीं लगता NDTV की सरकार से भिड़ने की हैसियत है। NDTV के मालिक प्रणय राय एक्सप्रेस वाले रामनाथ गोयनका नहीं हैं कि घर फूँककर भिड़ जाएँ। जो दिख रहा है, हो सकता है कि हक़ीक़त वह न हो।

NDTV पर बैन दो ही तरीक़े से हट सकता है। सरकार इसे वापस ले या फिर सुप्रीम कोर्ट बैन हटाए। कोई तीसरा रास्ता नहीं है। मुझे उम्मीद है कि सोमवार की सुबह NDTV के मालिक प्रणय राय अदालत जाएँगे। जाने को तो वे रविवार को भी जा सकते हैं। लोकमहत्व के मामलों में कोर्ट छुट्टी के दिन भी सुनवाई करती है। मार्कंडेय काटजू समेत देश के कई बड़े कानूनविद कह रहे हैं कि NDTV को अदालत में जाना चाहिए। वे ठीक कह रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी पर बैन के खिलाफ देश भर से उठने लगी आवाज

DUJ Calls for Protest on NDTV Ban

The Delhi Union of Journalists (DUJ) strongly and unequivocally condemns the one-day ban on NDTV’s Hindi channel, ostensibly for its reporting of the Pathankot airbase attack.  We see no reason for singling out NDTV in this manner when all channels reported the attack in similar fashion.  In a democracy no bureaucratic body such as the Inter-ministerial Committee of the Information & Broadcasting Ministry that issued this order should have such arbitrary powers. Exercise of such power reminds one of the dark days of the Emergency when the media was muzzled and citizens’ freedoms lost.

An emergency extended executive meeting will now be held the DUJ office at 6.30pm preceded by its executive on Monday 7 November, 2016 where its action programme will be finalised , DUJ president SK Pande and general secretary Sujata Madhok announced  today. The statement added :”We commend the Editors Guild for issuing a strong statement protesting the ban and call upon all media bodies and  journalists to unitedly protest this attack on media freedom.  We demand an immediate revocation of this undemocratic order.”

The DUJ called for the widest possible united front to fight this and connected attacks on freedom of the press.

एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबन्ध का तानाशाही फ़ैसला वापस लो!

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-मंत्रालयी कमेटी द्वारा एनडीटीवी को एक दिन (९ नवम्बर) के लिए प्रतिबंधित करने का फ़ैसला दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है. एनडीटीवी पर आरोप है कि उसने पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले की रिपोर्टिंग के दौरान ‘रणनीतिक रूप से संवेदनशील ब्योरे’ प्रसारित किये थे. गौरतलब है कि लगभग सभी टेलिविज़न चैनलों ने मिलती-जुलती रिपोर्टिंग की थी. मोदी सरकार द्वारा एनडीटीवी को ख़ास तौर से चुना जाना उसकी मंशाओं को स्पष्ट कर देता है. यह सरकार की सबसे मूलगामी आलोचना करनेवाले चैनल को किसी बहाने से धमकाने और चुप करा देने की कोशिश है. सीधे-सीधे मीडिया की आज़ादी के उसूल का यह उल्लंघन आपातकाल की याद दिलाता है. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह प्रतिबन्ध जिस दिन लगाया गया, उससे ठीक एक दिन पहले ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पुरस्कार वितरण समारोह में प्रधानमंत्री ने मीडिया की आज़ादी पर अंकुश लगाए जाने के सन्दर्भ यह कहा था कि “आज निष्पक्ष भाव से आपातकाल की मीमांसा हर पीढी में होती रहनी चाहिए, ताकि इस देश में ऐसा कोई राजपुरुष पैदा न हो जिसको इस तरह के पाप करने की इच्छा तक पैदा हो.” यह इच्छा मोदी सरकार के भीतर गहरे तक धंसी हुई है, यह बात उसके अब तक के कारनामों से वैसे भी ज़ाहिर थी, प्रतिबन्ध के इस फैसले से तो इस ‘पाप करने की इस इच्छा’ को लेकर कोई संदेह नहीं रह गया है. जनवादी लेखक संघ इस फैसले की कठोर शब्दों में निंदा करता है और इसे अविलम्ब वापस लेने की मांग करता है.

मुरली मनोहर प्रसाद सिंह (महासचिव)
संजीव कुमार (उप-महासचिव)
जनवादी लेखक संघ

AINEF OPPOSES NDTV BAN

The All India Newspapers Employees Federation (AINEF) has expressed serious concern at the one day ban on the NDTV and demanded its withdrawal. In a joint statement  issued from the AINEF Delhi Office,  President Mr. SD Thakur, Vice President   SK Pande and general secretary Mr. Balagopalan have called the “ban a selective attempt at targeting NDTV.”

“We express full solidarity with the movement against the ban, which is ominous, unprecedented and an attack on freedom of the press. It is indeed arbitrary and a colorable exercise of power to muzzle the press by the authorities.

SK Pande
Vice President
AINEF

Press release

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एनडीटीवी पर बैन कोई एक दिन का फैसला नहीं

3 मई 2011 को मेरे, मेरे 80 साल के पिता (जो कि केंद्र सरकार से सेवानिवृत कर्मचारी) और मेरे अख़ाबर को छापने वाले प्रिंटर के खिलाफ गाजियाबाद के कई थानों में कई एफआईआर दर्ज करा दीं गईं। साथ ही हमारे हिंदी अख़बार को उत्तर प्रदेश सरकार ने बैन कर दिया। इसके अलावा हमारे घर की बिजली और पानी तक काट दिया गया। जिसके बाद पूरे शहर के बुद्धीजीवि वर्ग ने इसका विरोध किया और सभी राजनीतिक दलों के सम्मानित नेताओं ने सरकार की मनमानी का विरोध किया। चाहे जनाब भारतेंदु शर्मा जी हो या फिर श्री के.सी त्यागी जी या फिर श्री कुंवर अय्यूब अली, इन सभी लोगों ने हमारा न सिर्फ हमारा समर्थन किया बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार की मशीनरी को आड़े हाथों लिया।

हालांकि बाद में गाजियाबाद पुलिस ने अपनी चार्जशीट में ही मुझको आरोप मुक्त कर दिया। और इलाहाबद हाइकोर्ट ने हमको राहत दी, जिसके बाद हमारी गिरफ्तारी पर रोक लगी। लगभग पांच साल अदालत और प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया में अपनी गुहार रखने के बाद मेरे पिता को बाइज्ज़त आरोप मुक्त किया गया और अख़बार को दोबारा प्रकाशित करने की अनुमति मिली। जिस शख़्स ने अपने पूरे जीवन काल में किसी थाने या अदालत का मुंह तक न देखा हो उनको अपने बेटे की पत्रकारिता के वजह से लगभग पांच साल अदालत में चक्कर काटने पड़े।

हमारी सिर्फ इतनी ग़लती थी कि हमने पत्रकारिता के मानदंड के मुताबिक कुछ घपले घोटालों और सरकारी मशीनरी की लूट को बेनक़ाब किया था। पुलिस ने एफआईआर दर्ज की लेकिन ऊपर वाले का शुक्र रहा कि एक मिनट के लिए भी न तो थाने की शक्ल देखी न कोई गिरफ्तारी हुई। जिसको आईओ बनाया गया उसने थोड़ी बहुत पुलिसिया गुंडागर्दी दिखानी चाही तो ऊपर वाले उसको बहुत ही बड़ी सज़ा दे डाली। साथ ही भले ही इंसाफ पाने में कई साल लगे हों लेकिन अदालत ने बाइज्जत बरी करके हमारे ज़ख़्मों को मरहम भी लगा दिया। प्रेस कॉउंसिल ऑफ इंडिया ने हमारे अखबार को भी दोबारा प्रकाशित करने की राह आसान कर दी।

लेकिन इस सबके बावजूद आज फिर उन तथाकथित पत्रकारों और चौथे स्तंभ के दावेदारों की कायरता और नामर्दी पर शर्म आ रही है, जो उस दिन ख़ामोश रहे। प्रेस का गला घोंटा गया और मोटा विज्ञापन और रात को पुलिस से एक बोतल पाने वाले मीडिया हाउस और कथित पत्रकार मुंह पर टेप लगाए हमारी हमदर्दी का ढोंग करते रहे। निजी तौर पर कई कथित बड़े पत्रकारों को मैने जब फोन किया तो उन्होने अपनी मजबूरी भी बताई।

लेकिन एनडीटीवी पर एक दिन का बैन को सुन कर एक बार फिर लगा कि काश उस दिन एनडीटीवी या कोई कथित बहादुर मीडिया हाउस एक पत्रकार के कमज़ोर और उभरते हुए मडिया हाउस की भ्रूण हत्या के खिलाफ बोलने की हिम्मत करता तो शायद आज जैसी घटनाओं को दोहराने से पहले सोचा जाता। हमें एनडीटीवी पर लगे बैन पर उतना ही दुख है जितना अपने अखबार पर कई साल तक बैन रहने का। लेकिन सवाल वही है कि किसी एक के दमन पर चुप रने वालों को अपने लिए भी उस दमनचक्र का इंतज़ार करना चाहिए।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी पत्रकार हैं सहारा समय, डीडी आंखों देखी, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज़ सहित कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य चुके हैं।

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एनडीटीवी बैन के खिलाफ रवीश के इस ऐतिहासिक प्राइम टाइम को न देख पाएं हों तो अब जरूर देख लें

Om Thanvi : आज रवीश का प्राइम टाइम ‘सवाल पर सवाल है’ ऐतिहासिक था। उस रोज़ की तरह, जब उन्होंने स्क्रीन को स्वेछा से काला किया था, अभिव्यक्ति के संसार में पसरे अंधेरे को बयान करने के लिए। आज उन्होंने हवा में व्याप्त ज़हर के बहाने अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हो रहे प्रहार को दो मूकाभिनय के कलाकारों से ‘सम्वाद’ के ज़रिए चित्रित किया। बहुत मार्मिक ढंग से।

उन्होंने सरकार की तंगदिली को बेनक़ाब किया, सबसे भरोसेमंद चैनल को पठानकोट के नाम पर दी जा रही सज़ा और इस तरह की बदनामी की कुचेष्टा का जवाब दिया। मुझे लगा वे भावुक हो जाएँगे। पर भावना और दर्द पर क़ाबू रखते हुए वे मज़े वाले मूड में आ गए। ओछे शासन को हँसते-खेलते धो डाला। मुझे अब सरकार पर तरस आने लगा है। वह जूते भी खाती है और प्याज़ भी, पर विवेक से काम नहीं लेती। प्राइम टाइम न देख पाएं हो तो इस लिंक पर क्लिक करें : 

http://www.ndtv.com/video/shows/prime-time/prime-time-when-we-will-not-ask-the-questions-so-what-would-we-do-437481 

एक रोज़ पहले ही रामनाथ गोयनका एवार्ड देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि हम इमरजेंसी की मीमांसा करते रहें, ताकि देश में कोई ऐसा नेता सामने न आए जो इमरजेंसी जैसा पाप करने की इच्छा भी मन में ला सके। और भोपाल की संदिग्ध मुठभेड़, दिल्ली में मुख्यमंत्री- उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस उपाध्यक्ष की बार-बार होने वाली हिरासतकारी को भूल जाइए, ताज़ा बुरी ख़बर यह है कि एनडीटीवी-इंडिया पर भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक रोज़ का प्रतिबंध घोषित किया है। मंत्रालय के आदेश के अनुसार उसकी एक उच्चस्तरीय समिति ने पठानकाट हमले के दौरान उक्त चैनल की रिपोर्टिंग को देश की सुरक्षा के लिए ख़तरे वाली क़रार दिया है। इसलिए सज़ा में चैनल को 9 नवम्बर को एक बजे से अगले रोज़ एक बजे तक चैनल का परदा सूना रखना होगा। क्या अघोषित इमरजेंसी की पदचाप और मुखर नहीं हो रही? 

मुझे आशंका है कि आने वाले दौर में यह और तल्ख़ होगी अगर इसका एकजुट और विरोध न किया गया। देश की सुरक्षा ख़तरे में डालने के संगीन आरोप में किसी समाचार माध्यम पर ऐसा प्रतिबंध देश में पहले कभी नहीं लगाया गया है। इसलिए मेरा सुझाव है कि 9 नवम्बर को, जब एनडीटीवी-इंडिया का परदा सरकारी आदेश में निष्क्रिय हो, देश के हर स्वतंत्रचेता चैनल और अख़बार को अपना परदा/पन्ना विरोध में काला छोड़ देना चाहिए। एडिटर्स गिल्ड, प्रेस क्लब आदि संस्थाओं को उस रोज़ प्रतिरोध के आयोजन करने चाहिए – अगर अपना लोकतंत्र हमें बचा के रखना हो। वरना शासन का शिकंजा एनडीटीवी की जगह आगे अभिव्यक्ति के किसी और माध्यम पर होगा।

Sanjaya Kumar Singh : रवीश का प्राइम टाइम कल देर रात फोन पर देखना पड़ा। इतनी चर्चा थी कि बिना देखे नीन्द नहीं आई। कंप्यूटर बंद कर चुका था और नीन्द लग भी रही थी। सोचा देखते हैं नीन्द जीतती या प्राइम टाइम। कहने की जरूरत नहीं है कि प्राइम टाइम देखकर सुकून की नीन्द आई। एक बजे सोया सुबह साढ़े सात बजे नीन्द खुली। मीडिया को प्रेस्टीट्यूट कहने वाले ना वेश्यावृत्ति ना रोक सकते हैं ना स्वीकार कर सकते हैं ना खुद पर नियंत्रण रख सकते हैं। लेकिन मीडिया पर प्रतिबंध लगाएंगे। मैं तो कहूंगा, कोशिश कर लीजिए। ओम थानवी से 100 प्रतिशत सहमत।

Satyanand Nirupam : ‘सवाल पर सवाल है’- का पुनः प्रसारण आज दिन में सुबह नौ बजे, दोपहर दो बजे और रात को नौ बजे होने वाला है।  सुबह दोपहर शाम- तीन खुराक प्राइम टाइम विथ Ravish Kumar! #ndtvइंडिया पर। आज तो बागों में बहार ही बहार है!!!

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, संजय कुमार सिंह और सत्यानंद निरुपम की एफबी वॉल से. 

