
वरिष्ठ पत्रकार महेश लांगा की गिरफ्तारी के बाद गुजरात पुलिस ने उनके खिलाफ तीसरा मामला दर्ज किया है. 29 अक्टूबर को दर्ज इस एफआईआर में लांगा पर एक व्यवसायी को धोखा देने का आरोप है.
दूसरी तरफ इस मसले पर मीडिया संगठन लांगा के खिलाफ कार्रवाई को पत्रकारिता पर हमला करने की बात कह रहे हैं. मामले को प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई जा रही है.
द हिंदू के वरिष्ठ सहायक संपादक महेश लांगा को GST धोखाधड़ी मामले में 7 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था. पुलिस का आरोप है कि वह एक ऐसी योजना में शामिल थे जिसने फर्जी तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा करने के लिए कई फर्जी कंपनियां बनाईं.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लांगा की पत्नी और चचेरा भाई भी इस घोटाले में फंसे हैं, जिससे कथित तौर पर सरकारी खजाने को काफी नुकसान होने की बात कही जा रही है.
लोकल हरियाणा नामक एक वेबसाइट की खबर में लिखा गया है कि, लांगा पर तीसरी FIR के बाद गुजरात पुलिस भी सवालों के घेरे में आ गई है. द हिंदू ने तो बाकायदा – “दस्तावेज़ों पर कब्जे के लिए पत्रकारों पर मुकदमा चलाना ‘चिंताजनक’, ‘निंदनीय’ है: मीडिया निकाय” नामक शीर्षक से हेडिंग लगाकर पूरा लेख तैयार किया है.

हालांकि, पुलिस आयुक्त जीएस मलिक ने इस पर साफ किया कि- “लांगा के खिलाफ आरोपों की गंभीर प्रकृति के बावजूद उनकी जांच पेशेवर रही है न की प्रतिशोधात्मक.”
वहीं, पुलिस का दावा है कि लांगा के आवास से 20 लाख रुपये कैश और आपत्तिजनक दस्तावेज बरामद हुए हैं, साथ ही यह कि- पत्रकार की जीवनशैली, लग्जरी होटलों में रहना और उनकी आय की वैधता को लेकर भी सवाल उठाए हैं. लांगा के पास जो गोपनीय दस्तावेज हैं, उन्हें लेकर पुलिस का दावा है कि- इन्हें पत्रकारिता के उद्देश्य से नहीं बल्कि एक बड़े कॉर्पोरेट जासूसी अभियान का हिस्सा हैं, जिसमें नौकरशाह संवेदनशील जानकारी लीक कर रहे थे.
29 अक्टूबर मंगलवार को लांगा के खिलाफ प्रणय शाह नाम के एक व्यवसायी को धोखा देने का आरोप लगाया गया. आरोप है कि शाह ने अपने पक्ष में मीडिया कवरेज हासिल करने के लिए लांगा को 48 लाख रुपये का भुगतान किया था.
मीडिया संगठनों की प्रतिक्रियाएं
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इन घटनाक्रमों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि, “अपने कर्तव्यों का पालन करने वाले पत्रकारों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई चिंताजनक है. संगठन ने इस बात पर जोर दिया कि पत्रकारों को अक्सर अपने काम के हिस्से के रूप में संवेदनशील दस्तावेजों तक पहुंच की आवश्यकता होती है. EGI ने लांगा के खिलाफ आरोपों के संबंध में गुजरात पुलिस से पारदर्शिता की मांग की है.”
इसके अलावा मीडिया संगठनों के भीतर कुछ आवाजें यह भी तर्क देती हैं कि पत्रकारों को उनकी पेशेवर जिम्मेदारियों से संबंधित कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए. द हिंदू की पूर्व अध्यक्ष मालिनी पार्थसारथी ने कहा कि, “पत्रकारों को जवाबदेही से बचाना पत्रकारिता की अखंडता को कमजोर करता है.”
इस मामले को लेकर पत्रकार संघों ने एक संयुक्त बयान में एफआईआर की निंदा की है. सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी इस घटना को लेकर चर्चा का मैदान बन गए हैं. कुछ समाचार आउटलेट्स ने अधिवक्ताओं के हवाले से लिखा है कि- “प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना लोकतंत्र और जवाबदेही के लिए आवश्यक है.”
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