Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

जनसत्ता और एक्सप्रेस ग्रुप खबरें तो छापते हैं लेकिन संघी होना छिपा नहीं पाते!

अंबरीश कुमार-

सबको खबर दे- सबकी खबर ले बनाम ‘झाल मुड़ी पत्रकारिता का आठवां पेज!

दिल्ली के बहादुर शाह जफ़र मार्ग पर जो एक्सप्रेस बिल्डिंग हैं वह रामनाथ गोयनका की बनवाई हुई है. देश की राजनीति पर इस बिल्डिंग का कितना असर रहा है यह जाने माने पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है.

मुझे भी इस बिल्डिंग में आने का सौभाग्य रामनाथ गोयनका की वजह से ही मिला था. जिसपर फिर कभी. पर फिलहाल संदर्भ अलग है. इसी बिल्डिंग पर तब लिखा था “सबको खबर दे, सबकी खबर ले’ यानी जनसत्ता. यह टैग लाइन वरिष्ठ पत्रकार कुमार आनंद की बनाई थी.

इसी जनसत्ता के आठवें पेज का महिमामंडन नेता विपक्ष की खबर के सन्दर्भ में अपने पुराने साथी ने किया है. विपक्ष के नेता की खबर पेज आठ पर और मोदी शाह की खबर पेज एक पर. इस अखबार के दिल्ली संस्करण को भी मैंने निकाला है और पहले पेज पर कौन सी खबर जाएगी और आठवें पेज पर कौन सी खबर दबाई जाएगी यह खेल सब समझते है.

जनसत्ता उस दौर में यानी प्रभाष जोशी के समय में विपक्ष की आवाज रहा है. सांप्रदायिकता के उस दौर में मैं पहला पेज छोड़ने वाला था तभी देर रात प्रभाष जोशी जी पहुंच गए. पहले पेज पर सम्पादक समाचार हरि शंकर व्यास का एक भड़काऊ एंकर जा रहा था उन्होंने देखा और कहा, इसे हटा कर दूसरी स्टोरी लें.

उस दौर में भी जनसत्ता कभी सरकार का पिट्ठू नहीं बना और तन कर खड़ा रहा. रोज पहले पेज पर सरकार की खबर ली जाती थी. पेज आठ पर नहीं. आज अखबार के पहले पेज पर सरकार की आलोचना वाली खबर ढूंढते रह जाएंगे. जनसत्ता के पुराने साथी संजय सिंह ने एक पीस लिखा है वह भी पढ़ना चाहिए.

जनसत्ता और एक्सप्रेस ग्रुप खबरें तो छापते हैं लेकिन संघी होना छिपा नहीं पाते और हिन्दुस्तान टाइम्स या टाइम्स ऑफ इंडिया हो नहीं सकते – इसलिए ये मजबूरी है।

हिन्दुस्तान टाइम्स या टाइम्स ऑफ इंडिया नहीं होने से मतलब है कि हमारे जैसे जो लोग हैं वो पेज आठ पर ही सही खबर तो लगा ही देंगे। लगाते ही थे। इससे ना हमलोग कभी डरे और ना डराया जाता था।

आज के अखबारों की समीक्षा में पहला पैरा इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता की इसी पत्रकारिता पर है। लेकिन जो बदलाव है वह भी दिख रहा है। किसी एक खबर के लिए संपादक की तारीफ या आलोचना की जा सकती है लेकिन जो स्थितियां उसमें बीच में ही रहना है। इस या उस पार हो ही नहीं सकते हैं।

कुल मिलाकर नौकरी ही कर रहे हैं। पत्रकारिता तो सोशल मीडिया पर भी नहीं हो पा रही है। ट्रोल का दबाव और पोस्ट हटवा देना भारी समस्या है.

संबंधित खबर…

राहुल गांधी का RSS को लेकर दिया बयान जनसत्ता और अमर उजाला ने छापा, बाकी अखबार पी गये!

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन