मोदीखाता (एक) : चले थे गंगा साफ करने, हो गई वो और प्रदूषित!

Nitin Thakur

ये मोदीखाता सीरीज़ की पहली कड़ी है. इसमें बात गंगा सफाई की करेंगे. जल्दबाज़ी के शौकीन दोस्त आगे बढ़ सकते हैं, ठहरकर समझने का हौसला रखनेवाले दो-चार मिनट दे सकते हैं. बड़ी मेहनत से लिखा जा रहा है, आपसे थोड़ा ध्यान देने की दरख्वास्त है. मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं कि मेरी खोजबीन का आधार RTI पर आधारित आंकड़ों की किताब ‘वादाफरामोशी’, सरकारी और प्रतिष्ठित एजेंसियों के आंकड़े और मीडिया में प्रकाशित मंत्रियों के बयान हैं.

वाराणसी आज के दौर की वीवीआईपी सीट है और गंगा की सफाई इसका सबसे बड़ा मुद्दा है। प्रधानमंत्री मोदी के साथ गंगा सफाई मंत्री उमा भारती के दावे तो सबने सुने ही हैं मगर उनकी हकीकत क्या है अब ये आंकड़ों की ज़ुबानी समझिए। हम सब जानते हैं गंगा सफाई के लिए सरकार ने नमामि गंगे प्रोजेक्ट शुरू किया था। इसका बजट 20 हज़ार करोड़ रुपए है। 2011 में विश्वबैंक ने भी गंगा सफाई के लिए 4600 करोड़ रुपए दिए थे।

इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य गंगा को प्रदूषण मुक्त करना, गंगा संरक्षण और उसका कायाकल्प था। इसके अलावा रिवर फ्रंट बनाने से लेकर औद्योगिक कचरे का निस्तारण तक करने का काम भी सरकार को करना था। ये सारे लक्ष्य खुद सरकार ने अपने लिए तय किए थे। इसके अलावा मीडिया रिपोर्ट्स उन खबरों से भरी पड़ी हैं जिसमें उमा भारती घोषणा करती हैं कि अगर 2018 तक वो गंगा को अविरल ना कर सकीं तो उसी में कूद कर जान दे देंगी।

आगे बढ़ने से पहले बता दूं कि 2016 में मोदी सरकार ने जिस नेशनल गंगा काउंसिल की स्थापना की थी उसके अध्यक्ष स्वयं प्रधानमंत्री थे और गंगा को लेकर उनकी गंभीरता इस तथ्य से समझिए कि खुद उन्होंने इसकी कभी एक बैठक भी नहीं बुलाई। खैर, अब ये भी जानिए कि गंगा के प्रदूषण को मापने के लिए नमामि गंगे के तहत 4 साल में 113 रियल टाइम बायो मॉनिटरिंग स्टेशन लगाने थे। ये बताते कि रियल टाइम में नदी में प्रवाहित होेनेवाले प्रदूषण की मात्रा कितनी है। सरकारों की गंभीरता इसी से समझिए कि इसका फ्रेमवर्क 2001 से ही तैयार था लेकिन ना तो यूपीए सरकार और ना बाद में मोदी सरकार ने एक भी मॉनिटरिंग स्टेशन लगाने की ज़रूरत समझी।

बड़े-बड़े कॉरपोरेट हाउस अपने मुनाफे में से 2% हिस्सा corporate social responsibility (CSR) के नाम पर दान पुण्य में खर्च किया करते हैं। 12 अक्टूबर 2018 को जल संसाधन मंत्रालय में एक आरटीआई लगाई गई। पूछा गया कि CSR के तहत गंगा सफाई के कितने काम हुए? ये ज़ाहिर है कि प्रधानमंत्री को कॉरपोरेट पसंद करते हैं और ये भी ज़ाहिर है कि मोदी गंगा की परवाह में कई बार बोलते रहे हैं। ऐसे में अगर गंगा सफाई में यदि कुछ पैसा कम पड़ता है तो सरकार कॉरपोरेट से रकम निकलवा सकती है। इसका जवाब 6 नवंबर 2018 को मिला और पता चला कि अब तक CSR के तहत कोई प्रोजेक्ट बना ही नहीं, यानि गंगा के मामले में कॉरपोरेट का साथ नहीं लिया जा सका जबकि और बहुत जगह हैं जहां कॉरपोरेट बढ़ चढ़कर सरकार से सहयोग करने को तैयार हो गया। हां, शिपिंग कॉरपोरशन ऑफ इंडिया और इंडो रामा ग्रुप ने कुछ घाट और शवदाहगृह ज़रूर बनाए। कुल 6 कामों के लिए कुछेक काम के लिए कुल तीन कॉरपोरेट हाउस ने ही कुछ काम किए।

गंगा के नाम पर सरकार ने भी खूब पैसा बनाया। लोगों से दान लेकर और पोस्ट ऑफिस से गंगाजल बेचकर खूब कमाई हुई। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत भी एक फंड बनाया गया था। नाम है क्लीन गंगा फंड। 2016 में बने इस फंड में आम लोगों ने भी खूब पैसा भेजा। 6 नवंबर 2018 को जल संसाधन मंत्रालय ने एक आरटीआई के जवाब में बताया कि 15 अक्टूबर 2018 तक फंड में ब्याज समेत 266.94 करोड़ रुपए जमा हुए थे। मोदी के सत्ता में आने से पहले नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के खाते में जितना अनुदान और विदेशी लोन के तौर पर पैसा जमा था उस पर 7 करोड़ 64 लाख रुपए का ब्याज़ मिला। मार्च 2017 तक इस खाते की राशि 107 करोड़ रुपए तक जा पहुंची, यानि तीन साल में मोदी सरकार ने सिर्फ नेशनल मिशन फॉर गंगा के खाते से 100 करोड़ रुपए का ब्याज़ कमा लिया। अब ध्यान दीजिए कि ये राशि इसलिए बढ़ी क्योंकि सरकार मिलनेवाले पैसे को गंगा पर खर्च कर ही नहीं रही थी, नतीजतन पैसा पड़ा रहा और ब्याज़ मिलता गया। पैसा जिस लिए खर्च करने को मिला वो हुआ नहीं और उससे सरकार कमाई में जुटी रही।

