मणिका मोहिनी-
मुझे याद आता है, कृष्ण कल्पित ने एक बार अनामिका के बारे में बहुत ही घटिया टिप्पणी की थी कि यह कवयित्री अनामिका युवा लड़के कवियों को अपने घर बुलाती है, उन्हें पुरस्कार दिलाने का लालच देती हैं आदि-आदि। मेरे ख्याल से अनामिका ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की थी।
अजी कौन मुंह लगे ऐसे लुच्चों के। पुरुष लेखकों को चाहिए कि उसका बॉयकॉट करें। पर सभी पुरुषों को मज़ा आता है इसीलिए पुरुष लेखक उन्हें पीछे लगाए रखते हैं। महिलाएं इसलिए भी डरती हैं कि कहीं उनके बारे में कुछ अश्लील न लिख दें। इज़्ज़त वाला अपनी इज़्ज़त से डरा, गुंडे ने समझा मुझसे डरा।
यह महोदय लंबे समय से लतियाये, थपड़ियाये जा रहे हैं !
बाबुषा कोहली लिखती हैं… सम्पादित अंश…
“हमने तब थपड़ियाने की बात कही थी, अब इन पर दया आती है। थप्पड़ से दया तक की हमारी निज यात्रा संपन्न हुई। लेकिन कल्पित कोविड का वेरिएंट मालूम पड़ते हैं, एडवांस रूप धर-धर कर लौटते हैं।
जिनके साथ दुर्व्यवहार हुआ, वे कौन हैं, मुझे नहीं पता।… निश्चित ही आसान नहीं लगता होगा सामने आकर कुछ कहना।… मेरे लिए जब फ़ेसबुक पर कृष्ण कल्पित ने अत्यंत भद्दी और यौन-कुंठित टिप्पणियाँ की थीं, तब पढ़ने-लिखने वालों की दुनिया में यह कुरूपता देख कर मैं सन्न रह गई थी, बल्कि लगभग सदमे जैसी स्थिति में आ गई थी। लेकिन उस मानसिक आघात के साथ जीना मैंने नहीं चुना।
हल्ला मचाया, क्रोध किया और आगे बढ़ गई। यहाँ तक कि इतना आगे बढ़ गई कि कृष्ण कल्पित से सामना हुआ, तो अच्छे से बातचीत भी की।
जिनके साथ यह बुरा बर्ताव किया गया, आप जो भी हों, अगर आप तक मेरा संदेश पहुँच रहा है, तो आप के लिए मैं साहस और प्रेम भेजती हूँ। कोई अपनी वासना और कुंठा से पीड़ित है, तो इसके लिए स्त्रियों को न छुपने की ज़रूरत है, न पीड़ित महसूस करने की।
हल्ला मचाओ, डाँटो, थपड़ियाओ और आगे बढ़ जाओ।” (9 वर्ष पुराना स्टेटस-सबसे ऊपर)


मजकूर आलम-
कुछ ज़रूरी बातें, निजता का सम्मान करें
- Krishna Kalpit अगर आप लिख रहे हैं तो उसे टैग बनाएं कि हजारों लोग उसके बारे में क्या लिख रहे हैं, उसे पता चले।
- किसी कार्यक्रम में अयोग्य व्यक्ति का चयन हो जाना संभव है, अगर आप सिफारिश करने वाले व्यक्ति को योग्य मानते है। ये अलग बात है कि वह व्यक्ति ममता दिखाकर विषधर कालिया नाग निकल जाए।
- मनुष्य होने की पहली शर्त है कि निजता का सम्मान करें। पीड़िता का तो बहुत ज्यादा। अगर पीड़ित व्यक्ति एफआईआर नहीं कराना चाहता या चाहती तो आप उसे कन्विंस कर सकते हैं, लेकिन लट्ठ लेकर तुम्हें ऐसा करना ही होगा, नहीं कह सकते। चाहे आयोजक हो या कोई अन्य।
- ऐसे में किसी अरबको निशाना बनाकर मामले का राजनीतीकरण करने से पहले इस बात पर विचार करें कि क्यों न हम कृष्ण कल्पित-कृष्ण कल्पित का जाप करें। इतना करें कि वो खुद ही अपना मुख मलिन कर ले।
5 मगर अगर आपको ये दिखे कि कोई कृष्ण कल्पित को छोड़ माला पहनाकर अन्य कल्पित कथा का जाप कर रहा है तो संदेह ज़रूर करें कि उसकी दिलचस्पी पीड़िता को न्याय दिलाने से ज्यादा किसी और चीज में है? - कोई ऐसा दिखे तो एक बार अनुसंधान ज़रूर करें कि उसके ऐसा करने से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसको फायदा होने जा रहा है। पीड़िता को, कृष्ण कल्पित को या किसी और को।
- इस बहाने कहीं किसी बड़ी राजनैतिक ताक़त को अपने दुश्मन को घेरने का मौका तो नहीं मिल गया है। जो समय-समय पर उसके लिए चुनौती बनता रहा है और उसने अपने टूल-किट को अपने प्रतिद्वंद्वी को ध्वस्त करने के लिए लगा दिया हो?
- सबसे पहले इस तरह से मामले का राजनीतीकरण करने वालों का इतिहास टटोलें। उनके किनके साथ संबंध हैं। वह कब-कब किसके संकटमोचक बनकर खड़े हुए। किसके इशारे पर किसे ट्रोल किया। किसे बदनाम करने के लिए लगातार अभियान चलाया?
- कहीं सत्ता बदलने के साथ वैचारिक ठिकाना बदलने वाले सुविधाजीवी तो नहीं है इसके पीछे, जो एक विचारधारा जिसके खिलाफ लोगों का गुस्सा कम करते रहते हैं और जब भी इस विचारधारा की सत्ता को चुनौती मिले तो चुनौती देने वाले व्यक्ति, संस्था, इंस्टीट्यूशन के खिलाफ तुरत खड़े हो जाते हैं?
- इस विचारधारा के सत्ता के खिलाफ मजबूत होती आवाज से लेकर विपक्षी के ऐसे शीर्ष नेताओं के खिलाफ स्ट्रेटजी बनाकर दुष्प्रचार करते रहने वाले तत्व तो नहीं हैं, जिन नेताओं की छवि समाज और जनता में अच्छी है.
- 100 बात की एक बात. सिर्फ कृष्ण कल्पित को ही नहीं, ऐसे सारे ट्रॉलर्स को भी उतनी ही (थोड़ा-सा कम भी चलेगा) लानत-मलामत भेजिए, जो अपनी ‘राजनीतिक गोटी’ के लिए पीड़िता की निजता भंग करने और मोरल पुलिसिंग करने पर तुले हैं।
- ऐसे टटपुँजिए ट्रॉलर्स को पीड़िता से कोई मतलब नहीं होता। चाहे वह अवसाद में चली जाए या फिर उसके साथ कुछ और हो जाए ये नकली हमदर्द उस पर अपनी राजनीतिक गोटियां सेकेंगे और निकल जाएंगे।
- हां, वही हैं ये लोग। शुभ 11 वाले या नहीं- पहचानिए। या सिर्फ नील में गिरने का नाटक रच रखा है। सच में रंग नहीं बदला। ये जानना ज़रूरी है।
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