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सियासत

पत्रकारों का चुनाव और ‘कत्ल की रात’ !

आपने अखबारों में अक्सर पढ़ा होगा, फलां चुनाव में बंटने के लिए आई दारू पकड़ी गई… मतदाताओं को रिझाने के लिए उम्मीदवारों ने दारू बांटा… कंबल बांटा…साड़ी, बिछिया और न जाने क्या क्या बांटे..। हर खबर के बाद चिंतन करने का मन भी किया होगा कि क्या हो गया है, लोकतंत्र का? मतदान के एक दिन पहले यह सारा खेल होता है…. इस एक रात को ‘कत्ल की रात’ कहा जाता है!

आपने अखबारों में अक्सर पढ़ा होगा, फलां चुनाव में बंटने के लिए आई दारू पकड़ी गई… मतदाताओं को रिझाने के लिए उम्मीदवारों ने दारू बांटा… कंबल बांटा…साड़ी, बिछिया और न जाने क्या क्या बांटे..। हर खबर के बाद चिंतन करने का मन भी किया होगा कि क्या हो गया है, लोकतंत्र का? मतदान के एक दिन पहले यह सारा खेल होता है…. इस एक रात को ‘कत्ल की रात’ कहा जाता है!

अब यह ‘कत्ल की रात’ क्या होती है, यह  मुझे बीते दिनों महसूस हुआ। दरअसल, मैं भी चुनाव लड़ रहा था। जी नहीं! मैं किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं। मैं तो एक सीधा और सज्जन इंसान हूं। राजनीतिक दल से मेरा दूर दूर से कोई नाता नहीं। मैं पत्रकारों का चुनाव लड़ रहा था। मुझे लगा था कि मैं इस चुनाव में अपनी पत्रकारिता के दम पर बेहतर प्रदर्शन कर सकता हूं, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि मेरा सारा बेहतर प्रबंधन उस एक ‘कत्ल की रात’ को तार-तार हो जाएगा और चुनाव में मुझे चारों खाने मात खानी पड़ जाएगी। जनाब मैं चुनाव हार गया!! पर मैं आपकी बधाइयां चाहता हूं कि मैं ‘कत्ल की रात’ का भागीदार होने से बच गया!!!

चुनाव। पिछले साल अप्रैल-मई में देश की सरकार चुनने के लिए चुनाव। इसकी खुमारी उतरी नहीं कि नवंबर में विधानसभा के चुनाव। यह खुमारी जाए इससे पहले इस साल की शुरूआत में नगरीय निकाय और फिर पंचायत चुनाव। कसम से अवसर पर अवसर… अब आप पूछेंगे कैसा अवसर, अरे जनाब अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं, अवसर तो कुछ और होता है। कहने को अपना देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन यहां चुनाव होते ही दूसरे गणित होने शुरू हो जाते हैं। गुणा भाग शुरू हो जाता है! सबके सब लग जाते हैं, इस कोशिश में कि कौन उनको ज्यादा से ज्यादा उपकृत कर सकता है…! और जब एक के बाद एक चार चुनावों की खुमारी हावी हो तो मीडिया के चुनाव में भी इसका असर दिखना लाजिमी था। सो कुछ जनाब लग गए ‘कत्ल की रात’ के इंतजार में…!

मेरे अपने शहर में पत्रकारों का चुनाव था। मैं भी एक दावेदार था। एक पत्रकार सज्जन(?) मेरे पास आए और कहने लगे कि मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मतदाता यूनियन बनाया है और हमारी कुछ मांगे हैं, आपको इन मांगों को पूरी करनी है, फिर आपकी जीत पक्की!!!! जीत पक्की सुनकर मैं खुश हो गया लेकिन उनकी मांगों ने मुझे डरा दिया… वही ‘कत्ल की रात’। अब कोई आम चुनाव तो था नहीं कि ‘कत्ल की रात’ एक होती, जनाब की मांग थी कि चुनाव तो एक दिन का है, पर आपको ‘कत्ल की रात’ के ‘अवसर’ उनको ‘अक्सर’ उपलब्ध कराने होंगे!

कसम से मैं तो डर ही गया और उसी दिन मेरी हार हो गई… चुनाव हुए, परिणाम भी आए, मैं हार गया, क्योंकि मेरे पास ‘कत्ल की रात’ का इंतजाम नहीं था, पर मुझे उम्मीद नहीं थी कि बुद्धिजीवियों के चुनाव में भी ‘कत्ल की रात’ होती है, मुझे लगता था कि यह तो राजनीतिक दलों के चोचले हैं, पर मैं गलत था क्योंकि जब भी चुनाव होगा, ‘कत्ल की रात’ भी होगी….!

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