‘आजतक’ में कार्यरत नितिन ठाकुर को मिला प्रमोशन, एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर बने

आजतक न्यूज चैनल में दो वर्षों से ज़्यादा समय से कार्यरत युवा पत्रकार नितिन ठाकुर को प्रमोशन मिला है. उन्हें एडिटोरियल प्रोड्यूसर से प्रमोट करके एसोसिएट सीनियर प्रोड्यूसर बना दिया गया है. Continue reading

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

राजदीप चाहते तो प्रणब मुखर्जी से माफी मांगने वाला हिस्सा इंटरव्यू की एडिटिंग के दौरान हटवा सकते थे!

Nitin Thakur : प्रभु चावला का एक प्रोग्राम ‘सीधी बात’ आजतक पर आता था। एक दिन प्रभु चावला ने अपने कोंचनेवाले अंदाज़ में एक नेता को छेड़ दिया। नेताजी ने गरम होकर ऑनएयर ऐसा बहुत कुछ कह डाला जो आगे ख़बर भी बना। अगले दिन एक लड़का दूसरे को कह रहा था- ‘कल तो उस नेता ने प्रभु चावला को चुप ही करा दिया। ऐसी-ऐसी सुनाई कि प्रभु चावला मुंह देखता रह गया..कुछ बोल भी नहीं सका। इन पत्रकारों को तो ऐसे ही सुनानी चाहिए’ दूसरा लड़का चुप खड़ा था। पहले वाला और भी बहुत कुछ बोला।

दूसरे को जवाब ना देता देख मुझे मजबूरन बीच में बोलना पड़ा- ‘बीच में बोलने के लिए माफ करना लेकिन क्या तुम्हें समझ आया कि ये जीत प्रभु चावला की ही थी। लोग एंकर का भाषण सुनने के लिए तो टीवी नहीं देखते। ना एंकर की कोशिश होती है कि वो भाषण दे। एंकर की जीत ही इसमें है कि वो सामनेवाले से ऐसा कुछ बुलवा ले जो वो बोलने से बच रहा हो। नेताजी का योजनाबद्ध संयम तुड़वाना ही प्रभु चावला की कोशिश थी। जब तक वो संयम नहीं टूटा प्रभु चावला सवाल कर रहे थे लेकिन जैसे ही बांध टूटा तो फिर प्रभु चावला का काम हो गया और वो चुप्पी लगाकर सुनते रहे। इसे एंकर की बोलती बंद होना नहीं कहते..बल्कि सामनेवाले की ढोलक फोड़ना कहते हैं’

खैर मुझे जो समझ आया वो ज्ञान दे दिया..बाकी तो सब ज्ञानी हैं ही यहां।

आज ये ज्ञान मुझे देने की ज़रूरत इसलिए भी महसूस हुई क्योंकि दो-एक दिन पहले पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का इंटरव्यू राजदीप सरदेसाई ने लिया। इंटरव्यू के दौरान राजदीप ने प्रणब मुखर्जी को एक जवाब के बीच में टोक कर कुछ पूछ लिया। शायद मुखर्जी अपना जवाब मुकम्मल करना चाहते थे लेकिन अचानक हुई टोकाटाकी से उन्हें हल्का गुस्सा आ गया। पुराना नेता, पकी उम्र और सर्वोच्च पद पर आसीन रहने के मिले जुले रुतबे से मुखर्जी ने जो कुछ कहा उसके बीच राजदीप ने अपनी गलती तुरंत मानी और गरिमापूर्ण ढंग से माफी मांग ली। आगे मुखर्जी ने अपना इंटरव्यू अच्छे से दिया और आखिर में खुद भी राजदीप के प्रति थोड़ा कठोर होने के लिए खेद व्यक्त किया।

बावजूद इसके राजदीप ने मुखर्जी से कहा कि मैं इसे सकारात्मक ढंग से लेता हूं। कुछ पेशेवर ट्रोल्स और मीडिया से नफरत पाल बैठे लोगों ने इसे राजदीप का मज़ाक बनाने में इस्तेमाल किया, जबकि ये सबक पत्रकारिता और राजनीति दोनों के नवागंतुकों के लिए था। समय आ गया है जब नेताओं और पत्रकारों को आपसी सम्मान रीस्टोर करना चाहिए। नेताओं को समझना होगा कि वो सत्ताधारी हैं। आज़ाद पत्रकारिता को सांस मिलती रहे तो ही उनका शासन इतिहास का उजला अध्याय माना जाएगा, और पत्रकारों को समझना पड़ेगा कि उनका काम सवालों का जवाब हासिल करना है ना कि हमलावर मुद्रा में सामने वाले को रौंद डालना। बाकी तो जिन लोगों को ना लोकतंत्र समझना है, ना राजनीति और ना पत्रकारिता ये पोस्ट उनके लिए नहीं है।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

अविनाश विद्रोही सबसे बड़ी बात है राजदीप उस भाग को काट सकते थे क्योंकि वो लाइव नही था बाबजूद उसके उन्होंने उस अंश को लोगो को दिखाने का साहस किया ये भी एक तरह की अच्छी रिपोर्टिंग ही है।

Sanjaya Kumar Singh लेकिन भक्त बेचारे इतना जानते तो भक्त क्यों होते ….

Ayush Dubey Bas ye akal sab Mein hoti to sab samajhdar Na kehlaate.

Nitin Thakur कुछ लोगों को सब समझ है लेकिन जानबूझकर अनजान बनते हैं। उनको जो सिद्ध करना होता है सारा ज़ोर वही सिद्ध करने में लगाते हैं।

Puneet Gaur Pranav Babu has habit of scolding, even now senior Congress leaders mentioned it many times, so but his Rajdeep conduct was good, As far as cutting off the portion is concerned, it’s not possible, whole channels credibility would have been in limbo after that (whatever is left) remember Namo interview with DD

Nitin Thakur हां मुखर्जी का ऐसा स्वभाव भी है लेकिन बावजूद इसके अंत में उनका खेद प्रकट करना उनकी उदारता ही दर्शाता है। उन्हें इसकी भी ज़रूरत नहीं थी। बाकी चैनल के पास कोई क्लिप काट देने का पूरा अधिकार और सुविधा होती है।

रोशन मैं पत्रकारिता का छात्र हूं. ‘हमारा काम सवालों का जवाब हासिल करना है ना कि हमलावर मुद्रा में सामने वाले को रौंद डालना’, यह सबक आजीवन याद रखूंगा।

Kamlesh Rathore राजदीप ने अपनी गलती मानी वही बडी बात है नहीं तो आज कल के बेलगाम एंकर कहाँ सुनते किसी की। दूसरा उसे ऑनएयर किया वो बडी हिम्मत है। (वैसे वो नेता जी कौन थे सीधी बात वाले?)

Nitin Thakur नेता और जिससे कहा जा रहा था कि प्रभु चावला की बोलती बंद हो गई दोनों की पहचान गुप्त है।

Ritu Raj Misra आजाद पत्रकारिता का अर्थ गुलाम इंटरव्यूई नहीं होता . नेता ने अगर कुछ बोल दिया तो वो भी संविधान के दायरे में आता है .

Nitin Thakur कहां लिखा गया कि असंवैधानिक है।

Ritu Raj Misra अगर संवैधानिक है तो किसी भी थर्ड पार्टी का मंतव्य इसे परिवर्तित करने का महज एक दृष्टिकोण भर है . मिडिया अपने स्वतंत्रता के अधिकार का बहुत जिक्र करती है जबकि उसके पास और भी अधिकार हैं और भी कर्त्तव्य . जब हम मीडिया में स्वतंत्रता की बात करते हैं तो उसका अर्थ लगभग लगभग उच्छ्न्खलता होता है. मीडिया के पास दो चीजें हैं बाज़ार के नियम और एथिक्स. बाज़ार ताकतवर होता है और एथिक्स को रौंद देता है तो बचता है सिर्फ बाज़ार . मीडिया में आतंरिक नियमन के तरीके कमजोर है. मैंने किसी पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होते हुए नहीं देखी गैर-जिम्मेदार खबरों पर . लगभग लगभग सभी संस्थाओं को इन्टरनल डिसिप्लिन के लिए कंडक्ट रूल होते हैं . मैंने नहीं देखा कि उन पर कभी कोई कार्यवाही होती है. क्या मीडिया को खुद आर टी आई के अन्दर नहीं आना चाहिए खुद इतनी बड़ी बड़ी बातें करने वाले बिलकुल अपारदर्शी और कमजोर लोग है . मीडिया अपनी आतंरिक कमियों से ढह रहा है . धीमे धीमे मीडिया शुद्ध रूप से मीडिया ही रह जायेगा वह एक कांच का टुकड़ा या लेंस होगा जिसकी नैतिक अथारटी शून्य होगी.