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एनडीटीवी को सरकारी प्रतिबन्ध की बधाई

Sanjaya Kumar Singh : एनडीटीवी पर कार्रवाई की खबर से मुझे आम आदमी पार्टी के सासंद भगवंत मान पर संसद की सुरक्षा से खिलवाड़ करने के आरोप और फिर मान के आरोप की याद आई। पता नहीं अब यह मामला किस स्थिति में है पर “सैंया भये कोतवाल” ऐसे ही नहीं कहा जाता है। संसद की साइट पर संसद भवन का वर्चुअल लिंक दिख तो अब भी रहा है पर चल नहीं रहा। चूंकि संसद देखा हुआ है इसलिए वर्चुअल लिंक देखने की जरूरत ही नहीं महसूस हुई। संसद का वीडियो लोड करने के लिए जब मान का मामला गर्माया तो मैंने देखना चाहा कि अधिकृत तौर पर क्या दिखाया जा रहा है और मान ने क्या दिखा दिया। पर उस दिन से वह लिंक चल ही नहीं रहा है। काफी दिन हो गए। आज याद आया तो सोचा फिर देखा जाए। पर उसे चलाने, लगाने, हटाने वाले भी, लगता है, भूल गए। वैसे ही है। ना हटा है, ना चल रहा है। फिलहाल, एनडीटीवी मामले में मुझे यकीन है कि वह इस कार्रवाई से और मजबूत होगा। उसका समर्थन बढ़ेगा। अगर ऐसे प्रतिबंधों से डरना होता तो वह ऐसा कुछ करता ही क्यों जिससे मिर्ची लगती है।

Sandeep Verma : प्रतिबन्ध तो शेर पर ही लगता है, दुम हिलाने वालों को तो दूध-रोटी खिलाई जाती है. एनडीटीवी को सरकारी प्रतिबन्ध की बधाई.

Anil Singh : एनडीटीवी इंडिया के साथ सभी चैनल करें ब्लैकआउट! जिस सरकार ने खुद पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को (निश्चित रूप से जिसमें आईएसआई के लोग शामिल रहे होंगे) पठानकोट एयरबेस के चप्पे-चप्पे का दौरा कराया, वो एनडीटीवी इंडिया पर पठानकोट हमले के उस कवरेज़ के लिए एक दिन का बैन लगा रही है जो हर चैनल व अखबारों में कमोबेश एक ही तरह से कवर किया गया था। चैनल से कहा गया है कि वो 9 नवंबर की रात 12.01 बजे से 10 नवंबर को रात 12.01 बजे तक कुछ भी न दिखाए। जाहिर है कि एनडीटीवी इंडिया को सरकार विरोधी रुख की सज़ा दी जा रही है। यह मीडिया का गला घोंटनेवाली ऐसी लोकतंत्र-विरोधी कार्रवाई है जिसका विरोध न किया गया तो कल कोई भी नहीं बचेगा। इस समय एनडीटीवी इंडिया एकमात्र चैनल है जो सच को सच कहने की हिम्मत करता है और सरकार की हर बेज़ा हरकत पर वाजिब सवाल उठाता है। कल दूसरे चैनलों को भी एनडीटीवी इंडिया की तरह ब्लैकआउट किया जा सकता है। ऐसे में उचित यही होगा कि कम से कम हिंदी के सारे न्यूज़ चैनल एनडीटीवी इंडिया के साथ एकजुटता दिखाते हुए 9 नवंबर की रात से 10 नवंबर की रात तक 24 घंटे का ब्लैकआउट कर दें।

Nadim S. Akhter : एनडीटीवी इंडिया न्यूज़ चैनल पर केंद्र सरकार ने लगाया एक दिन के लिए बैन। अब पता चला कि देश का नंबर वन हिंदी न्यूज़ चैनल कौन है? मैं मीडिया के किसी भी संस्थान, चाहे वो भक्त संस्थान ही क्यों न हो, पे पाबन्दी लागए जाने के खिलाफ हूँ। और लोकतंत्र में हर नागरिक को सत्ता के ऐसे तानाशाही फैसलों का मुखर विरोध करना चाहिए। कभी एनडीटीवी पे रवीश कुमार ने प्राइम टाइम में स्क्रीन को ब्लैक कर दिया था। उससे -प्रेरणा- लेकर केंद्र सरकार पूरे चैनल को ब्लैक आउट कर रही है।  सनद रहे, ये रंग काला है। मुंह पे लग जाए तो -मुंह काला- हो जाता है और आँखों में लग जाए तो काजल बन जाता है। और पन्नों में समा जाए तो इतिहास बन जाता है। सो सावधान! विश्राम! लाठी पकड़, फुल पैंट पहन! अब माथे पे काली टोपी धर। तुम कौन? सेवक गुरूजी। अच्छा स्वयंसेवक! हाथ सीने की सीध में। हथेली नीचे। नाखून ऊपर। प्रशिक्षण समाप्त। #ndtvblackout

Krishna Kant : जरूरी नहीं कि आपातकाल लगाने के लिए प्रधानमंत्री रेडियो से घोषणा करें. इंदिरा गांधी में फिर भी इतनी ईमानदारी थी कि जनता को बता दिया था. अब जनता तय करे कि उसे मजबूत जनतंत्र चाहिए या एक निरंकुश देवता. NDTV पर एक दिन का प्रतिबंध दो साल से लागू अघोषित आपातकाल की पहली मुनादी है।

Khushdeep Sehgal : आज NDTV का नंबर, कल सब का होगा…(सिर्फ सेल्फी-भक्ति वाले बचेंगे)

Jitendra Narayan : आतंकवादियों को पठानकोट एयरबेस तक पहुँचाने वाले एसपी सलविंदर सिंह से बड़ा अपराधी NDTV है?

Saiyed Zaigham Murtaza : 10 नवंबर शाम 8-9 बजे एनडीटीवी ऑन ज़रूर कीजीए। इमरजेंसी का विरोध कीजीए। बताईए कि सत्य देखने नहीं समझने की चीज़ है। टीआरपी ब्लैंक स्क्रीन भी दे सकता है।

Abhay Tiwari : कोई कह नहीं रहा है.. पर सारी गलती रवीश कुमार की है। सब सुधर गए .. बस वही एक बच गए हैं जो सुधरने का नाम नहीं लेते.. पर क्या करें.. हमें बिगड़े हुए रवीश कुमार ही अच्छे लगते हैं। जिस दिन वो सुधर जाएंगे हमारा टीवी पर न्यूज देखना बंद हो जाएगा।

Chandra Prakash Pandey : देश और समाज को नुकसान पहुँचाने वाले कॉन्टेंट के प्रसारण पर लगाम लगनी ही चाहिए, लेकिन ये तय कौन करेगा कि कौन सा कॉन्टेंट देश या समाज को नुकसान पहुंचाने वाला है? सरकारें तो बिलकुल नहीं तय कर सकती। आप ऐसा मैकेनिज्म बनाइये कि अदालत या कोई स्वतंत्र संस्था तय करे, दण्डित करे, आप कौन होते हैं? वैसे मीडिया में पर्याप्त आत्म-नियंत्रण है, ये काम उसी पर छोड़ देना बेहतर है। क्या आप डरा रहे हैं? असल में आप डरे हुए हैं। NDTV पर कार्रवाई का फैसला वापस लो, ऐसी तानाशाही से डराओ मत क्योंकि इसमें तुम्हारी हार तय है सरकार! #StandWithNDTV

अजात अभिषेक : 9 तारीख़ को मैं कोई न्यूज़ चैनल नहीं देखूँगा. #Reject_Censorship (पहली बार कॉपी-पेस्ट कर समर्थन की अपील कर रहा हूँ इस अभियान के. इसे अपनी वाल पर चिपकाइए और दोस्तों से ऐसा ही करने की अपील कीजिये.सच मानिए, ज़रूरी है).

Madan Tiwary : सुनने में आ रहा है कि NDTV के प्रसारण पर रोक लगाई गई है. कारण पठानकोठ हमले के दौरान गैर जिम्मेवाराना रिपोर्टिंग. यह अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की कवायद है. मैं रविश का घोर विरोधी हूँ परन्तु इस प्रतिबन्ध को देश के लिए खतरनाक मानता हूँ. यह फासीवाद है. इसके खिलाफ जनता को सड़कों पर आना चाहिए. आज मुल्क में वर्तमान में सबसे खतरनाक भाजपा और मोदी समर्थक हैं. वे सबसे ज्यादा गाली गलौज करते हैं. प्रतिबन्ध लगाना है तो पहले अपने समर्थकों पर लगाए सरकार. मोदी आग से खेल रहे हैं. जलकर ख़ाक हो जाएंगे अगर रवैया नहीं सुधारा तो. 

Nishtha : NDTV चैनल की पत्रकारिता को सलाम। सरकार ने एक दिन का प्रतिबन्ध लगाकर इस बात को सही साबित कर दिया। आपातकाल में भी कई पत्रकारों को सच बोलने पर प्रतिबन्ध झेलना पड़ा था। यह भी अघोषित आपातकाल ही है। #I_Support_NDTV

Priyabh Ranjan : NDTV India पर एक दिन का BAN लगाने का फरमान तो आ गया…लेकिन पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के अफसरों को पठानकोट एयर बेस की ‘सैर’ कराने वाली इस मोदी सरकार पर कौन सा BAN लगाया जाए? #UndeclaredEmergency #NDTV_Banned

सौजन्य : फेसबुक

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उन्हें सुदर्शन टीवी की गटर छाप पत्रकारिता से दिक्कत नहीं, बस एनडीटीवी इंडिया के अस्तित्व से बड़ी समस्या है

Sheetal P Singh : ये कहाँ आ गये हम…  जिन्हें सुदर्शन टीवी (जिसके मालिक/ संपादक पर यौन उत्पीड़न का मामला दर्ज हुआ है) जो अनवरत सांप्रदायिक प्रचार करता है, नाबालिग़ लड़की से बलात्कार करने के आरोप में बंद आसाराम का खुला समर्थन करता है । भाषा / कंटेंट के मामले में गटर पत्रकारिता का नमूना है से बाल भर भी आपत्ति न है न हुई न होगी उनके तरकश में NDTV इंडिया के खिलाफ भाखने को बहुत कुछ है! जिन्हें Znews के संपादक / प्रबन्धक / मालिक को वीडियोटेप पर नवीन जिन्दल से सौ करोड़ का ब्लैकमेल करते देखने से रत्ती भर भी फ़र्क़ न पड़ा वे पत्रकारिता की शुचिता की तलाश में NDTV इंडिया की कमियाँ गिना रहे हैं! जिन्हें संपूर्ण मीडिया के नरेंद्र मोदी अमित शाह अरुण जेटली मुकेश अंबानी गौतम अडानी से संबंधित हर ऐसे समाचार जिसमें आलोचना हो पर अघोषित प्रतिबंध से हर्फ़ भर भी दिक़्क़त नहीं है उन्हे NDTV इंडिया के अस्तित्व से ही बड़ी दिक़्क़त है! इन सब को पहचानिये! इनकी जात पहचानिये! ये एक रंग के हैं, इनका रंग पहचानिये!

 

Anil Jain : अघोषित आपातकाल की मुखर होती पदचाप! इतिहास के अच्छे-बुरे दिनों या घटनाक्रमों को वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आपातकाल लगाते वक्त तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को अपनी ‘लोकप्रियता’ और ‘राजनीतिक कौशल’ का वैसा ही गुमान था जैसा आज भी कुछ लोगों को है। आपातकाल कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि सत्ता के अतिकेंद्रीकरण, निरंकुशता, व्यक्ति-पूजा और चाटुकारिता की निरंतर बढ़ती गई प्रवृत्ति का ही परिणाम थी। आज फिर वैसा ही नजारा दिख रहा है। यह जरुरी नहीं कि लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों का अपहरण हर बार बाकायदा घोषित करके ही किया जाए। वह लोकतांत्रिक आवरण और कायदे-कानूनों की आड में भी हो सकता है। शासक वर्ग की कोशिशें इस दिशा में जारी हैं। सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही करार देना, भोपाल की संदिग्ध मुठभेड, दिल्ली में कांग्रेस उपाघ्यक्ष और मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री को बार-बार हिरासत में लेना और एनडीटीवी-इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध- यह सब क्या है?

Amitaabh Srivastava : एनडीटीवी इंडिया पर सरकारी पाबन्दी की कार्रवाई घोर निंदनीय है. ये सरकार के खतरनाक मंसूबों की एक झलक है. हर पत्रकार को , संपादक को, पत्रकार संस्था को निजी और सामूहिक स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए भले ही चैनल से आपको ढेरों शिकायतें हो. एडिटर्स गिल्ड के अलावा बीईए और बाकी संस्थाओं, संगठनों को भी इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए. इमरजेंसी की आड़ में कांग्रेस को कोसने वाली सरकार हकीकत में आज़ाद प्रेस की अवधारणा से कितनी नफरत करती है . ये उसकी मिसाल है. ये इमरजेंसी नहीं तो और क्या है. शर्मनाक. 

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी. सिंह, अनिल जैन और अमिताभ श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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मोदी अगर एनडीटीवी को ठिकाने लगाने पर आ जाएंगे तो एक दिन का नहीं, पूरा ही ब्लैक आउट करा देंगे

Rajat Amarnath : NDTV जहाँ नौकरी पाने का पैमाना होता था कि आपके परिवार में कौन कौन ब्यूरोक्रेसी में हैं ताकि ख़बर के साथ साथ आड़े वक्त पर चैनल का काम निकाल सकें सरकार बदली तो काम निकालने वाले ब्यूरोक्रेट्स भी बदल गए डॉक्टर राय खुद कांग्रेसी हैं इसलिए उन्हीं के समय मे पनपे हैं उनकी पत्नी राधिका राय की बहन हैं वृंदा करात और बहनोई हैं प्रकाश करात जो वामपंथी हैं ये जगजाहिर है ऐसे में ये चैनल सरकारी पक्ष की तो बात करने से रहा और अब जब सरकार ने बाकी चैनलों को बख्श दिया लेकिन NDTV को एक दिन के लिए ब्लैक आउट करने का आदेश दिया तो छटपटाहट शुरू हो गई. अब इसे अघोषित आपातकाल बताया जा रहा है.  

1999 (NDA की सरकार थी) में करगिल में कुछ फौजी सिर्फ़ इसलिए शहीद हुए क्योंकि NDTV की तेज तरार्र पत्रकार ने वहीं से लाईव कर दिया जहाँ बंकर में फौजी बैठे थे. जो भी पत्रकारिता से जुड़े हैं उन सबको ये किस्सा पता है. सरकार की आलोचना होनी चाहिए लेकिन NDTV सरकार विरोधी है. NDTV प्रधानमंत्री विरोधी नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी विरोधी है, इसलिए सूचना प्रसारण के फैसले पर भी नरेन्द्र मोदी का फैसला बताया जा रहा है. श्रीमान नरेन्द्र मोदी तो जब NDTV को ठिकाने लगाने पर आयेंगे तो सबसे पहले अपनी टेबल पर पड़ी NDTV के काले कारनामों की फाइल निपटायेंगे. एक दिन का ब्लैक आउट नहीं, बल्कि पूरा ब्लैक आउट कर देंगे. न मैं नरेन्द्र मोदी का विरोधी हूँ और न प्रशंसक पत्रकार हूँ. मैं केवल अपना नजरिया लिख रहा हूं पूरे मामले पर. 

Dilip Mandal : एक महीने बाद NDTV अगर एक ओपिनियन पोल लाता है, जिसमें यूपी में BJP सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती दिखाई जाती है और BSP तीसरे नंबर पर, तो क्या आप उस पर भरोसा करेंगे? करना ही पड़ेगा। लिखकर रख लीजिए। NDTV का ऐसा ओपिनियन पोल आएगा। मीडिया का अंडरवर्ल्ड! जो दिखता है, सिर्फ उतना ही नहीं होता। मैं बैन के खिलाफ हूँ।

Chitra Tripathi : किसी भी चैनल के खिलाफ सरकार की कारवाई निंदनीय है। ये अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति पैदा करता है। लेकिन NDTV India से मेरी कोई सिंपैथी नहीं है। वैसे भी खुद की स्क्रीन काली करने वाले चैनल को.. दूसरों को नीचा दिखाने की और खुद को महानता की श्रेणी में रखने की प्रवृत्ति रही है इस चैनल की…

वरिष्ठ पत्रकार रजत अमरनाथ, दिलीप मंडल और चित्रा त्रिपाठी की एफबी वॉल से. 

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प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे तब दुगुने वेग से दागने चाहिये सवाल (कविता)

प्रश्नकाल

-भंवर मेघवंशी-

प्रश्नों पर जब प्रतिबंध लगे
तब दुगुने वेग से
दागने चाहिये सवाल
सवाल,सवाल और सवाल
अनगिनत ,अनवरत
प्रश्न ही प्रश्न पूछे जाने चाहिये
तभी यह अघोषित आपातकाल
प्रश्नकाल में बदल सकता है.

पूछो, इसलिये कि
पूछना जरूरी है.
पूछो, इसलिये कि
सवाल मर ना जायें कहीं .
जब सवालों की जिन्दगी का
सवाल हो,
ऐसे में चुप रहने का तो
सवाल ही कैसे उठता है?

सवालों की मौत
लोकतंत्र की मौत है
संविधान का मरण है.
इसलिये बरा -ए -मेहरबानी
जम्हूरियत की सेहत के लिये
इस प्रश्नकाल को
स्थगित मत कीजिये.
पूछते रहिये निरंतर
सहज और असहज सवाल.

यह जानते हुये भी
कि पूछना हो सकता है
एक जोखिम भरा काम .
अक्सर नहीं मिलेंगे जवाब
क्योंकि चुप्पों के देश में
जवाब में नहीं आते,
प्रत्यत्तर में प्रतिप्रश्न
उछाले जाते है
कि-
तुम होते कौन हो पूछने वाले?
फिर भी पूछना जरूरी है
पूछते रहिये सदा सर्वदा.

सवाल
सिर्फ सवाल नहीं होते
वे हमारे जिन्दा होने का
सबूत होते है.
सवाल ही जन्मते है
तर्क, विग्यान और गणित को.
सवाल हमें लोकतंत्र में
मालिक बनाते है.
“सर्व प्रभुता सम्पन्न”
सवालों से ही तो
है हमलोग
“वी द पीपल” कहलाते है.
सवाल
हमारे लोकतंत्र के
फेफड़ों की
सांस है.
सवाल ही
इस आफतकाल में
आखिरी ऊजास है.
इसलिये पूछते रहो
पूछते रहो कि
पूछना जरूरी है.

प्रश्नों ने ही
रची होगी सभ्यताएं
अक्षर, स्वर, व्यजंन
वाक्य, बोलियां और भाषाएं
कालक्रम की इस
विकास यात्रा का उद्गम
प्रश्नों में ही छिपा है.
प्रश्न नहीं होते
तो पाषाणयुग
में ही ठहरे होते हम.

प्रश्नों ने ही कबीलों को
समाज बनाया.
प्रश्नों ने ही हमारे कल को
आज बनाया.
इसलिये अपने प्रश्नों को
सहेजो लोगो.

खोने मत दो
अपने सवालों को
मदमाती सत्ता के
अहंकारी अट्टहासों में
श्रद्धा के घटाटोप अंधियारों में
राष्ट्रवाद के नारो में
भीड़ के हथियारों में
अपने सवाल
जिन्दा रखों
हर दौर, हरेक सरकारों में.

वे जब
शस्त्र पूजें,
हत्यारों को करें
महिमा मण्डित.
बनायें उनके
पूजागृह
और उनके पापों पर
तिरंगा डाल दें,
तब भी चुप मत रहना
पूछना.

जब वो बना दें
फौजों को पवित्र गाय
और गायों  के नाम पर फौजें
पशुपुत्रों के
उस पाश्विक युग में भी
चुप मत रहना,
पूछना सवाल.

जब वो सवाल
पूछने को ही
राष्ट्रद्रोह बना दें,
भेजने लगे जेल,
मारने लगे कौड़े
गोलियों और गालियों की
करने लगे बौछार
तब भी
बिना डरे मेरे यार
पूछना सवाल.

सवाल तो शाश्वत है
शाश्वत ही रहेंगे
प्रतिबंधों को तो
टूटना होता है
टूट जायेंगे
और प्रतिबंध लगाने वाले
डर जायेंगे
यहां तक कि
मर जायेंगे.

सवाल फिर भी
रहेंगे जिन्दा
क्योंकि हम विरसे में
अपने वंशजों को
सौंप जायेंगे
अनगिनत सवाल
और वसीयत में
लिख जायेंगे
सवाल उठाने का हक़
जिससे कि वो बना सकेंगे
हर अघोषित
आपातकाल को प्रश्नकाल !!

लेखक भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार एवं समाजकर्मी हैं. यह रचना एनडीटीवी इंडिया के समर्थन में है. सम्पर्क सूत्र- bhanwarmeghwanshi@gmail.com

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छप्पन इंच के सीने पर छेद तमाम हैं… अगर छेद दिखाए गए तो बैन कर दिया जाता है…

सच को सच कह दिया था इसी पर मेरे पीछे ज़माना पड़ा है… इस ज़माने में सिर्फ वो सरकार है जिसे सवाल पसंद नहीं, और कुछ भक्तों की संख्या है जिनकी आंखें फूट चुकी हैं.. छप्पन इंच के सीने पर छेद तमाम हैं… और अगर छेद दिखाए गए… तो बैन कर दिया जाता है… 2014 से 2019 तक के बीच के लोगों को खुद को महान समझना चाहिए… क्योंकि उन्हें दोबारा हिटलर को देखने का मौक़ा मिल रहा है… हमें कोरिया जाने की ज़रूरत नहीं है… क्योंकि एक ‘किम जोंग’ हमारे देश में भी फल-फूल रहा है… उसे सवाल पसंद नहीं है, उसे मन की करनी है, उसे किसी की नहीं सुननी है… रावण जैसा अहंकार, बकासुर जैसी सोच, कंस जैसी क्रूरता उसके भीतर कूट-कूट कर भरी है…

राजकमल झा की दो लाइनों ने ही उसके फूलते सीने को पिचका दिया… अक्षय मुकुल की बात ने उसके अहंकारी सोच पर ज़ोर का तमाचा मारा… और रवीश के ‘मूक शो’ ने उसकी मरी हुई मानवता को कब्रिस्तान तक छोड़ने का काम किया… जब पत्रकार सरकार का ‘अंडु’ पकड़ कर लटकने लगेंगे, तो आप कहां जाएंगे, ये आपको सोचना होगा… जब पत्रकार सेल्फी मोड में ‘लेड़ी तर्र’ करवाते फिरेंगे, तो आप कहां जाएंगे, ये आपको सोचना होगा…. कौन आपके सवाल पूछेगा, कौन आपकी आवाज़ को वहां तक पहुंचाएगा… एक हैं बाबा तिहाड़ी… नाम नहीं लिखूंगा… नहीं तो आप समझ जाएंगे… सुधीर की बात कर रहा हूं… हां-हां… वहीं सुधीर… ज़ी वाला… गज़ब का देशभक्त पत्रकार है… उसे प्रधानमंत्री की चड्ढी का ब्रांड भी पता होगा… अमित शाह कहां दाढ़ी सेट करवाता है… उसे वो भी पता होगा…

ये तिहाड़ी पूरी तरह से ‘नीचे वाला’ पकड़ के लटक चुका है… कुछ और भी हैं… कुछ क्या, बहुत सारे हैं… चाटे जा रहे हैं, चाटे जा रहे हैं… कुछ तो छोड़ ही नहीं रहे हैं… किसी को Z वाली सुरक्षा मिल रही है… किसी को Y वाली… इन्ही पत्रकारों की वजह से प्रधानमंत्री पर बीते दो साल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने तक का दबाव नहीं बन पाया… बताया जाए जनता को, कि क्या हुआ, क्या होगा… ट्वीट पर बिना सवाल के जवाब दे दिया जाता है… मौत पर सांत्वना होती है, हादसों पर दुख होता है, शहीदों पर सियासत होती है और जीत पर जश्न होता है… सब ट्वीट पर… लेकिन NDTV ने पिलाई करनी शुरू कर दी है… पत्रकारिता की ताक़त दिखानी शुरू कर दी है… आप साथ आओ… क्योंकि ये आपके हित का भी सवाल है… जो पैसा लेकर चाटते हैं, या भक्त बनकर चाटते हैं, उनके साथ आने की ज़रूरत नही हैं… जो सवाल पूछता जानते हैं, जो पत्रकारिता को समझते हैं… उनको एक साथ आने की ज़रूरत है…

युवा पत्रकार संजय सिंह की फेसबुक वॉल से. संपर्क : sanjaysingh27sept@gmail.com

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सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी चैनल को खत्म करो!

गले में बाँधे रहते थे, अब मुँह पर पट्टा बाँधे हैं,
पालतू हैं हम मोदी के, इस बात का गंडा बाँधे हैं।
सच की जुर्रत करने वाले एनडीटीवी को खत्म करो,
झूठ के भोपू वाले हैं, हम झूठ का दामन थामे हैं।

ये पंक्तियाँ उन चंद तथाकथित बिकाऊ पत्रकारों की भावनाओं की कल्पना है जिन्हें कोई अंध भक्त कहता है, कोई सरकार के झूठ का भोंपू तो कोई मोदी का पालतू। आजाद पत्रकारिता और निष्पक्ष कलम जब सरकार की गलत नीतियों का बखान करने लगता है तो पालतू गला फाड़-फाड़ कर भोंकते हैं। सरकार की मुखालिफत पर ये अक्सर काट भी लेते हैं। लेकिन इनके काटने से पीड़ितों को ना इन्जेक्शन लगवाना पड़ता है और न ही जान का खतरा महसूस होता है। मेडिकल साइंस कहती है कि काटने वाला जब तक जीवित है तब तक पीड़ित खतरे से बाहर है। अभी तीन साल तक इन्हे चंद टुकड़ों की ताकत जिन्दा रखेगी और सत्ता की ताकत इन्हेँ झूठ का साथ देने की आब-ए-हयात देती रहेगी। झूठ की हिफाजत के लिये निष्पक्ष पत्रकारिता पर जो भौकते रहते है उनका मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों पर खामोश रहना स्वाभाविक भी है।

9 नवंबर को एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध के खिलाफ बुलंद आवाजो मे खामोशी इख्तियार करने वाले पत्रकारों/पत्रकार संगठनों को तानाशाही मोदी सरकार का पालतू करार दिया जा रहा है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की नई दमनकारी विज्ञापन नीति के बाद एनडीटीवी पर एक दिन के प्रतिबंध को केन्द्र सरकार के आगे नतमस्तक हो जाने की अप्रत्यक्ष चेतावनी माना जा रहा है। हिन्दुस्तानी मीडिया की आजादी को दौलत की जंजीरो मे बाँधकर कैद करने वाली नीतियों के खिलाफ पत्रकारों का गुस्सा उन पत्रकारों के खिलाफ ज्यादा मुखर हो गया है जो मोदी भक्ति मे मीडिया के खिलाफ केन्द्र सरकार के दमनकारी फैसलो पर खामोश है।

देशभर के पत्रकारों और मीडिया संगठनो मे एनडीटीवी पर एक दिन के लिये बैन को लेकर गुस्सा बढ़ता जा रहा है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सबसे बड़े संगठन-  एडिटर्स गिल्ड आफ इन्डिया,  प्रेस क्लब आफ इन्डिया के अतिरिक्त देशभर के दर्जनों पत्रकार संगठन एनडीटीवी के समर्थन मे आकर केन्द्र सरकार के खिलाफ आन्दोलन की रूपरेखा तैयार कर रहे है। वहीं इस मामले पर यूपी सहित देश के चंद पत्रकार संगठनों की खामोशी इन्हें कटघरे में खड़ा कर रही है। इन संगठनो ने मीडिया को गुलामी की जंजीरो मे बाँधने वाली मोदी सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ अब तक एक बयान तक भी नही दिया। यही नहीं, पत्रकारों और पत्रकारिता की आजादी के हक की बातेँ करने वाले इस तरह के कई मोदीपरस्त पत्रकार संगठन  एनडीटीवी पर बैन के तानाशाही कदम पर खामोशी इख्तियार किये हैं। इस खामोशी से ये शक और आरोप और भी उभरने लगे ही कि बड़े मीडिया समूहों को ही नही संगठनों की दुकान चलाने वाले कथित पत्रकारों को भी मोदी समर्थन की सुपारी के टुकड़े दिये जाते हैं।

लेखक नवेद शिकोह लखनऊ के पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 08090180256 या Navedshikoh84@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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ये तीन तरह के लोग एनडीटीवी पर बैन के खतरनाक फैसले को नहीं समझ पाएंगे

Nitin Thakur : एनडीटीवी इंडिया पर बंदिश का फैसला कितना खतरनाक है, ये बात तीन तरह के लोगों की समझ में नहीं आएगी।  1. वो जिन्होंने मजबूरी में पत्रकारिता के पेशे को अपनाया है। 2. किसी और एजेंडे को पूरा करने के लिए इस पेशे में घुस आए लोग। 3. ग्लैमर से अंधे होकर पत्रकारिता की गलियों में आवारगर्दी कर रहे पत्रकार जैसे दिखनेवाले लोग। इनके लिए रिपोर्टिंग करते किसी पत्रकार का पिटना हास्य का विषय है। किसी पत्रकार या पत्रकारिता संस्थान पर चलनेवाले सरकारी डंडे को ये इज़्ज़त देते हैं। दरअसल इन्हें अपने पेशे पर शर्म है लेकिन ये लोग इस पेशे के लिए खुद शर्म का विषय हैं।

Nadim S. Akhter : एनडीटीवी पर एक दिन का ही सही, पर बैन लगाकर मोदी सरकार ने अपनी अब तक की सबसे बड़ी फ़ज़ीहत करवा ली है। उनकी सरकार का ये फैसला मोदी कार्यकाल के बाकी सारे बड़े फैसलों और नीतियों पे भारी पड़ेगा। कारण ये है कि इस देश की जनता ऐसे मामलों में सरकारों को माफ़ नहीं करती क्योंकि आज भी मीडिया की आज़ादी पे हमला वो खुद पे हमला मानती है। मैंने शुरू में ही कहा था कि देर-सबेर ये गुजरात की प्रयोगशाला ये पूरे देश पे लागू करने की कोशिश करेंगे। ये उसकी आहट भी है और शंखनाद भी। अगर दिल्ली का मीडिया एकजुट नहीं हुआ तो उसे अंदर से सदा के लिए तोड़ दिया जाएगा और इसका सबसे बड़ा नुकसान इस देश को होगा। फैसले की घडी है।

Narendra M Chaturvedi : एनडीटीवी इंडिया पर सरकारी पाबन्दी की कार्रवाई घोर निंदनीय है. ये सरकार के खतरनाक मंसूबों की एक झलक है. हर पत्रकार को , संपादक को, पत्रकार संस्था को निजी और सामूहिक स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए भले ही चैनल से आपको ढेरों शिकायतें हो. एडिटर्स गिल्ड के अलावा बीईए और बाकी संस्थाओं, संगठनों को भी इस पर सख्त रुख अपनाना चाहिए. इमरजेंसी की आड़ में कांग्रेस को कोसने वाली सरकार हकीकत में आज़ाद प्रेस की अवधारणा से कितनी नफरत करती है . ये उसकी मिसाल है. ये इमरजेंसी नहीं तो और क्या है शर्मनाक.

