बहस करने के मामले में भारतीयों जैसे कमीने दुनिया में कम हुए हैं!

रंगनाथ सिंह-

मुझे लगता है पोलेमिक्स या बहसबाजी मानवीय सभ्यता का सबसे पुराना व्यसन है। बौद्धिक दुनिया का सबसे प्रिय मनोरंजन भी यही है। इसका सूत्रीकरण करते हुए एक आचार्य ने कहा है- वाद-विवाद-संवाद ही ज्ञान के विकास की प्रक्रिया है। हर बौद्धिक सिपाही पोलेमिक्स के मैदान में अपने अध्ययन, तर्क और तथ्यों का तेग लेकर उतरता है। सामने वाला भारी पड़ जाए तो वह फिर से अध्ययन करता है, तर्क जुटाता है और नए तथ्य लेकर सामने आता है।

ऐसा नहीं है कि यह केवल अकादमिक विषयों के साथ होता है। धार्मिक मसलों पर भी सालोंसाल बहस चलती है। एक छोटी सी बहस की मिसाल ले लीजिए। ईश्वर एक है या दो है या अनेक। अगर एक है तो व्हाई ही इज सिंगल! अगर दो है तो सेकेंड वन इज मेल ऑर फीमेल? दोनों मेल हैं तो…हाऊ डिड दे….खैर। एक मेल और एक फीमेल है तो देन व्हाट अबाउट चिल्ड्रेन? हू डज दि एक्चुअल हाउस वर्क? इफ शी वाज हाउसवाइफ देन व्हाई डिड ही सेंड हर टू किल द डिमेन?

आप देख सकते हैं कि एक मामूली से सवाल से शुरू हुई बहस कहाँ तक जा सकती है। इस छोटे से सवाल पर मानवीय सभ्यता चार हजार साल से बहस करती आ रही है। जे कृष्णमूर्ति जैसे दार्शनिक मानते हैं कि ईश्वर ने इंसान को नहीं बल्कि इंसान ने ईश्वर को बनाया है।

अगर आप मानवीय सभ्यता का इतिहास देखेंगे तो पाएँगे कि हर सभ्यता, हर समुदाय या हर कबीले ने अपने-अपने ईश्वर बना रखे थे। मुझे लगता है कि उस दौर में छोटे-छोटे बच्चे भी ईश्वर बना लेते थे क्योंकि खिलौने जैसे ईश्वर भी मिले हैं जो सबसे ज्यादा छोटे बच्चों को लुभाते होंगे। बड़े तो हर काम बड़ा करते हैं। वो ईश्वर बनाएँगे तो उसकी साइज बड़ी रखेंगे। यह भी हो सकता है कि बड़े पहले छोटे से ईश्वर बनाते रहे हों। जब उन्होंने छोटी चीजों को बड़ा बनाने की कला सीखी तब बड़े-बड़े ईश्वर बनाने लगे। संग्रहालयों में पड़े गान्धार बुद्ध की मूर्तियों की साइज देखिए और बामियान में तोड़े गए बुद्ध मूर्ति की साइज देखिए। खैर, मेरी चिंता मूर्तियों की साइज नहीं, ईश्वर को लेकर होने वाली बहस है।

सोचिए, एक वक्त ऐसा था कि जो चाहे अपना ईश्वर बना सकता था। ऐसे ही थोड़े ही किसी भले आदमी ने यह घोषणा की होगी- अहं ब्रह्मास्मि! (मैं ही ईश्वर हूँ)। आप इसे ईश्वर होने न होने के नजरिये से मत देखिए। आप ईश्वर बनाने की आजादी के नजरिये से देखिए। जब इस भाई ने कहा होगा कि मैं ही ईश्वर हूँ तो दूसरे ने क्या होगा? तू तेरा ईश्वर है तो मैं मेरा ईश्वर हूँ! खैर, इस स्तर की आत्मनिर्भरता का वही हाल होता है जो आत्मनिर्भर भारत का हो रहा है। खुद को ईश्वर घोषित करते समय आदमी भूल जाता है कि ईश्वर ऐसा होना चाहिए जिसके सामने आगे रो सके, अपना दुखड़ा सुना सके, जीवन में कुछ अभाव हो तो उसकी पूर्ति की कामना-प्रार्थना कर सके, हौसला टूट रहा हो तो उसे जुड़वा सके।

