हम ठान लें तो धन मीडिया के विकल्प के रूप में जन मीडिया को खड़ा किया जा सकता है

दिल्ली। प्रख्यात आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि मीडिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सच्चाई के प्रति खुद बाखबर रहने और जनता को बाखबर रखने की है। हम ठान लें तो धन मीडिया के विकल्प के रूप में जन मीडिया को खड़ा किया जा सकता है। प्रो.जैन गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘धन मीडिया बनाम जन मीडिया’ विषय पर आयोजित परिसंवाद में विचार व्यक्त कर रही थीं। उन्होंने कहा कि धन बल के प्रभाव में आकर मीडिया चाहे जितनी भी कलाकारी करे, जनता को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। दिल्ली के हालिया विधान सभा चुनावों में एक दल विशेष को मिली ऐतिहासिक जीत पर उन्होंने कहा कि यह घटना मीडिया के कारण नहीं बल्कि जन मन के मोह भंग के कारण हुई है।

 

उन्होंने अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ की खबरों का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी के अन्य अखबारों के मुकाबले उसकी खबरें ज्यादा विश्वसनीय होती हैं। उन्होंने कहा कि आज से बीस साल पहले लोग पत्रकारिता को विषय मानने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने जोखिम लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता को विषय बनवाया। आज देश के तमाम विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता एक विषय के रूप में पढायी जा रही है। प्रो. जैन ने कहा कि अगर आज हम ठान भर लें तो जन मीडिया को धन मीडिया के विकल्प के रूप में खड़ा किया जा सकता है।

‘जनसत्ता’ के संपादक ओम थानवी ने अपने संदेश में कहा कि पिछले कुछ समय से मीडिया जन गण के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पीछे से हटता जा रहा है। मीडिया में धनबल का प्रभाव बढ़ा है। इसलिए खास तौर पर न्यूज चैनलों की संख्या में इजाफा हुआ है। मीडिया में ज्यादा धन आने का मतलब यह नहीं कि खबरों की गुणवत्ता ही घट जाए। अखबार पहले से ज्य़ादा रंगीन और चमकदार हुए हैं। अखबारों की तादाद भी बढ़ी है। न्यूज चैनल भी चौबीस घंटे खबरें परोस रहे हैं। आज मीडिया में परंपरागत विषयों के अतिरिक्त स्वास्थ्य, शिक्षा, खेती-बाडी, पर्यावरण और श्रमिकों की दशा पर कितनी चर्चा होती है, यह सब जानते हैं। फैशन, फिल्म, खेल और अपराध की खबरों को ही तरजीह दी जा रही है। उन्होंने कहा कि अनेक न्यूज चैनल बड़े उद्योगपतियों के ही हैं। इसलिए वे शासकों और जन नेताओं के संबंध साधते हैं। ऐसा हाल के चुनावों में भी देखा गया है। अनेक अखबार प्रापर्टी डीलर और बिल्डर निकाल रहे हैं। सरकारों से उनका अपना स्वार्थ होता है। जनता के प्रति उनसे किसी भी तरह की जबाबदेही की अपेक्षा नहीं की जा सकती। मीडिया की पूंजीपतियो एवं सरकारों के साथ संलिप्तता संदिग्ध है। पत्रकार मालिकों की इच्छा के विरुद्ध अपने विवेक का इस्तेमाल करने को तैयार नहीं हैं। न्यूज चैनलों में स्वतंत्र संपादक बहुत कम हैं। ज्यादातर मालिक ही संपादक बने हुए हैं। प्रमुख पदों पर बैठे मीडिया कर्मी मालिकों के आर्थिक हित साधने में व्यस्त होते हैं। जी न्यूज के संपादक अकल्पनीय राशि ऐंठने के प्रयास में जेल भी हो आए हैं। वे आज भी चैनल के प्रमुख पद पर बने हुए हैं। पेड न्यूज का वाकया भी बहुत पुराना नहीं है। लेकिन विज्ञापन सामग्री अब न्यूज के रूप में भेष बदल कर परोसी जा रही है।

आज तक के चर्चित एंकर और वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि धन मीडिया का विकल्प बनने के लिए वैकल्पिक सोच एवं वैकल्पिक अर्थव्यवस्था तैयार करने की स्थिति होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बिहार में किसान यूरिया को लूट रहे हैं। इसको राष्ट्रीय खबर बनना चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। उन्होंने गुजरात के दैनिक अखबार का उदाहरण देते हुए कहा कि चौतीस पेज के उस अखबार में बीस पेज का विज्ञापन होता है…और हर विज्ञापन दस रुपये का होता है। इस बिजनेस मॉडल का इतना असर है कि बड़े से बड़े नेता और अधिकारी को उसके बुलावे पर आना पड़ता है क्योंकि वह अखबार जनता से जुड़ा हुआ है। जन मीडिया को भी अपना कुछ इसी प्रकार का जन बिजनेस मॉडल बनाना होगा, तब वह ताकतवर होकर जन दबाव बना सकेगा।

माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के निदेशक जगदीश उपासने ने अपने संदेश में कहा कि ‘क्लास रिपोर्टर’ जर्निलज्म के उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक है जो मीडिया में अपना भविष्य देख रहे हैं। इसे तो हर पत्रकारिता संस्थान को अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लेना चाहिए। इसी तरह ‘मीडिया हूं मैं’ पत्रकारिता की शिक्षा लेने वाले छात्रों एंव रिसर्चर्स के लिए एक महत्वपूर्ण किताब है।

इंडियन इंस्टिटयूट ऑफ मास कम्युनिकेशन (आईआईएमसी) में पत्रकारिता के प्रोफेसर आनंद प्रधान ने कहा कि भारत में मुख्यधारा के मीडिया में आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता का अभाव है। मीडिया घरानों को खुद पर उठ रहे सवालों से भागने की जगह उन्हें जनता के सरोकारों और सवालों का सामना करना चाहिए।

जाने-माने कथाकार संजीव ने मीडिया की साहित्य से दिन ब दिन बढ़ती दूरी का जिक्र करते हुए कहा कि आजकल की पत्रकारिता संवेदनशील नहीं रह गयी है। वह टीआरपी और बिजनेस की अंधी दौड़ में डूब गयी है। उन्होने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी फैशन शो को कवर करने के लिए सैकड़ों मीडिया कर्मी पहुंच जाते हैं, लेकिन किसी गरीब किसान की आत्महत्या उन्हें परेशान नहीं करती। मीडिया विश्लेषक यशवंत सिंह ने कहा कि जिस तरह से मीडिया का मालिक अचानक खरबपति बन गये, यह साबित करता है कि पत्रकारिता अब  जन के पक्ष में तथा सत्ता के खिलाफ नहीं है। बल्कि अब विरोध और सत्ता की दलाली मुख्यधारा की पत्रकारिता की केंद्रीय धुरी है।

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि आज मीडिया के ग्लैमर के चलते तमाम अपराधी व माफिया भी पत्रकार बनकर उसे ढाल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे पत्रकारिता की गरिमा गिर रही है। उन्होंने कहा कि तमाम बिल्डर व अन्य दो नंबर के धंधे वाले अखबार और चैनल शुरु कर अपने धंधे को बचाने में लगे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार ने कहा कि जन सरोकार की पत्रकारिता अब लगातार कम हो रही है। सुनियोजित ठग मीडिया और चैनलों के मालिक धन कमाने वाले व्यक्ति हो गये हैं। ऐसे में पत्रकारिता का स्तर लगातार गिर रहा है।

प्रख्यात कार्टूनिस्ट इरफान ने कहा कि अब कार्टूनों को भी जाति और धर्म के आधार पर देखा जाने लगा है। यह स्थिति मीडिया के लिए अच्छी नहीं है। उन्होंने कहा कि स्वस्थ एंव पारदर्शी लोकतंत्र में कार्टून स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए।

गार्गी कॉलेज के प्राध्यापक श्रीनिवास त्यागी ने कहा कि जिस तरह से धन मीडिया अपनी विश्वसनीयता समाज में खोता जा रहा है, इससे आज यह जरूरी हो गया है कि जन मीडिया विकल्प के रूप में खडा़ हो। वरिष्ठ पत्रकार अनिल शर्मा ने कहा कि आज धन मीडिया ने धन उगाही के लिए पत्रकार से लेकर संपादक तक की एक मजबूत कड़ी बना ली है। कोई जन जब इसके विरुद्ध बोलता है तो नीचे से ऊपर तक उसे नकार दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आज धन मीडिया के चलते पत्रकारों का सबसे ज्यादा शोषण हो रहा है। उन्होंने कहा कि आज समय आ गया जब पूरे देश में विकल्प के रूप में गांव से लेकर महानगरों तक जन मीडिया का संगठन व समाचार पत्र तथा चैनल शुरु किए जाएं।