Nitin Thakur खबरों को लेकर मीडिया अकेला नियम नहीं बनाता है। सरकार के विभागों से उसके पास लगातार नोटिस और नोटिफिकेशन आते रहते हैं। उसके मुताबिक ही खबरें चलती हैं। पूरी तरह सरकार को अधिकार देने में डर यही है कि फिर जो सरकार आएगी वही सारे मीडिया को डीडी की तरह चलाएगी। नेहरू ने एक बार कहा था कि मीडिया थोड़ी गड़बड़ी करे तो भी मैं उसकी आज़ादी के पक्ष में हूं। स्वाभाविक है गड़बड़ी से उनका मतलब तब पेड खबरें चला लेने से नहीं रहा होगा, बल्कि वो खबरों को लेकर ही ऐसा कह रहे होंगे। आज भी ज़िम्मेदार मीडिया संस्थान किसी खबर को यूं ही नहीं चलाते। उनके पास कोई ना कोई आधार होता है। हां खबरों के चयन और एंंगल को एडिटोरियल सेंस पर छोड़ा जाता है जिसे किसी भी तरह की चुनौती देने का सीधा मतलब मीडिया की आज़ादी में दखल ही है। वैसे गलत खबरों पर लीगल नोटिस आते रहते हैं और सबको जवाब देना होता है। हर संस्थान के पास वकीलों की टीम है। लोग नहीं जानते कि मीडिया संस्थान हर दूसरे दिन कहीं ना कहीं किसी खबर पर केस लड़ते हैं। आसाराम, केजरीवाल, निर्मल बाबा के चेलों ने तो सीरीज़ में केस दायर किए थे। लोकतंत्र हैं उनको अधिकार है और उसी अधिकार के तहत ज़िम्मेदार संस्थान केस लड़ रहे हैं। इसके इतर कल-परसों में कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हुई छुटपुट वेबसाइट्स की बात अलग है । इनमें बहुत एजेंडा वेबसाइट हैं लेकिन न्यूज़ वेबसाइट्स की तरह बिहेव करती हैं। इन्होंने मीडिया की गिरती साख में और बट्टा लगाया है। हां, आरटीआई में मीडिया को आना चाहिए ये सही है। फंडिंग वगैरह का ब्यौरा जानने का सबको अधिकार होना चाहिए।

Rashid Mohd राजदीप सरदेसाई ख़ुद में एक अच्छी शख्शियत है और एक मंझे हुए पत्रकार है।

Dharamveer Katoch राजदीप जानते हैं कौन सी बोल खेलनी है और कौन सी छोड़नी है,आख़िर दिलीप सरदेसाई जैसे बल्लेबाज के बेटे हैं…अब मालिकों के इशारों पर कठपुतलियों की तरह नाचने वाले इस बात को समझेंगे?

Nitin Thakur मुझे पता नहीं लगा कि खेलनी और छोड़नी जैसा इसमें क्या था। सवाल पूछने के लालच में और कई बार काउंटर क्वेश्चन में ओवर लैपिंग होती है। जवाब देने वाले की लय टूट जाती है। माफी मांग कर उन्होंने इंटरव्यू को सीधा सीधा चलने दिया है।

Dharamveer Katoch आज के योद्धा पत्रकार कभी मान सकते हैं कि उन्हें माफ़ी मांग लेनी चाहिये,उन्हें तो मानों दुनियां का अंतिम सत्य हाथ लग गया है!

Nitin Thakur हां ये बड़ी दिक्कत तो है ही।

Anuj Agrawal रविशंकर जी को ये इंटरव्यू देखना चाहिये, और उसके बाद बाजपेयी जी को दिया अपना इंटरव्यू, पुण्य सर के संयम काबिलेतारीफ था उस इंटरव्यू में…

Shamim Uddin Ansari प्रभु चावला कोई अच्छे इंटरव्यू कर्ता नहीं थे। अरशद वारसी ने भी उनकी ख़ूब ख़बर ली थी।

Nitin Thakur अपनी अपनी पसंद है। मैं यहां रेटिंग नहीं दे रहा।

नवनीत कुमार अगर आजकल एडिटिंग होना बंद हो जाये तो कमाल हो जाये! उमर अब्दुल्ला भी एक बार ऐसे ही भड़क गए थे प्रभु जी से। तब काफी छोटे थे हम लोग लेकिन तीन पांच समझने लगे थे। उस समय प्रभु जी ने ऐसी डांट लगाई की अब्दुल्ला एकदम चुप हो गए।

Nitin Thakur चैनल मेजबान होते हैं और दूसरे लोग मेहमान। ऐसे में एंकर्स को विनम्रता बरतनी चाहिए, दूसरी बात ये है कि पत्रकार यूं भी कोई पुलिस वाला नहीं होता कि ज़ोर जबरदस्ती से बुलवा ले.. वो समझदारी से ही जवाब निकलवा सकता है। तीसरी बात ये कि कई पत्रकार नेताओं के मुकाबले बहुत विद्वान होते हैं लेकिन उनका काम अक्सर कई मौकों पर ज्ञान झाड़ना नहीं होता। उमर अब्दुल्ला तो वाकई प्रभु चावला के मुकाबले तब बहुत कम ज्ञान रखते होंगे।

नवनीत कुमार जी बिल्कुल उस समय अब्दुल्ला काफी यंग थे। जबकि प्रभू सर वरिष्ठ थे। और धाकड़ भी थे।

Ashok Pandey ठाकुर साहेब इसे आप चाहे सामने वाले की ढोल फोड़ना कहे या उकसा कर सामने वाले से कुछ कहलवाना , लेकिन एक बात तो सत्य है कि ऐंकर अक्सर अपनी सीमा लाँघ जाते हैं , एक सवाल के जवाब से पहले दूसरा सवाल , वो भी बिलकुल आक्रामक अंदाज में। ऐंकर को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐंकर की ही ढोल फोड़ने को आमादा हो जाते हैं।मुझे राज ठाकरे का इंटरव्यू याद है और उस पत्रकार का चेहरा भी। खैर राजदीप सर देसाई का अंदाज पूर्व राष्ट्रपति के साथ जैसा रहा , कईयों के लिए सबक होगा।

Nitin Thakur मैंने तो खुद ही माना है कि ये पत्रकारों के लिए भी एक सबक है। मैं कौन सा बचाव कर रहा हूं कि आप ये कमेंट लिखने को मजबूर हैं। बाकी रहे राज ठाकरे तो वो गुंडे हैं। उनसे सबको डरना भी चाहिए।

Ashok Pandey ठाकुर साहब मैने ऐसा क्या लिख दिया जो आपको बुरा लग गया ..

Nitin Thakur बुरा लगने के काबिल आपने कुछ नहीं लिखा पांडे जी, मैंने बुरा माना भी नहीं है। मैंने बस इतना भर लिखा है कि मैं आपकी सीमा लांघने की बात से सहमत हूं तभी तो लिखा है कि इससे सबक लेना चाहिए।

Mohammed Saood Khan बहुत उम्दा Nitin Thakur bhai… बस आपकी आखिरी लाइन गलत है.. असल में ये पोस्ट लोकतंत्र और पत्रकारिता ना समझने वालों के लिए ज़्यादा ज़रूरी है 🙂

Prashant Mishra आजकल क्यों ऐसा पेश किया जा रहा कि पत्रकार लोहा ले रहे राजनेताओं से? क्या ये सिर्फ़ TRP के लिए है या पत्रकारों की महत्वाकांक्षा पूरी करने का माध्यम मीडिया हो गया है? मुझे लगता है निष्पक्ष पत्रकारिता के चोले में पत्रकार अपना नैसर्गिक भाव भूल रहे हैं, और राजनीतिक एजेंडा तय करने की कोशिश करते नजर आ रहे।

Neeraj Rawat ऐसा ही रविश कुमार ने किरन बेदी के साथ किया था और …बेदी जी की सिरी राजनेतिक समझ तार तार हो गई थी ऐसे बहुत से उदाहरण है। …अच्छी पत्रकारिता के..

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यशवंत पर हमला करने वाले इन दो अपराधियों को पत्रकार कहना ही गलत है : नितिन ठाकुर

Nitin Thakur : भड़ास एक महाप्रयोग था, Yashwant Singh का. जो सबकी खबरें लेते थे उनकी खबरें लेने-देने का मंच. पत्रकारों को कोसने के दौर में उनकी बदहाली को भड़ास ने खूब उठाया. अब तीन ही दिन पहले यशवंत के साथ दो लोगों ने इसलिए मारपीट कर दी क्योंकि उन्होंने दोनों के खिलाफ अलग-अलग मौकों पर खबर छाप दी थी. वैसे तो उन दोनों को पत्रकार कहना ही गलत है क्योंकि उन्होंने कलम छोड़ हाथ उठाया लेकिन पेशेगत पहचान की वजह से उनको पत्रकार ही कहा जाएगा.

