एबीपी के अनोखे शो ‘प्रेस कांफ्रेस’ में गूंजा केजरीवाल का ‘ठुल्ला’

एबीपी न्यूज ने नया शो प्रेस कांफ्रेंस ने शुरू किया है जो हर शनिवार रात 8 बजे, रविवार सुबह 10 बजे और रात में 8 बजे प्रसारित किया जाता है. एबीपी न्यूज के पहले शो में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शिरकत की और खुलकर सारे सवालों का जवाब दिया. ये देश का इकलौता पहला शो है जिसमें 12 वरिष्ठ पत्रकार शामिल हैं जो हर गेस्ट से ये सवाल करेंगे. प्रेस कांफ्रेंस शो के एंकर वरिष्ठ पत्रकार दिबांग हैं.

पहले इंटरव्यू ‘शो’ में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ‘ठुल्ला’ शब्द पर माफी मांगी। वह कहते हैं, प्रधानमंत्री दिल्ली सरकार को ठीक से काम नहीं करने दे रहे हैं, एलजी साहब और पुलिस कमिश्नर बस्सी साहब हैं अच्छे इंसान। उनसे कोई विवाद नहीं। उनपर ऊपर से प्रेशर बनाया जाता है। प्रधानमंत्री जी दिल्ली पुलिस का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, ठुल्ला कहने पर मुझ पर एफआईआर दर्ज करवाया गया लेकिन सुषमा स्वराज वसुंधरा राजे, शिवराज के खिलाफ क्यों नहीं हुई दर्ज एफआईआऱ ? वह वादा करते हैं कि पांच साल में दिल्ली में वैट आसान हो जाएगा। उन्होंने ने माना कि उनसे दो गलतियां हुई हैं। वह कहते हैं कि बीजेपी को दिल्ली में केन्द्र सरकार के साथ अपने रवैये का खामियाजा बिहार में भुगतना पड़ेगा। उन्होंने खुद बिहार चुनाव में प्रचार के बारे में अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इंटरव्यू में उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने का शौक नहीं है।

अपने इस अनोखे शो को लेकर ‘एबीपी न्यूज’ लिखता है- ” ठुल्ला शब्द का मतलब होता है निठल्ला. ये अपमानजनक शब्द है. अरविंद केजरीवाल के द्वारा ठुल्ला शब्द इस्तेमाल करने के बाद ये शब्द  ट्विटर, फेसबुक से लेकर व्हॉट्सएप पर चर्चा का विषय बन गया है. लोगों ने ‘ठुल्ला’ को लेकर कमेंट करने शुरू किए तो पुलिसकर्मियों ने भी उसे काउंटर करना शुरू कर दिया. इसी मामले को लेकर कई पुलिसवाले केजरीवाल के खिलाफ कोर्ट भी पहुंच गये हैं.

”केजरीवाल ने ठुल्ला शब्द का इस्तेमाल करके चौतरफा निशाना साधने की कोशिश की है . दिल्ली में मीनाक्षी की हत्या के बाद जनता दिल्ली सरकार और पुलिस पर उंगुली उठा रही थी . केजरीवाल ने इस शब्द का इस्तेमाल करके ये जताने की कोशिश की है पुलिस कुछ नहीं कर रही है यानि दिल्ली की पुलिस निठल्ली है. केजरीवाल पर जनता सवाल नहीं उठाए इसीलिए उन्होंने ये कहकर गेंद पुलिस के पाले में डालने की कोशिश की. ठुल्ला शब्द के बाद केजरीवाल की काफी निंदा होने लगी. कैसे एक मुख्यमंत्री इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं . केजरीवाल को इस शब्द के जरिए जो संदेश देना था वो संदेश दिल्ली में नहीं पूरे देश में फैल चुकी है.”

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एलजी साहब, ये तो हद हो गई !

नई दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार के साथ उप राज्यपाल यानि एलजी नजीब जंग के बीच चल रही जंग अब अत्यंत ही फूहड़ और अलोकतांत्रिक हो गई है। एक सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी यह बात समझ सकता है कि विशाल बहुमत से चुनी गई नई दिल्ली की केजरीवाल सरकार को हर तरह से केन्द्र की भाजपा सरकार द्वारा परेशान किया जा रहा है। 

भारत के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि एक चुनी हुई सरकार और उसके मुख्यमंत्री को किसी भी तरह की नियुक्ति-तबादले अथवा पदस्थापना के अधिकार ही ना हों। अभी केजरीवाल सरकार ने दिल्ली महिला आयोग की नई प्रमुख के रूप में स्वाति मालीवाल की नियुक्ति की है और उनके द्वारा कार्यभार संभालते ही एलजी की ओर से यह फरमान सुनाया गया कि उनकी नियुक्ति बिना उप राज्यपाल की अनुमति के की गई, लिहाजा उसे खारिज किया जाता है और स्वाति मालीवाल को भी कहा गया कि वे काम ना करें अन्यथा उनके दफ्तर में ताला जड़ दिया जाएगा। लगे हाथ एलजी ऑफिस से यह भी कहा गया कि सरकार का मतलब उप राज्यपाल ही है। अब इस पर भाजपा का तो एलजी का पक्ष लेना समझ में आता है मगर कांग्रेस के दिमाग पर भी पत्थर पड़ गए हैं, जो वह ऐसे हिटलरशाही आदेशों को सही बताते हुए केजरीवाल सरकार को ही कोस रही है और भाजपा की मददगार दिख रही है। 

