अभि मनोज-
मुंबई की भागती-दौड़ती जिंदगी में कुछ लोग पटरियों की उन लकीरों की तरह होते हैं, जो खुद शांत रहकर लाखों मुसाफिरों के सफर को दिशा देते हैं। कमल मिश्रा मेरे लिए वही इंसान था। आज जब उसके असमय निधन की खबर आई, तो मन भारी है और स्मृतियों का समंदर थमने का नाम नहीं ले रहा।
यादें 2009 के उन दिनों में ले जाती हैं, जब मैंने ‘नवभारत’ मुंबई के संपादकीय विभाग में स्थानीय संपादक के रूप में कदम रखा था। कमल वहां एक युवा, ऊर्जावान और बेहद जिज्ञासु रिपोर्टर थे। एक सहयोगी ने उनके बारे में पहली ही मुलाकात में कहा था-रेलवे पर उनकी पकड़ बेजोड़ है।

कमल की एक खासियत थी-वे गलत बात बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते थे। एक-दो बार सुन लेते, लेकिन फिर सख्ती से अपनी बात रखते। उस दौर में औपचारिकता से ज्यादा आत्मीयता थी, और कमल में यह गुण कूट-कूट कर भरा था। कल्याण के ‘नौतली नाका’ में रहने वाला यह सरल इंसान मेरे लिए सहकर्मी से बढ़कर हमेशा छोटे भाई जैसा रहा।
रेलवे रिपोर्टिंग का ‘अंदाज़-ए-कमल’
मैं अक्सर गर्व से कहा करता था-“रेलवे रिपोर्टिंग सीखनी हो, तो कमल से सीखो।” मुंबई जैसे महानगर में, जहां वेस्टर्न, सेंट्रल और कोंकण रेलवे जैसे विशाल नेटवर्क हैं, वहां किसी एक पत्रकार की इतनी गहरी पैठ होना विरल है।
कमल मिश्रा केवल एक रिपोर्टर नहीं थे, बल्कि मुंबई की परिवहन व्यवस्था की रग-रग से वाकिफ थे। उनका नेटवर्क रेलवे बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों से लेकर ट्रैक पर काम करने वाले गैंगमैन तक फैला हुआ था। उनकी खबरें इतनी प्रामाणिक होती थीं कि कई बार बड़े अधिकारी भी तथ्यों की पुष्टि के लिए उन्हें फोन करते थे।
कमल की पत्रकारिता कभी दफ्तरों तक सीमित नहीं रही। चाहे रेल दुर्घटना हो या बस हादसा-वे सबसे पहले घटनास्थल पर पहुंचने वालों में होते थे। कई बार वे मीलों पटरियों पर पैदल चलकर यह समझने की कोशिश करते कि तकनीकी चूक कहां हुई।
‘फ्री प्रेस जर्नल’ में एडिटर (ट्रांसपोर्ट एंड इंफ्रा) के रूप में उन्होंने रेलवे, बेस्ट बस सेवा और टैक्सियों पर गहरी और प्रभावशाली रिपोर्टिंग की। टैक्सी चालकों की मनमानी के खिलाफ उनका अभियान आज भी मिसाल है। वे खुद आम यात्री बनकर टैक्सी रोकते थे, और मना करने पर पूरी जानकारी के साथ रिपोर्ट प्रकाशित करते थे। उनके इस प्रयास का असर इतना व्यापक हुआ कि आरटीओ को कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ा।
इससे पहले टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशन समूह के अंग्रेजी समाचार-पत्र ‘मुंबई मिरर’ में अपने कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसपोर्ट से जुड़ी कई बड़ी खबरें ब्रेक कीं। जटिल परियोजनाओं को आम आदमी की भाषा में समझाना उनकी खासियत थी।
एक अधूरा सफर और गहरा शून्य
नियति का प्रहार बेहद क्रूर साबित हुआ। नासिक से कल्याण लौटते समय हुए एक भीषण सड़क हादसे में वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे। पिछले कुछ महीनों से वे उन्हीं स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। अंततः बुधवार, अप्रैल 2026 की सुबह 56 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली।
कमल, तुम्हारे जाने से मुंबई की परिवहन पत्रकारिता में जो गहरा शून्य पैदा हुआ है, उसे भर पाना मुश्किल ही नहीं, शायद असंभव है। तुम्हारी बेबाकी, तुम्हारी आत्मीय मुस्कान और पटरियों की धड़कन को शब्दों में पिरोने का तुम्हारा हुनर हमेशा याद आएगा।
तुम केवल एक पत्रकार नहीं थे-तुम जनता की आवाज़ थे, जो पटरियों, बस डिपो और सड़कों पर गूंजती थी।
अलविदा मेरे भाई! जहां भी हो, तुम्हारी यादों की ‘लोकल’ हमारे दिल के स्टेशनों पर हमेशा ठहरती रहेगी।
मूल खबर…
परिवहन रिपोर्टिंग के दिग्गज पत्रकार कमल मिश्रा का निधन!