हमलावर नंबर एक- भूपेंद्र नारायण सिंह भुप्पी

हमलावर नंबर दो- अनुराग त्रिपाठी

एक को किसी चैनल ने पहले ही इसलिए बाहर कर दिया था क्योंकि वो वसूली करने लगा था तो दूसरा अभी Newslaundry में काम कर रहा है. पत्रकारों के प्रति असहिष्णु दौर में पत्रकारों के दुख सुख का हिसाब रखनेवाले यशवंत पर यूं हमला किया जाना बताता है कि सहनशीलता चारों ओर कम हो रही है. यशवंत जो करेंगे सो करेंगे लेकिन हम सबको इस खबर का प्रसार करके संबंधित संस्थानों तक उनके कर्मचारियों के गैर कानूनी बर्ताव की जानकारी पहुंचानी चाहिए. हमले के आरोपियों के नाम तस्वीर पेश है.

फेसबुक के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

संबंधित खबरें….

xxx

xxx

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है!

Nitin Thakur : सब जानते हैं कि एनडीटीवी की छंटनी किसी पूंजीपति के मुनाफा बढ़ाने का नतीजा नहीं है. वो किसी नेटवर्क18 या ज़ी ग्रुप की तरह मुनाफे में होने के बावजूद लोगों को नहीं निकाल रहा. एनडीटीवी एक संस्थान के बिखरने की कहानी है. यही वजह है कि उनका कोई कर्मचारी मालिक को लेकर आक्रोशित नहीं है. वो जानते हैं कि उनसे ज़्यादा ये मुसीबत संस्थान के प्रबंधन की है. बावजूद इसके किसी को तीन महीने तो किसी को छह महीने कंपन्सेशन देकर विदा किया जा रहा है.

एनडीटीवी को जाननेवालों को मालूम है कि यहां ऐसे बहुतेरे हैं जिन्होंने दशकों तक आराम से नौकरी की और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं समझी. सैलरी फंसाना, जाते हुए कर्मचारी की सैलरी मार लेना, किश्तों में तन्ख्वाह देना या चार चार पैसे पर इंटर्न पाल कर उनका शोषण वहां उस तरह नहीं हुआ जिस तरह इंडस्ट्री के दर्जन भर कई चैनलों में होता है. सबसे ऊंची सैलरी पर करियर की शुरूआत इसी चैनल में होती रही है. ये जो छंटनी -छंटनी का राग अलाप कर एनडीटीवी को सूली पर चढ़ाने की भक्तिपूर्ण चालाकी भरी कोशिश है वो धूर्तता के सिवाय कुछ नहीं.

ये वही हैं जो एनडीटीवी को रोज़ बंद होने की बददुआ देते थे और आज जब सरकार के खिलाफ मोर्चा लेते हुए वो तिनका तिनका बिखर रहा है तो किसी की जाती हुई नौकरी पर तालियां बजाने की बेशर्मी भी खुलकर दिखा रहे हैं. बीच बीच में कुटिल मुस्कान के साथ “बड़ा बुरा हुआ” भी कह दे रहे हैं. इनकी चुनौती है कि एनडीटीवी वाले अपनी स्क्रीन पर अपने ही यहां हो रही छंटनी की खबर दिखाएं. भाई, आप यही साहस अपने चैनलों और अखबारों में क्यों नहीं दिखा लेते? मुझे तो नहीं याद कि उस चैनल ने कहीं और छंटनी की खबर भी दिखाई हो.. फिर आप ये मांग आखिर किस नीयत से कर रहे हैं?

आपने पी7, श्री न्यूज़, जिया न्यूज़, ज़ी, आईबीएन में रहते हुए खुद के निकाले जाने या सहयोगियों के निकाले जाने पर खबर बनाई या बनवाई थी?? दरअसल आपकी दिक्कत पत्रकार होने के बावजूद वही है जो किसी पार्टी के समर्पित कैडर की होती है. आप उस चैनल को गिरते देखने के इच्छुक हैं जो चीन विरोधी राष्ट्रवाद के शोर में भी CAG की रिपोर्ट पर विवेकवान चर्चा कराके लोगों का ध्यान सरकार की लापरवाही की तरफ खींच रहा है. आपकी आंतें तो डियर मोदी जी की आलोचना की वजह से सिकुड़ रही हैं, वरना किसी की नौकरी जाते देख खुश होना किसी नॉर्मल इंसान के वश से तो बाहर की बात है.

मैंने यहां पहले भी लिखा है कि मैं चैनल दिखने की एक्टिंग करते संघ के अघोषित इलेक्ट्रॉनिक मुखपत्र चैनलों के बंद होने के भी खिलाफ हूं. वो चाहे जो हों मगर आम लोगों की रोज़ी रोटी वहां से चल रही है. विरोधी विचार होना एकदम अलग बात है.. मगर सिर्फ इसीलिए किसी की मौत की दुआ करना अपनी गैरत के बूते से बाहर का सवाल है. एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है. ये तो उसी दिन पता चल गया था जब पठानकोट हमले की एक जैसी रिपोर्टिंग के बावजूद ऑफ एयर का नोटिस बस एनडीटीवी इंडिया को मिला था. चैनल को लेकर सरकारी खुन्नस छिपी हुई बात नहीं है. इसे रॉय का वित्तीय गड़बड़झाला घोषित करके मूर्ख मत दिखो.

रूस में एनटीवी हो या तुर्की में आधा दर्जन सरकार विरोधी मीडिया संस्थान.. सबको ऐसे ही मामले बनाकर घेरा और मारा गया है. आज सरकार की बगल में खड़े पत्रकारनुमा कार्यकर्ताओं के लिए जश्न का दिन है. उसे खुलकर सेलिब्रेट करो. किसी की मौत की बददुआ करके.. अब जब वो मर गया तो उस पर शोक का तमाशा ना करो. थोड़ी गैरत बची हो तो सिर्फ जश्न मनाओ. जिस चैनल पर एक दिन के बैन को भी सरकार को टालना पड़ा था अंतत: वो सरकार के हाथों पूरी तरह “बैन” होने जा रहा है. अब आप कहां खड़े हैं तय कीजिए, वैसे भी इतिहास कमज़ोर राणा के साथ खड़े भामाशाह को नायक मानता है, मज़बूत अकबर के साथ खड़े मान सिंह को नहीं।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रंगदार संपादक और राष्ट्रवादी शोर : टीवी जर्नलिज्म आजकल….

मोदी के राज में कानून का डंडा बहुत सेलेक्टिव होकर चलाया जा रहा है…

Nitin Thakur : एनडीटीवी प्रमोटर पर छापे के दौरान ‘ज़ी’ अजीब सी खुशी के साथ खबर चला रहा था. शायद उन्हें इस बात की शिकायत है कि जब उनकी इज्ज़त का जनाज़ा निकल रहा था तब उनका साथ किसी ने नहीं दिया. ज़ी का दर्द एक हद तक सही भी है. तब सभी ने चौधरी और अहलूवालिया का स्टिंग बिना ऐसे कुछ लिखे चलाया था कि “ये पत्रकारिता पर हमला है”. अब ज़ी हर बार जश्न मनाता है. जब एक दिन के एनडीटीवी बैन की खबर आई तो भी.. जब छापेमारी की खबर आई तो भी. उसे लगता होगा कि कुदरत ने आज उसे हंसने का मौका दिया है तो वो क्यों ना हंसे. बावजूद इसके सच बदल नहीं सकता कि उनका मामला खबर ना दिखाने के लिए संपादकों द्वारा रंगदारी की रकम तय करने का था और ये सब एक बिज़नेसमैन की वित्तीय अनियमितता का केस है जिसमें बैंक का कर्ज़ ना लौटाना प्रमुख है.

दोनों मामलों की गंभीरता की तुलना का कोई सवाल ही नहीं है. ज़ी के मामले में पत्रकारिता पर हमला तब माना जाता जब कैमरे पर जिंदल का आदमी खबर रोकने के पैसे तय करता और ज़ी के संपादक खुले आम कहते कि हम बिकनेवाले नहीं. वहां ऐसा कुछ नहीं था. हां, जब जिंदल ने स्टिंग सार्वजनिक कर दिया तब ज़रूर ज़ी ने कहा कि हम तो खुद मीडिया को खरीदने की इस चाल का पर्दाफाश करनेवाले थे. हालांकि ये कभी नहीं पता चला कि कैसे? सीबीआई ने विदेश से लौटते ही घंटों तक वर्तमान सांसद चंद्रा जी से पूछताछ की और उन्होंने सीबीआई की पूछताछ के तुरंत बाद अपने संपादकों की क्लास लेने वाले ढंग में बाइट भी दी. वो फिर अलग कहानी है कि कैसे संपादकों से मिलने के बाद चंद्रा जी हल्के पड़ते चले गए. सवाल आज भी कायम है कि क्यों?