कई जानकारों का यह तर्क भी है कि ऐसा तो संविधान में ही स्पष्ट है और नई दिल्ली को चूंकि पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं है, लिहाजा एलजी के ऐसे आदेश और निर्देश कानूनन सही हैं। अब यहां सवाल यह है कि फिर नई दिल्ली में चुनाव कराकर एक लोकतांत्रिक सरकार को बैठाया ही क्यों गया? एलजी के भरोसे ही नई दिल्ली राज्य का संचालन करवाया जाता रहता। विधिवत हुए चुनाव में 67 सीटें जीतकर आप पार्टी ने प्रचंड बहुमत हासिल किया और जनता के प्रति उसकी जिम्मेदारी भी बनती है। वोट मांगते वक्त कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा ने भी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग की थी और आप पार्टी तो इसको लेकर आंदोलनरत रही ही और अब सरकार में आने के बाद भी उसे संघर्ष करना पड़ रहा है। 

आज जनता मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ-साथ उनकी पार्टी के मंत्रियों और विधायकों के पास ही पुलिस से लेकर अन्य संबंधित विभागों की समस्याएं लेकर जाएंगी और चूंकि पुलिस भी उनके अधीन नहीं हैं तब वे जनता को कैसे राहत दिलवा पाएंगे? और तो और अभी राज्य महिला आयोग में स्वाति मालीवाल की नियुक्ति को लेकर भी न्यूज चैनलों और विपक्षीय पार्टियों ने इस तरह हल्ला मचाया जैसे देश में ये पहली राजनीतिक नियुक्ति की गई हो। अब अगर आम आदमी पार्टी अपनी ही विचारधारा या पार्टी से संबद्ध लोगों की नियुक्तियां नहीं करेंगी तो क्या कांग्रेस और भाजपा के लोगों को पदों पर बैठाएगी? 

अगर उसे अपनी रीति-नीति को लागू करवाना है तो अपनी ही विचारधारा और पार्टी से जुड़े लोगों को पदों पर बैठाना पड़ेगा। गनीमत है कि अरविंद केजरीवाल से यह मांग नहीं की गई कि वे मंत्री सहित अन्य पदों पर भी बजाय आप विधायकों को बैठाने के कांग्रेस और भाजपा के लोगों को ये मौका दिया जाता। नई दिल्ली की वर्तमान परिस्थितियों में अब अदालती हस्तक्षेप और कड़ा फैसला ही जरूरी है। हाईकोर्ट से लेकर और खासकर सुप्रीम कोर्ट को नई दिल्ली के संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट आदेश जारी करना चाहिए ताकि रोजाना की हो रही फजीहत खत्म हो और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को काम करने का पूरी तरह से मौका मिल सके। यहां पर सबका साथ – सबका विकास का नाराा देने वाली केन्द्र की मोदी सरकार भी पूरी तरह एक्सपोज हो चुकी है। अगर वह लोकतंत्र की हिमायती है तो उसे नई दिल्ली की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को कानूनों में बदलाव कर अधिकार दिए जाना चाहिए। अगर मोदी सरकार ताबड़तोड़ भूमि अधिग्रहण से लेकर अन्य अधिनियम संसद से मंजूर करवाए बिना अध्यादेश के जरिए लागू कर रही है तो उसे नई दिल्ली के मामलों में बदलाव करने में हिचक क्यों है? 

एलजी की तरह ही दिल्ली पुलिस का रवैया और बीते दिनों में हुई कार्रवाई भी साफ-साफ बताती है कि केजरीवाल सरकार को काम ना करने देने से लेकर बदनाम करने का षड्यंत्र भी किया जाता रहा। एक तरफ बलात्कार से लेकर कई गंभीर अपराधों में घिरे अन्य पार्टियों के सांसद, विधायक और मंत्री बेफिक्र घूम रहे हैं और उनको नोटिस जारी करने की भी हिम्मत दिल्ली पुलिस आज तक नहीं दिखा पाई, जबकि आम आदमी पार्टी के मंत्री से लेकर विधायक को रातों रात गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि अगर आप पार्टी के ये लोग दोषी हैं तो कानून के मुताबिक गिरफ्तारी से लेकर सजा भी  मिलना चाहिए मगर ये कानून का राज क्या सिर्फ एक ही पार्टी के लिए हैं अथवा सभी के लिए?