अब पढ़िए गंगा सफाई पर लिखी गई पोस्ट का सबसे दिलचस्प हिस्सा। वाराणसी के संकट मोचन फाउंडेशन (SMF) के जुटाए गंगाजल के सैंपल की खबर नवभारत टाइम्स में 17 मार्च 2019 को छपी। पता चला कि गंगा को 2019 तक निर्मल बनाने की सरकारी योजना फेल हो गई है। उमा भारती से नितिन गडकरी को प्रभार मिल चुका था और उन्होंने अपना लक्ष्य 2020 तक बढ़ा दिया। फाउंडेशन लगातार गंगा के सैंपल की जांच करता रहा है। उसने बताया कि गंगा में कोलीफॉर्म ऑर्गनिज्म जनवरी 2016 में 4.5 करोड़ (अपस्ट्रीम) और 5.2 करोड़ (डाउनस्ट्रीम) था। फरवरी 2019 में यह 3.8 करोड़ (अपस्ट्रीम) और 14.4 करोड़ (डाउनस्ट्रीम) हो गया जबकि मानक के मुताबिक पीने के पानी में कोलीफॉर्म ऑगनिज्म 50 एमपीएन/100 मिली होना चाहिए। बीओडी लेवल की बात की जाए तो यह भी 66 से 78 एमजी तक हो गया है, जबकि 2016 में यह आंकड़ा 46 से 54 एमजी के बीच था।

आधी लाइन में इसका मतलब है कि चले थे गंगा साफ करने, हो गई वो और प्रदूषित। 1 जुलाई 2018 को ‘आजतक’ वेबसाइट पर एक खबर छपी, जिसमें बताया गया कि एक आरटीआई लगाकर जब सरकार से पूछा गया कि अब तक गंगा कितनी साफ हुई तो उसके जवाब में सरकार ने साफतौर पर कहा कि उसे पता ही नहीं गंगा अब तक कितनी साफ हुई है. अब आखिरी हिस्सा। आंकड़ों से पता चलता है कि ना गंगा सफाई के कार्यक्रम को गंभीरता से लिया गया और ना ही गंगा साफ हो सकी लेकिन प्रधानमंत्री ने गंगा के नाम पर अपने विज्ञापनों में कोई कमी नहीं छोड़ी।

6 दिसंबर 2018 को एक आरटीआई के जवाब में जल संसाधन मंत्रालय के नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा से पता चला कि 2014-15 से 2018-19 के बीच सरकार ने 36.47 करोड़ रुपए के विज्ञापन जारी किए। 2014 में ये 2 करोड़ के आसपास थी और चुनावी साल में आते-आते 13 करोड़ का आंकड़ा पार कर गई। ठीक है कि सरकार को अपने कराए गए विकास कार्यों को प्रचारित करने का अधिकार है लेकिन छोटे-छोटे कामों का विज्ञापन भारी रकम खर्च करके जिस तरह किया गया वो हैरान करता है क्योंकि 113 रियल टाइम बायो मॉनिटरिंग स्टेशन ही ना लगना सरकार की गंभीरता को दिखाता है। इसके अलावा 14 अक्टूबर 2017 को सरकार पटना-बेऊर एसटीपी, सीवरेज नेटवर्क जैसे काम का विज्ञापन जारी किया जाता है। अब सवाल है कि ये प्रोजेक्ट तो तीन साल पहले मंज़ूर हो चुके थे, फिर कोई बताए कि केंद्र सरकार ने बिहार में इन कामों को नीतीश से गठबंधन के पहले क्यों शुरू नहीं किया?

एक आरटीआई में पूछा गया कि 13 अगस्त 2016 के बाद कितने सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हुए, किन शहरों में ड्रेनेज नेटवर्क की प्लानिंग हुई, दस स्मार्ट गंगा सिटी बनाई जानी थी उनका क्या हुआ? पता चला कि 10 अक्टूबर 2018 तक 236 प्रोजेक्ट सेंक्शन हुए जिनमें 63 पूरे हो गए। 114 सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर और एसटीपी प्रोजेक्ट सेंक्शन हुए जिनमें महज़ 27 पूरे हुए। दस में से कहीं भी स्मार्ट गंगा सिटी नहीं बन सकी, अलबत्ता उज्जैन में इसकी घोषणा करनेवाली उमा भारती विदा हो गईं।

…जारी…

आजतक समेत कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके और इन दिनों टीवी9 भारतवर्ष की डिजिटल टीम से जुड़े पत्रकार नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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Comments on “मोदीखाता (एक) : चले थे गंगा साफ करने, हो गई वो और प्रदूषित!

  • ऐसी सैंपल रिपोर्ट कांग्रेस के टाइम की सैंपल रिपोर्ट से compare करके देखना पड़ेगा। मैं पिछले 10 साल से लगातार हरिद्वार जा रहा हूँ गंगा नदी अब जितनी साफ है उतनी साफ पहले नही थी। सत्य को प्रमाण की आवश्यक्ता नही होती। आपका ये web page खिसियाई बिल्ली खम्बा नुचे की तरह है

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