खैर आगे चलकर संपादकों का ना सिर्फ प्रमोशन हुआ बल्कि एक को तो जनता में अपनी छवि चमकाने के लिए फ्री हैंड दिया गया कि वो अपने शो को भयानक राष्ट्रवादी बनाकर हीरो बन जाए. इसके लिए अलग से लोगों की भर्ती हुई. आज कर्मचारियों की पूरी फौज सारा दिन सिर्फ एक शो में चांद तारे जड़ने के लिए लगी रहती है. वो जानती है कि ये शो सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं बनता. ये टीम की अनवरत मेहनत का परिणाम है कि आज कोई भी उस “रंगदार संपादक” की बात नहीं करता. अब सबको राष्ट्रवादी शोर ने बहरा कर दिया है. स्वयं चंद्रा जी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए टीवी पर अमीर बनने के टिप्स बेचने शुरू किए.

कई साल तक उस बोरियत से भरपूर शो को चलाकर वो भी अंतत: करियर गुरू जैसी इमेज बनाने में कामयाब रहे. दोनों ही लोगों ने विश्वसनीयता के संकट से जूझते हुए टीवी का उपयोग अपने निजी छवि निर्माण में जिस तरह योजनाबद्ध ढंग से किया उस पर मैं कभी पीएचडी का शोध करना चाहूंगा. आज दोनों के पास अपना बचाव करने के लिए फैन्स का साथ है. यकीन ना हो तो फैन पेज देख आइए. संपादक जी के नाम से लगे होर्डिंग तो मैंने दिल्ली के पॉश इलाकों तक में पाए हैं. ये अभूतपूर्व है जब एक संपादक को कुछ लोग नेता की तरह प्रमोट कर रहे हैं.

अब तो कोई उनका स्टिंग कर दे तो पहले की तरह परेशानी नहीं होगी. वो उसे अपने स्तर से पत्रकारिता पर हमला कह कर या सीधा सीधा राष्ट्रवादी पत्रकारों पर हमला कह कर बच निकलेंगे. निजी हितों की लड़ाई को कैसे अभिव्यक्ति या विचार की लड़ाई में बदला जाए ये उसकी तैयारी है. क्रिकेट मैच का बायकॉट दरअसल अपने उसी खास रुझानवाले फैन को ये भरोसा दिलाने के लिए है कि जब सारे मीडिया के लिए देश से ऊपर क्रिकेट हो गया था तब हम अकेले भारतीय सेना का पराक्रम दिखा रहे थे. उससे उलट एनडीटीवी ऐसी कोई कोशिश कभी करता नहीं दिखा. उन्होंने सरकारों से सवाल पूछे. भले चैनल का प्रमोटर कोई वित्तीय खेल करता ही रहा हो तो भी चैनल के तेवर ने पत्रकारिता के बेसिक्स के साथ खिलवाड़ नहीं किया.

खिलवाड़ तब होता जब चैनल धीरे धीरे अपनी टोन डाउन करता ताकि उसके प्रमोटर को सरकार के कोप से किसी हद तक बचाया जा सके. इससे उलट वो टीआरपी में जितना पिछड़ा उसका तेवर ज़्यादा ही तल्ख होता गया. बैन का नोटिस भेजकर सरकार ने सोचा होगा कि चेतावनी देकर चैनल के सुर साध लेगी मगर रवीेश कुमार की काली स्क्रीन का मैसेज साफ था. चैनल बैन तो सरकार ने वापस लिया ही.. प्रतिरोध की बहार देखकर समझ आ गया कि भले ही मालिक पर हमला कर दो लेकिन चैनल से बचकर रहो. चैनल की लड़ाई जो चेहरा लड़ रहा है उसे देश के करोड़ों लोगों का भरोसा हासिल है. बीच में उसकी क्रेडिबिलिटी भी खत्म करने की साज़िश हुई. भाई पर छिछला सा आरोप लगा और ट्रोल रवीश को किया जाने लगा. उसके बाद सोशल मीडिया पर किसी रवीश की छोटी बहन को भी ट्रोल किया गया. ट्रोल करनेवालों को इस तथ्य से बहुत लेनादेना नहीं था कि रवीश की कोई बहन ही नहीं है. खैर.. दो चैनलों के पाप की तुलना से मीडिया का कोई भला नहीं होनेवाला.

मैंने ये लड़ाई पहली बार पाकिस्तानी चैनल्स पर देखी थी जहां एंकर खुलेआम ऑन एयर अपने प्रतियोगियों की खिंचाई करते हैं. भारत के चैनल इस मामले में बेहद अनुशासित रहे मगर पहली बार इस नियम को ज़ी ने ही तोड़ा. उसने ही सबसे पहले सेकुलर मीडिया जैसी बात कहके देश को समझाने की कोशिश की.. कि वो खुद बाकी सबसे अलग हैं और सेकुलर तो कतई नहीं हैं. उसने ये हरकत इतनी बार दोहराई कि एक बार तो चैनल के मालिक को ऑन एयर सफाई देनी पड़ी कि हम किसी पार्टी के साथ नहीं हैं. ये ऐतिहासिक सफाई वो तब दे रहे थे जब कुछ महीने पहले अपने ही चैनल पर एक पार्टी के लिए प्रचार करते और वोट मांगते दिखे थे. ज़ाहिर है उनकी सफाई कपिल की कॉमेडी की तरह मज़ेदार थी.

वैसे उनके विरोधी नवीन जिंदल तो और भी माशाअल्लाह निकले. उन्होंने ज़ी को घेरने के लिए एक चैनल ही खरीद डाला. ज़ी फिर भी किसी ज़माने में कभी शानदार पेशेवर चैनल था जिसने राजनीतिक खबरों को बेहद अच्छे ढंग से रखने में साख बनाई थी मगर जिंदल इस पेशे में सिर्फ इसीलिए उतरे क्योंकि उन्हें ज़ी के हमलों का जवाब उसी की भाषा में देना था. इस सबमें किस को कितना फायदा हुआ ये तो नहीं मालूम लेकिन पत्रकारिता का नुकसान बहुत हुआ. विरोधी चैनल को अपने खिलाफ खबर चलाने का कानूनी नोटिस भिजवाने वाला खेल ये दोनों खूब खेलते रहे हैं. भारतीय पत्रकारिता ने दो बिज़नेसमैन की लड़ाई में अपना इतना खून कब बहाया था याद नहीं. इतने बड़े मामले की जांच कहां तक पहुंची आज ये कोई नहीं जानता. वैसे मोदी सरकार को इनकी लड़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं है.

कोल ब्लॉक की जिस जंग में दोनों के हाथ काले हुए उस पर अब कोई बात नहीं करता. सरकार के पास वक्त और ऊर्जा लगाने के लिए आज खुद का एक शत्रु है और फिलहाल उसका फोकस पूरी तरह उसी पर है. फोकस ना होता तो वो इतने छिछले आरोप में सीबीआई को कभी नहीं उतारती. प्राइवेट बैंक का कर्ज़ ना लौटाने का केस और उसमें भी एक ऐसे आदमी की शिकायत जो कभी इसी ग्रुप का खास रहा है सब कुछ ज़ाहिर करने के लिए काफी है. आरोप तो इतना कमज़ोर है कि जिसकी हद नहीं. प्रणय रॉय के पास कर्ज़ चुकाने के कागज़ात मौजूद हैं. अलबत्ता कागजों के सही गलत का फैसला बाद की बात है. अब लगे हाथ बता दूं कि जिस फेमा के उल्लंघन में चैनल की अक्सर खिंचाई होती है ठीक वही मामला एक अन्य मीडिया संस्थान पर भी है लेकिन उसे सरकार के एक बेहद शक्तिशाली मंत्री के बहुत करीबी होने का ज़बरदस्त फायदा मिल रहा है.

मोदी के राज में कानून का डंडा इतना सेलेक्टिव होकर चलेगा ये अंदाज़ा लगाना तब बेहद आसान हो गया था जब गुजरात की एजेंसियों ने सरकार बनने के बाद उन तीस्ता सीतलवाड़ पर औने पौने आरोप लगाए जिसने गुजरात दंगों के मामले में मोदी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया. आज जो हो रहा है वो सीबीआई से पहले भी कराया गया है. इस काम में अब उसे महारत हासिल है. खुद मोदी का वो वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद है जिसमें वो सीबीआई को कांग्रेस की कठपुतली बता रहे हैं.