लेखक-पत्रकार राजेश ज्वेल से सम्पर्क – 9827020830, jwellrajesh@yahoo.co.in

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मीडिया पर अरविंद-अखिलेश के तेवर एक, रोज-रोज की बेढंगी चाल से दोनो तल्ख, भरोसा टूटा

 

नई दिल्ली : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने गत दिवस दिल्ली सचिवालय में हुई एक साझा बैठक में जमीन विवाद सुलझाने पर आपसी विमर्श किया। बैठक में दिल्ली-नोएडा बॉर्डर के पास स्थित जमीन के बेहतर उपयोग पर चर्चा हुई। करीब एक घंटे चली बैठक में पहले मुख्यमंत्री, मंत्री, अधिकारियों के बीच संयुक्त बैठक हुई और फिर अधिकारियों को अलग करके चर्चा की गई। बैठक के साथ ही एक सबसे महत्वपूर्ण सूचना पूरे देश में गूंज गई, मीडिया हाउसों के मनमानेपन पर अखिलेश यादव की टिप्पणी। गौरतल है कि इन दिनो मुख्यमंत्री केजरीवाल भी मीडिया के जादू मंतर से काफी क्षुब्ध हैं। इस मुद्दे पर दोनो सीएम के तेवर एक से माने जा रहे हैं। 

केजरीवाल से मुलाकात के बाद सीएम यादव ने कहा कि मैंने केजरीवाल को बधाई दी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार होना एक बड़ी बात है। उल्लेखनीय है कि गत सोमवार को सीएम केजरीवाल ने मीडिया समूहों पर विश्वास न करते हुए कहा था कि अब मीडिया की भूमिका पर पब्लिक ट्रायल होना चाहिए। 

मंगलवार को वही अंदाज सीएम यादव का रहा। वह भी अंदर से मीडिया के तौर तरीकों को लेकर काफी नाखुश हैं। वह उससे बचकर रहना चाहते हैं। अपने आवास पर हुई कैबिनेट की बैठक के बाद सीएम यादव ने सीएम केजरीवाल की तारीफ के साथ कहा कि मीडिया ही हमें बनाता है और वही गिराता है। इसलिए मीडिया से अनुरोध है कि वह न तो हमें बनाए और न गिराए। यूपी सीएम ने मीडिया से खुद को बख्श देने की गुजारिश भी की। 

यूपी के सीएम ने कहा कि ये मीडिया कभी अर्श तक उठाता है, कभी फर्श तक पहुंचाने की कोशिशें करने लगता है। उनकी टिप्पणी के निहितार्थ साफ थे कि मीडिया का रंग उन्हें सीएम केजरीवाल की तरह ही एकदम अच्छा नहीं लग रहा है। उन्होंने कहा कि मीडिया का कोई भरोसा नहीं है और केजरीवाल तो खुद भी खून के घूंट पीते रहते हैं। 

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मजीठिया वेतनमान : मीडिया कर्मियों पर फैसला आने से पहले कई सवाल केजरीवाल पर

अब तो लाखो मीडिया कर्मियों के भविष्य ही नहीं, केजरीवाल के एक और इम्तिहान का भी दिन होगा 28 अप्रैल । जिस दिन से दिल्ली के मुख्यमंत्री ने प्रिंट मीडिया के पत्रकारों और कर्मचारियों के वेतन को लेकर गठित जीआर मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन की निगरानी के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त करने की घोषणा की है, मन में कई तरह के प्रश्न और संदेह आ-जा रहे हैं। मसलन, क्या अरविंद केजरीवाल सचमुच अपनी घोषणाओं पर सख्ती से अमल कर भारतीय प्रिंट मीडिया नामक कारपोरेट हाथियों से शत्रुता मोल ले सकते हैं, या इसके पीछे भी कोई बड़ा खेल है, जो हाल-फिलहाल पकड़ में नहीं आना है?

यह प्रश्न अनायास नहीं। और विश्वास कर लेना भी मुश्किल नहीं। अन्ना आंदोलन से आज दिल्ली में ऐतिहासिक सरकार बनने तक अरविंद केजरीवाल की खूबियों और माद्दा से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह भी विश्वास किया जा सकता है कि उन्हें लड़ाई लड़ने आता है। उन्होंने जीवन में लड़ने का रास्ता चुना है। वह जिस तरह के अतीत से आते हैं, वह भी संघर्षशील हर मन को ललचाता और उम्मीद बंधाता है, लेकिन पिछले दिनो आम आदमी पार्टी के भीतर योगेंद्र यादव, कुमार आनंद, प्रशांत भूषण आदि की बगावत की बू अरविंद केजरीवाल के बारे में नये सिरे से सोचने को विवश करती है। एक बात और। उनके अत्यंत निकट, इर्द-गिर्द जिस तरह के लोग खड़े हैं, उनमें कई-एक के रंग-ढंग मजीठिया मामले पर भी केजरीवाल की ताजा भूमिका (घोषणा) एकदम से पचा लेने, उस पर अडिग विश्वास कर लेने पर सहमत नहीं होने देते। 

