केजरीवाल का पर्दाफाश : विशाल लाठे ने आम आदमी पार्टी के चेहरे से नकाब हटाई

दिल्ली : मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता विशाल लाठे ने एक चिट्टी लिखकर हकीकत से पर्दा उठाने का प्रयास किया है। ऐसे समय को उन्होंने आम आदमी पार्टी का काला दिन करार दिया है। उन्होंने सविस्तार अपने पत्र में अरविंद केजरीवाल का पर्दाफाश करते हुए आम आदमी पार्टी के चेहरे से नकाब हटा दी है। 

योगेंद्र यादव और विशाल लाठे

उन्होंने बताया है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग के दौरान प्रातः 9 बजे साथियों को लाइन लगा कर सभागार में चेक करने के बाद ही अंदर जाने दिया गया था। जो साथी पहले से चिन्हित थे, उन्हें उस दिन अंदर नहीं आने दिया गया था। अंदर लगे डेस्क पर सभी साथियों के मोबाइल और सामान जमा करा लिए गए थे, जो कि पहले कभी किसी मीटिंग में नहीं हुआ था। 

उन्होंने बताया कि 9:35 पर  सुधीर भरद्वाज और दिलीप पाण्डेय मुझे एक अलग कक्ष में ले गए। मेरे साथ एक अन्य साथी जोकि मेंबर थे को ले जाया गया। मेरे आगे एक कागज रख दिया गया, जिस पर सुधीर ने दस्तखत कर दिए और मुझसे करने को कहा गया। मेरे सामने प्रीतिशर्मा मेनन और गोपाल रॉय बैठे थे। मैंने पढ़ने की इच्छा जताई तो कहा गया कि क्या जरूरत है। गोपाल रॉय ने कहा की हम पर भरोसा नहीं है क्या, मैंने फिर भी उसे पढ़ा। 

उन्होंने बताया कि उस पेपर पर लिखा था – ‘रेसोलुशन। प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, अजीत झा, प्रो. आनंद कुमार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्य परिषद से निकाल दिया जाए।’ मैं पढ़ कर चौंक गया। मैंने तुरंत पूछा, ये क्या है, मीटिंग से पहले रेसोलुशन पर दस्तखत कैसे ले सकते हैं आप? मैंने दस्तखत करने से मना कर दिया और बहार आ गया। मेरे साथ दूसरे साथी भी बाहर आ गए। 

उन्होंने बताया कि उसके बाद संजय को जैसे ही पता लगा कि मैंने दस्तखत करने से मना कर दिया है तो शायद रायता फैलने के डर से मुझसे काफी देर बात कर पटाने की कोशिश करते रहे। साथ ही, मेरी औकात क्या है, कह कर धमकाया भी, लालच भी दिया गया। उत्तर प्रदेश का संयोजक बनाने और मुरादाबाद से टिकट देने का लालच दिया गया। खैर, उस समय मैंने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद मीटिंग रूम में मेरे पीछे 3-4 बॉउन्सर्स अलग से खड़े कर दिए गए।

उन्होंने बताया कि अरविन्द केजरीवाल ने भाषण देना शुरू किया तो पार्टी की दिल्ली फतह से बात शुरू कर प्रशांत और योगेन्द्र पर पहुंच गए। फिर शांति भूषण का नाम लिए बगैर बोले कि ‘किसी ने मुझे किरण बेदी, अजय माकन से भी निचले पायदान पर रखा, क्या उसे पार्टी में रहना चाहिए?’ उस समय मर्यादित दिखने वाले कुछ पार्टी विधायक अचानक खड़े हो गए और गद्दारों को बाहर निकालो, कहकर नारे लगाने लगे। नितिन त्यागी और कपिल मिश्र उन्हें लीड कर रहे थे। कहा गया कि गद्दारों को उठा कर बाहर फ़ेंक दो। यह सब अरविन्द चुपचाप देखते रहे।