आज देश किस आधार पर मान ले कि वो प्रधानमंत्री का तोता नहीं है? मीडिया के उस खेमे से उनकी खुन्नस यूं भी पूरानी है जो अक्सर उनसे गुजरात दंगों पर सवाल करता रहा है. वो तो लाल किले तक से मीडिया को पाठ पढ़ा चुके हैं. उनके लिए मीडिया को उसकी हैसियत दिखाना कितना ज़रूरी है ये इसी बात से समझिए कि तीन साल गुज़र गए उन्होंने कभी खुलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की.. अलबत्ता संपादकों से अलग मिलकर निर्देश और सलाह देते रहते हैं. आज सत्ता उनके पास है और उसके साथ सीबीआई दहेज की तरह मिलती है. अब ये प्रधानमंत्री के विवेक पर है कि वो सीबीआई का इस्तेमाल व्यापमं जैसे बड़े घोटालों में कायदे से करते हैं या फिर अपने पूर्ववर्तियों की तरह विरोधियों को निपटाने और ब्लैकमेल करने में करते हैं. देश उन्हें देख रहा है.. वो कहां देख रहे हैं??

फेसबुक के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

किसानों के पेशाब पीने के बाद भी नहीं पिघलेगी मोदी सरकार

Nitin Thakur : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस दिन कंगारुओं के प्रधानमंत्री के साथ अक्षरधाम में पिकनिक मना रहे थे, क्या उन्हें इल्म है कि ठीक उसी दिन नॉर्थ एवेन्यू पर इस देश के चार किसान नंग धड़ंग होकर प्रदर्शन कर रहे थे? वो पागल नहींं थे.. और ना ही वो किसी पब्लिसिटी के लिए आए थे.. वो तो बेचारे तमिलनाडु के अपने गांवों से हज़ारों किलोमीटर दूर पत्थर के इस शहर में अपनी गुहार लगाने पहुंचे थे।

28 दिनों तक वो बेचारे प्रदर्शन के लिए सरकारों द्वारा तय की गई जगह जंतर मंतर पर पड़े रहे। उन्हें लगा कि चेन्नई ना सही मगर दिल्ली उनकी आवाज़ ज़रूर सुनेगी। 28 दिनों तक तथाकथित प्रधानसेवक के दफ्तर से कोई उनसे बात करने जंतर मंतर नहीं आया। सब्र टूटा तो किसान खुद ही प्रधानमंत्री के दफ्तर जा पहुंचे लेकिन मैले-कुचैले और गंदे-से दिखनेवाले इन जीवों की वहां भला क्या बिसात.. आखिर वो लकदक और चमकदार नेताओं और साहब लोगों का गढ़ है। खैर, पुलिसवाले जीप में ठूंसकर इन किसानों को जंतर मंतर पर ही पटकने के लिए चल दिए। बस तभी मौका पाकर चारों जीप से कूदे और कपड़े उतारकर नारेबाज़ी करने लगे। उस दिन तो उन्हें किसी तरह घेरकर जंतर मंतर ले आया गया लेकिन आज वही लोग चारों तरफ से थक हार कर अपना पेशाब पीकर प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

इससे पहले वो नरमुंड लेकर जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर चुके हैं। दिखावे के इस लोकतंत्र में किसानों का ये झुंड पूरे अहिंसक तरीके से प्रदर्शन कर रहा है लेकिन ना बेशर्म मंत्री के पास इनकी बात सुनने का वक्त है और ना ही उनके नेता के लिए ये ज़रूरी हैं। हां तमिलनाडु में चुनाव होता तो ये ही प्रधानसेवक इन किसानों के ही नाम पर रोने का ढोंग करके ‘मेरे किसान भाइयों को मत मारो’ कहकर हमदर्दी और वोट लूट लेता। आजकल वो सूरत में हीरे के कारखानों का उद्घाटन कर रहे हैं। इतना ही नहीं, बाकायदा वक्त निकालकर गुजरात के बड़े पूंजीपतियों के पुराने अहसान चुका रहे हैं। उनके 5 स्टार हॉस्पिटल के फीते काट रहे हैं जिन्होंने पुराने वक्त में फंड देकर करियर बनाने में मदद की।

मोदी जुलाई में इज़रायल जाने के लिए सामान पैक करने में जुटे हैं लेकिन चंद किलोमीटर पर खुदकुशी से चार कदम दूर किसानों से मिलने का उनके पास ना वक्त है और ना मन। मुझे नहीं लगता कि किसानों के पेशाब पीने से भी कोई सरकार पिघलेगी। वैसे बता दूं कि कंगारुओं के पीएम ने हमारे पीएम के साथ पिकनिक मनाई और सेल्फी तो ली… लेकिन फिर अपने देश में पहुंचते ही वो वीज़ा खत्म कर डाले जिनके सहारे हिंदुस्तान से लाखों बेरोज़गार ऑस्ट्रेलिया में नौकरी करते थे। समझ से परे है कि खुद को प्रधानसेवक (ये शब्द भी नेहरू से चुराया है) कहने वाला ये शख्स आखिर सेवक है किसका? क्या सिर्फ उनका जिनको ऑस्ट्रेलिया में ठेके दिलाने के लिए वो टर्नबुल को मेट्रो में घुमाकर पटा रहा था?

Arun Khare : तमिलनाडु के किसान कर्ज माफी की मांग को लेकर पिछले सैतीस दिन से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दे रहे हैं आज 22 तारीख को इन किसानों ने सरकार की अनदेखी के विरोध में मूत्रपान कर देश के जनमानस को हिला दिया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली की सरकार आंख कान बंद कर अन्नदाता को विरोध के ऐसे तरीकों के लिए मजबूर कर रही है । सरकार की इस चुप्पी और किसानों से आज तक बात न करने की घोर निंदा की जानी चाहिए।

इसी के साथ उत्तर भारत के उन किसान संगठनों की भी कडी और घोर निंदा की जानी चाहिए जो अपने दक्षिण भारतीय किसानों के इस संघर्ष में चुप बैठे हुए हैं। कहां है दिल्ली को किसानों से भर देने वाले किसान संगठन? क्या उनके आंदोलन किसी राजनीतिक दलों के हित साधक होते थे ? यदि नही तो ये तथाकथित बडे किसान संगठन क्यों नहीं तमिलनाडु के किसानों के साथ खडे नजर नहीं आ रहे । देश भर के किसानों को आपने स्तर पर अपने अपने तहसील और जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर दक्षिण भारतीय किसानों की मांग का समर्थन करना चाहिए।

Priyamvada Samarpan : ”आत्महत्या की चिता पर देखकर किसान को, नींद कैसे आ रही है देश के प्रधान को?” हरिओम पवार जी के वीर रस की ये पंक्तियां उन्हें कैसे सोने देती होंगी? कविवर जंतर-मंतर पर से ऐसी ही हुंकार का वक्त है… अगर आप किसानों के साथ स्वर देंगे तो देश आपके साथ सुर मिलाएगा. सनद रहे अगर खामोश रह गए तो किसी भी मंच पर कोई बेबाक आईना दिखा देगा. कसम से तब नंगे नजर आएंगे. चुप्पी तोड़िए हुजूर.

Pankaj Chaturvedi : तमिलनाडु के किसान जंतर मंतर पर अपनी मांगों के लिए, जिसमे प्रमुख सम्पूर्ण कर्जा माफी की है, के लिए गत 40 दिन से जतन कर रहे है। कभी आत्महत्या कर चुके किसानों के नर मुंड के साथ तो कभी नग्न हो कर। दिल्ली शहर नगर निगम पर कब्जे की जंग का कुरुक्षेत्र बना है और किसान का दर्द उसके लिए कोई मायने नही रखता। आज किसानों ने अपना ही मूत्र पिया और कल विष्ठा खाएंगे। मीडिया के लिए उसका महज फोटो जरूरी है। मेरी अपील है छात्रों, स्वयमसेवी संगठनों, युवाओं, लेखकों, पत्रकारों से कि वे इस प्रदर्शन को तमाशे के रूप में ना लें। उनके साथ खड़े हों। उनकी मांगों को समाज और जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाएं और उन्हें मल खाने जैसा विरोध करने से रोकें। आज मूत्र पान की खबर के बाद मन व्यथित है। यकीन मानिए, लंच नही किया। सोचें कि आपका अन्न दाता पेशाब पी रहा है। घर से निकले। एक रविवार जंतर मंतर पर बिताए। उस नॉटंकी अन्ना और केजरी के पीछे तो बहुत भृमित हुए थे। इन किसानों में खुद को देखें।

पत्रकार नितिन ठाकुर, अरुण खरे, प्रियंवदा और पंकज चतुर्वेदी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

चिंटू जी, पत्रकार बोलने के लिए नहीं, बुलवाने के लिए ही होता है!