इतना साफ साफ सा है कि आज के कारपोरेट मीडिया से मोरचा लेना आसान नहीं है। केजरीवाल की घोषणा स्पष्टतः कारपोरेट मीडिया को ललकारने वाली है। आगामी 28 अप्रैल को एक ऐसा फैसला आने वाला है, जिस पर लाखों मीडिया कर्मियों का भविष्य निर्भर है। मीडिया घराने न्यायाधीशों को प्रभावित करने के हजार उपाय जोड़ने में जुटे हैं। जिनके हितों की वकालत में सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर दस्तक दी गई है, वे मीडिया प्रबंधन से डरे-सहमे हुए खुलकर साथ आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। न्यायपालिका के भी रंग-ढंग देखते हुए उनका भी डर अनायास, अस्वाभाविक नहीं है। हमे एक झटके में किसी के क्रांतिकारी हो जाने की गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए। ऐसे हालात में और भी सवाल बनते हैं कि क्या केजरीवाल की घोषणा का उनके पुराने साथी (योगेंद्र यादव, कुमार आनंद, प्रशांत भूषण आदि) तात्कालिक फायदा नहीं उठाना चाहेंगे? अथवा कारपोरेट मीडिया उनकी आवाज थाम कर केजरीवाल की ताकत कमजोर नहीं करना चाहेगा?

उल्लेखनीय है कि पिछले दिनो मजीठिया वेज बोर्ड क्रियान्वयन संघर्ष समिति के प्रतिनिधिमंडल की मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया से संक्षिप्त मुलाकात हुई थी। उसके बाद केजरीवाल ने मजीठिया बोर्ड की अनुशंसाओं के क्रियान्वयन की जमीनी हकीकत जानने के लिए श्रम विभाग से एक रिपोर्ट तलब कर ली है। साथ ही, उन्होंने वेज बोर्ड की अनुशंसाओं की नियमित निगरानी के लिए श्रम विभाग को तत्काल एक निगरानी समिति गठित करने का भी निर्देश दिया है। क्या केजरीवाल ने इतना बड़ा निर्णय बिना आगे-पीछे सोचे-विचारे ही ले लिया होगा, या इस पर उनकी अपने साथियों से कोई गंभीर मंत्रणा न हुई होगी। ऐसा हो भी सकता है, नहीं भी। कारपोरेट मीडिया ने अतीत में केजरीवाल के लिए भी कुछ कम टगड़ी नहीं मारी हैं। कदम कदम पर उन्हें शोशेबाजियों से उलझाने की कोशिशें की हैं। लोकसभा चुनाव से पहले और बाद तक तो जैसे वह हाथ धोकर ‘आप’ के पीछे पड़ा रहा है। यदि केरजरीवाल सचमुच अपने अन्य निर्णयों की तरह इस मजीठिया मसले पर भी अडिग रहते हुए मीडिया कर्मियों का साथ अंत तक निभाते हैं तो राजपाठ के वक्र-जनद्रोही तौर-तरीकों की दृष्टि से ये सब भी पहली बार सातवें अजूबे जैसा ही होगा।

तय है, कारपोरेट मीडिया घराने यह सब यूं ही जान-सुनकर खामोश न हो गए होंगे। उनके मन में भी कुछ-न-कुछ जरूर तेजी से पक रहा होगा। हो सकता है, उनकी मंशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिरे से कोई गुल खिलाने की हो और वे उस दिशा में अंदर-ही-अंदर सक्रिय भी हों। शायद अवश्य। ऐसे में एक और बड़ा सवाल बनता है कि न्यायपालिका तीन विंदुओं में से किस पर 28 अप्रैल को खरी उतरती है- एक, वह कारपोरेट मीडिया की तिकड़मों के दबाव में आ जाती है, केजरीवाल बनाम मजीठिया वेज बोर्ड क्रियान्वयन संघर्ष समिति के अनुकूल कोई फैसला सुनाती है अथवा न्यायाधीश पद की गरिमा के अनुकूल कोई ऐसा निर्णय दे देती है, जो दोनो पक्षों को मान्य हो? जैसा कि संभव नहीं। 

यह भी गौरतलब होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले से चेतावनी दे रखी है, मजीठिया मामले पर 28 अप्रैल सुनवाई का अंतिम दिन है। उसी दिन फाइल बंद। फैसला चाहे जो भी रहे। तो क्या ये अंतिम प्रश्न भी परेशानी का सबब नहीं कि जिसके विपक्ष में फैसला होगा, इस मामले पर उसके लिए अदालत के दरवाजे सचमुच हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे? संभवतः ऐसा भी नहीं !