अगर आप ही अपने ईश्वर हैं तो फिर ये सब काम आप ही करने होंगे। अगर आप ये सारे काम आप ही कर सकते तो भला ईश्वर क्यों बनाते? तो गाड़ी फँस गयी। इसीलिए इस रास्ते पर बहुत ही कम लोग जाते हैं। ईश्वर बनाने के मामले में भी बेहतर यही होता है कि चार समाज मिलकर ईश्वर बनाये। सामुदायिक भावना ईश्वर के निर्माण के लिए सराहनीय और व्यावहारिक होती है।

कहते हैं परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है। मनुष्य नहीं, परिवार। ईश्वर निर्माण के मामले में भी सबसे सफल छोटी इकाई परिवार ही है। ट्रेडिशनली कुल देवी या कुल देवता आर ऑर फर्स्ट लाइन ऑफ डिफेंस। खैर, विश्व इतिहास पर गहरी पकड़ आज किस हिन्दुस्तानी की नहीं है! तो आपको यह सब किस्सा कहानी पता ही होगी। हम बहस पर लौटते हैं।

आपको पता ही होगा कि ईश्वर निर्माण की आजादी काफी समय तक दुनिया में रही। उन लोगों के बीच मेरा तेरा ईश्वर को लेकर ज्यादा हुज्जत नहीं होती थी। जहाँ कोई अपने ईश्वर पर ज्यादा इतराता था, अगला कबीला या समुदाय अपना नया ईश्वर बना लेता था। तुम अपना देख लो, हम अपना देख लेंगे टाइप एट्टियट्यूड। काफी समय तक यह सब चलता रहा। इस दौरान दुनिया की बड़ी-बड़ी सभ्यताओं का निर्माण हुआ। विश्व इतिहास और आप…तो जानते ही हैं।

खैर, आप जिस विश्व इतिहास को अच्छी तरह जानते हैं उसमें आपने एक निर्णायक मोड़ तब देखा होगा जब कुछ लोगों ने इस बात पर एतराज जताया कि हर कोई ईश्वर नहीं बना सकता। उन्होंने कड़क आवाज में कहा, ईश्वर एक है और उसका फाइनल वर्जन वह है जो मैंने बनाया है। जिसे इसपर एतराज है वो आकर उनसे बहस करे। गौर करिएगा, बहस करे। बहस किस आधार पर करे? तर्क के आधार पर तथ्य के आधार पर नहीं क्योंकि ईश्वर के होने का फैक्ट पता चल गया तो वह किस बात का ईश्वर है।

बहस का महत्व और इतिहास देखिए। खुद ईश्वर कई सौ सालों से बहस का विषय बना हुआ है। अगर ईश्वर है तो कहीं न कहीं उसे भी इसमें मजा आ रहा है वरना वह एक दिन कड़क कर कह देता- बहसबाजी बन्द करो….के। वह साफ बता देता कि वह सिंगल है या डबल है या पूरी फेमिली है या उनकी पूरी कॉलोनी है।

अगर आप यह सोच रहे हैं कि आदमी को ईश्वर से ज्यादा प्यारी बहस है इसलिए वह ईश्वर से ज्यादा फोकस इस बात पर करता है कि ईश्वर कितने हैं या कैसे हैं? बहस की चीज को बहस तक रखे तो वो इंसान ही क्या! ईश्वर कितने हैं इस बात को लेकर बात तर्क से तलवार तक पहुँच गयी। एक समय तो यह हाल हो गया कि जिसकी तलवार में ज्यादा ताकत उसका ईश्वर उतना ज्यादा ताकतवर। उसके बाद इस छोटे से सवाल पर तर्क भी चलते रहे, तलवार भी चलती रही। बहस खत्म नहीं हुई कि ईश्वर एक है या दो या अनेक?

आप तो भारतीय इतिहास के भी अच्छे जानकार हैं तो आपको पता ही होगा कि बहस करने के मामले में भारतीयों जैसे कमीने दुनिया में कम हुए हैं। कमीना कहने का बुरा मानिएगा, मैंने आजकल प्रचलित स्वीट वाला कमीना यूज किया है। लेकिन यही बात आप हार्वर्ड वाले प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने अंग्रेजी रैपर में कही- आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन – तो आपको बात बुरी नहीं लगी थी। खैर, हम आते हैं मूल मुद्दे पर। ईश्वर कितने हैं और कैसे हैं इस बहस को दुनिया में सबसे ज्यादा ऊँचाई तक कोई ले गया तो वो हिन्दुस्तानी हैं। हिंदुस्तानियों ने इस बहस को ऐसे मोड़ पर पहुँचा दिया जिसके बाद यह वहीं फँसी हुई है। ईश्वर एक है के सबसे बड़े झण्डाबरदार भी हिन्दुस्तान में आकर कह पड़े…अरे….के ये तो बहुत….हैं।