Nitin Thakur : जब एक पत्रकार कोई सवाल करता है तो वो इस उम्मीद में नहीं करता कि सामनेवाला चुप हो जाए। वो वाकई चाहता है कि जवाब आए। जवाब आता है और अगर जवाब देनेवाला नेता हो तो बड़े जुमलों और भारी भाषा के साथ पूरी सफाई पेश करता है। इसके बाद पत्रकार अगले सवाल की तरफ बढ़ता है क्योंकि उसका काम हो चुका होता है। इसे कुछ चिंटू ये कह कर प्रचारित करते हैं कि वाह अमुक नेता ने पत्रकार की क्या बोलती बंद कर दी.. चिंटू जी, पत्रकार बोलने के लिए नहीं बुलवाने के लिए ही होता है।

वो चुभते सवाल ही इसलिए करता है ताकि आप को वो जवाब मिल सके जो नेता जी सीने में दबाए बैठे हैं, इसलिए अगली बार जब कोई पत्रकार सवाल करे और सामने से जवाब आए तो उसे पत्रकार की हार नहीं उपलब्धि समझिए। मुझे मालूम है कि देश में कहीं भी ठीक ठीक पत्रकारिता नहीं पढ़ाई जाती तो इस बेसिक समझ का अभाव इस लाइन में आने की कोशिश कर रहे ”डूड जर्नलिस्ट्स” में भी है। उनकी धारणा है कि पत्रकार सामनेवाले से बहस करने के लिए होता है।

फेसबुक के चर्चित लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से. उपरोक्त पोस्ट पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

सुशांत शर्मा Han. Bahut sahi . Youtube pe rajdeep aur modi ji ke kuchh videos hain jinme rajdeep modi ji ke truck me baithe hain 2012 gujarat chunaav ke. Usme modi ji ne kuchh ulta seedha bola aur video ke caption hai, modi insulted rajdeep sardesai. Little do they know ki video as it play karwana bhi rajdeep ke hath me hi tha. Insult karwa ke bhi poora video sab log ko dikhaya hai. Aise hi patrakaaron ko bika hua kah dene se kaam nahi chalega desh ka !

Nitin Thakur सुशांत शर्मा बेशक। पत्रकार गाली खाकर, कारों के पीछे दौड़कर, नीचे बैठकर सिर्फ इसलिए जानकारियां जुगाड़ता है ताकि लोगों तक पहुंचा सके। टीवी ही नहीं, चाहे प्रिंट हो या फिर वेब या फिर कोई भी दूसरा माध्यम पत्रकार के पास जानकारी पाने के ये ही तरीके हैं। राजदीप सरदेसाई जितने बड़े घर से ताल्लुक रखते हैं उन्हें ये सब करने की ज़रूरत ही नहीं थी। उन्हें रोज़ी रोटी जैसा कोई संकट ही नहीं। उनके पिता की एकेडमी में सचिन तेंदुल्कर जैसे खिलाड़ियों ने क्रिकेट का ककहरा सीखा था। माना कि इन लोगों में लाख बुराइयां होंगी जो सबमें होती हैं पर इन्होंने खबर जुगाड़ने के लिए सिर्फ फोनबाज़ी नहीं की बल्कि जोखिम लेकर स्पॉट पर पहुंच रिपोर्ट्स दर्ज की। आज दौर चला है सवालों पर लगाम लगाने का। विपक्ष वगैरह को तो चुनाव में हराकर आप संख्या में कम कर सकते हो, बिकने वालों को खरीद सकते हो लेकिन ईमानदार और प्रतिबद्ध पत्रकार को खत्म करने का तरीका यही खोजा गया कि चार बेइमानों के नाम लेकर पूरे पेशे की विश्वसनीयता खत्म कर डालो। अब नेताओं से किया गया कोई आम और सहज सवाल भी दलाली से निकला सवाल आसानी से बनाया जा सकता है। इस पेशे को रगेदने में जितने ज़िम्मेदार पत्रकारिता संस्थान चलानेवाले हैं, उससे बहुत ज़्यादा वो हैं जिन्होंने पत्रकारों की क्रेडिबिलिटी को अपने लाभ के लिए भोथरा बनाया। अस्पतालों में शूटिंग मना होती है, सरकारी कार्यालयों में भी इजाजत नहीं होती लेकिन एक पत्रकार कैमरा छिपाकर और कानून तोड़कर वहां ये शूट करने के लिए पहुंचता है कि देखिए कानून तोड़ा जा रहा है। उस चैलेंज और रिस्क का सामना कोई नहीं कर सकता जब आप किसी चुने हुए नेता के क्षेत्र में पहुंचकर उसके वोटर्स से ही पूछ रहे होते हैं क्या आपके नेता ने आपकी परेशानी हल कर दी?

Pradeep Balbir Singh Negi बोलती बंद का कांसेप्ट इसलिए आया क्योंकि आजकल पत्रकार रह ही कहाँ गए है वो तो पार्टी की एजेंट्स हो गए है इसलिए जब वो अपनी पार्टी जी ओर से सवाल दागते है तो सामने वाले का जवाब कम और चुप्पी ज्यादा चाहते है । पत्रकारिता कम और शह और मात का खेल ज्यादा चलता है।

Manish Chandra Mishra सही बात…और टीवी वालों ने ऑन कैमरा कुछ ज्यादा ही एक्टिंग सिखा दी नेताओं को. ये एंकरानियां जब जबरदस्ती का कड़ा रुख अपनाती है तो बड़ी फनी लगती है. आजकल देवगन तो जबरदस्ती के साथ भी जबरदस्ती कर रहा है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार को बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांग देना चाहिए!

Nitin Thakur : मुझे बिलकुल समझ नहीं आ रहा है कि ये सरकार रवीश कुमार को इतनी मोहलत क्यों दे रही है। उन्हें तो बिना सुनवाई के ही फांसी पर टांगा जाना चाहिए। आखिर किसी पत्रकार के भाई का नाम सेक्स रैकेट चलाने में आए और फिर भी पत्रकार को खुला घूमने दिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है? पहले तो उनके भाई ब्रजेश पांडे ने लहर के खिलाफ जाकर कांग्रेस ज्वाइन कर ली.. ऊपर से टिकट लेकर विधायकी लड़ने का जुर्म किया.. इसके बाद भी ना ब्रजेश पांडे में राष्ट्रवाद ने उफान मारा और ना ही उन्हें देश के हिंदुओं की कोई फिक्र हुई.. कांग्रेस में ही उपाध्यक्ष का पद लेकर राजनीति जारी रखी।

किसी पत्रकार का भाई राजनीति करे ये भले गैर कानूनी ना हो लेकिन पत्रकार की नौकरी के लिए मुफीद नहीं। इससे पत्रकार पर ठप्पा लगना तय है, भले वो ज़िंदगी भर उसी पार्टी की लेनी देनी करता रहा हो। पत्रकार के रिश्तेदारों को ठेकेदारी भी नहीं करनी चाहिए और ना ही ऊंची नौकरी में जाना चाहिए.. हो ना हो ज़रूर पत्रकार ही ठेके दिलवा रहा होगा.. और वो ही नौकरी की भी सिफारिश कर रहा होगा। इस सबके बाद अगर पत्रकार का कोई दूर या पास का रिश्तेदार किसी कानूनी पचड़े में फंस जाए.. फिर चाहे वो छोटा हो या बड़ा तो भी ये पत्रकार की ही गलती है।

आखिर उसके घर के सभी लोग संस्कारी क्यों नहीं हैं ? क्या हक है किसी ऐसे आदमी को पत्रकारिता करने का जिसके घरबार-परिवार में किसी का नाम किसी कानूनी मामले में आ जाए? इस देश में बिज़नेस, सरकारी नौकरी और राजनीति भले किसी नैतिक दबाव से मुक्त हो कर की जा सकते हों लेकिन पत्रकारिता करने के नियम बेहद कड़े हैं और मई 2014 के बाद तो ये और भी मुश्किल हो गए हैं। खैर, नया फैशन ये है कि जो पत्रकार आपके रुझान के मुफीद ना पड़ता हो और लड़कीबाज़ी से लेकर कमीशनखोरी तक के इल्ज़ाम उस पर ना टिकते हों तो फिर पत्रकार के रिश्तेदारों का कंधा सीधा कीजिए और उस पर बंदूक रखकर पत्रकार को गोली मार दीजिए।

यहां टीवी पर फिरौती लेते पत्रकार देखे गए हैं.. नकली स्टिंग चलाकर चैनल बैन करवा डालने वाले पत्रकार देखे गए हैं.. और ना जाने कहां-कहां क्या-क्या करनेवाले पत्रकार और पत्रकारिता संस्थान भी देखे गए हैं (लिस्ट बनानी शुरू करूं तो वो भी शर्मसार होंगे जो कल अपनी पोस्टों में नैतिक ज्ञान बघार रहे थे.. उनके संस्थानों में लड़कियों के साथ क्या कुछ होता रहा है इन करतूतों की अधिक जानकारी के लिए Yashwant भाई का भड़ास पढ़ा जा सकता है)। इस देश ने फिरौती वसूलने के बाद कई साल तक अपनी इमेज मेकिंग के लिए अति राष्ट्रवादी और धार्मिक उन्माद फैलानेवाली पत्रकारिता करनेवालों को माफ किया है पर मैं देश की जनता से मांग करता हूं कि ऐसे पत्रकार को माफ ना किया जाए जिसका भाई अपने प्रदेश में मर चुकी एक पार्टी से राजनीति तो करता ही है, साथ में उस पर किसी नेता की ही बेटी आरोप लगा दे। वैसे मामला और निशाना दोनों समझनेवाले सब समझ रहे हैं लेकिन दिक्कत दो तरह के लोगों के साथ है। एक तो वो हैं जो किसी भी हाल में महिलावादी या दलितवादी दिखने को मजबूर हैं ( वजह वो ही जानें) और दूसरे वो जिन्हें मामले में दिलचस्पी कम बल्कि पत्रकार के चीर हरण में आनंद ज़्यादा आ रहा है (वजह सबको पता है)।