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केजरीवाल का पर्दाफाश : विशाल लाठे ने आम आदमी पार्टी के चेहरे से नकाब हटाई

दिल्ली : मीडिया की सुर्खियों में आने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता विशाल लाठे ने एक चिट्टी लिखकर हकीकत से पर्दा उठाने का प्रयास किया है। ऐसे समय को उन्होंने आम आदमी पार्टी का काला दिन करार दिया है। उन्होंने सविस्तार अपने पत्र में अरविंद केजरीवाल का पर्दाफाश करते हुए आम आदमी पार्टी के चेहरे से नकाब हटा दी है। 

योगेंद्र यादव और विशाल लाठे

उन्होंने बताया है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग के दौरान प्रातः 9 बजे साथियों को लाइन लगा कर सभागार में चेक करने के बाद ही अंदर जाने दिया गया था। जो साथी पहले से चिन्हित थे, उन्हें उस दिन अंदर नहीं आने दिया गया था। अंदर लगे डेस्क पर सभी साथियों के मोबाइल और सामान जमा करा लिए गए थे, जो कि पहले कभी किसी मीटिंग में नहीं हुआ था। 

उन्होंने बताया कि 9:35 पर  सुधीर भरद्वाज और दिलीप पाण्डेय मुझे एक अलग कक्ष में ले गए। मेरे साथ एक अन्य साथी जोकि मेंबर थे को ले जाया गया। मेरे आगे एक कागज रख दिया गया, जिस पर सुधीर ने दस्तखत कर दिए और मुझसे करने को कहा गया। मेरे सामने प्रीतिशर्मा मेनन और गोपाल रॉय बैठे थे। मैंने पढ़ने की इच्छा जताई तो कहा गया कि क्या जरूरत है। गोपाल रॉय ने कहा की हम पर भरोसा नहीं है क्या, मैंने फिर भी उसे पढ़ा। 

उन्होंने बताया कि उस पेपर पर लिखा था – ‘रेसोलुशन। प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, अजीत झा, प्रो. आनंद कुमार को पार्टी की राष्ट्रीय कार्य परिषद से निकाल दिया जाए।’ मैं पढ़ कर चौंक गया। मैंने तुरंत पूछा, ये क्या है, मीटिंग से पहले रेसोलुशन पर दस्तखत कैसे ले सकते हैं आप? मैंने दस्तखत करने से मना कर दिया और बहार आ गया। मेरे साथ दूसरे साथी भी बाहर आ गए। 

उन्होंने बताया कि उसके बाद संजय को जैसे ही पता लगा कि मैंने दस्तखत करने से मना कर दिया है तो शायद रायता फैलने के डर से मुझसे काफी देर बात कर पटाने की कोशिश करते रहे। साथ ही, मेरी औकात क्या है, कह कर धमकाया भी, लालच भी दिया गया। उत्तर प्रदेश का संयोजक बनाने और मुरादाबाद से टिकट देने का लालच दिया गया। खैर, उस समय मैंने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद मीटिंग रूम में मेरे पीछे 3-4 बॉउन्सर्स अलग से खड़े कर दिए गए।

उन्होंने बताया कि अरविन्द केजरीवाल ने भाषण देना शुरू किया तो पार्टी की दिल्ली फतह से बात शुरू कर प्रशांत और योगेन्द्र पर पहुंच गए। फिर शांति भूषण का नाम लिए बगैर बोले कि ‘किसी ने मुझे किरण बेदी, अजय माकन से भी निचले पायदान पर रखा, क्या उसे पार्टी में रहना चाहिए?’ उस समय मर्यादित दिखने वाले कुछ पार्टी विधायक अचानक खड़े हो गए और गद्दारों को बाहर निकालो, कहकर नारे लगाने लगे। नितिन त्यागी और कपिल मिश्र उन्हें लीड कर रहे थे। कहा गया कि गद्दारों को उठा कर बाहर फ़ेंक दो। यह सब अरविन्द चुपचाप देखते रहे।

इसके बाद अरविन्द ने कहा कि मैं इनके साथ काम नहीं कर सकता। इसलिए या तो मुझे या इन लोगों को चुन लें। मैं अपना इस्तीफा पार्टी के सभी पदों से देता हूँ। इसके बाद वह एक मीटिंग में शामिल होने की बात कह कर तुरंत बाहर निकल गए। उनके जाते ही गोपाल राय ने कमान संभाल ली। मनीष सिसौदिया ने कहा कि योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, आनंद कुमार और अजित झा को नेशनल कौंसिल से निकाला जाए। उस समय तुरंत एक साथी रेहमान चौधरी, जो मेरे करीब ही बैठे थे, उठकर बोले कि उनको भी सफाई देने का मौका मिलना चाहिए। हम उन्हें सुनना चाहते हैं। उनके इतना कहते ही बगल में बैठे दुर्गेश ने बॉउन्सर्स को इशारा किया और उन्होंने उन्हें जबरदस्ती  बाहर खींच ले गए।