इसके बाद अरविन्द ने कहा कि मैं इनके साथ काम नहीं कर सकता। इसलिए या तो मुझे या इन लोगों को चुन लें। मैं अपना इस्तीफा पार्टी के सभी पदों से देता हूँ। इसके बाद वह एक मीटिंग में शामिल होने की बात कह कर तुरंत बाहर निकल गए। उनके जाते ही गोपाल राय ने कमान संभाल ली। मनीष सिसौदिया ने कहा कि योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और अजित झा को नेशनल कौंसिल से निकाला जाए। उस समय तुरंत एक साथी रेहमान चौधरी, जो मेरे करीब ही बैठे थे, उठकर बोले कि उनको भी सफाई देने का मौका मिलना चाहिए। हम उन्हें सुनना चाहते हैं। उनके इतना कहते ही बगल में बैठे दुर्गेश ने बॉउन्सर्स को इशारा किया और उन्होंने उन्हें जबरदस्ती  बाहर खींच ले गए।

विशाल लाठे ने बताया कि बाहर लेजाकर उन्हें लात घूसे मारे गए और वहीं बैठने को कहा गया। योगेन्द्र, पंकज, पुष्कर मैं और एक अन्य साथी ने कहा कि ये गलत हो रहा है। आप ऐसा नहीं कर सकते। मैंने कड़ा विरोध किया। उसके बाद उन्हें अंदर लिया गया। इस दौरान बिना सुने ( पूर्व में ही दस्तखत करे हुए पन्नों से ) रेसोलुशन लाया गया। वहां मौजूद बॉउन्सर्स ने दो-दो हाथ खड़े कर दिए और उनकी गिनती होने लगी। विधायकों ने हाथ खड़े कर दिए जबकि केवल फाउंडर मेंबर्स ही वोट दे सकते थे। यह सब मुझसे देखा न गया।

विशाल लाठे ने बताया कि मैं तो अरविन्द के लिए वोट देने गया था लेकिन परिस्थितियों को देखकर मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा और अचानक मुझे योगेन्द्र और प्रशांत, अजीत झा और आनंद कुमार बेहतर लगने लगे। मैं उनके साथ बाहर आ गया। बहार आने वालो में हमारे एमपी डॉ. गांधी और एमएलए पंकज पुष्कर भी थे। अब प्रश्न है कि क्या हम सभी गलत हैं। एमपी और एमएलए को तो कोई लालच भी नहीं है। क्या ये एक नयी आम आदमी पार्टी है? क्या चुनाव लड़ने के बाद आम आदमी पार्टी बदल गयी है?

उन्होंने कहा है कि अरविन्द शायद अब ये भूल गए कि जैसे मोहल्ला सभा को सिर्फ अपने मोहल्ले से जुड़े मुद्दों का निर्णय लेने का हक़ होगा, वैसे ही पार्टी में भी पंचायत, नगर निगम, राज्य आदि लेवल पर वहां के लोकल वॉलेंटियर्स का इनपुट लिया जा सकता है और लिया जाना भी चाहिए। वैसे वो अरविन्द ही थे जिन ने कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का निर्णय लेते समय न केवल वॉलेंटियर्स बल्कि दिल्ली की आम जनता का भी इनपुट बड़ी ही जल्दी ले कर इस “असंभव” काम को संभव कर दिखाया था!

डोनेशन की जाँच पर अरविन्द ने कहा था कि ‘ये लोग (प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव) उन 4 डोनेशन की जाँच करवाने की बात कर रहे हैं, इस जाँच से किसको फायदा होगा? मोदी को फायदा होगा। बीजेपी वाले बोलेंगे की जब तक जाँच चल रही है, इस्तीफा दो।’ बड़े ही आश्चर्य की बात है कि ये वही अरविन्द हैं, जो अपने द्वारा किये हर खुलासे और आरोप पर कांग्रेस और बीजेपी से जाँच करवाने की बात करते थे। कल को अगर बीजेपी या कांग्रेस के नेता भी यही तर्क दें कि भाई हमारे किसी भी मामले की जाँच हम नहीं करवाएंगे क्योंकि इस से विपक्ष को फायदा होगा, विपक्ष इस्तीफा मांगेगा तो क्या अरविन्द उनकी इस बात को मानेंगे? राजनीति में सच्चाई, पारदर्शिता और न्याय की बात करने वाले अरविन्द मीटिंग में जाँच से बचते हुए दिखे।