किसी को डिफेंड करने का कोई इरादा नहीं है लेकिन रवीश को करूंगा। उन्हें इसलिए नहीं करूंगा कि मैं उनका कोई फैन-वैन हूं बल्कि इसलिए करूंगा क्योंकि एजेंडेबाज़ी का ये खेल यहीं नहीं थमनेवाला। अगर रवीश कुमार को गिराए जाने में कायमाबी मिल गई तो फिर इस्टेब्लिशमेंट के सामने खड़ा हर पत्रकार इसी रणनीति से गिराया जाएगा। अपने यारों,दोस्तों, रिश्तेदारों के कारनामों से अपना चरित्र जज होने से बचाने के लिए हर छोटे- बड़े पत्रकार को करियर की शुरूआत में ही अखबार में विज्ञापन निकलवाना पड़ेगा। उसमें पत्रकार घोषित करेगा कि, ”आज और अभी से मैं अपने सभी नाते-रिश्तेदारों से सारे संबंध खत्म कर रहा हूं। इनके किए-अनकिए के ज़िम्मेदार यही होंगे, मैं नहीं। मेरी निष्ठाओं को इनकी करतूतों पर ना परखा जाए।” ये घोषणा भले इस मुल्क के नेताओं को करने के लिए मजबूर ना होना पड़े.. नौकरशाहों से ना कराई जाएं लेकिन पत्रकारों से ज़रूर करवाएं.. आखिर देश के सारे फैसले वो ही तो लेेते हैं और आपकी ज़िंदगी के ना जाने कितने फैसले पत्रकार ही प्रभावित कर रहे हैं! पत्रकार ना हों तो देश आज ही चांद पर कॉलोनी बना ले। आपके खातों में 15 लाख भी आ जाएँ। समाजवाद का सपना ये पत्रकार प्रजाति ही रोक कर खड़ी है।

अब अंत में एक और बात.. लड़की ने आरोप लगाए हैं तो उसकी एफआईआर भी दर्ज हुई.. तुरंत कार्रवाई करते हुए मामला सीआईडी के हाथों में दिया गया। एसआईटी ने जांच करते हुए लड़की के आरोपों को सही भी पाया। नीतीश कुमार की पुलिस की तारीफ होनी चाहिए। इतनी जल्दी कार्रवाई गुजरात के कच्छ में नहीं हुई जहां पर एक लड़की ने बीजेपी के कई आला नेताओँ पर लड़कियां सप्लाई करने का आरोप लगाया था और बाकायदा अपनी वीडियो क्लिप के साथ सामने आई थी। उसने रैकेट के बारे में सबूत भी दिए थे। यहां मसला और ही कुछ है।

लड़की ने 22 दिसंबर को एफआईआर में एक लड़के निखिल, उसके पिता और भाई का नाम डलवाया। भाई पर जातिसूचक गाली देने के आरोप भी लगाए।याद रहे कि आरोप छेड़छाड़ के थे, रेप के नहीं। यहां तक ब्रजेश पांडे कहानी में नहीं हैं। खैर, पुलिस एक हद तक दबाव डालकर अक्सर एफआईआर हल्की करा देती है इसलिए बाद में मजिस्ट्रेट के सामने अकेले में बयान लिए जाते हैं और वही आखिरी माने भी जाते हैं। दो दिन बाद कोर्ट में यही लड़की धारा 164 के तहत बयान देती है और निखिल नाम के मुख्य अभियुक्त पर शादी का झाँसा देकर रेप करने का आरोप लगाती है। यहां भी ब्रजेश पांडे का नाम कहीं नहीं है। 30 दिसंबर को सीआईडी ने मामला हाथ में लिया मगर पीड़िता ने बार-बार बयान देने के बावजूद ब्रजेश पांडे का नाम नहीं लिया। सीआईडी ने जो एसआईटी बनाई उसकी जांच में एक महीने के बाद लड़की ने एक पार्टी में ब्रजेश पांडे से मिलने और छेड़छाड़ के इल्ज़ाम लगाए।

बिहार के टीवी पत्रकार Santosh Singh ने मामले की तफ्तीश की है। सारे कागज़ निकलवाए और मामले की प्रक्रिया देखी। उन्होंने फेसबुक पर ही सारी जानकारी तारीख के हिसाब से दी है और ये भी लिखा है कि पीड़िता ने ब्रजेश पांडे को फेसबुक पर देखा कि ये निखिल की फ्रेंड लिस्ट में हैं। पीड़िता का कहना है कि इनको लेकर मैं अपने दोस्तों से चर्चा किया तो कहा कि ये सब लगता है सैक्स रकैट चलाता है इन सबों से सावधान रहो। पुलिस डायरी में एक गवाह सामने आता है मृणाल जिसकी दो बार गवाही हुई है। पहली बार उन्होनें ब्रजेश पांडेय के बारे में कुछ नही बताया, निखिल की अवारागर्दी की चर्चा खूब की। उसके एक सप्ताह बाद फिर उसकी गवाही हुई। और इस बार उसकी गवाही का वीडियोग्राफी भी हुआ, जिसमें उन्होने कहा कि एक दिन निखिल और पीड़िता आयी थी, निखिल ने पीड़िता को कोल्डड्रिंक पिलाया और उसके बाद वह बेहोश होने लगी उस दिन निखिल के साथ ब्रजेश पांडेय भी मौंजूद थे …मृणाल उसी पार्टी वाले दिन का स्वतंत्र गवाह है। लेकिन उसने ब्रजेश पांडेय छेड़छाड़ किये है, ऐसा बयान नही दिया।

वैसे मैंने भी शिकायतकर्ता लड़की के आरोप सुने हैं। पत्रकार ने पूछा कि सैक्स रैकेट चलाने वाली बात कैसे कह सकती हैं तो उसने कहा कि चूंकि निखिल ने मुझे ब्रजेश के साथ दिल्ली जाने को कहा था तो मुझे उससे लगता है। लड़की ने जो पत्रकार से कहा उससे ये भी मालूम चलता है कि वो निखिल से शादी करना चाहती थी और जब उसने ऐसा करने से इनकार किया तब वो उसके पिता से मिलने पहुंची थी। वैसे लड़की की पहचान नहीं खोलनी चाहिए लेकिन अब चूंकि वो खुद मीडिया में इंटरव्यू दे रही है और बीजेपी नेताओं ने काफी हद तक पहचान खोल दी है तो इतना तो जान ही लीजिए कि उसका बैकग्राउंड कमज़ोर कतई नहीं है, अच्छा खासा पॉलिटिकल है तो संभावनाएं और आशंकाएं खूब हैं। बहरहाल लड़की का मीडिया ट्रायल करना गलत है, भले वो खुद मीडिया तक आई है.. लेकिन उतना ही गलत उस पत्रकार का मीडिया ट्रायल भी है जो खुद इसमें कहीं से शामिल नहीं। हां, अगर किसी को मज़ा ही रवीश कुमार को फंसाने में आ रहा हो तो बात अलग है। केजरीवाल को काबू करने के सिलसिले में जब केंद्र उनके खिलाफ कुछ ना ढूंढ सका तो विधायकों को जिस बेशर्मी से औने-पौने मामलों में जेल भेजा गया वो सबके सामने है.. ये अलग बात है कि ऐसे ही मामलों में फंसे होने के बावजूद ना स्मृति ईरानी को छेड़ा गया और ना ही निहालचंद को।

सोशल मीडिया के चर्चित और जनपक्षधर लेखक नितिन ठाकुर की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें :

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

क्या रवीश के शो की टीआरपी ना आने की वजह से किसी को दस्त लग सकते हैं?