विशाल लाठे ने बताया कि बाहर लेजाकर उन्हें लात घूसे मारे गए और वहीं बैठने को कहा गया। योगेन्द्र, पंकज, पुष्कर मैं और एक अन्य साथी ने कहा कि ये गलत हो रहा है। आप ऐसा नहीं कर सकते। मैंने कड़ा विरोध किया। उसके बाद उन्हें अंदर लिया गया। इस दौरान बिना सुने ( पूर्व में ही दस्तखत करे हुए पन्नों से ) रेसोलुशन लाया गया। वहां मौजूद बॉउन्सर्स ने दो-दो हाथ खड़े कर दिए और उनकी गिनती होने लगी। विधायकों ने हाथ खड़े कर दिए जबकि केवल फाउंडर मेंबर्स ही वोट दे सकते थे। यह सब मुझसे देखा न गया।

विशाल लाठे ने बताया कि मैं तो अरविन्द के लिए वोट देने गया था लेकिन परिस्थितियों को देखकर मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा और अचानक मुझे योगेन्द्र और प्रशांत, अजीत झा और आनंद कुमार बेहतर लगने लगे। मैं उनके साथ बाहर आ गया। बहार आने वालो में हमारे एमपी डॉ. गांधी और एमएलए पंकज पुष्कर भी थे। अब प्रश्न है कि क्या हम सभी गलत हैं। एमपी और एमएलए को तो कोई लालच भी नहीं है। क्या ये एक नयी आम आदमी पार्टी है? क्या चुनाव लड़ने के बाद आम आदमी पार्टी बदल गयी है?

उन्होंने कहा है कि अरविन्द शायद अब ये भूल गए कि जैसे मोहल्ला सभा को सिर्फ अपने मोहल्ले से जुड़े मुद्दों का निर्णय लेने का हक़ होगा, वैसे ही पार्टी में भी पंचायत, नगर निगम, राज्य आदि लेवल पर वहां के लोकल वॉलेंटियर्स का इनपुट लिया जा सकता है और लिया जाना भी चाहिए। वैसे वो अरविन्द ही थे जिन ने कांग्रेस के साथ सरकार बनाने का निर्णय लेते समय न केवल वॉलेंटियर्स बल्कि दिल्ली की आम जनता का भी इनपुट बड़ी ही जल्दी ले कर इस “असंभव” काम को संभव कर दिखाया था!

डोनेशन की जाँच पर अरविन्द ने कहा था कि ‘ये लोग (प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव) उन 4 डोनेशन की जाँच करवाने की बात कर रहे हैं, इस जाँच से किसको फायदा होगा? मोदी को फायदा होगा। बीजेपी वाले बोलेंगे की जब तक जाँच चल रही है, इस्तीफा दो।’ बड़े ही आश्चर्य की बात है कि ये वही अरविन्द हैं, जो अपने द्वारा किये हर खुलासे और आरोप पर कांग्रेस और बीजेपी से जाँच करवाने की बात करते थे। कल को अगर बीजेपी या कांग्रेस के नेता भी यही तर्क दें कि भाई हमारे किसी भी मामले की जाँच हम नहीं करवाएंगे क्योंकि इस से विपक्ष को फायदा होगा, विपक्ष इस्तीफा मांगेगा तो क्या अरविन्द उनकी इस बात को मानेंगे? राजनीति में सच्चाई, पारदर्शिता और न्याय की बात करने वाले अरविन्द मीटिंग में जाँच से बचते हुए दिखे।

वैसे चुनाव से ठीक पहले जब उन 4 डोनेशन का मामला चर्चा में आया था, तब अरविन्द ने बरखा दत्त को दिए इंटरव्यू में इस देश के लोगों से वादा किया था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद वह खुद इन चार डोनेशन की जाँच के आदेश देंगे। प्रशांत भूषण इस वादे को अगर याद दिलाते हैं तो क्या वह पार्टी विरोधी थे? दिल्ली चुनाव में टिकिट बाँटने में कई खामियां हुईं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। हमारे एक एमएलए प्रत्याशी के गोदाम से शराब पकड़ी गयी थी। अमानतुल्ला खान पर कथित इंडियन मुजाहदीन के आतंकी की मदद करने का आरोप लगा था और ये वही अमानतुल्ला खान हैं, जो कोर्ट के निर्णय के बावजूद बटाला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताते हैं और दोबारा जाँच की मांग करते हैं। अमानतुल्ला को आप ने सिर्फ इसलिए टिकिट दिया क्योंकि वह मुस्लिम हैं।

इसके आलावा जिन 12 प्रत्याशियों की जाँच प्रशांत ने लोकपाल से करवाई, उनमें से 2 दोषी पाये गए, 6 के खिलाफ लोकपाल ने चेतावनी दी और सिर्फ 4 को क्लीन चिट दी। इन 2 प्रत्याशियों के टिकट वापस लिए गए। इसका मतलब साफ़ है कि पार्टी ने टिकट बंटवारे में गलती की थी और अगर प्रशांत ये मामला लोकपाल के पास नहीं ले जाते तो इन 2 अपराधी और गलत छवि के लोगों की भी देश की राजनीती में एंट्री आम आदमी पार्टी के जरिये हो जाती क्योंकि उनको टिकट तो दिए ही जा रहे थे। अरविन्द खुद हमेशा कहते थे कि राजनीति में अपराधी नहीं आने चाहिए। पर दुःख की बात ये है कि आज अरविन्द, प्रशांत भूषण के इस कदम की तारीफ करना तो दूर बल्कि उनके इस कदम को पार्टी विरोधी बता रहे हैं। ये बोल रहे हैं कि प्रशांत ने उन को बहुत परेशान किया।

