
संजय कुमार सिंह
आज अंग्रेजी के मेरे पांच अखबारों की लीड अलग-अलग है पर हिन्दी के दोनों अखबारों की लीड एक है। यह अंग्रेजी के पांच में से किसी भी एक अखबार में लीड नहीं है। लीड अलग होने का कारण यही है कि सर्वसम्मत लीड नहीं है लेकिन पांच अखबारों की लीड अलग होने का कारण यह भी है कि लीड बनाने लायक पांच खबरें हैं। यहां आप एक अखबार की खबरें नहीं पढ़ते हैं। इसलिए आज मैं सबसे पहले यह बता दूं कि आज की खबरें क्या क्या हैं। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स की लीड एक ही है और शीर्षक भी लगभग एक ही है, नीट यूजी लीक के मास्टरमाइंड (सरगना) को पटना से गिरफ्तार किया गया। यह नीट मामले में सरकार की कार्रवाई का प्रचार है। वास्तविकता यह है कि मामला ठंडे बस्ते में जा रहा है। कभी भी पकड़े जाने पर कार्रवाई का डर और चेतावनी दोनों है पर पुराने मामले यादकर, भगवान का नाम लेकर छात्र चैन की बंसी बजा सकते हैं।
नीट के छात्रों को चैन नहीं
कहने की जरूरत नहीं है कि 11 लोगों की गिरफ्तारी के बाद की गिरफ्तारी आ के अखबारों में प्रमुखता से छपी है। पहले गिरफ्तार लोगों में एक स्कूल के प्रिंसिपल और दो अन्य लोगों का मास्टर माइंड गिरोह कहा जा चुका है जो एक ही धर्म के हैं। एक कोचिंग संस्थान ने विज्ञापन में दावा किया है कि सभी छात्र उसके संस्थान के हैं और एक यू ट्यूबर को इसमें एक ही धर्म के लोग दिखे हैं। पर सरकार कह रही है कि प्रश्नपत्र लीक नहीं हुए हैं, परीक्षा रद्द नहीं होगी और स्थगित कौनसेलिंग जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होगी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की सुनवाई 18 जुलाई को होगी। जाहिर है, उसका जो आदेश होगा उसका पालन भी होगा। पूर्व में हम देख चुके हैं कि जिन मामलों में फैसला आने में देर हो जाती है वहां फैसले कैसे हुए हैं। पर वह हमारी चिन्ता का विषय नहीं होना चाहिये। कोर्ट का फैसला सर्वोपरि है। कोर्ट को इस हाल में किसने पहुंचाया इसपर विचार तो कोर्ट को ही करना है पर वह अलग मुद्दा है।
जब भी पता चलेगा कार्रवाई होगी
कुल मिलाकर, नीट की स्थिति आज द हिन्दू में लीड है। शीर्षक है, नीट की कौनसेलिंग जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होगी। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई 18 जुलाई के लिए स्थगित की। उपशीर्षक के अनुसार किसी भी अनियमितता के लाभार्थी पाये जाने वाले छात्र की उम्मीदवारी किसी भी समय रद्द कर दी जायेगी। ऐसा कौनसेलिंग के समय या उसके बाद भी हो सकता है। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि परीक्षा रद्द नहीं होगी। किस उम्मीदवार को कब गड़बड़ी का लाभार्थी पाया जायेगा यह भी छात्र तय नहीं कर सकता है और लाभार्थी के साथ एक जैसे व्यवहार की गारंटी देश में पहले नहीं थी तो अब क्या होगी। और यही वास्तविकता है।
कार्रवाई आईएएस बनने के बाद?
