मीडिया वाले किसानों को अपराधी साबित करने के लिए पूरा जोर लग रहे!

दिलीप खान-

TV9 खोला. एक नामालूम एंकर चीख रहा है:

“इसे किसी भी तरह आंदोलन नहीं कहा जा सकता. दिल्ली में किसान नंगा नाच कर रहे हैं. ये लोग लोकतंत्र का नाजायज़ इस्तेमाल कर रहे हैं.”

दिल्ली के दिलशाद गार्डन में पुलिस कार के भीतर आंसू गैस के गोले दाग रही है और TV9 की स्क्रीन पर उसे दिखाया भी जा रहा है. एंकर कह रहा है, “मजबूर पुलिस को ऐसा करना पड़ा. देखिए, किसान किस तरह पैदल भाग रहे हैं. देखिए किस तरह पुलिस को कुचलते हुए भाग रहे हैं.”

स्क्रीन पर अफ़रा-तफ़री थी. पुलिस डंडे बरसा रही थी. किसान डंडों से बचने के लिए भाग रहे हैं. एंकर को ‘कुचलना’ दिख रहा है. बीच में अचानक रिपोर्टर आया. रिपोर्टर कह रहा है, “किसानों की गाड़ी से शराब की बोतलें बरामद हो रही हैं. हालात बहुत बेक़ाबू हो चुके हैं.”

अब रिपोर्टर चीख़ रहा है- ये नशे का आंदोलन है. शराबियों का आंदोलन है.

ग़ुस्से का मनोविज्ञान कहता है कि वक़्त के साथ सब्र टूटता है. क्राइसिस मैनेजमेंट जिस सरकार का बेहतर होता है वो ऐसी नौबत नहीं आने देती. इस सरकार का सारा मैनेजमेंट आंदोलन को डिसक्रेडिट करना है. सरकार इस फिराक में रहती है कि किसी भी प्रदर्शन में मामूली तोड़-फोड़ हो और भोंपू मीडिया के ज़रिए आंदोलनकारियों को गुंडा करार दिया जा सके.

आज भी यही हो रहा है. ज़ी न्यूज़ कह रहा है- ये आंदोलन नहीं अराजकता है. TV9 भारतवर्ष कह रहा है- ये किसानों का नंगा नाच है. रिपब्लिक टीवी कह रहा है- दिल्ली में किसान दंगे भड़का रहे हैं.

ऐसा और भी टीवी चैनलों पर चल रहा होगा. सोशल मीडिया पर भले ही कुछ और दिख रहा है, लेकिन टीवी जुटा हुआ है. सारी रिपोर्टिंग ‘तय रूट’ पर हो रही है.

सरकार ने हफ़्तों तक किसानों को कड़ाके की ठंड में दिल्ली सीमा पर बैठाए रखा. इस आंदोलन में ख़ुद कई लोग पकड़ाए गए, जिन्होंने क़बूला था कि उसे किसान आंदोलन में हिंसा भड़काने का ज़िम्मा सौंपा गया था. किसने जिम्मा दिया था, उन लोगों ने ये भी क़बूला.

हज़ारों किसान अभी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं. सैकड़ों या तो जोश में टकराव कर रहे हैं या फिर इसमें वही लोग हैं जिनको सुपारी दी गई थी.

मुमकिन है कि युवा किसान नियम तोड़ने में जुटे हों. हफ़्तों बाद जब किसानों को ‘छूट’ दी गई, तो सामान्य मनोविज्ञान बताता है कि वे अपने भीतर के ग़ुस्से को पैदल चलकर व्यक्त नहीं कर सकते. बेबसी का इजहार बैरीकैड्स तोड़ने और नियम तोड़ने से ही होता है. इतिहास में तमाम आंदोलन नियम तोड़कर हुए.

टीवी वाले बैरीकेड्स तोड़ने को देश तोड़ने के बराबर तौल रहे हैं. टीवी वालों को ये तक याद नहीं कि जब किसान दिल्ली की तरफ़ बढ़ रहे थे तो सरकार ने ख़ुद NH खुदवा दी. सड़कों पर गड्ढे खोद दिए गए. सीमेंट के बैरीकैड्स बना डाले गए. वाटर कैनन दागे गए. आज भी आंसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं. डंडे बरसाए जा रहे हैं.

देश का सारा सम्मान राजपथ पर ही जमा नहीं होता. राजपथ पर सबको टहलने दो. मोदी सरकार का इतिहास बताता है कि कुछ हुड़दंगई ये लोग हर आंदोलन में छोड़ देते हैं. पता कीजिए कि इस बार हुड़दंग मचाने वाले कहां से आए.

अब टीवी पर ट्रैक्टर रैली नहीं दिखेगी. अब यही हुड़दंग दिखेगा. टीवी को मसाला मिल गया है.