Nitin Thakur : क्या रवीश कुमार के शो की टीआरपी ना आने की वजह से किसी को दस्त लग सकते हैं? जी हां, लग सकते हैं। एक जाने-माने दरबारी विदूषक (विदूषक सम्मानित व्यक्ति होता है, दरबारी विदूषक पेड चाटुकार होता है) का हाजमा खराब हो गया और उसने मीडिया पर अफवाह फैलाने वाली एक वेबसाइट का मल रूपी लिंक अपनी पोस्ट पर विसर्जित कर दिया। कई बार लोग जो खुद नहीं कहना चाहते या लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते वो किसी दूसरे के लिखे हुए का लिंक डाल कर बता देते हैं।

वेबसाइट चुगली कर रही थी कि रवीश के शो की टीआरपी ना आने की वजह से अब चैनल उनके प्रोग्राम का विश्लेषण कर रहा है। हां, वेबसाइट ने ये नहीं बताया कि बाई द वे एनडीटीवी के कौन से प्रोग्राम की टीआरपी आ रही है। टीआरपी के आधार पर तो पूरा चैनल ही विश्लेषण के दायरे में है, लेकिन लिखनेवाले की शैली से पता लग रहा है कि उसका इंटरेस्ट लिखने में कम बल्कि रवीश के खिलाफ प्रचार में ज़्यादा है। आखिर कोई रवीश कुमार के नाम के आगे ब्रैकेट में पांडे यूं ही तो नहीं लिख देगा। ये बात और है कि पूरे लेख में लेखक बेचारा रवीश के नाम की स्पैलिंग तक ठीक लिखने में भटक रहा है मगर जाति का ज़िक्र करना उसे बहुत ज़रूरी लगा (और इस तरह के कच्चे लेख को छापना दरबारी विदूषक को भी ज़रूरी लगा)।

आगे बता दूं कि ‘रवीश कुमार के शो की टीआरपी नहीं आ रही’ ये बताते हुए लेखक को इस बात का ज़िक्र करना बहुत आवश्यक लगा कि रवीश के भाई को बिहार में कांग्रेस से टिकट मिला था। इन दोनों बातों का आपस में कनेक्शन सिर्फ वो लोग ही जोड़ सकते हैं जिन्हें शो और उसके कंटेंट से ज़्यादा रवीश की जाति और उनके भाई के चुनाव में रुचि है। मुझे शो और उसके एंकर से सवाल करने पर कोई आपत्ति नहीं है, वो खूब करें लेकिन लेख की भाषा और खबर से इतर अफवाहें फैलाने से मुझे एक खास किस्म की सोच वालों के जलने की बू आ रही है। वैसे भी रवीश कुमार के प्रति इनकी झल्लाहट और उसकी वजह किसी से छिपी नहीं। एक बात मैं लेख लिखनेवाले अद्भुत प्राणी से जानना चाहूंगा।

लेख की शुरूआत में उसने लिखा, ‘सरोकार की बात करने वाले एंकर्स भी लाखों की सैलरी पाते हैं ‘, मैं ये नहीं समझ पाया कि लाखों की सैलरी पाने में सरोकार कहां से बाधक बन गए? एंकर चोरी कर रहा है, डाका डाल रहा है या अपराध कर रहा है? संस्थान ने एंकर के साथ कॉन्ट्रैक्ट किया और सैलरी दी, इसमें ये सरोकार किस ढंग से बिखर गए? जब अफवाह फैलाते लेख लिखने से सरोकारों को चोट नहीं पहुंच रही तो किसी इंसान को मेहनत का ठीक मेहनताना मिलने से सरोकारों की कौन सी हत्या हो रही है? तुम क्या चाहते हो कि पत्रकार ज़िंदगी भर झोला ही उठाए फिरे?

एंकर क्या हर पत्रकार को लाखों में सैलरी मिलनी चाहिए, ताकि उसे घर चलाने के लिए कोई झूठ बोलने वाली वेबसाइट ना चलानी पड़े और उस पर हिट्स के लिए किसी दरबारी विदूषक से फेसबुक पर लिंक शेयर की गुज़ारिश ना करनी पड़े। वैसे ‘सूत्रों’ के मुताबिक इस अफवाह फैलानेवाली वेबसाइट का लिंक शेयर करनेवाले दरबारी विदूषक महोदय को भी लाखों में सैलरी मिलती है और उसके सरोकार झूठ फैलाने वाले लिंक डालने के बावजूद बरकरार हैं।

सोशल मीडिया के चर्चित राइटर नितिन ठाकुर की एफबी पोस्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मीडिया हो या आरबीआई, सभी इस मोदी सरकार से थोड़ा डर कर चल रहे हैं : राहुल गांधी

राहुल गांधी का आज का भाषण उन्हें बहुत आगे ले जाएगा। उन्होंने दिल्ली में खड़े होकर जो लाइन कांग्रेस और बीजेपी के बीच खींची है अगर उसे कायम रख पाए तो कोई वजह नहीं कि कांग्रेस की अगली जीत के नायक वही हों। कई और ठीक-गलत बातों से हट कर उन्होंने आज जो बार-बार कहा, वो था ‘डरो मत’। ना राहुल ने यूपीए के विकास कार्य गिनाए, ना राहुल ने हिंदू-मुस्लिम की बात की, ना राहुल ने एनडीए के घोटाले बताए… उन्होंने जो कहा वो सिर्फ इतना था कि बीजेपी- संघ परिवार ‘डराओ’ की लाइन पर चलते हैं जबकि कांग्रेस का हाथ ‘डरो मत’ कहता है। वोटर ऐसी सीधी बात ही समझता है, जबकि सीधे-सादे इन दो शब्दों के अर्थ कहीं ज़्यादा गहरे और सच्चे हैं।

राहुल ने आज सुबह के भाषण में मीडिया का हवाला दिया था। दोपहर भी वही दोहराया। उन्होंने जो ऊपर-ऊपर कहा लेकिन समझा दिया वो इतना ही था कि पत्रकार सरकार के खिलाफ लिखते हुए डरने लगा है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने जहां संस्थानों को इज़्ज़त दी और उनको बनाए रखा वहीं बीजेपी ने उनके अधिकार छीनकर उन्हें अपाहिज (बीजेपी के अपने शब्दकोष के मुताबिक दिव्यांग) बना दिया। मीडिया हो या आरबीआई सभी सरकार से थोड़ा डर कर चल रहे हैं। यही सब संस्थाएं कांग्रेस के शासन में भी थीं लेकिन इनका काम खुलकर जारी था। किसे याद नहीं कि मीडिया राहुल और सोनिया पर कैसे-कैसे तंज करता था। बिलो द बेल्ट जाकर सोशल मीडिया में कहानियां बांची जाती थीं। पर्सनल अटैक की तो कोई सीमा तय ही नहीं की गई। उस वक्त कोई पीएम पद की प्रतिष्ठा की बात करता ही नहीं था, सोनिया को भी महिला होने के नाते सम्मान नहीं दिया गया।

कांग्रेस लाठी-डंडे लेकर प्रभात फेरी और पथ संचलन नहीं करती थी। ना उसके कार्यकर्ता किसी खास दिन मारपीट करके बाज़ार बंद करवाने सड़कों पर उतरते थे। कोई भावना दुखने पर भी कांग्रेस के चमचे सोशल मीडिया पर गालियों की बाढ़ नहीं लाए। इनमें से किसी ने पत्रकारों और चैनलों के घटिया नाम नहीं रखे। असहिष्णुता का ऐसा माहौल नहीं था जिसमें कलाकार असहज महसूस करता हो। कौन सा फिल्म सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष उस वक्त संस्कारी बॉस बनकर कलाकारों की मेहनत पर कट मार रहा था? वो सरकार करप्ट होगी .. लेकिन उसने इस्तीफे भी लिए और मंत्री पद से हटाकर लोगों को जेल भी भेजा। हालांकि मैं फिर भी यूपीए को बरी नहीं करता पर उस वक्त आलोचना करनेवालों की तरफ आंखें नहीं तरेरी गईं।

कैग की रिपोर्ट तक सरकारी दबाव के बिना आती थी और सरकार की ही पोल खोल कर धर देती थी। हो सकता है ये इमरजेंसी लगाने का भूत रहा हो जिसने हर कांग्रेसी सरकार को संस्थानों का सम्मान करने के प्रति अधिक कॉन्शियस रखा जबकि बीजेपी वाले इसी ओवर कॉन्फिडेंस में दूसरों की आज़ादी कम करते चले गए कि हमसे ज़्यादा लोकतंत्र के लिए भला कौन लड़ा है ? राहुल ने जिस ‘डर’ की भावना को आज लफ्ज़ दिए हैं वो उनका कल्याण कर सकती है बशर्ते आगे भी वो भ्रम में ना पड़कर सीधी बात करें। विरोधी तो मज़ाक अब भी बनाएंगे लेकिन उन्हें नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो रहा है। लोकतंत्र में एक कमजोर विपक्ष अगर अब ताकत जुटा रहा है तो ये लोकतंत्र के लिए अच्छा ही है। वैसे भी किसी पार्टी का मुकाबला कोई पार्टी ही कर सकती है, एनजीओ या मीडिया नहीं।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: