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मनोज बाजपेयी से मिलने के बाद “घूसखोर पंडत” पर 4पीएम संस्थापक संजय शर्मा ने क्या लिखा, पढ़िये

संजय शर्मा-

बाजपेयी के अभिनय की जितनी तारीफ़ की जाए, सच में उतनी कम है. उन्होंने सिर्फ किरदार नहीं निभाए, बल्कि उन्हें जीया है.

सत्या का भीखू म्हात्रे हो, शूल का समर्पित पुलिस अफ़सर, अलीगढ़ का मौन और पीड़ित प्रोफेसर, या भोंसले का अकेला बूढ़ा आदमी. हर भूमिका में उन्होंने अभिनय की परिभाषा बदल दी.

उनकी कला के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कारों से लेकर पद्मश्री तक सम्मानित किया जा चुका है. लेकिन इन सम्मानों से भी बड़ी बात यह है कि उन्होंने दर्शकों के दिलों में जो जगह बनाई है, वह किसी ट्रॉफी से नहीं मापी जा सकती.

पिछले दो दिनों से एक फिल्म के शीर्षक को लेकर उनका नाम विवाद में घसीटा जा रहा है. जबकि एक अभिनेता का काम सिर्फ अभिनय करना होता है. कहानी, शीर्षक, प्रस्तुति, यह सब एक बड़ी रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं.

किसी किरदार के नाम या संदर्भ को लेकर अभिनेता को कठघरे में खड़ा कर देना कहीं न कहीं रचनात्मक स्वतंत्रता पर चोट है.

बीते समय की फिल्मों को याद कीजिए कितनी ही फिल्मों में “ठाकुर” शब्द का इस्तेमाल विलेन के लिए हुआ. तब किसी ने इसे जातिगत अपमान नहीं माना. समाज ने समझा कि वह एक किरदार है, एक कथा का हिस्सा है. आज हम इतने असहिष्णु क्यों हो रहे हैं!

मैं स्वयं ब्राह्मण हूँ, लेकिन मेरी भावनाएँ आहत नहीं हुईं. मेरा मानना है कि कोई भी धर्म या जाति इतनी संकुचित नहीं होनी चाहिए कि कल्पना और कहानी से भी डर जाए. कला समाज का आईना है, और आईने को तोड़ देने से सच्चाई नहीं बदलती.

जरा-जरा सी बात पर एफआईआर दर्ज होना, कलाकारों और फिल्मकारों के मन में डर पैदा करता है. इससे रचनात्मकता सिमटती है, साहस घटता है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, विचार और संवाद का माध्यम भी है.

और अब जब NetFlix ने खुद स्पष्ट कर दिया है कि यह एक काल्पनिक चरित्र का नाम है और उन्होंने सोशल मीडिया सामग्री भी हटा दी है, तो इस विवाद को यहीं समाप्त मान लेना चाहिए. आगे बढ़ना ही बेहतर है.

सबसे अहम बात यदि आप कभी मनोज जी से मिलेंगे, तो पाएँगे कि वे एक महान अभिनेता ही नहीं, उससे कहीं बेहतर इंसान हैं. जब मैं उनसे मिला, घंटों की बातचीत में मैंने उनके भीतर की संवेदनशीलता, विनम्रता और गहराई को महसूस किया. इतनी सफलता के बावजूद उनमें अहंकार का नामोनिशान नहीं है.

ऐसे कलाकार के साथ खड़ा होना सिर्फ एक अभिनेता का समर्थन करना नहीं, बल्कि कला, अभिव्यक्ति और संवेदनशील समाज के पक्ष में खड़ा होना है. मनोज जी, आप अभिनय के शिखर पर हैं और इंसानियत में उससे भी ऊँचे.

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