‘जनसत्ता’ जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है!

Sanjaya Kumar Singh : जनसत्ता एक अच्छा अखबार था और जब खराब होना शुरू हुआ तो लगातार खराब होता गया। उसका कोई ग्राफ नहीं बना। कुंए में (गड्ढे) में जाती बाल्टी की तरह सीधी रेखा बनती जा रही है। मैं समझ रहा था कि बाल्टी मराठवाड़ा के किसी कुंए में छोड़ दी गई है पड़ी हुई है। लेकिन अच्छे अखबार के पाठक भी अच्छे होते हैं और बता देते हैं कि जनसत्ता आज कैसे और नीचे गया। एक दिन मैं भी लिखने बैठा था तो लगा कहां दीवार पर सिर मारूं।

पर आज ‘अलविदा जनसत्ता’ पढ़कर लगा कि संस्थान इससे खुश होगा या दुखी। जनसत्ता जिस हाल में निकल रहा है उसमें यही समझना मुश्किल हो गया है कि निकल किस लिए रहा है। एक समय था कि एक पाठक की प्रतिक्रिया को जनसत्ता में प्रमुखता से छापा गया था उसके उसे साथ नोट लगा था कि यह सिर्फ कड़वा-कड़वा है। मीठा-मीठा निकाल लिया गया है। बाद में लिखने वाले जनसत्ता में सहायक संपादक बने। अब इस पाठक की सार्वजनिक चिट्ठी जनसत्ता के बारे में फिर कड़वा-कड़वा बयां कर रही है।

पढ़ें मूल पोस्ट :

जनसत्ता में कार्यरत रहे वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vinod K. Chandola फटफटिया लेखक/ सम्पादक महज़ उनके आदर्श जिन्हें गहरी छपास होती है!

Hemraj Chauhan सही बात है एक महीने पहले मैं भी अलविदा कहा चुका हूं, प्रभाष जोशी जी के बारे आप लोगों से इतना सुना है कि जनसत्ता से बहुत उम्मीद बढ जाती है. ओम थानवी सर ने इसे अलग बनाए रखा और हिंदी अखबारों से पर अब ये वो भी नहीं रहा था. बस लंबी लंबी खबरें, ना कोई विचार सिर्फ खानापूर्ति..

Radhakishan Meghwanshi संजय कुमार सिंह जी किसी के अलविदा कह देने मात्र से जनसत्ता का अंत नहीं हो जाएगा , कहानिया लिखी जाती रही है , किसी को कम और किसी को ज्यादा महत्त्व दिया जाता रहा है , यहाँ सनी लीओन को ज्यादा महत्त्व देने से भारतीय संस्कारी पुरुषों को या किसी व्यक्ति विशेष को परेशानी हो सकती है पर मुझे जनसत्ता जैसे संसथान और उनके पत्रकारों पर ही ज्यादा भरोषा है !

Alok Sinha लेकिन दैनिक भास्कर जैसे शासन समर्थक ( चाहे किसी का भी शासन हो ) से हारना अच्छा नहीं लगता और आज इंडियन एक्सप्रेस भी कौन सा तीर मार रहा हे इसे TV . मीडिया का असर ना कहे | नवभारत टाइम्स , हिन्दुस्तान , अदि की क्या हालत हे , ये तो मानना ही पडेगा की पत्रकारों की पौध सूख रही हे | नई पीढ़ी में कोई अखबारी पत्रकार बनना ही नहीं चाहता ,मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ,खुले मैदान में कोई दौड़ना नहीं चाहता रही बात भास्कर की वहीं बात कांग्रेस और बीजेपी का अंतर की सही मार्केटिंग और साजसज्जा के साथ परोसना जिसे आता हे उसका वास्तविक प्रचार प्रसार कितना हे पर निर्भर हे, भास्कर का देश का सर्वाधिक बिकने वाला हिंदी पेपर बना ,क्या वास्तविक रिपोर्ट हे ? रमेश अगरवाल जी के बाद उनका पब्लिक रिलेशन कौन करेगा ( यंहा नाम पब्लिक रिलेशन जरूर हे लेकिन वो पब्लिक रिलेशन ना हो कर कुछ और हे ) कभी भासकर मध्यप्रदेश में स्वदेश और नई दुनिया से टक्क्र लेता था कभी आगे कभी पीची लेकिन जब ,नव भारत टाइम्स और हिन्दुस्तान टाइम्स ने हिंदी के क्षेत्र में हथियार फेक दिए तो उसका फायदा जनसत्ता ने ना उठाकर भास्कर ने उठाया |बिना कोई नामचीन पत्रकार होते हुए और संपादक होते हुए |और आज राजिस्थान में पत्रिका ,यूपी में अमर उजाला ,जागरण, पंजाब में पंजाब केसरी ,गुजरात में पत्रिका , महाराष्ट्र में जनसत्ता, पत्रिका ,हरियाणा में जनसत्ता और पंजाब केसरी ,और तो और दिल्ली में जनसत्ता , पंजाब केसरी, आदि को तकर देने लगा , कैसे बिना नामचीन पत्रकार और संपादक मंडल के |

Sanjaya Kumar Singh जब तक सनी लियोन के बारे में पढ़ने वाले रहेंगे उसके बारे में लिखा भी जाएगा। पढ़ने वाले को शर्म नहीं तो लिखने वाले को क्यों हो। आप बिल्कुल ठीक हैं Meghwanshi जी। और जनसत्ता में अभी क्या बुराई उससे पीछे बहुत सारे अखबार हैं।



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