वैसे चुनाव से ठीक पहले जब उन 4 डोनेशन का मामला चर्चा में आया था, तब अरविन्द ने बरखा दत्त को दिए इंटरव्यू में इस देश के लोगों से वादा किया था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वह खुद इन चार डोनेशन की जाँच के आदेश देंगे। प्रशांत भूषण इस वादे को अगर याद दिलाते हैं तो क्या वह पार्टी विरोधी थे? दिल्ली चुनाव में टिकिट बाँटने में कई खामियां हुईं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। हमारे एक एमएलए प्रत्याशी के गोदाम से शराब पकड़ी गयी थी। अमानतुल्ला खान पर कथित इंडियन मुजाहदीन के आतंकी की मदद करने का आरोप लगा था और ये वही अमानतुल्ला खान हैं, जो कोर्ट के निर्णय के बावजूद बटाला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताते हैं और दोबारा जाँच की मांग करते हैं। अमानतुल्ला को आप ने सिर्फ इसलिए टिकिट दिया क्योंकि वह मुस्लिम हैं।

इसके आलावा जिन 12 प्रत्याशियों की जाँच प्रशांत ने लोकपाल से करवाई, उनमें से 2 दोषी पाये गए, 6 के खिलाफ लोकपाल ने चेतावनी दी और सिर्फ 4 को क्लीन चिट दी। इन 2 प्रत्याशियों के टिकट वापस लिए गए। इसका मतलब साफ़ है कि पार्टी ने टिकट बंटवारे में गलती की थी और अगर प्रशांत ये मामला लोकपाल के पास नहीं ले जाते तो इन 2 अपराधी और गलत छवि के लोगों की भी देश की राजनीती में एंट्री आम आदमी पार्टी के जरिये हो जाती क्योंकि उनको टिकट तो दिए ही जा रहे थे। अरविन्द खुद हमेशा कहते थे कि राजनीति में अपराधी नहीं आने चाहिए। पर दुःख की बात ये है कि आज अरविन्द, प्रशांत भूषण के इस कदम की तारीफ करना तो दूर बल्कि उनके इस कदम को पार्टी विरोधी बता रहे हैं। ये बोल रहे हैं कि प्रशांत ने उन को बहुत परेशान किया।

पार्टी का RTI के अंदर आना: अरविन्द ने इस बात को बड़ी आसानी से एक लाइन में टाल दिया कि “जरूर आना चाहिए”। आना तो चाहिए पर अरविन्द इस बात का जवाब नहीं दे पाये कि जब वह सभी पार्टियों को RTI के अंतर्गत आने की मांग करते हैं तो फिर वह खुद अपनी पार्टी को अभी तक RTI के अंदर क्यों नहीं लाये? क्यों प्रशांत भूषण को इस बात के लिए दबाव बनाने की जरुरत पड़ रही है? और ये कोई प्रशांत की मांग नहीं है, ये बात तो खुद अरविन्द पिछले ४ साल से बोल रहे हैं तो अपने ही वादे को पूरा करना अरविन्द की जिम्मेदारी है कि नहीं? इसमें भूषण पार्टी विरोधी कैसे हो गए? क्यों अरविन्द अपने ही वादे को पूरा करने में प्रशांत भूषण पर अहसान जता रहे हैं?