विवेक उमरांव-

जब कोई बड़ा जन-आंदोलन होता है तो उसमें गर्म व नर्म दोनों तरह के लोग होते हैं। भारत की आजादी आंदोलन में भी गर्म व नर्म दल थे। चल रहे किसान जन-आंदोलन में भी गर्म व नर्म दल हैं।

नर्म दल बैरीकेडिंग देखकर रुक जाते हैं। लाठी-चार्ज व आंसू गैस इत्यादि रूपी पुलिसिया आत्याचार का विरोध नहीं करते हैं। पुलिस यदि आम आदमी या आंदोलनकारियों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाती है, तब भी नर्म दल वाले कुछ नहीं कहते हैं।

गर्म दल बैरीकेडिंग को हटाते हुए आगे बढ़ते हैं। लाठी चार्ज व आंसू गैस को झेलते हुए तथा इनको रोकते हुए आगे बढ़ते हैं। पुलिस यदि आम आदमी या आंदोलनकारियों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाती है तो गर्म दल वाले जवाब देते हैं, पुलिस को ऐसा करने से रोकने का प्रयास करते हैं।

ऐसा ही चल रहे किसान आंदोलन में भी हो रहा है। लेकिन यदि लोकतांत्रिक जनांदोलनों के मूल्यों के आधार पर देखा जाए तो गर्म दलों की कुछ गतिविधियों के बावजूद अभी तक किसान जनांदोलन अहिंसक ही कहा जाएगा।

किसान जनांदोलन की आज की गतिविधि के संदर्भ में पुलिस व प्रशासन ने गलतियां की हैं, बड़ी गलतियां की हैं। यूं लगता है कि इन लोगों को बड़े जनांदोलनों से व्यवहार करने के संदर्भ में धेला भर भी समझ नहीं है।

दरअसल किताबों को रटने, रटी-रटाई ट्रेनिंग व रूटीन तरीकों से ऐतिहासिक क्षणों व गतिविधियों व क्रियाओं से नहीं समझा व निपटा जा सकता है।

यह किसान जनांदोलन ऐतिहासिक है। इससे निपटने के लिए पुलिस व प्रशासन को चले आ रहे ढर्रों से बाहर आकर समझदारी दिखाते हुए व्यवहार करने की जरूरत थी और है। लेकिन जिस तत्व की ट्रेनिंग ही नहीं है, समझ ही नहीं है, दृष्टि ही नहीं है। उसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

जनांदोलन व आंदोलनकारी दुश्मन नहीं होते हैं, ना ही जानवर या कीड़े मकोड़े होते हैं जो उनसे दुश्मनों या जानवरों या कीड़े मकोड़ों की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए। फिर भारत में किसानों का बहुत बड़ा योगदान है, उसमें में जो किसान आंदोलनरत हैं उनका तो अधिक ही योगदान रहा है।

जनांदोलनों से सत्ता की हिंसक शक्ति के साथ व्यवहार नहीं किया जाता है। लोकतंत्र में सत्ता किसी भी स्थिति परिस्थिति में आम लोगों पर हिंसा करने के लिए नहीं होती है।

दो महीनों से किसान धैर्य व शांति से आंदोलन कर रहा है। यदि आज वह देश की राजधानी में किसान परेड निकालना चाहता था तो पुलिस व सरकार द्वारा टकराव करने की बजाय किसानों की इच्छा का सम्मान करना चाहिए था। यह सरकार का बड़प्पन ही होता। पुलिस की समझदारी ही होती।

समझदारी की अपेक्षा केवल किसान से ही क्यों। पुलिस व सरकार भी तो समझदारी दिखा सकती है या यह मान लिया जाए कि सरकार व पुलिस समझदार हो ही नहीं सकती।

अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। आशा है कि किसान जनांदोलन में नर्म व गर्म दोनों प्रकार के दलों के बावजूद किसान आंदोलन अहिंसक ही रहेगा जैसे कि अभी तक अहिंसक है।

जब तक किसान आम लोगों की संपत्तियों की लूटपाट नहीं करता है, आम लोगों के साथ मारपीट नहीं करता है तब तक किसान जनांदोलन अहिंसक है, अनुशाषित है। मुझे विश्वास है कि किसान जनांदोलन अहिंसक ही रहेगा भले ही मुख्यधारा की मीडिया अपनी हेडलाइनों में हिंसा भड़काने या हिंसा साबित करने के लिए पूरा जोर लगाती रहे।

आशा है कि किसान जनांदोलन अहिंसक बना रहेगा। देश को ऐसे आंदोलन की महती जरूरत है। हर ईमानदार व सच्चे देश भक्त का यह दायित्व है कि वह इस आंदोलन से सीखे समझे व संभाले।

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