कई सौ साल तक तर्क-वितर्क करने के बाद हिंदुस्तानियों ने तर्क दिया कि ईश्वर एक भी है, दो भी है, अनेक भी है, वह ईश्वर है इसलिए उसकी मर्जी है कि वो कब कितना रहे और कहाँ रहे। अगर वह ईश्वर है तो उसकी मर्जी है कि वो काशी विश्वनाथ के गर्भ गृह में रहे या शालिग्राम की पिण्डी में रहे या तुलसी के बिरवे में रहे। अगर ज्यादा कन्फ्यूजिंग हो रहा है तो इसे यूँ समझें। माई बॉडी माई च्वाइस का राइट अगर दीपक पादुकोण के पास है तो क्या ईश्वर के पास वही राइट नहीं है! माई बॉडी माई च्वाइस…आई विल डिसाइड व्हेर विल आई लिव…हनी।

गोस्वामी तुलसीदास को तो आप जानते ही होंगे, भले ही आपने कभी रामचरित मानस न पढ़ी हो आपको यह पक्का पता होगा कि उसमें क्या लिखा है। तुलसी बाबा ने भी इस बहस में शिरकत करते हुए क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस के तहत ऊपर वाला पुराना स्टैण्ड ही कॉपी किया था – अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।। आप समझते ही होंगे रिलिजियस कैनन से कोट करने पर आर्गुमेंट में अथॉरिटी आती है बस इसीलिए तुलसी बाबा को अपनी मौज में घसीट लिया।

खैर इस छोटे से सवाल से शुरू हुई बहस की जो कथा ऊपर कही है वह मुख्य कथा है। इस बहस का एक अवांतर प्रसंग है जो शायद इस पूरी बहस का सबसे छोटा लेकिन सबसे मानीखेज प्रसंग है। जब यह बहस चलने लगी कि ईश्वर एक है या दो है या अनेक और मान्यता के आधार पर तार्किकों के खेमे बनने लगे तभी कुछ लोग ऐसे पैदा हो गये जो कहने लगे कि हम मानते ही नहीं कि ईश्वर जैसी कोई चीज है फिर एक दो या अनेक हो या न हो हमारे लिए ये बहस फजूल है! समझ लीजिए ये लोग अह्म ब्रह्मास्मि वालों के नजदीकी रिश्तेदार थे।

ईश्वर को न मानने वाले अल्पसंख्यक दुनिया की लगभग सभी सभ्यताओं में पाए जाते हैं। कई जगह तो ऐसे लोगों के तर्क का जवाब में तलवार चल गयी। फेमस किस्सा है मंसूर की गर्दन कट गयी फिर भी उसका मुँह से यही ध्वनि निकलती रही- अह्म ब्राह्मास्मि। लेकिन हिन्दुस्तान में!

याद करिए हिंदुस्तानियों की तार्किकता के बारे में हिन्दी में मैंने और इंग्लिश में अमर्त्य सेन ने क्या कहा था! ईश्वर है या नहीं है कि बहस थोड़ी देर हिंदुस्तान में भी खिंची लेकिन जब एक चतुर हिन्दुस्तानी ने ईश्वर का अस्तित्व न मानने वालों को जवाब देते हुए यह कहा कि ईश्वर नहीं चाहते कि ये लोग जानें कि ईश्वर है! मामला फँस गया। भाई ने ऐसा तार्किक फच्चर फँसाया कि उसके बाद जर्मनी-रूस-इराक-अमेरिका तक में बहस चल गयी कि ईश्वर है या नहीं लेकिन हिन्दुस्तान में पिछले हजार साल में जब भी किसी ने ईश्वर पर सवाल उठाया है जवाब में यही सुनने को मिलता है- अरे जाने दो, भगवान ने इनकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी है! आइए, कीजिए बहस।

इस मामले में अभी तक का सबसे बेस्ट ट्राई गौतम बुद्ध का रहा है। बुद्ध ने ईश्वर है या नहीं है या है भी और नहीं भी है ऐसे सवालों का जवाब देने से ही इनकार कर दिया। नतीजा क्या हुआ! प्यारे भारतवासियों ने उनके मौन से अपना जवाब निकाल लिया। अगर ये तीनों सवालों पर चुप है तो हो न हो यही ईश्वर हैं! बोलो नमो बुद्धाय…

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