क्या प्रशांत और योगेन्द्र को शो कॉज नोटिस दिया गया? क्या पार्टी ने इन दोनों पर जो आरोप लगाये, उसके पर्याप्त सबूत दिए? क्या मीटिंग में सही ढंग से वोटिंग हुई? क्या इन आरोपों की जाँच किसी स्वतंत्र संस्था से करवाई गई? कुछ AAP कार्यकर्ता ये बोलते हैं कि सबूत तो है पर इसलिए नहीं दिखा रहे कि उससे इन दोनों की बदनामी होगी। जब दोनों को सरे आम पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगा कर निकाला गया तो बदनाम तो वैसे भी किया ही है पार्टी ने, तो अब सबूत बताने में क्या शर्म?

बात ये भी है की जब NC की मीटिंग में अरविन्द को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया, कुमार विश्वास को अपनी बात रखने दी गयी तो फिर जिन लोगों पर आरोप लगे थे, उनको अपना पक्ष रखने का मौका क्यों नहीं दिया गया? और एक पक्ष की दलील के बाद ही कथित वोटिंग करवा ली गयी। ये तो ठीक वैसा ही होगा जैसे कोर्ट में सिर्फ एक ही पक्ष को अपनी दलील रखने दी जाये और फिर ज्यूरी से बोला जाये कि अब इसके आधार पर अपना फैसला सुना दो।

NC की मीटिंग में मारपीट तो एक ऐसी शर्मनाक घटना है जो शायद अभी तक देश की किसी भी पार्टी की मीटिंग में नहीं हुई होगी जिसमें उस पार्टी के सर्वोच्च नेता मौजूद हों। वैसे AAP इस बात को नकार रही है। पर सवाल उठता है कि अगर मारपीट नहीं हुई तो फिर पार्टी पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग क्यों नहीं जनता के सामने रख देती? अरविन्द के भाषण के बाद मुश्किल से 1 घंटे के अंदर ही वोटिंग हो गयी थी तो इस सिर्फ 1 घंटे का वीडियो जारी करने में पार्टी को कितना समय लगेगा? क्या कारण था कि लोगों को मीटिंग के अंदर मोबाइल नहीं ले जाने दिया गया? ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ।

बात ये भी है कि क्या प्रशांत भूषण वाकई में गलत थे? क्या पार्टी में गलत टिकिट के बंटवारे, RTI की वकालत, वॉलेंटियर की आवाज ज्यादा सुनी जाने की मांग, डोनेशन और व्यय में पारदर्शिता और जाँच की मांग करना पार्टी विरोधी है? पीठ में छुरा घोपना है? इन ही सब सिद्धांतों पर तो ये पार्टी बनी थी, ये सारी तो अरविन्द की ही कही बातें हैं पर अब लगता है, इस “नई” आम आदमी पार्टी में जो भी उन पुराने और मूलभूत सिद्धांतों की बात करेगा वो पार्टी विरोधी कहलायेगा, उसको चुनाव हरवाने वाला कहा जायेगा। और ये सारी बातें पार्टी के अंदर ही उठाई जा रही थीं, प्रशांत भूषण ने पार्टी के बाहर तो कुछ नहीं कहा, यहाँ तक कि जब उन के पिता का अरविन्द के खिलाफ बयान आया था तो प्रशांत भूषण सबसे पहले टीवी पर आ कर बोले थे कि मै शांति भूषण से सहमत नहीं हूँ।

अरविन्द ने खुद कहा की जब वो राजनीती छोड़ने का मन बना चुके थे तब योगेन्द्र और प्रशांत ही उन के पास आये और उन ने अरविन्द की मांग मानी, तो ये आरोप की योगेन्द्र और प्रशांत अरविन्द से पावर छीनना चाहते हैं, या वो अरविन्द को हटाना चाहते हैं वो तो बिलकुल गलत है। पार्टी के लोकपाल “एडमिरल रामदास” जैसे सम्मानित व्यक्ति को निकला गया। अचानक क्या जरुरत आ पड़ी थी उनको निकलने की? क्या इसके पीछे ये कारण नहीं कि उन को इसलिए निकला गया क्योंकि उन्होंने कुछ लोगों के इशारों पर काम करने से इंकार कर दिया था। 

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