नवीन कुमार-
“प्रगतिशीलों” को मुसलमानों के कत्लेआम की समर्थक और प्रचारक मधु किश्वर के तौर पर नई नेता मिलने की बधाई।
पूरी जिंदगी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और घृणा का प्रचार प्रसार करने वाली मधु किश्वर ने एक से एक “प्रगतिशीलों” की प्रगतिशीलता की पतलूनें उतारकर एक झटके में उतारकर फेंक डाली है। वो ठहाके लगाकर हंसती होंगी। कि देखो कैसे मासूम लोग हैं। एक झंडु पोस्ट पर ऐसे मचल गए जैसे रंगीन बलून के लिए बच्चे। यह दुर्दांत और फूहड़ है कि मधु किश्वर में प्रगतिशीलों को नरेंद्र मोदी से लड़ाई का औज़ार नज़र आ रहा है। उन्हीं मधु किश्वर में जिन्हें गुजरात के नरसंहार के अपराध से नरेंद्र मोदी को मुक्त कराकर उन्हें संत साबित करने में में दस साल खपा दिए।
मधु किश्वर ने अपनी 75 साल की जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा ये साबित करने में लगाया है कि मीडिया ने 2002 के कत्लेआम को लेकर नरेंद्र मोदी को बदनाम किया। उसी मधु किश्वर ने इस कोशिश में नरेंद्र मोदी की तुलना गांधी से कर डाली। और केवल तुलना नहीं की यहां तक कहा कि मोदी ने राजनीति में बिल्कुल वही किया जैसा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन में किया था। उन्हीं मधु किश्वर ने जिन्होंने कठुआ में सबकुछ शीशे की तरह साफ़ हो जाने के बावजूद पूरी किताब लिख डाली कि इसके लिए मंदिर का पुजारी नहीं गजवा-ए-हिंद ज़िम्मेदार है। यह विक्षिप्तता या भूल नहीं आपराधिक है। घिनौना और बर्बर है।
एक नहीं, दर्जनों लेख हैं मधु किश्वर के मुस्लिम कत्लेआम की पर्देदारी करते हुए, उसे जायज़ ठहराते हुए। नरेंद्र मोदी को संत बताते हुए। सच ये है कि मधु किश्वर का पूरा वैचारिक ढांचा दंगाई है। वो नरेंद्र मोदी की आरती उतारती हुई यहां तक पहुंची हीं। उनपर लहालोट होने वालेप्रगतिशील महानुभाव असल में मुसलमानों के कत्लेआम के पक्ष में हैं। न केवल पक्ष में हैं बल्कि इसका उत्सव मनाने की भीड़ में शामिल हैं। उनके लिए गांधी और गोडसे में कोई फर्क नहीं हैं। किसी प्रगतिशील ने नहीं पूछा कि क्या आप अपने पुराने लेखन के लिए शर्मिंदा हैं? किसी प्रगतिशील ने नहीं पूछा कि क्या आप गुजरात के मुसलमानों के कत्लेआम की तरफदारी के लिए देश के लोगों से माफी मांगती हैं? किसी ने नहीं पूछा कि कठुआ की बच्ची के दरिंदों की तरफदारी के लिए माफी मांगती हैं? किसी ने नहीं पूछा कि क्या आप समतामूलक धर्मनिरपेक्ष देश की हिमायती हो गई हैं? क्यों नहीं पूछा?
फिर सवाल है कि मधु किश्वर की विश्वसनीयता क्या है? उनका बौद्धिक, सामाजिक या राजनैतिक योगदान क्या है? वो क्या बेचती रही हैं? नफ़रत, घृणा और बर्बरता। सवाल यह भी है कि वो ऐसा क्या नया बोल रही हैं जिसपर बैक चैनल में बातें नहीं होती रही हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी उससे बहुत-बहुत ज्यादा बोल चुके हैं। वो भाजपा के सांसद रहे हैं। वह भी नरेंद्र मोदी मोदी के समय। उस पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं जिसकी नालें मोदी के राजनैतिक पुरखों से जुड़ी हैं। फिर भी कितने लोग हैं जो सुब्रह्मण्यम स्वामी पर लहालोट हैं या उन्हें गंभीरता से ले रहे हैं। क्या मधु किश्वर उसी गप पर नया लेबेल नहीं चढ़ा रही हैं जिसके बारे में देश के आम जन पहले से वाक़िफ़ हैं? हकीकत यह है कि सफलता के लिए किसी स्त्री पर किसी के साथ सो जाने का इल्ज़ाम, उसकी चारित्रिक हत्या एक सड़े हुए सवर्ण मर्दवादी ढांचे का सबसे मसालेदार शग़ल है। इन लोगों ने गांधी, नेहरू से लेकर लोहिया और सोनिया तक को नहीं छोड़ा। लानत है आपके घटियापन पर। जो लोग आज मधु किश्वर के पीछे खड़े हैं उनके नामों में लगे पुछल्ले देखिए उनके लिजलिजे चेहरों के पीछे का “संस्कार” साफ हो जाएगा।
सवाल मधु किश्वर से नहीं है। सवाल है उनके पीछे खड़ी हो गई प्रगतिशील लंपटों की भीड़ से। उनकी पॉलिटिकल पॉज़िशन क्या है? कि बीजेपी होती तो कुछ नहीं सोचती उनके पीछे खड़े होने में। उनके नाम पर सीधे धावा बोल देती। ऐसे लोगों का मोदी और उनके फासीवाद से लड़ाई का राजनैतिक रास्ता और निदान ये है कि बीजेपी से लड़ने के लिए उसकी तरह हो जाना है। वो भी सीना चौड़ा करके। अगर यही रास्ता है तो फिर तो कोई लड़ाई ही नहीं है। मोदी, संघ, बीजेपी और मधु किश्वरों की दुर्दांत सोच से लड़कर उन्हीं की तरह के लोगों को लाना है, उन्हीं की जय बोलनी है, उन्हीं पर लहालोट होना है तो माफ कीजिएगा आर हत्यारों के साथ खड़े हैं।
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