Mukesh Kumar : अगर भारतीय मीडिया इमर्जेंसी की आहट को सचमुच सुन पा रहा है तो कायदे से उन चौबीस घंटों में तमाम न्यूज़ चैनलों को प्रसारण रोक देना चाहिए जिस समय एनडीटीवी पर बैन लगाया गया है और अगले दिन अख़बार भी नहीं निकलने चाहिए। हालाँकि मीडिया जिस तरह से सरकार की गोद में बैठ चुका है या उससे आतंकित होकर व्यवहार कर रहा है उसे देखते हुए इस तरह के प्रतिरोध की उम्मीद बेमानी लगती है लेकिन अगर वह समझ पाया कि ये हमला केवल एनडीटीवी या, मीडिया पर नहीं बल्कि समूचे लोकतंत्र पर है तो शायद उनका विवेक एवं अंतरात्मा उसे सही राह दिखा देंगे। आमीन।

Arvind Katiyar : नौ नवंबर की रात 24 घंटे के लिए सरकार का एनडीटीवी के प्रसारण पर रोक का फैसला तुगलकी है, इससे सरकार की किरकिरी ही होगी, कहीं हिटलर जिंदा होगा तो कहीं मोसलनी। अभी से कुछ लालपंथी पत्रकार फेसबुक पर हिटलर को लेकर संजीदा हैं…

Yusuf Ansari : NDTV पर एक दिन का बैन अभिभव्यक्ती की आजादी के खिलाफ है. ये फैसला मोदी सरकर के मानसिक दिवालियेपन का सबूत है. मोदी सरकार ने देश में इमरजेंसी जैसे हालत तो पैदा कार ही दिये हैं. अब इमरजेंसी का एलान भी कर ही दे. कम से कम देश मुगालते में तो नहीं रहेगा.

Vineeta Yadav : No channel should off air in any govt ! Many ques stands for this decision ! Its india nt pak …

Krishna Kant : इस देश को लाखों रवीश कुमार चाहिए। इस देश को दलालों की ज़रूरत नहीं, लाखों सवाल उठाने वाले चाहिए। 

Pawan Lalchand : NDTV इंडिया पर गलत कवरेज के बहाने बैन की कड़ी निंदा की जानी चाहिये.

Sheeba Aslam Fehmi : मोदी जी NDTV को भी कन्हैया बनाएँगे! सिर्फ ‘रविश कुमार’ लिख दो तो पोस्ट हिट हुई जा रही है! मोदी जी, ये क्या किया?

Vivek Dutt Mathuria : आज NDTV की बारी और कल आपकी….आप तय कीजिए कि आप रीढ वाले प्राणी हैं या रेंगने वाले…वक्त इतिहास लिख रहा है ….

Anita Gautam : NDTV की खिलाफत से सरकार कठघड़े में हो सकती है, पर रवीश कुमार की आलोचना चाँद पर थूकने जैसा है।

सौजन्य : फेसबुक

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बिहार में मीडिया पर घोषित प्रतिबंध

Vinayak Vijeta : मुख्यमंत्री का सख्त निर्देश, ईटीवी को कोई बाईट नहीं दें जदयू नेता… राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जदयू नेताओं और अपने प्रवक्ताओं को यह सख्त निर्देश दिया है कि वह ईटीवी को न तो कोई बाईट दें और न ही ऑन या ऑफ द रिकार्ड इस चैनल के किसी संवाददाता से बात करें। सुत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री का इस चैनल पर गुस्सा पिछले दिनों पंचायत प्रतिनिधियों के सम्मेलन को लेकर था। बताया जाता है कि इस सम्मेलन के प्रचार के लिए सूचना और जनसंपर्क विभाग ने पटना के तीन निजी चैनलों को विज्ञापन दिया था। पर ईटीवी ने इस विज्ञापन को इसलिए स्वीकार नहीं किया कि विज्ञापन का दर चैनल के निर्धारित दर से काफी कम था।

इसके वावजूद ईटीवी ने उस सम्मेलन का लाईव किया जहां मंच के टेबल पर ईटीवी का माईक भी लगा था पर मुख्यमंत्री ने ईटीवी के माईक को हटवा दिया। बुधवार को जदयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ट नारायण सिंह ने मुख्यमंत्री के निर्देशनुसार सभी प्रवक्ताओं को तलब किया और उन्हें यह सख्त निर्देश दिया कि न ही कोई प्रवक्ता या जदयू का कोई नेता ईटीवी को अपना बाईट देगा न ही कोई इस चैनल के पैनल डिस्कशन में भाग लेगा। अपरोक्ष रूप से मीडिया को अपने बंदिश में रखने की लगातार कोशिश करने वाले नीतीश कुमार के इस निर्देश की गुप्त चर्चा जगह जगह हो रही है।

अपने पहले शासन काल में से ही काफी अहंकारी बन गए नीतीश कुमार के उस रूप की चर्चा भी मीडिया जगत में हो रही है जब तत्कालीन आबकारी मंत्री जमशेद अशरफ के हवाले से पटना से प्रकाशित एक प्रमुख हिन्दी दैनिक के वरीय पत्रकार ने सुशासन (शराब शासन) पर एक खबर लिखी थी जिसमें पूरे बिहार में हर चौक चौराहे पर शराब की दुकान खुलने और गलत आबकारी नीती की चर्चा थी। तब यह  खबर उस अखबार के प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से छपी थी।

उस खबर को लेकर नीतीश कुमार उस अखबार और उसके प्रबंधन पर इतने क्रोधित हुए कि प्रबंधन को उस वरीय पत्रकार को नौकरी से हटाने तक का दवाब बना दिया था। कई दिनों तक इस अखबार को सरकारी विज्ञापन देने पर रोक लगा दी गई। नीतीश का गुस्सा देख तब इस अखबार के मालिक तक पटना आए और नीतीश कुमार से मिलने की कोशिश की पर खफा नीतीश ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। बाद में किसी तरह इस अखबार के  प्रबंधन ने इस मामले को पैचप करते हुए अपने उस वरीय पत्रकार का तबादला दिल्ली कर दिया। बाद में काफी मान-मनौव्वल के बाद नीतीश कुमार माने जिसके बाद उन वरीय पत्रकार को फिर पटना पदस्थापित किया गया।

बिहार के स्वतंत्र पत्रकार विनायक विजेता की फेसबुक वॉल से. 

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कश्मीर में मीडिया पर बैन का कोई तुक नहीं बनता : रवीश कुमार

कश्मीर में अख़बार बंद है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आज दूसरा दिन है जब वहाँ किसी को अख़बार नहीं मिला है। राज्य सरकार ने अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा दी है। दिल्ली की मीडिया में ख़बरें आई हैं कि कर्फ़्यू के कारण वितरण रोका गया है। छपी हुई प्रतियाँ ज़ब्त कर ली गई हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट भी बंद है। कर्फ़्यू के कई दिन गुज़र जाने के बाद राज्य सरकार को ख़्याल आया कि अख़बारों को बंद किया जाए। क्या कर्फ़्यू में दूध,पानी सब बंद है? मरीज़ों का इलाज भी बंद है? आधुनिक मानव के जीने के लिए भोजन पानी के साथ अख़बार भी चाहिए। सूचना न मिले तो और भी अंधेरा हो जाता है। अफ़वाहें सूचना बन जाती हैं और फिर हालात बिगड़ते ही हैं, मन भी बिगड़ जाते हैं। खटास आ जाती है।

वहाँ पहले भी हालात के बिगड़ने पर अखबारों के छपने पर रोक लगती रही है। पर पहले के नाम पर कब तक आज वही सब होता रहेगा। क्या वहाँ आतंकवाद अख़बारों के कारण फैला था? क्या बुरहान वहाँ की मीडिया की देन है? क्या मौजूदा हालात के लिए स्थानीय मीडिया ही ज़िम्मेदार है? क्या वहाँ समस्या के कारण को ढूँढ लिया गया है? उन्हीं अख़बारों से ही तो ख़बर आई थी कि अनंतनाग तीर्थयात्रा मार्ग में स्थानीय मुस्लिमों ने कर्फ़्यू तोड़ कर यात्रियों की मदद की। यह भी ख़बर आई कि मुस्लिमों ने अपने पड़ोसी कश्मीरी पंडित की माँ के जनाज़े को कंधा दिया है। यह भी खबर आई कि कई कश्मीरी पंडित फिर से भाग आए हैं। सुरक्षाबलों की ज़्यादतियों को भी अख़बार छाप रहे थे। लोगों और सेना दोनों के पक्ष छप रहे थे। इन खबरों से लोग वहाँ की विविधता को देख पा रहे थे। अख़बारों पर पाबंदी लगाकर कश्मीर और शेष भारत के लोगों से यह मौका छिन लिया गया है।

कश्मीर के अख़बारों को कश्मीर के लिए बंद किया गया है या शेष भारत के लिए? पहले भी वहाँ ऐसा तनावपूर्ण माहौल रहा है लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार लोग कश्मीर की ख़बरों के बारे में गहराई से रूचि ले रहे थे। कश्मीर की वेबसाइट की ख़बरें पढ़ी जा रही थीं और साझा हो रही थीं दावे से तो नहीं कह सकता लेकिन पहली बार लगा कि कश्मीर की मीडिया की ख़बरें शेष भारत तक पहुँच रही हैं। दिल्ली से चलने वाली कई वेबसाइट पर कश्मीर की मीडिया और दिल्ली की मीडिया के कवरेज का तुलनात्मक अध्ययन हो रहा था। कश्मीर समाचार पत्रों के नाम भारत में जाने जा रहे थे। उनके संपादक तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों में आकर बोलने लगे।

इससे दोनों जगहों के पाठकों के बीच एक बेहतर समझ बन रही थी। संवाद बन रहा था। कश्मीर की जटिलता से भागने वाले मेरे जैसे पाठकों के पास भी तुलनात्मक अध्ययन का ज़रिया उपलब्ध था। कश्मीर के लोगों को भी लगा होगा कि उनकी बात कही जा रही है। लिखी जा रही है। अख़बार बंद करने से यह संदेश जाएगा कि स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर है और सरकार वहाँ के लोगों से संवाद नहीं करना चाहती है। आख़िर सरकार अपना पक्ष किन माध्यमों के ज़रिये लोगों के बीच रखेगी।

मुझे समझ नहीं आ रहा कि कश्मीरी मीडिया की ख़बरों में ऐसा क्या था जो वहाँ के लोग नहीं जानते हैं और जो वहाँ से बाहर के लोग नहीं जानते हैं? क्या उबलता कश्मीर लिख देने से हालात में उबाल आ जाता है? अगर ये सही है और ये अतिसंवेदनशील सूचना नहीं है तो इसे छपने में क्या दिक्कत है? अगर कश्मीर मीडिया कथित रूप से प्रोपेगैंडा कर रहा था तो क्या हम आश्वस्त है कि दिल्ली का मीडिया ये काम नहीं कर रहा होगा? क्या यही भाव दिल्ली की मीडिया की ख़बरों और संपादकीय लेखों में नहीं है? फ़र्ज़ी ख़बरों के सहारे कैराना को कश्मीर बताकर कौन किसे उबाल रहा था इस पर भी वक्त निकाल कर सोचना चाहिए।

कश्मीर के कई हलकों से आवाज़ आई कि दिल्ली का कुछ मीडिया झूठी बातों को प्रचारित कर माहौल बिगाड़ रहा है।युवा आई ए एस अधिकारियों से लेकर शेष भारत के तमाम लोग दिल्ली की मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि कुछ एंकर ऐसे बावले हो गए हैं जिनके कारण हालात और ख़राब हो सकते हैं। आई ए एस शाह फ़ैसल ने साफ साफ नाम लेकर लिखा कि कौन कौन से चैनल हैं जो अफवाह फैला रहे हैं। एक अधिकारी ने तो बकायदा नाम लेकर लिखा है कि एक चैनल माहौल बिगाड़ रहा है।मैं नहीं कहता कि इस आधार पर चैनल के बारे में कोई फ़ैसला कर ही लेना चाहिए लेकिन इस पर चुप्पी भी बता रही है कि कौन किस तरफ है। अगर सरकार की चिन्ता माहौल न बिगड़ने देने की है तो क्या उसने वहाँ के लोगों को आश्वस्त किया है कि वह दिल्ली मीडिया के कुछ तत्वों की भी पड़ताल करेगी। अव्वल तो यह काम सरकार का है नहीं फिर भी उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि उस पर पक्षपात का आरोप न लगे।

बैन का कोई तुक नहीं बनता। न यहाँ न वहाँ । एक अंतर और दिखा। कश्मीर का मीडिया कश्मीर से बात कर रहा था और दिल्ली का मीडिया कश्मीर के बहाने उत्तर भारत में फैले उन्हीं पुरानी धारणाओं को भड़का रहा था जो ट्रकों पर लिखे होते हैं। दूध माँगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे तो चीर देंगे। लेकिन पाबंदी कश्मीर की मीडिया पर लगा दी गई। इससे तो हम कहीं नहीं पहुँचेंगे। ट्रक तो ओवरलोडिंग के जुर्माने से बचने के लिए चुंगी पर रिश्वत देकर निकल जाएगा और हमें दे जाएगा दो टकिया राष्ट्रवाद। जैसे कश्मीर का सवाल दूध भात का सवाल हो।

हर दूसरा विशेषज्ञ लिख रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों को कश्मीर के लोगों से बात करनी चाहिए तो फिर वहाँ के अख़बारों को कश्मीर की और कश्मीर से बात करने की सज़ा क्यों दी गई? वहाँ के अख़बार वहाँ के लोगों से ही तो बात कर रहे थे। सामान्य पाठक कैसे जानेगा कि वहाँ क्या हो रहा है। वहाँ के लोगों में भी भरोसा बनता कि उनकी बातें शेष भारत तक पहुँच रही हैं और लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं। हिंसा के रास्ते से कश्मीर को लौटाने के लिए सब यही तो कहते हैं कि बातचीत होती रहे। थोड़े दिनों बाद सारे डाक्टर अपनी पर्ची पर यही लिखेंगे कि सरकार बात करे।

इस वक्त सरकार का काम अख़बार कर रहे हैं। वहाँ के लोगों से वहाँ की बात कर रहे हैं। इससे एक संवाद क़ायम होता है। सही और विविध सूचनाएँ लोगों में आत्मविश्वास पैदा करती हैं। लोकतंत्र के प्रति इस विश्वास को ज़िदा रखती हैं कि बोला-सुना जा रहा है। प्रेस पर पाबंदी है और प्रेस चुप है। हम सबको चुप रहना अब सहज लगता है। उस सोशल मीडिया में भी चुप्पी है जो बिना बुलाए लोकतंत्र के बारात में नाचने आ गया है कि हमीं अब इसके अभिभावक हैं। वह भी चुप है। बोलने की पाबंदी के ख़िलाफ़ सबको बोलना चाहिए। वाजपेयी जी के शब्दों में यह अच्छी बात नहीं है।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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पोर्न पर पाबंदी : सरकार ने कहा- हम किसी के बेडरूम में नहीं झांक सकते

नयी दिल्ली : पोर्न पर प्रतिबंध की चर्चा के बीच आज केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि वह पोर्न पर प्रतिबंध के खिलाफ है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आज अपना पक्ष रखते हुए कहा कि वह चाइल्ड पोर्नोग्राफी को छोड़कर  पोर्न पर बैन के खिलाफ है. सरकार की ओर से कहा गया कि पोर्न पर प्रतिबंध संभव नहीं है, यह निजता का हनन होगा. अगर कोई बंद कमरे में कुछ कर रहा है, तो उसपर प्रतिबंध संभव नहीं है.

पोर्न पर प्रतिबंध को लेकर विवाद तब शुरू हुआ, जब सरकार नेइंटरनेट की सेवा देने वाली 857 वेबसाइट पर प्रतिबंध का निर्देश दिया. लेकिन जब इस निर्देश का विरोध हुआ, तो सरकार पीछे हट गयी और मात्र चाइल्ड पोर्नोग्राफी को प्रतिबंधित किया. केंद्र सरकार की ओर से पोर्न साइट्स पर बैन लगाये जाने के बाद प्रदर्शन हुए थे. बढ़ते प्रदर्शन के बाद सरकार ने यूटर्न लेते हुए केवल साइर्ल्‍ड पोर्नोग्राफी और ब्‍लू फिल्‍मों को छोड़कर सरकार ने सभी साइट्स के खिलाफ बैन हटा लिया था. 

इंदौर के वकील कमलेश वासवानी ने सभी पोर्न साइट्स को बंद करने के लिए एक याचिका दायर की थी. उन्‍होंने याचिका में कहा कि जिस तरह से ड्रग्‍स पर पूरे देश में बैन है उसी तरह से पोर्नोग्राफी पर भी बैन होना चाहिए.

एटॉर्नी जनरल ने मुकल रोहतगी ने आज सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि अगर कोई अकेले में पोर्न देखता है तो उसपर बैन नहीं लगाया जा सकता है. यह निजाता का हनन मामला हो सकता है. रोहतगी ने कहा कि इंटरनेट के इस दौर में सभी पोर्न वेबसाइट्स पर बैन नहीं लगाया जा सकता है. उन्‍होंने कहा कि हम किसी के बेड रूम में नहीं झांक सकते हैं. हालांकि अगर पोर्न पर पूरी तरह से बैन की बात उठती है तो इसके लिए सभी के सामने खुली बहस होनी चाहिए.

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अब पूरे देश में एक लाख की जमानत और इजाजत के बिना पत्रकारों के जेल में प्रवेश पर पाबंदी

केंद्र सरकार ने विशेष अनुमति के बगैर पत्रकारों और फिल्म निर्माताओं के जेल में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी है। गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव कुमार आलोक ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पत्र लिखा है कि किसी भी पत्रकार, एनजीओ या कंपनी के कर्मचारी को शोध करने, डॉक्यूमेंटरी बनाने, लेख लिखने या साक्षात्कार लेने के लिए जेल में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।

आदेश में कहा गया है कि यदि कोई फिल्म निर्माता ऐसी डॉक्यूमेंटरी बनाना चाहता है, जिसका समाज पर सकारात्मक असर पड़ेगा, तो उसे प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है। पत्रकारों या किसी अन्य व्यक्ति पर भी यही बात लागू होगी। इस तरह से यदि किसी व्यक्ति को जेल में प्रवेश की इजाजत दी जाती है, तो उसे एक लाख रुपये की जमानत राशि जमा करानी होगी।

संयुक्त सचिव कुमार आलोक ने अपने पत्र में यह भी बताया है कि डॉक्यूमेंटरी बनाने के लिए सिर्फ हैंडी-कैमरा ले जाने की इजाजत होगी। मोबाइल फोन, कागज, किताब या कलम लेकर नहीं जाने दिया जाएगा। ब्रिटिश फिल्म निर्माता लेस्ली उडविन द्वारा तिहाड़ जेल जाकर दिल्ली दुष्कर्म कांड के गुनहगार का साक्षात्कार लेने और उस पर पैदा हुए विवाद के बाद सरकार ने काफी देर से ये कदम उठाया है।

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मीडिया ट्रायल रोकने के नाम पर मीडिया पर बैन?

मुंबई और महाराष्ट्र में मीडिया का काम कठिन होने वाला है। खासकर अपराध से जुड़ें मामलों में। महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट मे एक हलफनामा दायर कर बताया है कि आरोपी और पीड़ित की निजता बनाए रखने के लिए पुलिस को दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें आरोपी का नाम, उसकी तस्वीर और उससे जुड़ी कोई भी जानकारी मीडिया को देने के लिए मना किया गया है। यह हलफनामा बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के जवाब में दिया गया है। जनहित याचिका दायर करने वाले वकील राहुल ठाकुर के मुताबिक, किसी पर भी मामला दर्ज होते ही पुलिस उसकी पुरी जानकारी, तस्वीर मीडिया को दे देती है। नतीजा ये होता है कि दोष साबित होने के पहले ही वह शख्स अपराधी मान लिया जाता है, जो अन्याय है।

राज्य सरकार के हलफनामे में 15 दिशा-निर्देश दिए गए हैं, जिसमें आरोपी के साथ पीड़ित और उसके परिवार की जानकारी देने पर भी रोक लगाई गई है। इसके साथ ही आरोपी का इकबालिया बयान, उसके पास से जब्त हथियार और दूसरे सामानों की तस्वीर भी मीडिया को नहीं देने के लिए कहा गया है। और तो और हत्या के मामले में मृतक की तस्वीर भी मीडिया को देने पर रोक लगाई गई है। इसके मुताबिक, ऐसा तब तक करना है जब तक उस मामले में आरोप पत्र दायर न हो जाए और सभी आरोपी पकड़ न लिए जाएं।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि कहीं ये मीडिया ट्रायल के नाम पर मीडिया पर पाबंदी की कोशिश तो नहीं? वरिष्ठ पत्रकार जतीन देसाई का कहना है कि इस तरह की पाबंदी पारदर्शिता खत्म करती है। 1993 में हुए मुंबई सीरियल बम धमाकों का हवाला देते हुए जतिन देसाई पूछते हैं कि उस मामले में तो अब भी कई आरोपी फरार हैं तो क्या हम उसकी रिपोर्टिंग ही न करें? देसाई के मुताबिक, इस तरह की पाबंदी के पहले सरकार मीडिया का पक्ष भी जान लेती तो अच्छा होता।

आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने तो इसे मीडिया का गला घोंटने की कोशिश करार दिया है। गलगली का कहना है आरोपियों को बेनकाब करने से उनमें भय पैदा होता है और अपराध पर रोक लगती है और मीडिया तभी खबर चलाती है जब पुलिस मामला दर्ज करती या फिर किसी को गिरफ्तार करती है। गलगली का सवाल है पुलिस गलत आदमी को गिरफ्तार ही क्यों करती है? जबकि पूर्व आईपीएस सुधाकर सुराडकर का कहना है कि जब हम हक की बात करते हैं तो फर्ज भी समझना होगा। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों मे इस तरहं की पाबंदी जरूरी है, लेकिन सभी मामलों में नहीं।

खास बात है कि मीडिया ही नहीं कई पुलिस वाले भी इस परिपत्रक को पुरी तरह से ठीक नहीं मानते। उनका कहना है कि हत्या के कई मामलों में मृतक की शिनाख्त ही मीडिया की वजह से हो पाती है। बिना शिनाख्त के हत्या की गुत्थी सुलझाई नहीं जा सकती। सवाल इस बात पर भी उठ रहा है कि अगर रोक लगानी है तो दोष साबित होने तक क्यों नहीं? सिर्फ आरोप पत्र दायर होने तक ही क्यों? उसके बाद भी तो कई आरोपी छूट जाते हैं। तो क्या तब उसके साथ अन्याय नहीं होगा? बहरहाल, रोक मीडिया को कुछ खास जानकारी देने पर लगी है। मीडिया में छापने पर नहीं इसलिए इसे मीडिया पर पाबंदी तो नहीं कहेंगे, लेकिन ये मीडिया को काफी हद तक सूचना देने से रोकने की कोशिश जरूर है।

यह भी सच है कि आरोपी और पीड़ित के अधिकार का ख्याल रखना चाहिए, लेकिन साथ में ये देखना भी जरूरी है कि जांच में पारदर्शिता बनी रहे वर्ना रसूखदार लोग पुलिस से मिलकर मामले को रफादफा करने से बाज नही आएंगे। आखिर कई ऐसे मामले हैं, जो मीडिया की वजह से ही अंजाम तक पहुंच पाए हैं। इसलिए मीडिया जैसा पहरेदार भी जरूरी है।

एनडीटीवी डाट काम पर प्रकाशित Sunil Singh की रिपोर्ट.

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इबलीस की शैतानी ताकत के खिलाफ एकजुट हों आध्यात्मिकतावादी

केरल के बाद अब दिल्ली में भी मैगी की बिक्री को पंद्रह दिन के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। उधर सेना ने भी अपने डिपार्टमेंटल स्टोरों से मैगी की बिक्री पर रोक लगा दी है। मैगी को लेकर जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है। इसकी शुरूआत उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद से हुई जहां मैगी के नमूने प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजे गए थे जिसमें यह रिपोर्ट आई कि मैगी में जस्ते की मात्रा सुरक्षा मानकों से काफी ज्यादा है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में और साथ ही दूसरे राज्यों में भी ताबड़तोड़ मैगी के नमूनों का परीक्षण कराया गया। लगभग सभी जगह अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार मैगी के नूडल्स को खाना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद माना गया है। हालांकि बंगला देश ने मैगी को क्लीन चिट दे दी है। 

बहरहाल मैगी विवाद को लेकर एक बात सामने आई है कि आज प्रोपोगंडा की मशीनरी इतनी ताकतवर हो गई है कि समाज ने अपने विवेक पर ताला लगाकर उसकी कुंजी जैसे समुद्र में फेक€ डाली है जिसकी वजह से संचार और प्रचार माध्यम जिसे फैशन के रूप में स्थापित कर दें उसका अंधानुकरण होना अनिवार्य है। यहां तक कि खानपान के मामले में भी एहतियात नहीं बरता जाता। इस भेड़चाल के चलते खास तौर से भारतीय समाज को व्यापक नुकसान हो रहा है। बिगड़ते सिस्टम का मैगी विवाद तो केवल एक सिरा है लेकिन संपूर्णता में विचार करें तो इस अनर्थ की व्यापकता का कोई छोर नहीं है।

मानवीय विवेक को पंगु करने वाले प्रोपोगंडा तंत्र के पीछे मुनाफे की लूट करने वाली बाजार व्यवस्था है। बाजार का सबसे बड़ा दुश्मन संस्कृति है। इस कारण संस्कृति का निर्माण खानपान, पहनावे सहित जिन घटकों से मुख्य रूप से होता है बाजार उन्हें सबसे पहले अपने शैतानी रंग से संक्रमित करता है। दरअसल उच्छृंखलता एक तरह की उन्मुक्तता ही है लेकिन दोनों के बीच काफी बड़ा फर्क भी है। बुनियादी तौर पर जंगलीपन के मायने है आदिम उच्छृंखलता या उन्मुक्तता। आदमी जब इस जंगलीपन से संस्कृति के जरिए आगे बढ़ा तभी उसने सभ्यता के ऊंचे सोपानों पर कदम रख पाया। कहने की जरूरत नहीं है कि संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया आदमी द्वारा अपने व्यवहार, लिप्सा आदि को संयमित करने की साधना के बीच शुरू हुई। दूसरी ओर बाजार के विस्तार के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट किसी भी तरह का संयम है इसलिए गौरव के प्रतिमान के रूप में सदियों से स्थापित संस्कृति को विगलित करके बहा देना बाजार के सैलाब का अभीष्ट भी है। सभी जगह खानपान वहां की जलवायु प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोज्य संसाधनों के आधार पर अस्तित्व में आया है। परंपरागत खानपान न केवल निरापद है बल्कि वह अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य संवद्र्धन के लिए भी अनुकूल है लेकिन यह बाजार का कमाल है कि जब वह विवेक का अपहरण कर लेता है तो बाजार फैशन के आकर्षण में लपेट कर ऐसे खानपान को दूसरे समाजों पर थोप देता है जो उसके लिए तो ज्यादा से ज्यादा मुनाफादेह हैं लेकिन हो सकता है कि एक जगह की अच्छी खाद्य सामग्री दूसरी जगह जीवन पर विपरीत प्रभाव डालने वाली बन जाए। कभी-कभी अपरिचित खाद्य सामग्री को इसलिए थोपा जाता है कि स्वाद में वह बहुत प्रीतिकर लगे लेकिन इसकी आड़ में उसमें बहुत सस्ते घटिया सामान की मिलावट करने की गुंजायश रहे जिससे उसे कई गुना मुनाफा बटोरने का हथियार बनाया जा सके। मैगी ही नहीं जंक फूड भी बहुत हानिकारक है। खुद विकसित देशों में इन पर प्रतिबंध लगता जा रहा है लेकिन यहां के अभिभावक अपने बच्चों को आधुनिक बनाने के लिए उन्हें जंक फूड का अभ्यस्त बनाना अनिवार्य समझने लगे हैं। बाबा रामदेव ने कुछ वर्ष पहले साफ्ट ड्रिंक के खिलाफ सशक्त अभियान चलाया था तब पहली बार लोगों ने आज के समय में खानपान में अपने विवेक के प्रयोग की जरूरत महसूस की थी। बाबा रामदेव के कारण कोल्ड ड्रिंक बेचने वाली कंपनियां इतनी बुरी तरह हिल गई थीं कि बाबा की हत्या तक का षड्यंत्र किया जाने लगा था। बाद में बाबा राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार होकर अपने रास्ते से भटक गए और जिसकी वजह से आज फिर कोल्ड ड्रिंक कंपनियों का मोहपाश सशक्त होने लगा है। बाबा रामदेव के जोर के समय लोग कोल्ड ड्रिंक के विकल्प में फिर से अपने परंपरागत पेय यानी मट्ठे की तरफ मुड़ गए थे जो वास्तविक शीतलता प्रदान करने के साथ-साथ सेहतमंद भी है लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि मट्ठा को अपनाने में अब नई पीढ़ी में पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया। यही बात पहनावे में भी है। स्त्री स्वातंत्रय के नारे को आड़ बनाकर वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से घातक पहनावे को बाजार भारतीय समाज पर थोप रहा है। खेल के क्षेत्र में क्रिकेट के प्रति उन्माद लोगों के उसके प्रति स्वाभाविक प्रेम का नतीजा नहीं है। बाजार ने क्रिकेट को एक दैवीय खेल के रूप में गढ़ा है जबकि जलवायु के हिसाब से भारत जैसे देश के लिए बेहद प्रतिकूल होने से यह खेल पूरी तरह से अमान्य होना चाहिए। कोई देश किसी खेल का चुनाव अपने यहां के लोगों के शारीरिक सौष्ठव के विकास के लिए करता है। जैसे चीन और सोवियत संघ में जिमनास्ट को दिया जाने वाला प्रोत्साहन लेकिन बाजार की भेड़चाल के पीछे चलने के लिए अभिशप्त भारत खेल के मामले में अपने गलत फैसले की वजह से जन स्वास्थ्य के लिए मुफीद पहलवानी, कबड्डी, हाकी जैसे परंपरागत खेलों का परित्याग कर चुका है। क्रिकेट के समानांतर असली खेल सट्टे का चलता है। यह दिन पर दिन इतना जोर पकड़ता जा रहा है कि आज जब आईपीएल चलता है तो दूरदराज के गांव तक में सट्टेबाजों के यहां लाखों रुपए की बुकिंग करा दी जाती है। सट्टा यानी जुए का दूसरा रूप और जुआ कितना अनर्थकारी है यह भारत के लोगों के अलावा कौन जानता है। दुनिया में पहला साम्राज्य भारत में हस्तिनापुर का बना था और यह पूरा साम्राज्य जुए की वजह से हुए महाभारत की भेंट चढ़ गया जिसमें सारे तत्कालीन महारथी योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए। फिर भी भारतीय इस खतरे को लेकर सावधान नहीं हैं। यह आश्चर्य का विषय है। इस तरह से कई क्षेत्रों में बाजार के द्वारा की जाने वाली चोट के उदाहरण गिनाए जा सकते हैं जिनका मुख्य लक्ष्य सांस्कृतिक तानेबाने को कमजोर करना यानी नैतिक रूप से समाज को पथ भ्रष्ट करके कुछ सोफिस्टीकेटिड ढंग से आदमी को जंगलीपन के युग में वापस लाना है।