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार केंद्र सरकार ने आईएएस अधिकारी पूजा खेडकर द्वारा कोटा के दुरुपयोग की जांच के लिए एक समिति बनाई है। पूजा पर ओबीसी और विकलांगता कोटा के दुरुपयोग का मामला है। कहने की जरूरत नहीं है कि समिति आईएएस की उम्मीदवारी के लिए किये गये दावों की जांच करेगी पर इस बात की संभावना बहुत कम है कि स्कूल और कॉलेज में इन श्रेणियों का लाभ उठाये बगैर कोई आईएएस की परीक्षा में इसका उपयोग करेगा। अगर जांच सिर्फ आईएएस की होगी तो उसकी डॉक्टरी की डिग्री पर क्या कोई आंच नहीं आयेगी या उसकी जांच नहीं होगी जबकि संभावना है कि उसमें भी आरक्षण का लाभ लिया गया हो। मुझे लगता है कि यह व्यवस्था है। पूर्व में एक सांसद पर झूठे जाति प्रमाणपत्र के उपयोग का आरोप था। पांच साल का उनका कार्यकाल पूरा हो गया पर प्रमाणपत्र की ना पुष्टि हुई ना उसका फर्जी होना तय हुआ। अब वह कुछ भी हो, क्या फर्क पड़ता है। ऐसा संभव होता है इसीलिये लोग गलत दावे करते हैं। आज ही खबर है कि आचार संहिता के उल्लंघन के एक मामले में पूर्व सांसद जयाप्रदा को बरी कर दिया गया है। दिलचस्प यह है कि विशेष सांसद-विधायक अदालत में सुनवाई हुई तब इतना समय लगा। मामला 2019 के चुनाव के समय का है और तब वे जीत गई थीं। उनका कार्यकाल पूरा हो गया। अब वे सांसद नहीं हैं। नवोदय टाइम्स में यह खबर पहले पन्ने पर है।
आबादी की चिन्ता
हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की लीड का शीर्षक है, भारत की आबादी 1.45 अरब 2085 में चीन की दूनी होगी। मुझे नहीं पता आज की इतनी खबरों में आबादी और वह भी 2085 की आबादी की स्थिति इतनी महत्वपूर्ण क्यों है। जो भी हो, अखबार में एक खबर है, भारतीय वायु सेना ने तेजस विमानो की आपूर्ति में देरी के लिए चिन्ता जताई है और एचएएल से कहा है कि आपूर्ति में देरी अस्वीकार्य है। स्थिति यह है कि 31 मार्च 2024 को मिलने वाले पहले विमान की आपूर्ति अभी तक नहीं की गई है।
द टेलीग्राफ में क्रिकेट की खबर
कोलकाता डेटलाइन की यह खबर भले क्रिकेट की है इसमें राजनीति, आतंकवाद, पाकिस्तान से संबंध आदि भी शामिल है। शीर्षक है, चैम्पियन्स ट्रॉफी : बीसीसीआई पाकिस्तान में गेंन्द नहीं खेलेगी। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, क्रिकेटर्स सीमा पार नहीं करेंगे जो अभी भी घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों के लिए खुला है। इस खबर के साथ छपी एक और खबर में बताया गया है कि जम्मू और कश्मीर के साथ पंजाब के शिखर के पुलिस अधिकारियों ने बैठक की और इसपर मंथन किया। मुख्य खबर के अनुसार, अगले हफ्ते कोलंबो में होने वाले इंटरनेशनल क्रिकेट कौंसिल का वार्षिक कांफ्रेंस हंगामी हो सकता है। अखबार के अनुसार बीसीसीआई अगर फरवरी 2025 में चैम्पियन्स ट्रॉफी के लिए अपनी टीम पाकिस्तान भेजने में हिचक दिखायेगा तो ऐसा हो सकता है।
प्रचार का मौका नहीं चूके
फर्जी डिग्री और फर्जी सर्टिफिकेट के मामले में दो तरह के व्यवहार सर्वविदित हैं। इसलिये मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा छात्रों को परेशानी से बचाने के लिए परीक्षा रद्द नहीं करने का है और फर्जी सबूत पर रद्द कर दिये जाने के बावजूद किसी चिन्ता परेशानी और शर्म की खबर आज पहले पन्ने पर तो नहीं है। हिन्दी अखबारों की लीड यह जरूर है कि सरगना पकड़ लिया गया। यह इस तथ्य के बावजूद है कि सरगना नई व्यवस्था में पनपा है जो नीट और दूसरी परीक्षाओं के आयोजन के लिए की गई है। यह व्यवस्था सरकार ने की है इसलिए इसके संरक्षण में लगी हुई है। जो कर रही है वह सार्वजनिक है और उसमें किसी की गिरफ्तारी यह बताती है कि कार्रवाई हो रही है और किसी को बख्शा नहीं जा रहा है। यह प्रचार का विषय है और इसलिए लीड है। पर वह कोई नई बात नहीं है।
जेएनयू पुरानी व्यवस्था की ओर
नई बात यह है कि इस व्यवस्था से परेशान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय इस सरकार की तथाकथित नई व्यवस्था को छोड़कर अपनी पुरानी व्यवस्था को ही फिर से लागू करने पर विचार कर रहा है। मुझे लगता है कि सरकारी व्यवस्था की नाकामी और उसे संरक्षण देने के बेशर्म प्रयासों और उसमें मिल रही नाकामियों को उजागर करना मुश्किल हो तो आज यह खबर भी लीड हो सकती थी कि जेएनयू पुरानी व्यवस्था पर लौटने की सोच रहा है। पर यह खबर सिंगल कॉलम में ही है। इंडियन एक्सप्रेस के साथ द टेलीग्राफ में भी।
नक्सलवाद के नाम पर कानून
आज प्रचार का विषय यह भी है कि बजट का समय आ रहा है। सरकार मेहनत कर रही है और अर्थशास्त्रियों के साथ बैठक कर रही है ताकि आने वाले बजट में रोजगार, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और निर्माण पर फोकस रहेगा। इंडियन एक्सप्रेस में बैठक की तस्वीर भी छपी है और लीड से पता चलता है कि सरकार ने शहरी क्षेत्रों में नक्सलवाद से बचने (या आम जनता को बचाने) के लिए महाराष्ट्र विधानसभा में एक विधेयक पेश किया है। इसके अनुसार, अगर कोई व्यक्ति किसी गैर सरकारी संगठन का सदस्य नहीं हो फिर भी उसकी सहायता करता हो (यह पुलिस तय करेगी) तो व्यक्ति को जेल हो सकती है। कुल मिलाकर जब एनटीए जैसी अच्छाई का फल हम देख रहे हैं तब कानून में संशोधन कर लगाम कसने की यह कोशिश भी आम बात नहीं है। और इसीलिए यह इंडियन एक्सप्रेस में लीड है लेकिन दूसरे अखबारों में नहीं है।
एलजी का निर्देश मुख्यमंत्री के सिर?
इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से छपी एक और खबर के मुताबिक डीडीए के उपाध्यक्ष ने एक इनक्वायरी का उल्लेख किया है जिसमें पेड़ काटने के मामले में एलजी की भूमिका का संदर्भ है। उपशीर्षक के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथपत्र में डीडीए के उपाध्यक्ष ने उस मेल की ओर इशारा किया जिसे डीडीए इंजीनियर ने पहले ‘धोखेबाजी’ कहा था। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे सीधे सपाट शब्दों में कहा है, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल डीडीए के शपथपत्र के अनुसार पेड़ काटने की सहमति मुख्यमंत्री ने दी। इसके साथ छपी एक खबर के अनुसार आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के शहरी विकास मंत्री सौरभ भारद्वाज ने कहा है कि एलजी के निर्देश पर 1100 पेड़ काटे गये थे ताकि अमीरों के फार्म हाउसों की रक्षा हो सके। उन्होंने दावा किया कि डीडीए ने सुप्रीम कोर्ट में एक ईमेल दाखिल किया है जिसमें कहा गया है कि पेड़ काटने का निर्देश एलजी ने दिये थे।
मुनक कैनाल में दरार
टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड का शीर्षक है, मुनक कैनाल में दरार, जलापूर्ति प्रभावित। लीक ठीक करने के प्रयास जारी, कॉलोनी में पानी भरा। यहां सेकेंड लीड कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतों को जमानत के आदेश ढीले-ढाले ढंग से स्थगित नहीं करना चाहिये। यह एक ऐसे मामले में है जब दिल्ली हाईकोर्ट ने किसी मामले में जमानत आदेश को स्टे कर दिया और मामला एक साल से लंबित है। संबंधित व्यक्ति जेल में पड़ा है। यह सरकारी व्यवस्था की हालत है और आज की कई खबरें ऐसी हालत बयान करती है। नहर में दरार अलग मामला है। भ्रष्टाचार दूर होने और ईमानदारी का ना खाऊंगा ना खाने दूंगा वाला राज स्थापित होने के बाद से ज्यादातर अखबार एक जैसे हो गये। ऐसा लगता था जैसे सब एक ही जगह से निर्देश ले रहे हों या एक ही स्कूल के पढ़े लोग सभी अखबार बना रहे हों। बेशक अपवाद थे और हैं। लोग सबको जानते हैं फिर भी मुझे यह अंतर दिलचस्प लगता है और आज जब हिन्दी अखबारों की लीड एक है और अंग्रेजी में वह किसी में नहीं है तो मामला निश्चित रूप से दिलचस्प है।