‘मीडिया हूं मैं’ एवं ‘क्लास रिपोर्टर’ जैसी किताबों के लेखक और उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश त्रिपाठी ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि आजकल कम ही लोग जन मीडिया के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं, लेकिन अन्ततः इसकी ताकत बढ़ती जाएगी और धन मीडिया परास्त होगा। इस संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार दीपक शर्मा, डा. वर्तिका नंदा, नाजिम नक्वी, संजीव चौहान, विकास मिश्रा, अनिल शर्मा, राजीव शर्मा, सीत मिश्रा, कमल सिंह, पायल चक्रवर्ती, प्रमोद चौरसिया आदि की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार की अध्यक्षता में मीडिया विमर्श का संचालन डाक्टर गणेश श्रीवास्तव ने किया।

इस आयोजन के कुछ प्रमुख वक्तव्य देखने सुनने के लिए इन यूट्यूब लिंक्स पर क्लिक करें…

कार्टूनिस्ट से जर्नलिस्ट कर खूब बरसे,’धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया’ गोष्ठी में
http://youtu.be/_1Spt78O9ZQ
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खूब भड़ास निकाली वक्ताओं ने ‘धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया’ गोष्ठी में
http://youtu.be/6OVpF3YoXSs
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नई दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान में जब सब बोले ‘बेबाक’
http://youtu.be/vnlg5L4GcX4

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Comments on “हम ठान लें तो धन मीडिया के विकल्प के रूप में जन मीडिया को खड़ा किया जा सकता है

  • sandip thakur says:

    मैं इस programme में नहीं था। वजह, मेरे पास इसकी सूचना नहीं थी। मुझे क्या अ िधकांश पत्रकाराें काे इसकी जानकारी नहीं थी। खैर,एेसी चचाॅ शहर के काेने में हाे जाती है,हाेती ताे है। अच्छा है। वैसे मेरा मानना है कि आज के दाैर में ‘धन मीडिया बनाम जन मीडिया’ की बात करना बेमानी है। क्याें? एक नजर programme के वक्ताआें पर डा िलए। हर वक्ता िकसी न िकसी रूप में Media से जुडा है। ले िकन जन की पत्रका िरता काेई नहीं कर रहा। क्याें ? िकसी ने इन्हें राेका ताे नहीं है। मैं भी िवगत 23-24 सालाें से इस पेशे मे हूं। अच्छे संस्थान में अच्छी पाेस्ट पर काम कर चुका हू आैर आज भी कर रहा हूं। Media आैर Mediaman के बारे में थाेड़ा बहुत ताे जानता ही हूं। हर माह माेटी सैलरी उठाने वाले,तीन बेडरूम फ्लैट में रहने वाले,लंबी काराें में घूमने वाले इन लाेगाें के मुंह से जन Media काे खड़े करने की बात कुछ हजम नहीं हाेती। Media की हालत आज क्या हाे गई है,इसका ताजा उदाहरण है आप की सरकार। सत्ता में आते ही Media की एंट्री स िचवालय में बंद आैर इस पर बाेलने वाला काेई नहीं। आज Media में जन से जुड़ी िकतनी खबरें हाेतीं हैं। दरअसल आज पत्रकािरता नहीं नाैकरी हाेती है। काेई Builder चैनल शुरू करता है,िकसी नए लड़के या मैडम काे चैनल हेड बना देता है आैर नामी गरामा पत्रकार माेटी सैलरी लेकर उसे ही सर सर कहना शुरू कर देते हैं। आैर बात करते हैं जन Media काे मजबूत करने की। आज हालत यह है िक आप चाहे िकतने भी याेग्य हाें,मी िडया में नाैकरी तब तक नहीं िमलेगी जब तक आपका काेई गॉड फादर नहीं हाे। हकीकत यहीं है आैर बात हाे रही है घन मी िडया बनाम जन मी िडया की। इस Hipocracy का क्या करें ?

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  • jaiprakash says:

    संदीप भाई आप की कई बातें कटुसत्य हैं लेकिन बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, आजादी का आंदोलन हो या अन्ना हजारे का, हर लड़ाई में हर कोई भगत सिंह नहीं होता है, जरूरी है गलत की मुखालफत होती रहे, कारवां तभी बनेगा, जब सही जमावड़ा एक मुट्ठी बन जाए किसी मुद्दे पर, मुर्दा शांति से भर जाने से अच्छा है एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो…आप को सूचना नहीं मिली प्रोग्राम की, इसके लिए हार्दिक खेद है, दरअसल प्रोग्राम आप जैसे सचेत साथियों के लिए ही था, ‘कार और पत्रकार’ पर बातें फिर कभी…

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