पार्टी का RTI के अंदर आना: अरविन्द ने इस बात को बड़ी आसानी से एक लाइन में टाल दिया कि “जरूर आना चाहिए”। आना तो चाहिए पर अरविन्द इस बात का जवाब नहीं दे पाये कि जब वह सभी पार्टियों को RTI के अंतर्गत आने की मांग करते हैं तो फिर वह खुद अपनी पार्टी को अभी तक RTI के अंदर क्यों नहीं लाये? क्यों प्रशांत भूषण को इस बात के लिए दबाव बनाने की जरुरत पड़ रही है? और ये कोई प्रशांत की मांग नहीं है, ये बात तो खुद अरविन्द पिछले ४ साल से बोल रहे हैं तो अपने ही वादे को पूरा करना अरविन्द की जिम्मेदारी है कि नहीं? इसमें भूषण पार्टी विरोधी कैसे हो गए? क्यों अरविन्द अपने ही वादे को पूरा करने में प्रशांत भूषण पर अहसान जता रहे हैं?

क्या प्रशांत और योगेन्द्र को शो कॉज नोटिस दिया गया? क्या पार्टी ने इन दोनों पर जो आरोप लगाये, उसके पर्याप्त सबूत दिए? क्या मीटिंग में सही ढंग से वोटिंग हुई? क्या इन आरोपों की जाँच किसी स्वतंत्र संस्था से करवाई गई? कुछ AAP कार्यकर्ता ये बोलते हैं कि सबूत तो है पर इसलिए नहीं दिखा रहे कि उससे इन दोनों की बदनामी होगी। जब दोनों को सरे आम पार्टी विरोधी गतिविधि का आरोप लगा कर निकाला गया तो बदनाम तो वैसे भी किया ही है पार्टी ने, तो अब सबूत बताने में क्या शर्म?

बात ये भी है की जब NC की मीटिंग में अरविन्द को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया, कुमार विश्वास को अपनी बात रखने दी गयी तो फिर जिन लोगों पर आरोप लगे थे, उनको अपना पक्ष रखने का मौका क्यों नहीं दिया गया? और एक पक्ष की दलील के बाद ही कथित वोटिंग करवा ली गयी। ये तो ठीक वैसा ही होगा जैसे कोर्ट में सिर्फ एक ही पक्ष को अपनी दलील रखने दी जाये और फिर ज्यूरी से बोला जाये कि अब इसके आधार पर अपना फैसला सुना दो।

NC की मीटिंग में मारपीट तो एक ऐसी शर्मनाक घटना है जो शायद अभी तक देश की किसी भी पार्टी की मीटिंग में नहीं हुई होगी जिसमें उस पार्टी के सर्वोच्च नेता मौजूद हों। वैसे AAP इस बात को नकार रही है। पर सवाल उठता है कि अगर मारपीट नहीं हुई तो फिर पार्टी पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग क्यों नहीं जनता के सामने रख देती? अरविन्द के भाषण के बाद मुश्किल से 1 घंटे के अंदर ही वोटिंग हो गयी थी तो इस सिर्फ 1 घंटे का वीडियो जारी करने में पार्टी को कितना समय लगेगा? क्या कारण था कि लोगों को मीटिंग के अंदर मोबाइल नहीं ले जाने दिया गया? ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ।

बात ये भी है कि क्या प्रशांत भूषण वाकई में गलत थे? क्या पार्टी में गलत टिकिट के बंटवारे, RTI की वकालत, वॉलेंटियर की आवाज ज्यादा सुनी जाने की मांग, डोनेशन और व्यय में पारदर्शिता और जाँच की मांग करना पार्टी विरोधी है? पीठ में छुरा घोपना है? इन ही सब सिद्धांतों पर तो ये पार्टी बनी थी, ये सारी तो अरविन्द की ही कही बातें हैं पर अब लगता है, इस “नई” आम आदमी पार्टी में जो भी उन पुराने और मूलभूत सिद्धांतों की बात करेगा वो पार्टी विरोधी कहलायेगा, उसको चुनाव हरवाने वाला कहा जायेगा। और ये सारी बातें पार्टी के अंदर ही उठाई जा रही थीं, प्रशांत भूषण ने पार्टी के बाहर तो कुछ नहीं कहा, यहाँ तक कि जब उन के पिता का अरविन्द के खिलाफ बयान आया था तो प्रशांत भूषण सबसे पहले टीवी पर आ कर बोले थे कि मै शांति भूषण से सहमत नहीं हूँ।

अरविन्द ने खुद कहा की जब वो राजनीती छोड़ने का मन बना चुके थे तब योगेन्द्र और प्रशांत ही उन के पास आये और उन ने अरविन्द की मांग मानी, तो ये आरोप की योगेन्द्र और प्रशांत अरविन्द से पावर छीनना चाहते हैं, या वो अरविन्द को हटाना चाहते हैं वो तो बिलकुल गलत है। पार्टी के लोकपाल “एडमिरल रामदास” जैसे सम्मानित व्यक्ति को निकला गया। अचानक क्या जरुरत आ पड़ी थी उनको निकलने की? क्या इसके पीछे ये कारण नहीं कि उन को इसलिए निकला गया क्योंकि उन्होंने कुछ लोगों के इशारों पर काम करने से इंकार कर दिया था। 

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न्यूज़रूम में छिपे बैठे केजरीवाल के वे दोनो एजेंट संपादक कौन!

केजरी भाई ने खुलासा किया है कि दो बड़े समाचार चैनलों के वरिष्ठ संपादकों ने उन्हें बताया था कि योगेंद्र यादव उनके खिलाफ खबरें प्लांट करा रहे थे। इसका सीधा-सीधा मतलब यह भी हुआ कि कम से कम दो बड़े समाचार चैनलों के वे वरिष्ठ संपादक खुलकर केजरीवाल के पक्ष में ख़बरें चला और चलवा रहे थे।

 

अति-विश्वस्त सूत्रों के हवाले से मुझे इस बात की पुख्ता जानकारी थी कि केजरीवाल ने मीडिया में कई बड़े लोगों को नेता बनाने का सपना दिखाकर उनका ईमान ख़रीदा था, तो कई छोटे और मध्यम दर्जे के लोगों को आर्थिक रूप से भी ऑबलाइज किया था। हां, कई नौजवान और ईमानदार पत्रकार ज़रूर इस उम्मीद में उनके साथ बह चले थे कि देश में क्रांति अब अगले ही मोड़ पर खड़ी है।

केजरीवाल ने सिर्फ अन्ना हज़ारे, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, किरण बेदी, योगेंद्र यादव, आनंद कुमार, मेधा पाटकर, राजेंद्र सिंह, स्वामी अग्निवेश, बाबा रामदेव, कैप्टन गोपीनाथ, एडमिरल रामदास और जनरल वीके सिंह जैसे अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गजों को ही यूज़ (एंड थ्रो) नहीं किया, बल्कि मीडिया को भी बुरी तरह यूज़ किया।

केजरीवाल की वजह से देश में न सिर्फ़ जन-आंदोलनों की विश्वसनीयता और ईमानदार वैकल्पिक राजनीति की उम्मीदों को झटका लगा, वरन मीडिया की साख भी धूल में मिल गई। जितनी मेरी समझ और जानकारी है, उसके मुताबिक मोदी समेत देश के तमाम नेता मीडिया-मैनेजमेंट और ख़रीद-फ़रोख्त में उनके सामने बौने साबित हुए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से

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केजरीवाल की खांसी में सुधार

बेंगलुरू शहर (कर्नाटक) के एक प्राकृतिक चिकित्सा संस्थान में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की खांसी ठीक हो रही है। दस दिनो की चिकित्सा का कोर्स है, जिसे पूरा करने के बाद ही केजरीवाल दिल्ली लौटेंगे। चार वरिष्ठ डॉक्टरों की टीम केजरीवाल की देखभाल कर रही है जिनमें एक एक्यूपंक्चरिस्ट, एक फिजियोथेरेपिस्ट और एक योग अधिकारी शामिल हैं।

केजरीवाल की इंसुलीन की खुराक भी कम कर दी गई है। उनका तेजी से उपचार हो रहा है। मालिश की जा रही है। पहले की अपेक्षा रक्त में शर्करा का स्तर भी घटा है। उन्हें जूस, चपाती, सूप, पकी हुई सब्जियां दी जा रही हैं। जिंदल नेचर केयर इंस्टीट्यूट की मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर बबीना नंदकुमार के मुताबिक केजरीवाल ही नहीं, उनके माता पिता पर भी पर इलाज का तेजी से असर हो रहा है। उनके पिता को कब्ज की शिकायत है और मां मधुमेह और गठिया से पीड़ित हैं। 

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केजरीवाल के करीबी ने किया पत्रकार का स्टिंग

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अक्सर जनता से अपील करते हैं कि भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए स्टिंग करो। अब खुलासा ये हुआ है कि केजरीवाल की टीम ने एक पत्रकार का ही फोन रिकार्ड कर लिया है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक केजरीवाल के करीबी बिप्लव कुमार नामक व्यक्ति ने पत्रकार चंदर सुता डोगरा को पहले फोन किया और फिर उनसे हुई बातचीत टेप कर ली। बिभव अब सीएम केजरीवाल के पर्सनल सेकेटरी हैं।

 

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