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यात्रा पर गए पत्रकार ‘कैलास’ को ‘कैलाश’ लिखकर दिलचस्प रिपोर्टिंग कर रहे हैं!

ओम थानवी-

पाँच साल बाद कैलास-मानसरोवर यात्रा फिर शुरू हो गई है। पचास श्रद्धालुओं का जत्था गया है। पत्रकार मित्र भी गए हैं, जो वहाँ पहुँच दिलचस्प रिपोर्टिंग कर रहे हैं।

मगर सब कैलास को कैलाश लिख-बोल रहे हैं। बोलने की बात और होती है। लेकिन लिखते हुए ज़्यादा सजगता चाहिए। कोई कैलास धाम का नाम कैसे बदल सकता है?

इस बारे में मैंने कुछ वर्ष पहले एक पोस्ट लिखी थी। लगता है नोक-पलक ठीक कर उसे हर कैलास-मानसरोवर यात्रा के वक़्त दोहराना मुनासिब होगा —

दरअसल, हिन्दी या संस्कृत में कैलाश कोई शब्द है ही नहीं। किसी कोश में नहीं मिलेगा। फिर भी अख़बार और टीवी, अपनी चिरंतन हिन्दी उदासीनता के चलते, कैलास-यात्रा को लेकर कैला’श’मय हुए चले जाते हैं।

असल शब्द है — कैलास, जो हमें सीधे संस्कृत (कैलासः) से मिला है।

लास माने नृत्य। मनोहर नृत्य। नृत्य का दूसरा रूप हुआ तांडव। नट और नर्तक के संदर्भ में भी लास/लास्य/लासक शब्दों का प्रयोग होता है। शिखरों का शिखर माना गया कैलास: कैलासपति शिव और पार्वती की लीलास्थली — जहाँ, कहते-सुनते आए हैं, दोनों ने मिलकर नृत्य किया। पार्वती ने लास्य, शिव ने तांडव।

आगे लोगों के नाम कैलास पड़े। फिर जाने कब कैलाश हो गए।

कहते हैं न कि नाम में क्या रखा है। कृष्ण लिखें चाहे क्रुष्ण, कृष्णा, किसन, किसना, कृशन, कान्हा, काना, कन्हैया, कन्हाई सब ठीक माने जाएँगे। इसलिए मैं लोगों के नाम बदलने के ज़रा हक़ में नहीं। ग्रेटर कैलाश को भी कैलास नहीं करूँगा।

पर, इसी तरह, कैलास-मानसरोवर वाले कैलास को भी कैलाश नहीं लिखूँगा।

आप भी बचिए। इससे पहले कि अख़बार-टीवी वाले कैलास धाम का नाम बदल डालें।

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