मैगी को लेकर कुछ फिल्मी हस्तियों के खिलाफ भी मुकदमे कायम हुए हैं जिनमें मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं जिनको उनके प्रशंसक उनके नाम के मंदिर बनवाकर भगवान तक का दर्जा दे चुके हैं। क्या श्री अमिताभ बच्चन की अभिनय कला सचमुच ऐसी है कि वे बालीवुड में अभिनय के बेताज बादशाह के रूप में माने जाने वाले दिलीप कुमार, संजीव कुमार और नाना पाटेकर के ही मुकाबले बीस हों। इस प्रश्न का उत्तर सही तरीके से तभी दिया जा सकता है जब कि समाज में लोगों का विवेक जाग्रत हो। अमिताभ बच्चन के पिता की नेहरू परिवार से नजदीकी के कारण अगर इंदिरा गांधी के समय चौदह फिल्में पिट जाने के बावजूद भी उन्हें पीएमओ के दबाव से बार-बार अवसर न मिले होते तो शायद वे हीरो बनने का सपना छोड़कर शुरू में ही भाग खड़े होते। उनमें राजेश खन्ना की तरह वो कुदरती दिलकश अंदाज नहीं था जिसकी वजह से लोग उनके दीवाने होते। सही बात यह है कि उनके सुपर स्टार बनने में मुख्य कारक उनके व्यक्तित्व का आकर्षण या अभिनय न होकर उनके बालसखा राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सत्ता के शिखर पर उनके पैर मजबूती से जमे होने का आभास था। वे कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों तक को चपरासी की तरह ट्रीट करते थे और उनकी यह सुपर हस्ती मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों में उन्हें सुपर स्टार के रूप में देखने की भावना का कारण बनी। व्यक्तिगत रूप से भी अमिताभ बच्चन सुनील दत्त तो छोडि़ए शत्रुघन सिन्हा से भी बेहतर नहीं हैं। जब वे इलाहाबाद के सांसद थे तो उनसे मिलने गए उनके पिता के साथी प्रोफेसरों को उनका जो अपमानजनक व्यवहार झेलना पड़ा था उसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने फिर उनसे कभी भेंट न करने की प्रतिज्ञा कर ली थी। मीडिया की तत्कालीन रिपोर्टें इसकी गवाह हैं। एबीसीएल घोटाले का कलंक भी उन पर है जिसमें हीरो बनने के शौक में देश के करोड़ों नौजवान उनकी ठगी का शिकार हुए थे और आज तक हीरो बनने के लिए उनसे जमा कराए गए ड्राफ्ट का पैसा वापस करने का बड़प्पन अमिताभ बच्चन ने नहीं दिखाया है। बीपीएल के साथ विज्ञापन का पच्चीस करोड़ रुपए का करार करने के बाद उन्होंने देश में इनकम टैक्स भरने से निजात पाने के लिए अमेरिका की ग्रीन कार्ड नागरिकता स्वीकार कर ली थी। यह भी उनके व्यक्तित्व के घटियापन का एक नमूना रहा। जिन सोनिया गांधी का अमिताभ बच्चन ने भाई की हैसियत से कन्यादान लिया था उन्हें राजनीति के मैदान में न आने देकर भारत से सपरिवार पलायन कर जाने को मजबूर करने का ठेका भी उन्होंने मुलायम सिंह जैसे लोगों से ले रखा था। बाद में जब पोल खुली और उनके स्व. सुरेंद्र नाथ अवस्थी जैसे शिष्यों के खिलाफ कांग्रेस में कार्रवाई हुई तो अमिताभ बच्चन अपनी धर्म बहन के खिलाफ खुलेआम हमलावर होने से नहीं चूके। बाराबंकी के उनके जमीनी कागज तैयार कराने संबंधी घोटाले से भी सब परिचित हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में जब उन्होंने यह स्यापा मीडिया में साया करवाया कि वे जब अस्पताल में भर्ती थे तब उन्हें सोनिया गांधी द्वारा निर्देशित सरकार ने आयकर का नोटिस भिजवाया। इसके बाद आयकर बोर्ड के अध्यक्ष का स्पष्टीकरण आया कि उनके अस्पताल में भर्ती होने के कई महीने पहले करापवंचन के बेहद तथ्य परक संदेह की वजह से उन्हें नोटिस भेजा गया था जिसका उन्होंने जवाब देने की जहमत नहीं उठाई थी और जब वे अचानक बीमार हो गए तो लोगों की सहानुभूति लूटने के लिए आज बीमारी के समय सोनिया गांधी द्वारा नोटिस भिजवाने का सफेद झूठ उन्होंने गढ़ डाला। अमिताभ बच्चन इसका खंडन नहीं कर पाए थे। अमिताभ बच्चन अपनी अभियन कला में निखार के लिए जिनकी कद्रदानी को सबसे अमूल्य मानते हैं वे पहलवान से शिखर के राजनेता बने मुलायम सिंह हैं जिन्होंने शायद तब तक कोई फिल्म नहीं देखी होग जब तक कि वे एक दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन चुके होंगे। सर्वश्रेष्ठ फिल्म मर्मज्ञ के रूप में मुलायम सिंह उनके प्रति कृतज्ञ हों या न हों लेकिन फिल्म जगत की बारीकियां जानने वाले जरूर उनकी इस दरियादिली पर निसार हो गए होंगे। जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान वे एक स्टंट शूट के दौरान घायल हो गए थे तब उनके लिए दुआ करने वालों में सबसे ज्यादा देश भर के मुसलमान थे और मुस्लिम दर्शकों की दीवानगी की वजह से ही उन्हें सुपर स्टार का तमगा हासिल हो सका था। इसी कारण वे आगे की फिल्मों में मुस्लिम दर्शकों की संवेदनाओं को छूने वाले दृश्य डलवाना कभी नहीं भूलते थे लेकिन मोदी के पिट्ठू बनकर अपने व्यवसायिक फायदे के लिए उन्होंने मुस्लिम जज्बातों के साथ खिलवाड़ करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। अमिताभ बच्चन की विश्वसनीयता का आलम यह है कि उन्होंने मैगी तो हो सकता है खाई हो लेकिन न तो उन्होंने कभी नवरत्न तेल होगा और न वे लगाएंगे और इसी तरीके से कायमचूर्ण तो उन्होंने देखा तक न होगा लेकिन दोनों का वे विज्ञापन कर रहे हैं। भले ही उनकी साख के कारण प्रेरित होने वाले उपयोग कर्ता इनका उपयोग करके बर्बाद हो जाएं। अरुण शौरी ने बाबा साहब अंबेडकर जैसी दिव्य आत्मा को झूठा भगवान ठहराने की कोशिश की थी जिसकी सजा अपनी ही सरकार में कोई पद न मिलने से सामने रही उनकी कुंठा से मालूम हो रही है लेकिन अगर कोई नकली भगवान है तो यह अमिताभ बच्चन है। आज जब उनके खिलाफ मुजफ्फरपुर बिहार की अदालत ने माधुरी दीक्षित और प्रीति जिंटा के साथ मैगी का विज्ञापन करने के कारण न केवल मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं बल्कि यह लिखा है कि अगर जरूरत पड़े तो उन्हें जेल भी भेज दिया जाए तो यह सवाल उठाने का इस समय सही वक्त है कि जिसका चरित्र व आचरण शुरू से ही संदिग्ध था उसे लोगों ने भगवान मान कैसे लिया था। यह करिश्मा है इबलीस का अवतार उस प्रोपोगंडा मशीनरी का जो उन कंपनियों की बंधक है जिनके अमिताभ बच्चन ब्रांड एंबेसडर हैं। चूंकि इन कंपनियों के विज्ञापन से ही मीडिया की रोजीरोटी चलती है इसलिए अगर यह कहेंगे कि अमिताभ बच्चन को सिद्धिविनायक मंदिर जाते हुए रात तीन बजे कवर करना है तो रिपोर्टरों का जाना मजबूरी है क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी बचानी है और मालिक का आदेश है और यह काम उनको अमिताभ बच्चन के गार्डों से लातें खाते हुए भी करना पड़ता है। ऐसे एंद्रजालिक भगवान जहर का भी विज्ञापन कर सकते हैं और लोग विश्वास कर लेंगे क्योंकि प्रोपोगंडा मशीनरी के सम्मोहक प्रभाव की वजह से उनकी विवेक शक्ति जवाब दे चुकी है। विवेक शक्ति के जवाब देने की मुख्य वजह यह भी है कि जातिगत पूर्वाग्रहों की वजह से उन्होंने कुदरती तौर पर प्राप्त न्याय भावना जिसे प्राकृतिक न्याय कहा जाता है को अपने आप में समाप्त कर लिया है। इस कारण यह एक कठिन समय है। इस समय जरूरत तो तालिबान जैसी जिद की है जो अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी ताकतों की हर बात को नकारे बिना यह सोचे कि इससे कुछ फायदा भी है या नहीं। तालिबान की यह जिद बेहद रचनात्मक बन गई है क्योंकि साम्राज्यवादी ताकतों का कोई नैतिक उद्देश्य नहीं है। तात्कालिक तौर पर किसी नैतिक उद्देश्य की पूर्ति हो भी रही हो तो साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा पोषित तंत्र की जरूरत अंततोगत्वा आदमी के जंगलीपन को वापस लाना है जिसे किसी भी आध्यात्मिक सांस्कृतिक समाज को स्वीकार नहीं करना चाहिए।

यहां मैं कोई राजनीतिक पार्टी से नहीं चाहता। दक्षिणपंथी ताकतें जो कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रवक्ता हैं मैं चाहता हूं कि वे और तालिबानी ताकतें दोनों साहचर्य के स्वाभाविक रूप से उपस्थित बिंदुओं को समझें। नारा देने से सांस्कृतिक राष्ट्र्रवाद नहीं होता उसके लिए क्रिया और प्रक्रियाएं तय करनी होती हैं। वे क्या हो सकती हैं यह आलेख मैगी से शुरू हुआ था यानी थोपे हुए ऐसे खानपान जिसमें औचित्य का विचार न किया गया हो। उसके प्रतिकार न करने से हुए हानि के चलते। हमारा अपना वजूद है कोई हमारे ऊपर किसी चीज को कैसे थोप सकता है। जिस तरह से पंजाबियों ने अमेरिका के सेविन स्टार होटल की प्रमुख डिसों में मक्के की रोटी, चने का साग स्थापित करके देश का गौरव बढ़ाया वैसे ही उत्तर प्रदेश के लोगों को भी कहना होगा कि हमें मैगी, मोमोज, पिज्जा, बर्गर, ढोकला नहीं चाहिए क्योंकि हमारी बिड़हीं, टपका, चीला, मिथौरी, आम पापड़ जैसे व्यंजन दुनिया की किसी भी डिस से ज्यादा बेहतर हैं और हमें यही चाहिए। हमें कहना होगा कि हमारे परंपरागत परिधान हिंदुओं का कुर्ता पाजामा या धोती कुर्ता और मुसलमानों की पठानी ड्रेस दुनिया में सबसे सौंदर्यपूर्ण है। हमें कहना होगा कि भारतीय मुसलमानों और कन्याभोज करने वाले भारतीय हिंदुओं के लिए नाबालिग लड़कियों की अस्मिता की रक्षा से बड़ा कोई ईश्वरीय कर्तव्य नहीं है इसलिए हम मांगलिक समारोह में कन्याओं से साफ्ट ड्रिंक सहित कोई भी चीज सर्व कराने की हरकत गवारा नहीं करेंगे। हमें बिना धार्मिक भेदभाव के भारतीय उप महाद्वीप के धर्म के पार के कुदरती भाईचारे के नाते यह देखना होगा कि कहीं मलाला साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली लड़की तो नहीं है जो ऊपरी तौर से तो स्त्री सशक्तिकरण की प्रतीक लग रही हो लेकिन असल में बाजार की स्त्री देह को सामान बेचने का हथियार समझने वाली मानसिकता की टूल हो। साम्राज्यवादी ताकतों ने संस्कृतिवादियों को बहुत लड़ा लिया अब इसका अंत हो और दुनिया की सारी आध्यात्मिक और संस्कृतिवादी ताकतें एक जुट हों।

केपी सिंह से संपर्क : bebakvichar2012@gmail.com

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आईआईटी मद्रास के छात्रों के ग्रुप पर पाबंदी लगाना फासीवादी कार्रवाई : ‘दिशा’

हाल ही में आई.आई.टी छात्रों द्वारा चलाये जा रहे अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल पर आई.आई.टी मद्रास के प्रबंधन द्वारा लगाया गया प्रतिबन्ध विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा है। दिशा छात्र संगठन ने इस प्रतिबन्ध की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। 

प्रधान मंत्री के खि़लाफ़ नफ़रत बढ़काने के कोशिश करने के आरोप में आई.आई.टी के प्रबंधन ने यह प्रतिबन्ध लगाया है। एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा एम.एच.आर.डी को लिखी गयी एक चिट्ठी के बाद यह कदम उठाया गया है। अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल द्वारा वितरित किये गए जिस पर्चे का हवाला देते हुए यह बताया जा रहा है कि छात्रों का यह ग्रुप प्रधान मंत्री के खि़लाफ़ नफ़रत को हवा दे रहा है अगर एक बार उस पर्चे की विषय वस्तु पढ़ ली जाए तो उससे साफ हो जाएगा कि यह प्रतिबन्ध नफरत फैलाने के लिए नहीं बल्कि इस सरकार की आर्थिक-राजनितिक नीतियों के बारे में आलोचना करने के लिए लगाया गया है। 

सबसे ज़रूरी और अहम बात यह है कि एक लोकतंत्र में आलोचना, वाद विवाद और अपनी बात कहने का हक़ सबको इस देश का संविधान देता है, तो फिर क्यों इतनी बेशर्मी के साथ उन विद्यार्थियों से यह हक़ छिना जा रहा है। सिर्फ इसिलए क्योंकि सरकार नहीं चाहती की देश  की युवा पीढ़ी उनके द्वारा जारी किये फतवों (नीतियों) की आलोचना करे। यहीं है वह अच्छे दिन जिनका वादा कर यह पार्टी सत्ता में आई थी। वोल्टेयर ने बिलकुल ठीक कहा था कि यह जानने के लिए की तुम पर कौन राज करता इसका पता लगा लो की तुम किसकी आलोचना नहीं कर सकते। किस लिहाज़ से किसी सरकार की नीतियों के बारे में वाद विवाद करना या आलोचना करना उस सरकार के प्रधान मंत्री के खि़लाफ़ नफ़रत बढ़ाना है, यह तो केवल सत्ता में बैठे लोग ही समझ सकते हैं। 

ऐसे प्रतिबन्ध एक तानाशाह द्वारा अपने खि़लाफ़ हर उस आवाज को चुप कराने की कोशिश है जो उनकी राजनीति पर सवाल खड़ा करती है। यह प्रतिबन्ध कोई पहला नहीं है। मोदी सरकार छात्रों और आम नागरिकों से उनके सांविधानिक हकों को किसी न किसी नाम पर छिनती रही है। अगर सरकार को नफ़रत फैलाने वालों से इतना परहेज़ है तो पहले वो साध्वी निरंजन ज्योति जैसे लोगों के खि़लाफ़ कोई कदम क्यों नहीं उठाती। भगवा ब्रिगेड जो कभी लव जिहाद, कभी गौ मांस पर प्रतिबन्ध, या घर वापसी की मुहीम के ज़रिये देश के लोगों के बीच नफ़रत के बीज बो रही है उनके खि़लाफ कोई कार्यवाही करने से क्यों कतराती हैं। क्यों वह आर.एस.एस  जो अपनी शाखाओं में खुलेआम साम्प्रदायिक ज़हर उगलता है, उस पर प्रतिबन्ध नहीं लगाती। 

बात साफ है ‘जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे‘ की तर्ज पर यह सरकार अब देश की जनता और युवाओं को यह चेतावनी देना चाहती है कि अगर उनके खि़लाफ कुछ भी कहा तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। इस सरकार का असली फ़ासीवादी चेहरा सामने आ रहा है। और फासीवाद का मुहतोड़ जवाब देने के लिए इस देश के सभी युवाओं को एक साथ मिलकर अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा। दिशा छात्र संगठन की वारुणी ने कहा ‘‘दिशा छात्र संगठन इस प्रतिबन्ध की कड़ी निंदा करता है और देश के तमाम न्यायप्रिय युवाओं से यह अपील करता है कि इस प्रतिबन्ध के खि़लाफ़ आवाज उठायें, क्योंकि साफ ज़ाहिर है कि यह सरकार तर्क और बहस से कितना डरती है। हमे अपने संवैधानिक हक़ों को इतनी आसानी से इन्हे कुचलने नहीं देंगे।‘‘

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

Ban on IIT madras student group : Death of democracy and dawn of the ‘aache din’

The recent ban by the authorities of IIT madras on the Ambedkar periyar study circle run by the students of  IIT-madras is a slap in the face of the democratic values so ardently professed by the largest democracy in the world. Disha Student organization condemns the ban in the strongest words possible. The reason putforth by the authorities of IIT for the ban is that the group is using the platform to spread ‘hatred’ against the Prime Minister. This ban took place after an anonymous letter to MHRD claimed that the pamphlets being circulated by the student group incite hatred against the PM. But if one looks at the content of the pamphlets in question here it would become clear why the group was banned. It was not inciting hatred by inviting a healthy discussion on the policies being implemented by the Government. The right to dissent and criticism are an integral part of a democracy and in no way criticising a government’s policies tantamounts to spreading hatred. Such bans are a threat to the freedom of expression and the right to free speech. This is not the first incident where there has been ban on students group or students being arrested on similar grounds. The farcicial democracy that we live in will only provide you space to speak up untill you are not questioning what is right and what is wrong as voltaire had said to learn who rules over you simply find out whom you are not allowed to criticise. With the new regime in power with its hindutva agenda at spearhead there are too many holy cows that we are supposed to not talk about. The message being given to the youth of the rest of the country is that keep quiet or else you bear consequences. We the students of this country have every right to debate, discuss and dissent on matters of socio-political importance, taking away that very right from us is implementing a dictatorial regime. This government is leaving no stone unturned to ensure that freedom  of expression is curbed if the point being expressed is not to their liking. Why is the governmnet not taking any action against Sadvi Niranjan jyoti for inciting hatred, why is the government so tolerant against the Saffron brigades attempt to polarize the people of this country in the name of Ghar wapasi, beef ban, love jihad. Why is the government not banning the R.S.S which in its shakas openly spews the venom of communal hatred.These are the real issues that Government needs to be addresing rather than jumping around and telling people who are asking pertinent questions to keep silent. These are the ‘acche din’ that were promised to us. The real facsict character of this regime is coming out in the open and it is not long when the mask would slip. The rise of such facsist powers is resistible but we the students and youth have to join our hands and work towards a society where free speech is not threatened. These are the real issues that Government needs to be addresing rather than jumping around and telling people who are asking pertinent questions to keep silent. These are the ‘acche din’ that were promised to us. Varuni from Disha Student organization said “We strongly condemn this ban and urge every conscientitous citizen of this country to raise their voice against this ban.”

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भास्कर, हिंदुस्तान, जागरण समेत कई अखबारों में भड़ास पर पाबंदी

खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का नेता बताने वाले और इस हक के लिए लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले मीडिया समूह अब उन छोटे व नए मीडिया माध्यमों की आवाज अपने यहां दबाने में लगे हैं जो बड़े बड़े मीडिया हाउसों की पोल खोलते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक दैनिक भास्कर और दैनिक हिंदुस्तान अखबार के दफ्तरों में भड़ास4मीडिया डॉट कॉम को ब्लाक कर दिया गया है. इन संस्थानों के प्रबंधकों ने ऐसा फैसला मालिकों के निर्देश के बाद लिया है. मालिकों ने मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर भड़ास4मीडिया द्वारा चलाए गए अभियान और आम मीडियाकर्मियों को उनका हक दिलाने से संबंधित मुहिम से नाराज होकर इस पोर्टल को अपने संस्थान के अंदर बंद कराने का आदेश दिया ताकि उनके यहां काम करने वाला कोई कर्मचारी इस पोर्टल को पढ़कर सुप्रीम कोर्ट न चला जाए.

 

मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर भास्कर प्रबंधन किस तरह घबराहट में है, इसका ताजा उदाहरण ये है कि पूरे मध्य प्रदेश सहित देश भर के भास्कर के सेंटरों पर भडास4मीडिया की साइट ब्लाक कर दी गई है. यह साइट कर्मचारियों में जागरूकता फैलाने में अहम रोल अदा कर रही है. इस कारण कई कर्मचारियों ने हिम्मत दिखाई और अपने हक के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इससे मालिकों की नींद हराम हो गई. अब प्रबंधन के पालतू सफेद हाथी कोर्ट गए कर्मचा‍रियों को तरह तरह से धमकाने में लगे हुए हैं. जो इस उम्‍मीद से चुप बैठे थे कि वे प्रबंधन के चहेते बन जाएंगे वे भी इन दिनों प्रताड़ना के दायरे में आ गए हैं. वैसे प्रताड़ना से डरने की जरूरत नहीं है क्‍योंकि इनका एक भी गलत कदम मालिकों को सुब्रत राय बना सकता है. अभी भी समय है. उठो जागो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष पथ पर चल पड़ो. सफलता सौ फीसदी आपके कदम चूमेगी.

सुप्रीम कोर्ट में 10 मार्च को हुई सुनवाई के बाद हिन्दुस्तान अख़बार में भड़ास4मीडिया को बंद कर दिया गया है ताकि कोई मजीठिया से संबंधित खबर न जान सके. प्रबन्धन के इस फैसले पर हंसी आती है. मोबाइल के ज़माने में भी हिन्दुस्तान का प्रबंधन ऐसी हरकत करेगा, ये कोई सोच भी नहीँ सकता. धनबाद के एक पत्रकार ने बताया कि अब वहां के कर्मचारी मोबाइल पर ही भड़ास पढ़ रहे हैं.

ज्ञात हो कि राजस्थान पत्रिका से लेकर कई अन्य दूसरे अखबार व न्यूज चैनल अपने अपने यहां भड़ास4मीडिया पर समय-समय पर पाबंदी लगाते आए हैं. खबरों और मीडिया के इन ठेकेदारों को लगता है कि वे अपने संस्थान में पाबंदी लगाकर अपने मीडियाकर्मियों को मीडिया से संबंधित सूचनाओं जानकारियों अधिकारों को जानने से वंचित कर देंगे लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि अब जमाना स्मार्ट फोन का है. इससे पहले हजारों मीडियाकर्मियों ने सिर्फ भड़ास पढ़ने के लिए अपने बचत के पैसे से लैपटाप खरीदा और घर से भड़ास पढ़ कर भड़ास को इनपुट भेजना शुरू कर दिया.

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बीबीसी ने बैन के बावजूद आज तड़के डॉक्युमेंटरी ‘इंडियाज़ डॉटर’ दिखा दिया…

Om Thanvi : तड़के बीबीसी ने डॉक्युमेंटरी ‘इंडियाज़ डॉटर’ दिखाई और सुबह से वह यू-ट्यूब, ट्विटर लिंक आदि के जरिए सामने है! अर्णब गोस्वामी, राजनाथ सिंह, माननीय सांसदगण, माननीय अदालत और दिल्ली पुलिस का शुक्रिया। आज के युग में बैन आगे से दिखाने के लिए लगाया कीजिए, न दिखाने के लिए नहीं – इतना तो टीवी पर उस अंगरेजी डॉक्युमेंटरी को लोग भी न देखते! और वह कलमुँहा ड्राइवर – पता नहीं फिल्म में कब आया और अपनी बकवास में अपनी ही मौत मर गया! उसके बयान (जिसमें ज्यादा समय विजुअल दूसरे ही चलते हैं) से उस रात के पाशविक कृत्य, अपराधियों की मानसिकता आदि को मुझे ज्यादा शिद्दत से समझने का मौका मिला। … इस पर चीखे अर्णब तुम सारी-सारी रात?

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पिशाच-वृत्ति के बलात्कारी ने जो-जो भद्दी बातें कहीं (कि बलात्कार के लड़कियां जिम्मेदार होती हैं, कि वे रात को घरों से बाहर निकलती ही क्यों हैं, कि वे आधुनिक कपड़े क्यों पहनती हैं आदि) वैसी बातें हमारे पुरुष-प्रधान पितृ-सत्ता वाले समाज में क्या आए दिन कथित भारतीयता और कथित नैतिकता के ठेकेदार बने लोग नहीं करते? एक अदद डॉक्युमेंटरी फिल्म के एक हिस्से में बलात्कारी की गलीज मानसिकता (फिल्म में स्त्री समाज को लेकर खाप मानसिकता वाले वकीलों और अन्य नागरिकों के कुत्सित ‘विचार’ भी हैं) को दिखाना पूरी संसद को आहत कर गया है, सरकार ने पूरी फिल्म ही रुकवा दी है – माननीय सांसदों और सरकार का यह तेवर आए दिन सामने वाले बयानों और आधुनिक कपड़ों आदि पर छींटाकशी या अन्य दुर्व्यवहार करने वाले दुष्ट समुदाय पर जाहिर क्यों नहीं होता?

Samar Anarya :  सिर्फ एक बात जो कोई नहीं कह रहा वह यह कि इस डाक्यूमेंट्री में मुकेश सिंह बार बार कह रहा है कि उसने बलात्कार नहीं किया, वह सिर्फ बस चला रहा था. बात गलत हो सकती है (कानूनी रूप से है, वह सजायाफ्ता है) पर उसके इंटरव्यू को आधार बना उसकी फांसी के लिए उन्माद खड़ा करने का जिम्मेदार कौन है? किसी को अपने खिलाफ गवाही देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, मुकेश सिंह को किसने किया? (याद रखियेगा कि प्रलोभन भी मजबूर करना है- शादी का झांसा देकर बनाया गया सम्बन्ध बलात्कार ही होता है. शर्मिंदा होइए कि ऐसे तमाम प्रगतिशील लोग भी इस डाक्यूमेंट्री में कैमरे के सामने खड़े होकर ज्ञान बाँट रहे हैं जो अब इस पर प्रतिबन्ध/स्थगन मांग रहे हैं. कितना आसान है अपने किये से मुकर जाना यह कह के कि “अगर मालूम होता कि यह डाक्यूमेंट्री ऐसा उन्माद खड़ा करने के लिए इस्तेमाल की जायेगी तो”…. आइये, मुकेश सिंहों को सड़क पर खड़ा कर उनकी खाल खींच लें, ठीक उस वक़्त जब माननीय सांसद योगी आदित्यनाथ की गरिमामयी उपस्थिति में लोग लाउडस्पीकर पर मुस्लिम औरतों की लाशों को कब्र से निकाल उनका बलात्कार करने का आह्वान कर रहे हों. [सरकारी प्रतिबंध अपनी जगह, बीबीसी ने न केवल कल ‘चैनल 4′ पर डाक्यूमेंट्री चला दी बल्कि अभी किसी ने यूट्यूब पर डाल भी दी है. (इंडिया’ज डॉटर’ नाम का चैनल है, आधिकारिक या किसी ने और पता नहीं).]

https://www.youtube.com/watch?v=wIbC1zida-8

Dilip C Mandal : बलात्कार के अभियुक्त मुकेश सिंह ने निर्भया कांड में ऐसा क्या कह दिया कि आपकी ‘महान’ संस्कृति खतरे में पड़ गई? पास के स्टेशन में या किसी बुक स्टोर में जाइए. गीता प्रेस गोरखपुर की स्त्रियों के लिए कर्तव्य शिक्षा टाइप कोई भी किताब उठाइए. मुकेश सिंह ही नहीं, उनके चाचा-ताऊ उनमें साक्षात विराजमान नजर आ जाएंगे. आप लकी है, अगर आपके घर में मर्द ऐसी ही बात नहीं करते. मुकेश सिंह तथाकथित महान, मगर वास्तव में पतनशील-मानवद्रोही सनातन संस्कृति का आदर्श, 24 कैरेट का प्रतिनिधि है.

