
मध्य प्रदेश की मंत्री को हेयर लाइन फ्रैक्चर के बाद ले गए थे दिल्ली, वहां पता चला ऑपरेशन की जरूरत नहीं। हेयरलाइन फ्रैक्चर के लिए दिल्ली आने का कोई मतलब नहीं है। हेयरलाइन फ्रैक्चर का मतलब हुआ हड्डी चटक जाना लगभग वैसे ही जैसे कांच चटक जाता है। कांच चटके तो कोई भारी संकट नहीं होता भले जुड़ नहीं सकता है पर हड्डी चटख जाए तो संकट थोड़ा होता है लेकिन हड्डी स्वयं जुड़ जाती है बशर्ते उसे बांध कर स्थिर रखा जाए।
यह बात तो आम समझ की है और उम्र के साथ आदमी इतने मामले देख सुन लेता है कि यह बात मालूम हो ही जानी चाहिए। फिर भी स्वास्थ्य – शिक्षा और संस्कृति मंत्री को मध्य प्रदेश या भोपाल के डॉक्टर्स ने दिल्ली भेज दिया तो यह उनकी महानता से कम नहीं है। और, स्वयं मंत्री के लिए भी। ठीक है कि मंत्री हैं, सरकारी खर्च पर सब कुछ होना था तो दिखा लिया पर यह भेड़िया आया जैसी बात न हो जाए।
मुझे नहीं पता मामला असल में क्या है और हेयर लाइन फ्रैक्चर होने की बात मरीज यानी मंत्री को बताई गई कि नहीं और नहीं बताई गई तो क्यों और बताने या नहीं बताने दोनों दशा में भोपाल से दिल्ली जाने की सलाह किसने, किसलिए दी। मैं खबर और ऐसी खबरों के प्रभाव की चर्चा कर रहा हूं। किसी और के लिए तो यह फिर भी क्षम्य था – एक राज्य की मंत्री अपना हेयरलाइन फ्रैक्चर दिल्ली में ठीक कराएंगी तो राज्य के अस्पतालों में क्या होगा? खबर से लगता है कि कुछ कनफ्यूजन था। इसमें सीटी स्कैन की भी बात है। हेयरलाइन फ्रैक्चर में सीटी स्कैन की क्या जरूरत? कायदे से रिपोर्टर को इस बारे में भी लिखना चाहिए था। कुल मिलाकर ऐसी खबरों से मजाक ही उड़ता है फिर भी ऐसी खबरें होती रहती हैं।
सीटी स्कैन की जरूरत क्यों पड़ी और सीटी से क्या कनफ्यूजन हुआ यह बताए बगैर चिकित्सकों के नाम के साथ लिखना की उन्होंने जरूरत बताई थी उनकी गरिमा कम करना है। आम मरीज इस तरह चिकित्सकों की सलाह पर दिल्ली-भोपाल करेगा। तकनीक के इस जमाने में? कायदे से खबर यही है कि मंत्री को किन हालात में भोपाल से दिल्ली भेज दिया गया और इसमें कहां क्या गड़बड़ हुई। अगर मामला बड़ा नहीं था तो क्या मध्य प्रदेश के चिकित्सकों ने वही किया जो जिल्ली में प्राइवेट अस्पताल के डॉक्टर पैसे बनाने के लिए करते हैं? कुल मिलाकर, लगता है कि स्वास्थ्य मंत्री को स्वास्थ्य से संबंधित मामलों की भी मामूली जानकारी नहीं है और यही हाल इस रिपोर्ट का है। जिसने सबसे पहले या जल्दी खबर करने के चक्कर में जो भी, जितना पता चला लिख मारा। इससे सूचना कम मिलती है रिपोर्टर होने की उसकी योग्यता पर ज्यादा सवाल उठते हैं।
एक तरफ केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार अस्पताल और चिकित्सा सुविधा की जगह लोगों का बीमा करवाकर वोट बटोरने के चक्कर में है दूसरी ओर कांग्रेस की मंत्री मामूली से मामले में दिल्ली भागी आ रही हैं तो सवाल उठता है कि देश में हो क्या रहा है। वह भी तब जब तकनीक की बात करें तो अपोलो अस्पताल हिमालय में अपोलो रिमोट हेल्थकेयर सर्विसेज द्वारा टेली-एमरजेंसी सुविधा मुहैया करा रहा है। अपोलो टेलीहेल्थ सर्विसेज ने 28 फरवरी 2018 तक समुद्रतल से 14,000 फीट ऊपर 10,000 से ज्यादा टेलीकंसलटेशन मुहैया कराए थे। हिमाचल प्रदेश के काजा और कीलांग क्षेत्र में करीब 750 इमरजेंसी मामले टेली कंसलटेशन से संभाले गए थे।
एक पुरानी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अपोलो टेलीहेल्थ को लाहौल और स्पीति जिलों में (3600 मीटर की ऊंचाई पर 34,000 की आबादी को) रिमोट हेल्थकेयर मुहैया कराने के लिए ठेका दिया गया था। अपोलो टेलीहेल्थ सर्विसेज अब इन दो और क्षेत्रों में टेलीहेल्थ सेवाएं मुहैया कराएगा और संपूर्ण कार्य के लिए जिम्मेदार होगा। इनमें टेक्नालॉजी समाधान (कनेक्टिविटी, सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर), टेलीकंसलटैंट मुहैया कराना तथा स्थानीय समुदायों के बीच जागरूकता पैदा करना शामिल है। और दूसरी ओर मंत्री का दिल्ली भागा आना। खबरों में रहने वाले हमलोग क्या करें?
लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक हैं. उनसे संपर्क
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