ऐसे संपादकों से भगवान बचायें जो करवा रहे हैं ‘लाश की हत्या’

देश में क्राइम रिपोर्टिंग में 27 साल से जमे वरिष्ठ पत्रकार संजीव चौहान की खोजी पत्रकारिता की एक और बानगी पेश करती हुई एक स्टोरी ‘पड़ताल’ कॉलम के तहत हिंदी बेवसाइट ‘First Post’ में प्रमुखता से प्रकाशित की गयी है. वेबसाइट के संपादक/उप-संपादक जी, जिन्होंने ‘पड़ताल’ के संपादन के लिए कलम उठाई, जाने-अनजाने ही हेडिंग बदलकर ‘पड़ताल’ की ऐसी-तैसी कर दी है.

संपादन करने वाले इस नौसिखिये या यूं कहें कि, किसी कथित संपादक जी ने अपनी काबिलियत बघारने के फेर में और अति-उत्साही संपादन के दौरान…हैडिंग दे डाला…”जब थाने पर लटके पुतले से खुला महिला की लावारिस लाश की हत्या का राज”…

अब जरा आप ही सोचिये अगर आप पत्रकारिता से जुड़े हैं कि, भला कहीं कभी आपने ‘लाश की हत्या’ या फिर ‘लाश की हत्या का राज’ भी खुलते देखा सुना है. हत्या तो जिंदा इंसान की ही हो सकती है. यह तो ‘फर्स्ट पोस्ट’ वेबसाइट के ही इन कथित संपादक जी की काबिलियत का कमाल हो सकता है, जिन्होंने ‘लाश की हत्या’ कराने का कमाल करके हिंदी पत्रकारिता में कम-अक्ली का नमूना पेश कर संपादन का एक मजाकिया इतिहास लिख डाला.

लावारिस लाश के बारे में तो लिखा-पढ़ा-देखा सुना जाता रहा है लेकिन ‘लाश की हत्या’ होने पर हंसी आ रही है. ऐसे घटिया संपादक जी और उनकी संपादन-क्षमता पर कोफ्त होना लाजिमी है.



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