Kumar Sauvir : माना, कि निर्भया-काण्‍ड के अभियुक्‍त ने जो भी किया वह मानवता के चेहरे पर एक वीभत्‍स और अमिट दाग है। लेकिन क्‍या आप किसी ऐसे शख्‍स को अपनी बात भी नहीं कहने और उसे सुनने का भी माद्दा खो चुके हैं। वह जघन्‍य-हत्‍यारा है, लेकिन अरे उसे सुनने की जहमत तो उठाइये कि आखिर उसका पक्ष क्‍या है। क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता है कि किसी अभियुक्‍त का पक्ष न सुनना न्‍याय के मौलिक सिद्धान्‍तों के खिलाफ है। Pramod Joshi जी ने एक जायज सवाल उठा दिया है। वे भी कहते हैं कि:- बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री पर भारतीय मीडिया की प्रतिक्रिया विस्मयकारी और आत्मघाती है। बिना देखे, बिना जाने विरोध। आप पाबंदियों का समर्थन कर रहे हैं? आप देखिये ना, कि पूरा संसद इस मामले पर एकजुट है कि इस अभियुक्‍त पर बनी डाक्‍यूमेंट्री पर हर कीमत पर पाबन्‍दी लगायी जाए। लेकिन बीबीसी ने ऐसी पाबंदी पर अपना सख्‍त विरोध जता दिया है। तो ऐसे में किसे कानून का विरोधी माना जाए और किसे समर्थक, अब यह सवाल तो हम सब को अपने गिरेहबान में झांकते हुए देना है। है कि नहीं ? सबसे ज्‍यादा शर्मनाक रवैया तो पत्रकार समुदाय का है, एक बार भी इन लोगों ने इस डाक्‍यूमेंट्री पर पाबंदी पर ऐतराज नहीं जताया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, दिलीप मंडल, कुमार सौवीर और सोशल एक्टिविस्ट अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

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केजरीवाल की राह पर चंद्रशेखर राव, मीडिया को बाहर निकाला, पत्रकारों का प्रदर्शन

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की राह पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री चलने लगे है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के निर्देशों को लागू करते हुए सचिवालय में मीडिया पर पाबंदी शुरू हो गई है. एक ओर मुख्यमंत्री कार्यालय वाले सी ब्लॉक से सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों को बाहर निकल जाने का आदेश सुनाकर अपमानित किया है तो वहीं दूसरी ओर पत्रकारों को ललचाने के लिए पत्रकार निधि के लिए दस करोड़ रुपये आवंटित किये गए. सरकार की इस नीति का तेलंगाना के पत्रकारों द्वारा जमकर विरोध किया जा रहा है. सरकार ने मीडिया पर नियंत्रण ना होने के दावे करते हुए ही चुपचाप प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया गया है. इस विषय पर सूचना-जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख द्वारा ये कहा जा रहा है कि मीडिया पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन मीडिया को स्वयं नियंत्रण पद्धति को अपनाना चाहिए।

तेलंगाना आंदोलन में अहम भूमिका निभानेवाली मीडिया वही नवगठित तेलंगाना के पुनर्निर्माण में भी विशेष भूमिका निभा रही मीडिया पर इस तरह की पाबंदी का तेलंगाना के पत्रकारों ने तीव्र विरोध करते हुए आंदोलन करने की चेतावनी दी है और अपना विरोध दर्ज कराते हुए सचिवालय के सामने प्रदर्शन भी किया। उधर इस पाबंदी को लेकर ये बात सामने आई है की कुछ मंत्रियो और अधिकारियो ने मुख्यमंत्री राव से शिकायत करते हुए कहा है की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि निरंतर सचिवालय आते रहने से कामकाज बाधित होने के साथ साथ सुरक्षा से जुड़े मामलो में भी परेशानिया आ रही है, जिसे देखते हुए सचिवालय में मीडिया पर रोक लगनी चाहिए। इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री द्वारा भी मंजूरी देने के समाचार है.सरकार के इस निर्णय के बाद पत्रकार सिर्फ मंत्रियो के संवाददाता सम्मलेन के दौरान ही सचिवालय में कदम रख पाएंगे।

मीडिया पर पाबंदी को लेकर मुख्यमंत्री के साथ हुई चर्चा में मंत्रियो ने जो कारण गिनाये है, उनमें कहा गया है कि कुछ अपरिपक्व पत्रकार निरंतर मंत्रियो की पेशियों में बने रहते हैं और कामकाज में बाधा पहुंचाते है. यही नहीं, कुछ तो काल्पनिक खबरें छापते हैं. इसलिए दिल्ली व कुछ अन्य राज्यों की तरह पत्रकारों को सिर्फ पत्रकार सम्मलेन के समय ही बुलाना चाहिए और बाकी समाचार उन्हें ईमेल या जनसम्पर्क विभाग के जरिये ही भेजा जाना चाहिए। साथ में ये भी गिनाया है कि सचिवालय आनेवालों में 20 न्यूज़ चैनल, 15 समाचार पत्र, छोटे समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों को मिलाकर तक़रीबन 200 लोग पत्रकार के तौर पर आनेवालों में शामिल हैं. इनमे से कौन वास्तविक है और कौन नहीं, यह भी पहचान पाना मुश्किल होने की बात अधिकारियों ने कही है. इस तरह इन कारणों को लेकर सरकार द्वारा मीडिया पर लगानेवाली पाबंदी के खिलाफ पत्रकारों ने विरोध के स्वर तेज कर दिए है, जिससे सरकार के सामने नया विवाद खड़ा होने की आशंका है.

सूर्य प्रकाश तिवाड़ी की रिपोर्ट.

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पत्रकारों द्वारा सचिवालय में घुसकर दलाली करने के धंधे को बंद करेंगे : गोपाल राय

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने राज्य सचिवालय में मीडिया के प्रवेश पर रोक लगा दी है और ‘आप’ नेता गोपाल राय ने पाबंदी को जायज ठहराया है. गोपाल राय ने मीडिया पर पाबंदी के बारे में कहा- ‘कुछ ऐसे पत्रकार हैं जो गलियारों में घुस कर दलाली करते थे. इनको अब दिक्कत हो रही है. दलाली के धंधे को सचिवालय में बंद करेंगे.’

उधर, उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि वे पहले जनता से बात करेंगे, काम करेंगे, आखिर में जब समय बचा तो मीडिया से बात करेंगे. इसे पाबंदी कहकर बदनाम करना ठीक नहीं है. उन्होंने कहा कि मीडिया पर कोई बैन नहीं है. सिसोदिया ने कहा- प्रतिदिन मैं उनसे बात कर रहा हूं लेकिन जनता से बात करने के बीच यदि मीडिया आता है तो यह गलत है.

मूल खबर…

कार्पोरेट और करप्ट मीडिया को केजरी ने सबक सिखाना शुरू किया, सचिवालय में प्रवेश पर रोक, सिसोदिया पीसी से उठे

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”मनीष सिसोदिया और आशुतोष खुद पत्रकार रहे हैं और अब वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोटना चाहते हैं”

दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (डीजेए) केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली सचिवालय में पत्रकारों के प्रवेश पर प्रतिबंध की कड़ी निंदा करता है और साथ ही दिल्ली के उप-राज्यपाल से मांग करता है कि वह प्रेस की आजादी को बचाने के लिए हस्तक्षेप करें और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को फौरन इस प्रतिबंध को हटाने का निर्देश दें। पिछली बार भी जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी थी तब भी केजरीवाल सरकार ने पत्रकारों के सचिवालय में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पत्रकारों के प्रबल विरोध और सचिवालय पर धरना प्रदर्शन के बाद यह प्रतिबंध हटा लिया गया था। इस बार भी पत्रकार इसके विरोध में मीडिया रूम में दो दिन से डटे हुए हैं।

डीजेए आंदोलनकारी पत्रकारों के साथ है और उनकी मांगों का समर्थन करता है। एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज वर्मा ने केजरीवाल सरकार से सचिवालय में मीडियाकर्मियों के प्रवेश पर से फौरन प्रतिबंध हटाने की मांग करते हुए कहा कि दुख इस बात का है कि जिस मीडिया ने अरविंद केजरीवाल को अरविंद केजरीवाल बनाया, मुख्यमंत्री बनते ही वही अब मीडिया से न केवल दूरी बनाने लगे हैं बल्कि उसके प्रवेश पर प्रतिबंध तक लगा दिया है। तब और हैरानी होती है जब आम आदमी पार्टी के दो बड़े नेता, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और आशुतोष खुद पत्रकार रहे हैं और अब वही संविधान द्वारा आम आदमी को दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गला घोटना चाहते हैं।

मनोज वर्मा ने कहा कि केजरीवाल सरकार के लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के घला घोटने के फैसले से साफ पता चलता है कि वह लोकतंत्र और उसके बुनियादी वसूलों में विश्वास नहीं करती और उसका रवैया तानाशाही का है। एसोसिएशन के पदाधिकारी इस बारे में जल्दी ही दिल्ली के उप राज्यपाल, केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री और प्रेस काउंसिल के चेयरमैन से मिल कर इस प्रतिबंध को हटाने की मांग करेंगे। अगर जल्द ही प्रतिबंध नहीं हटाया गया तो डीजेए सड़कों पर उतर कर केजरीवाल सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाएगा।

भवदीय
अनिल पांडेय
महासिचव
डीजेए

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दैनिक भास्कर ने कुछ संस्करणों में ‘जेड प्लस’ फिल्म के लेखक रामकुमार सिंह का नाम रिव्यू से हटाया

Ajay Brahmatmaj : जयप्रकाश चौकसे के कॉलम ‘पर्दे के पीछे’ से दैनिक भास्‍कर के जयपुर समेत कुछ संस्‍करणों में फिल्म के लेखक Ramkumar Singh का नाम हटा दिया गया। पत्रकार बिरादरी की तुच्‍छता है यह। यह शर्मनाक और दुखद है। फिलहाल जयप्रकास चौकसे को पढ़ें और कल फिल्‍म देखने का फैसला करें। शेयर करें और दूसरों को पढ़ाएं।

मुंबई के वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज के फेसबुक वॉल से.

Vineet Kumar : दैनिक भास्कर ने अपने कुछ संस्करण में जेड प्लस के लेखक रामकुमार सिंह का नाम इसलिये हटा दिया क्योंकि वो उस अखबार के लिये काम करते हैं जो भास्कर का कॉम्पिटिटर है… मतलब भास्कर के पाठक को जानने का अधिकार ही नहीं है कि जेड प्लस फ़िल्म के लेखक कौन हैं? तो ऐसे चलता है आपके लोकतंत्र के चौथे खम्भे का धंधा. अब सोचिये बड़े खेलों में क्या-क्या हटाया जाता होगा?

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हमने जेड प्लस फ़िल्म देख ली लेकिन आप हम जैसों के लिखे के चक्कर में मत पड़िए.. जिस तरह हर के हिस्से का सच अलग होता है,वैसे ही स्वाद का भी. और मेरे उस स्वाद में दोस्ती से लेकर फ़ोकट की प्रेस शो में फ़िल्म का देखना भी शामिल है.आपके देख लेने के बाद इसके मीडिया एंगल को लेकर अलग से लिखूंगा..बस इतना समझ लीजिये कि इस देश के किसी भी लफंदर टीवी रिपोर्टर का नाम दीपक होगा..फ़िल्म चाहे पीपली लाइव हो या फिर जेड प्लस..मतलब दीपक अब नाम नहीं एक सिंड्रोम है, मीडिया का चुत्स्पा…और न्यूज़ चैनल मतलब आजतक के आसपास का कोई भी अंडू-झंडू

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अच्छे दिन की पंचांग- फिल्म जेड प्लस… आम आदमी जब अपने हालातों के बीच जीते हुए अचानक से सरकार की रहमोकरम पर खास हो जाता है, उसकी किस्मत सांड जैसी हो जाती है तो वो प्रशासन की नजर में बहनचो..हो जाता है, वो अपनी जिंदगी न जीकर सरकार की जिंदगी जीने लग जाता है, वो अकेले में पर-पेसाब तक नहीं कर सकता, उसकी जिंदगी में सिक्यूरिटी और सियासत इस कदर घुस आती है कि वो समाज में बलून बनकर उड़ने लग जाता है..कितना कुछ हो जाता है एक आम आदमी के साथ जिसका खास होना उसकी खुद की कोशिश का हिस्सा न होकर सत्ता और सरकार के उस बेहूदे फैसले से तय होता है जिसका किसी भी हाल में गलत करार दिए जाने का सवाल ही नहीं उठता.

वैसे तो आम आदमी की कोई कहानी नहीं होती, बस हालात होते हैं..वो जिंदगी नहीं, हालातों को जीता है लेकिन सरकार उसके बीच अचानक से एक कहानी ढूंढ लेती है जिसमे वो टू इन वन हीरो पैदा करती है. एक हीरो वो खुद और दूसरा वो आम आदमी. सरकार का हीरो होना रोजमर्रा की घटना है, उसके रोज अच्छे दिन आते हैं लेकिन आम आदमी का हीरो होना एक्सक्लूसिव है और अच्छे दिन भी सीजनल होते हैं.

फिल्म जेड प्लस जिसे मिजाज से बेहद ही स्वीट लेकिन व्यंग्य के अंदाज में बेहद ही तीखे अपने ही दोस्त रामकुमार( Ramkumar Singh) ने लिखी है, की प्रोमो पिछले कई दिनों से वर्चुअल स्पेस पर तैर रही है..आपको इन प्रोमो को देखकर हंसी आएगी, लेकिन रिप्ले करेंगे तो गुस्सा, फिर से देखना चाहेंगे तो अफसोस और अगर उसी वीडियो को एक बार और देख लिया तो लगेगा हम दरअसल किसी नाम के काल में नहीं बल्कि उस बिडंबना काल में जीने जा रहे हैं, जिसकी अभी कुछ ही किस्त चुकाई है, पहाड़ जैसी किस्त बाकी ही है की वृतांत है..इस पूरे वृतांत से तो कल ही गुजरना हो सकेगा लेकिन प्रोमो को साक्ष्य मानते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक तो अच्छे दिन आए नहीं है, विज्ञापन की चौखट से लांघने में पता नहीं कितना वक्त लग जाए और गर ये “अच्छे दिन” सचमुच में आ गए तो फिर यातना के लिए आम आदमी कौन सा शब्द ढूंढेगा. आम आदमी के जातिवाचक संज्ञा और हालात से एक्सक्लूसिव कहानी में तब्दील होने की पूरी घटना के कई छोर, कई पेंच हैं जिन्हें कि हम अपनी-अपनी हैसियत की समझदारी की स्क्रू डाइवर से कल फिल्म देखने के बाद खोलने की कोशिश करेंगे..

युवा मीडिया और फिल्म विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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